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उत्तरकाण्ड, सर्ग 100

रसातलं प्रविष्टायां वैदेह्यां सर्ववानराः । चुक्रुशुः साधुसाध्वीति मुनयो रामसंनिधौ ॥ १ ॥

भावार्थ

विदेहकुमारी सीताके रसातलमें प्रवेश कर जानेपर श्रीरामके समीप बैठे हुए सम्पूर्ण वानर तथा ऋषि-मुनि कहने लगे— ‘साध्वी सीते ! तुम धन्य हो’ ॥ १ ॥

दण्डकाष्ठमवष्टभ्य बाष्पव्याकुलितेक्षणः । अवाक्शिरा दीनमना रामो ह्यासीत् सुदुःखितः ॥ २ ॥

भावार्थ

किंतु स्वयं भगवान् श्रीराम बहुत दुखी हुए । उनका मन उदास हो गया और वे गूलरके दण्डेका सहारा लिये खड़े हो सिर झुकाये नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ २ ॥

स रुदित्वा चिरं कालं बहुशो बाष्पमुत्सृजन् । क्रोधशोकसमाविष्टो रामो वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥

भावार्थ

बहुत देरतक रोकर बारंबार आँसू बहाते हुए क्रोध और शोकसे युक्त हो श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार बोले—॥३॥

अभूतपूर्वं शोकं मे मनः स्प्रष्टुमिवेच्छति । पश्यतो मे यथा नष्टा सीता श्रीरिव रूपिणी ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘आज मेरा मन अभूतपूर्व शोकमें डूबना चाहता है; क्योंकि इस समय मेरी आँखोंके सामनेसे मूर्तिमती लक्ष्मीके समान सीता अदृश्य हो गयीं ॥ ४ ॥

सादर्शनं पुरा सीता लङ्कां पारे महोदधेः । ततश्चापि मयाऽऽनीता किं पुनर्वसुधातलात् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘पहली बार सीता समुद्रके उस पार लङ्कामें जाकर मेरी आँखोंसे ओझल हुई थीं । किंतु जब मैं वहाँसे भी उन्हें लौटा लाया, तब पृथ्वीके भीतरसे ले आना कौन बड़ी बात है ?’॥५॥

वसुधे देवि भवति सीता निर्यात्यतां मम । दर्शयिष्यामि वा रोषं यथा मामवगच्छसि ॥ ६ ॥

भावार्थ

( यों कहकर वे पृथ्वीसे बोले—-) ‘पूजनीये भगवति वसुन्धरे ! मुझे सीताको लौटा दो; अन्यथा मैं अपना क्रोध दिखाऊँगा । मेरा प्रभाव कैसा है ? यह तुम जानती हो॥६॥

कामं श्वश्रूर्ममैव त्वं त्वत्सकाशात् तु मैथिली । कर्षता फालहस्तेन जनकेनोद्धता पुरा ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘देवि ! वास्तवमें तुम्हीं मेरी सास हो । राजा जनक हाथमें फाल लिये तुम्हींको जोत रहे थे, जिससे तुम्हारे भीतरसे सीताका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ७ ॥

तस्मान्निर्यात्यतां सीता विवरं वा प्रयच्छ मे । पाताले नाकपृष्ठे वा वसेयं सहितस्तया ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘अतः या तो तुम सीताको लौटा दो अथवा मेरे लिये भी अपनी गोदमें जगह दो; क्योंकि पाताल हो या स्वर्ग, मैं सीताके साथ ही रहूँगा ॥ ८ ॥

आनय त्वं हि तां सीतां मत्तोऽहं मैथिलीकृते । न मे दास्यसि चेत् सीतां यथारूपां महीतले ॥ ९ ॥ सपर्वतवनां कृत्स्नां विधमिष्यामि ते स्थितिम् । नाशयिष्याम्यहं भूमिं सर्वमापो भवन्त्विह ॥ १० ॥

भावार्थ

‘तुम मेरी सीताको लाओ ! मैं मिथिलेशकुमारीके लिये मतवाला ( बेसुध ) हो गया हूँ । यदि इस पृथ्वीपर तुम उसी रूपमें सीताको मुझे लौटा नहीं दोगी तो मैं पर्वत और वन-सहित तुम्हारी स्थितिको नष्ट कर दूँगा। सारी भूमिका विनाश कर डालूँगा । फिर भले ही सबकुछ जलमय ही हो जाय’ ॥९-१०॥

एवं ब्रुवाणे काकुत्स्थे क्रोधशोकसमन्विते । ब्रह्मा सुरगणैः सार्धमुवाच रघुनन्दनम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजी जब क्रोध और शोकसे युक्त हो इस प्रकारकी बातें कहने लगे, तब देवताओंसहित ब्रह्माजीने उन रघुकुलनन्दन श्रीरामसे कहा—॥ ११ ॥

राम राम न संतापं कर्तुमर्हसि सुव्रत । स्मर त्वं पूर्वकं भावं मन्त्रं चामित्रकर्शन ॥ १२ ॥ न खलु त्वां महाबाहो स्मारयेयमनुत्तमम् । इमं मुहूर्तं दुर्धर्ष स्मर त्वं जन्म वैष्णवम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीराम ! आप मनमें संताप न करें । शत्रुसूदन ! अपने पूर्व स्वरूपका स्मरण करें ॥ ‘महाबाहो ! मैं आपको आपके परम उत्तम स्वरूपका स्मरण नहीं दिला रहा हूँ । दुर्धर्ष वीर ! केवल यह अनुरोध कर रहा हूँ कि इस समय आप ध्यानके द्वारा अपने वैष्णव स्वरूपका स्मरण करें ॥ १३ ॥

सीता हि विमला साध्वी तव पूर्वपरायणा । नागलोकं सुखं प्रायात् त्वदाश्रयतपोबलात् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘साध्वी सीता सर्वथा शुद्ध हैं । वे पहलेसे ही आपके ही परायण रहती हैं । आपका आश्रय लेना ही उनका तपोबल है । उसके द्वारा वे सुखपूर्वक नागलोकके बहाने आपके परमधाममें चली गयी हैं ॥ १४ ॥

स्वर्गे ते संगमो भूयो भविष्यति न संशयः । अस्यास्तु परिषन्मध्ये यद् ब्रवीमि निबोध तत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘अब पुनः साकेतधाममें आपकी उनसे भेंट होगी; इसमें संशय नहीं है । अब इस सभामें मैं आपसे जो कुछ कहता हूँ, उसपर ध्यान दीजिये ॥ १५ ॥

एतदेव हि काव्यं ते काव्यानामुत्तमं श्रुतम् । सर्वं विस्तरतो राम व्याख्यास्यति न संशयः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘आपके चरित्रसे सम्बन्ध रखनेवाला यह काव्य, जिसे आपने सुना है, सब काव्योंमें उत्तम है । श्रीराम ! यह आपके सारे जीवन-वृत्तका विस्तारसे ज्ञान करायेगा, इसमें संदेह नहीं है ॥ १६ ॥

जन्मप्रभृति ते वीर सुखदुःखोपसेवनम् । भविष्यदुत्तरं चेह सर्वं वाल्मीकिना कृतम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘वीर ! आविर्भावकालसे ही जो आपके द्वारा सुख-दुःखोंका ( स्वेच्छासे ) सेवन हुआ है, उसका तथा सीताके अन्तर्धान होनेके बाद जो भविष्यमें होनेवाली बातें हैं, उनका भी महर्षि वाल्मीकिने इसमें पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया है ॥१७॥

आदिकाव्यमिदं राम त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । नह्यन्योऽर्हति काव्यानां यशोभाग् राघवादृते ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! यह आदिकाव्य है । इस सम्पूर्ण काव्यकी आधारशिला आप ही हैं—आपके ही जीवनवृत्तान्तको लेकर इस काव्यकी रचना हुई है । रघुकुलकी शोभा बढ़ानेवाले आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा यशस्वी पुरुष नहीं है, जो काव्योंका नायक होनेका अधिकारी हो ॥ १८ ॥

श्रुतं ते पूर्वमेतद्धि मया सर्वं सुरैः सह । दिव्यमद्भुतरूपं च सत्यवाक्यमनावृतम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘देवताओंके साथ मैंने पहले आपसे सम्बन्धित इस सम्पूर्ण काव्यका श्रवण किया है । यह दिव्य और अद्भुत है । इसमें कोई भी बात छिपायी नहीं गयी है । इसमें कही गयी सारी बातें सत्य हैं ॥ १९ ॥

स त्वं पुरुषशार्दूल धर्मेण सुसमाहितः । शेषं भविष्यं काकुत्स्थ काव्यं रामायणं शृणु ॥ २० ॥

भावार्थ

‘पुरुषसिंह रघुनन्दन ! आप धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो भविष्यकी घटनाओंसे युक्त शेष रामायण काव्यको भी सुन लीजिये ॥ २० ॥

उत्तरं नाम काव्यस्य शेषमत्र महायशः । तच्छृणुष्व महातेज ऋषिभिः सार्धमुत्तमम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘महायशस्वी एवं महातेजस्वी श्रीराम ! इस काव्यके अन्तिम भागका नाम उत्तरकाण्ड है । उस उत्तम भागको आप ऋषियोंके साथ सुनिये ॥ २१ ॥

न खल्वन्येन काकुत्स्थ श्रोतव्यमिदमुत्तमम् । परमर्षिणा वीर त्वयैव रघुनन्दन ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थवीर रघुनन्दन ! आप सर्वोत्कृष्ट राजर्षि हैं । अतः पहले आपको ही यह उत्तम काव्य सुनना चाहिये, दूसरेको नहीं’ ॥ २२ ॥

एतावदुक्त्वा वचनं ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः । जगाम त्रिदिवं देवो देवैः सह सबान्धवैः ॥ २३ ॥ ये च तत्र महात्मान ऋषयो ब्राह्मलौकिकाः । ब्रह्मणा समनुज्ञाता न्यवर्तन्त महौजसः ॥ २४ ॥ उत्तरं श्रोतुमनसो भविष्यं यच्च राघवे ।

भावार्थ

इतना कहकर तीनों लोकोंके स्वामी ब्रह्माजी देवताओं एवं उनके बन्धु-बान्धवोंके साथ अपने लोकको चले गये ॥ वहाँ जो ब्रह्मलोकमें रहनेवाले महातेजस्वी महात्मा ऋषि विद्यमान थे, वे ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर भावी वृत्तान्तोंसे युक्त उत्तरकाण्डको सुननेकी इच्छासे लौट आये ( उनके साथ ब्रह्मलोकमें नहीं गये ) ॥ २४½ ॥

ततो रामः शुभां वाणीं देवदेवस्य भाषिताम् ॥ २५ ॥ श्रुत्वा परमतेजस्वी वाल्मीकिमिदमब्रवीत् ।

भावार्थ

तत्पश्चात् देवाधिदेव ब्रह्माजीकी कही हुई उस शुभ वाणीको याद करके परम तेजस्वी श्रीरामजीने महर्षि वाल्मीकिसे इस प्रकार कहा—॥ २५½ ॥

भगवञ्श्रोतुमनस ऋषयो ब्राह्मलौकिकाः ॥ २६ ॥ भविष्यदुत्तरं यन्मे श्वोभूते सम्प्रवर्तताम् ।

भावार्थ

‘भगवन् ! ये ब्रह्मलोकके निवासी महर्षि मेरे भावी चरित्रोंसे युक्त उत्तरकाण्डका शेष अंश सुनना चाहते हैं । अतः कल सवेरेसे ही उसका गान आरम्भ हो जाना चाहिये’ ॥ २६½ ॥

एवं विनिश्चयं कृत्वा सम्प्रगृह्य कुशीलवौ ॥ २७ ॥ तं जनौघं विसृज्याथ पर्णशालामुपागमत् । तामेव शोचतः सीता सा व्यतीता च शर्वरी ॥ २८ ॥

भावार्थ

ऐसा निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने जनसमुदायको विदा कर दिया और कुश तथा लवको साथ लेकर वे अपनी पर्णशालामें आये । वहाँ सीताका ही चिन्तन करते-करते उन्होंने रात व्यतीत की ॥ २७-२८ ॥

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