उत्तरकाण्ड, सर्ग 101
रजन्यां तु प्रभातायां समानीय महामुनीन् । गीयतामविशङ्काभ्यां रामः पुत्रावुवाच ह ॥ १ ॥
भावार्थ
रात बीतनेपर जब सवेरा हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजीने बड़े-बड़े मुनियोंको बुलाकर अपने दोनों पुत्रोंसे कहा—‘अब तुम निःशङ्क होकर शेष रामायणका गान आरम्भ करो’ ॥१॥
ततः समुपविष्टेषु महर्षिषु महात्मसु । भविष्यदुत्तरं काव्यं जगतुस्तौ कुशीलवौ ॥ २ ॥
भावार्थ
महात्मा महर्षियोंके यथास्थान बैठ जानेपर कुश और लवने भगवान्के भविष्य जीवनसे सम्बन्ध रखनेवाले उत्तरकाण्डका, जो उस महाकाव्यका एक अंश था, गान आरम्भ किया ॥ २ ॥
प्रविष्टायां तु सीतायां भूतलं सत्यसम्पदा । तस्यावसाने यज्ञस्य रामः परमदुर्मनाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
इधर अपनी सत्यरूप सम्पत्तिके बलसे सीताजीके रसातलमें प्रवेश कर जानेपर उस यज्ञके अन्तमें भगवान् श्रीरामका मन बहुत दुखी हुआ ॥ ३ ॥
अपश्यमानो वैदेहीं मेने शून्यमिदं जगत् । शोकेन परमायस्तो न शान्ति मनसागमत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
विदेहकुमारीको न देखनेसे उन्हें यह सारा संसार सूना जान पड़ने लगा । शोकसे व्यथित होनेके कारण उनके मनको शान्ति नहीं मिली ॥ ४ ॥
विसृज्य पार्थिवान् सर्वानृक्षवानरराक्षसान् । जनौघं विप्रमुख्यानां वित्तपूर्वं विसृज्य च ॥ ५ ॥ एवं समाप्य यज्ञं तु विधिवत् स तु राघवः । ततो विसृज्य तान् सर्वान् रामो राजीवलोचनः ॥ ६ ॥ हृदि कृत्वा तदा सीतामयोध्यां प्रविवेश ह ।
भावार्थ
तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने सब राजाओंको, रीछों, वानरों और राक्षसोंको, जनसमुदायको तथा मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंको भी धन देकर बिदा किया । इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञको समाप्त करके कमलनयन श्रीरामने सबको बिदा करनेके पश्चात् उस समय सीताका मन-ही-मन स्मरण करते हुए अयोध्यामें प्रवेश किया ॥ ५-६½ ॥
इष्टयज्ञो नरपतिः पुत्रद्वयसमन्वितः ॥ ७ ॥ न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनीभवत् ॥ ८ ॥
भावार्थ
यज्ञ पूरा करके रघुकुलनन्दन राजा श्रीराम अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहने लगे । उन्होंने सीताके सिवा दूसरी किसी स्त्रीसे विवाह नहीं किया । प्रत्येक यज्ञमें जब-जब धर्मपत्नीकी आवश्यकता होती, श्रीरघुनाथजी सीताकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवा लिया करते थे ॥ ७-८ ॥
दशवर्षसहस्राणि वाजिमेधानथाकरोत् । वाजपेयान् दशगुणांस्तथा बहुसुवर्णकान् ॥ ९ ॥
भावार्थ
उन्होंने दस हजार वर्षोंतक यज्ञ किये । कितने ही अश्वमेध यज्ञों और उनसे दसगुने वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिसमें असंख्य स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणाएँ दी गयी थीं ॥ ९ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां गोसवैश्च महाधनैः । ईजे क्रतुभिरन्यैश्च स श्रीमानाप्तदक्षिणैः ॥ १० ॥
भावार्थ
श्रीमान् रामने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम, अतिरात्र, गोसव तथा अन्य बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिनमें अपार धनराशि खर्च की गयी ॥ १० ॥
एवं स कालः सुमहान् राज्यस्थस्य महात्मनः । धर्मे प्रयतमानस्य व्यतीयाद् राघवस्य च ॥ ११ ॥
भावार्थ
इस प्रकार राज्य करते हुए महात्मा भगवान् श्रीरघुनाथजीका बहुत बड़ा समय धर्मपालनके प्रयत्नमें ही बीता ॥११॥
ऋक्षवानररक्षांसि स्थिता रामस्य शासने । अनुरञ्जन्ति राजानो ह्यहन्यहनि राघवम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
रीछ, वानर और राक्षस भी श्रीरामकी आज्ञाके अधीन रहते थे । भूमण्डलके सभी राजा प्रतिदिन श्रीरघुनाथजीको प्रसन्न रखते थे ॥ १२ ॥
काले वर्षति पर्जन्यः सुभिक्षं विमला दिशः । हृष्टपुष्टजनाकीर्णं पुरं जनपदास्तथा ॥ १३ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्यमें मेघ समयपर वर्षा करते थे । सदा सुकाल ही रहता था—कभी अकाल नहीं पड़ता था । सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न दिखायी देती थीं तथा नगर और जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे रहते थे ॥ १३ ॥
नाकाले म्रियते कश्चिन्न व्याधिः प्राणिनां तथा । नानर्थो विद्यते कश्चिद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ १४ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्यशासन करते समय किसीकी अकाल-मृत्यु नहीं होती थी । प्राणियोंको कोई रोग नहीं सताता था और संसारमें कोई उपद्रव खड़ा नहीं होता था ॥ १४ ॥
अथ दीर्घस्य कालस्य राममाता यशस्विनी । पुत्रपौत्रैः परिवृता कालधर्ममुपागमत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर पुत्र-पौत्रोंसे घिरी हुई परम यशस्विनी श्रीराममाता कौसल्या कालधर्म ( मृत्यु) को प्राप्त हुईं ॥ १५ ॥
अन्वियाय सुमित्रा च कैकेयी च यशस्विनी । धर्मं कृत्वा बहुविधं त्रिदिवे पर्यवस्थिता ॥ १६ ॥ सर्वाः प्रमुदिताः स्वर्गे राज्ञा दशरथेन च । समागता महाभागाः सर्वधर्मं च लेभिरे ॥ १७ ॥
भावार्थ
सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयीने भी उन्हींके पथका अनुसरण किया । ये सभी रानियाँ जीवनकालमें नाना प्रकारके धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें साकेतधामको प्राप्त हुईं और बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ राजा दशरथसे मिलीं । उन महाभागा रानियोंको सब धर्मोंका पूरा-पूरा फल प्राप्त हुआ१६-१७
तासां रामो महादानं काले काले प्रयच्छति । मातृणामविशेषेण ब्राह्मणेषु तपस्विषु ॥ १८ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजी समय-समयपर अपनी सभी माताओंके निमित्त बिना किसी भेदभावके तपस्वी ब्राह्मणोंको बड़े-बड़े दान दिया करते थे ॥ १८ ॥
पित्र्याणि ब्रह्मरत्नानि यज्ञान् परमदुस्तरान् । चकार रामो धर्मात्मा पितॄन् देवान् विवर्धयन् ॥ १९ ॥
भावार्थ
धर्मात्मा श्रीराम श्राद्धमें उपयोगी उत्तमोत्तम वस्तुएँ ब्राह्मणोंको देते तथा पितरों और देवताओंको संतुष्ट करनेके लिये बड़े-बड़े दुस्तर यज्ञों ( पिण्डात्मक पितृयज्ञों ) का अनुष्ठान करते थे ॥ १९ ॥
एवं वर्षसहस्राणि बहून्यथ ययुः सुखम् । यज्ञैर्बहुविधैर्धर्मं वर्धयानस्य सर्वदा ॥ २० ॥
भावार्थ
इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा सर्वदा विविध धर्मोंका पालन करते हुए श्रीरघुनाथजीके कई हजार वर्ष सुखपूर्वक बीत गये ॥ २० ॥
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