उत्तरकाण्ड, सर्ग 97
रामो बहून्यहान्येव तद् गीतं परमं शुभम् । शुश्राव मुनिभिः सार्धं पार्थिवैः सह वानरैः ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार श्रीरघुनाथजी ऋषियों, राजाओं और वानरोंके साथ कई दिनोंतक वह उत्तम रामायण-गान सुनते रहे ॥ १ ॥
तस्मिन् गीते तु विज्ञाय सीतापुत्रौ कुशीलवौ । तस्याः परिषदो मध्ये रामो वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥ दूताञ्शुद्धसमाचारानाह्वयात्ममनीषया । मद् वचो ब्रत गच्छध्वमितो भगवतोऽन्तिके ॥ ३ ॥
भावार्थ
उस कथासे ही उन्हें यह मालूम हुआ कि ‘कुश और लव दोनों कुमार सीताके ही सुपुत्र हैं ।’ यह जानकर सभाके बीचमें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीने शुद्ध आचार-विचारवाले दूतोंको बुलाया और अपनी बुद्धिसे विचारकर कहा—‘तुमलोग यहाँसे भगवान् वाल्मीकिमुनिके पास जाओ और उनसे मेरा यह संदेश कहो ॥ २-३ ॥
यदि शुद्धसमाचारा यदि वा वीतकल्मषा । करोत्विहात्मनः शुद्धिमनुमान्य महामुनिम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘यदि सीताका चरित्र शुद्ध है और यदि उनमें किसी तरहका पाप नहीं है तो वे आप महामुनिकी अनुमति ले यहाँ आकर जनसमुदायमें अपनी शुद्धता प्रमाणित करें’ ॥ ४ ॥
छन्दं मुनेश्च विज्ञाय सीतायाश्च मनोगतम् । प्रत्ययं दातुकामायास्ततः शंसत मे लघु ॥ ५ ॥ श्वः प्रभाते तु शपथं मैथिली जनकात्मजा । करोतु परिषन्मध्ये शोधनार्थं ममैव च ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘तुम इस विषयमें महर्षि वाल्मीकि तथा सीताके भी हार्दिक अभिप्रायको जानकर शीघ्र मुझे सूचित करो कि क्या वे यहाँ आकर अपनी शुद्धिका विश्वास दिलाना चाहती हैं ॥ ‘कल सवेरे मिथिलेशकुमारी जानकी भरी सभामें आवें और मेरा कलंक दूर करनेके लिये शपथ करें’ ॥ ६ ॥
श्रुत्वा तु राघवस्यैतद् वचः परममद्भुतम् । दूताः सम्प्रययुर्बाढं यत्र वै मुनिपुङ्गवः ॥ ७ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीका यह अत्यन्त अद्भुत वचन सुनकर दूत उस बाड़ेमें गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकि विराजमान थे ॥ ७ ॥
ते प्रणम्य महात्मानं ज्वलन्तममितप्रभम् । ऊचुस्ते रामवाक्यानि मृदूनि मधुराणि च ॥ ८ ॥
भावार्थ
महात्मा वाल्मीकि अमित तेजस्वी थे और अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहे थे । उन दूतोंने उन्हें प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजीके वचन मधुर एवं कोमल शब्दोंमें कह सुनाये ॥ ८ ॥
तेषां तद् भाषितं श्रुत्वा रामस्य च मनोगतम् । विज्ञाय सुमहातेजा मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥ एवं भवतु भद्रं वो यथा वदति राघवः । तथा करिष्यते सीता दैवतं हि पतिः स्त्रियाः ॥ १० ॥
भावार्थ
उन दूतोंकी वह बात सुनकर और श्रीरामके हार्दिक अभिप्रायको समझकर वे महातेजस्वी मुनि इस प्रकार बोले–॥ ‘ऐसा ही होगा, तुमलोगोंका भला हो । श्रीरघुनाथजी जो आज्ञा देते हैं, सीता वही करेगी; क्योंकि पति स्त्रीके लिये देवता है’ ॥ १० ॥
तथोक्ता मुनिना सर्वे राजदूता महौजसम् । प्रत्येत्य राघवं सर्वे मुनिवाक्यं बभाषिरे ॥ ११ ॥
भावार्थ
मुनिके ऐसा कहनेपर वे सब राजदूत महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीके पास लौट आये । उन्होंने मुनिकी कही हुई सारी बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं ॥ ११ ॥
ततः प्रहृष्टः काकुत्स्थः श्रुत्वा वाक्यं महात्मनः । ऋषींस्तत्र समेतांश्च राज्ञश्चैवाभ्यभाषत ॥ १२ ॥
भावार्थ
महात्मा वाल्मीकिकी बातें सुनकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने वहाँ आये हुए ऋषियों तथा राजाओंसे कहा—॥ १२ ॥
भगवन्तः सशिष्या वै सानुगाश्च नराधिपाः । पश्यन्तु सीताशपथं यश्चैवान्योऽपि काङ्क्षते ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘आप सब पूज्यपाद मुनि शिष्योंसहित सभामें पधारें । सेवकोंसहित राजालोग भी उपस्थित हों तथा दूसरा भी जो कोई सीताकी शपथ सुनना चाहता हो, वह आ जाय । इस प्रकार सब लोग एकत्र होकर सीताका शपथ-ग्रहण देखें’ १३
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः । सर्वेषामृषिमुख्यानां साधुवादो महानभूत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
महात्मा राघवेन्द्रका यह वचन सुनकर समस्त महर्षियोंके मुखसे महान् साधुवादकी ध्वनि गूँज उठी ॥ १४ ॥
राजानश्च महात्मानं प्रशंसन्ति स्म राघवम् । उपपन्नं नरश्रेष्ठ त्वय्येव भुवि नान्यतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
राजालोग भी महात्मा रघुनाथजीकी प्रशंसा करते हुए बोले—‘नरश्रेष्ठ ! इस पृथ्वीपर सभी उत्तम बातें केवल आपमें ही सम्भव हैं, दूसरे किसीमें नहीं’ ॥ १६ ॥
एवं विनिश्चयं कृत्वा श्वोभूत इति राघवः । विसर्जयामास तदा सर्वांस्ताञ्छत्रुसूदनः ॥ १६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार दूसरे दिन सीतासे शपथ लेनेका निश्चय करके शत्रुसूदन श्रीरामने उस समय सबको बिदा कर दिया ॥ १६ ॥
इति सम्प्रविचार्य राजसिंहः श्वोभूते शपथस्य निश्चयम् । विससर्ज मुनीन् नृपांश्च सर्वान् स महात्मा महतो महानुभावः ॥ १७ ॥
भावार्थ
इस प्रकार दूसरे दिन सवेरे सीतासे शपथ लेनेका निश्चय करके महानुभाव महात्मा राजसिंह श्रीरामने उन सब मुनियों और नरेशोंको अपने-अपने स्थानपर जानेकी अनुमति दे दी ॥ १७ ॥
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