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उत्तरकाण्ड, सर्ग 102

कस्यचित्त्वथ कालस्य युधाजित् केकयो नृपः । स्वगुरुं प्रेषयामास राघवाय महात्मने ॥ १ ॥ गार्ग्यमङ्गिरसः पुत्रं ब्रह्मर्षिममितप्रभम् ।

भावार्थ

कुछ कालके पश्चात् केकयदेशके राजा युधाजित्ने अपने पुरोहित अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि गार्ग्यको, जो अङ्गिराके पुत्र थे, महात्मा श्रीरघुनाथजीके पास भेजा ॥१॥

दश चाश्वसहस्राणि प्रीतिदानमनुत्तमम् ॥ २ ॥ कम्बलानि च रत्नानि चित्रवस्त्रमथोत्तमम् । रामाय प्रददौ राजा शुभान्याभरणानि च ॥ ३ ॥

भावार्थ

उनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको परम उत्तम प्रेमोपहारके रूपमें अर्पण करनेके लिये उन्होंने दस हजार घोड़े, बहुत-से कम्बल ( कालीन और शाल आदि ), नाना प्रकारके रत्न, विचित्र-विचित्र सुन्दर वस्त्र तथा मनोहर आभूषण भी दिये थे ॥२-३॥

श्रुत्वा तु राघवो धीमान् महर्षिं गार्ग्यमागतम् । मातुलस्याश्वपतिनः प्रहितं तन्महाधनम् ॥ ४ ॥ प्रत्युद्गम्य च काकुत्स्थः क्रोशमात्रं सहानुजः । गार्ग्यं सम्पूजयामास यथा शक्रो बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

परम बुद्धिमान् श्रीमान् राघवेन्द्रने जब सुना कि मामा अश्वपति-पुत्र युधाजित्के भेजे हुए महर्षि गार्ग्य बहुमूल्य मेंट-सामग्री लिये अयोध्यामें पधार रहे हैं, तब उन्होंने भाइयोंके साथ एक कोस आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और जैसे इन्द्र बृहस्पतिकी पूजा करते हैं, उसी प्रकार महर्षि गार्ग्यका पूजन ( स्वागत-सत्कार ) किया ॥ ४-५ ॥

तथा सम्पूज्य तमृषिं तद् धनं प्रतिगृह्य च । पृष्ट्वा प्रतिपदं सर्वं कुशलं मातुलस्य च ॥ ६ ॥ उपविष्टं महाभागं रामः प्रष्टुं प्रचक्रमे ।

भावार्थ

इस प्रकार महर्षिका आदर-सत्कार करके उस धनको ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने उनका तथा मामाके घरका सारा कुशल-समाचार पूछा। फिर जब वे महाभाग ब्रह्मर्षि सुन्दर आसनपर विराजमान हो गये, तब श्रीरामने उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥ ६½ ॥

किमाह मातुलो वाक्यं यदर्थं भगवानिह ॥ ७ ॥ प्राप्तो वाक्यविदां श्रेष्ठः साक्षादिव बृहस्पतिः ।

भावार्थ

‘ब्रह्मर्षे ! मेरे मामाने क्या संदेश दिया है, जिसके लिये साक्षात् बृहस्पतिके समान वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आप पूज्यपाद महर्षिने यहाँ पधारनेका कष्ट किया है’ ॥ ७½ ॥

रामस्य भाषितं श्रुत्वा महर्षिः कार्यविस्तरम् ॥ ८ ॥ वक्तुमद्भुतसंकाशं राघवायोपचक्रमे ।

भावार्थ

श्रीरामका यह प्रश्न सुनकर महर्षिने उनसे अद्भुत कार्य-विस्तारका वर्णन आरम्भ किया—॥ ८½ ॥

मातुलस्ते महाबाहो वाक्यमाह नरर्षभः ॥ ९ ॥ युधाजित् प्रीतिसंयुक्तं श्रूयतां यदि रोचते ।

भावार्थ

‘महाबाहो ! आपके मामा नरश्रेष्ठ युधाजित्ने जो प्रेमपूर्वक संदेश दिया है, उसे यदि रुचिकर जान पड़े तो सुनिये ॥ ९½ ॥

अयं गन्धर्वविषयः फलमूलोपशोभितः ॥ १० ॥ सिन्धोरुभयतः पार्श्वे देशः परमशोभनः ।

भावार्थ

‘उन्होंने कहा है कि यह जो फल-मूलोंसे सुशोभित गन्धर्वदेश सिन्धु नदीके दोनों तटोंपर बसा हुआ है, बड़ा सुन्दर प्रदेश है ॥ १०½ ॥

तं च रक्षन्ति गन्धर्वाः सायुधा युद्धकोविदाः ॥ ११ ॥ शैलूषस्य सुता वीर तिस्रः कोट्यो महाबलाः ।

भावार्थ

‘वीर रघुनन्दन ! गन्धर्वराज शैलूषकी संतानें तीन करोड़ महाबली गन्धर्व, जो युद्धकी कलामें कुशल और अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हैं, उस देशकी रक्षा करते हैं ॥ ११½ ॥

तान् विनिर्जित्य काकुत्स्थ गन्धर्वनगरं शुभम् ॥ १२ ॥ निवेशय महाबाहो स्वे पुरे सुसमाहिते । अन्यस्य न गतिस्तत्र देशः परमशोभनः । रोचतां ते महाबाहो नाहं त्वामहितं वदे ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! महाबाहो ! आप उन गन्धर्वोंको जीतकर वहाँ सुन्दर गन्धर्वनगर बसाइये । अपने लिये उत्तम साधनोंसे सम्पन्न दो नगरोंका निर्माण कीजिये । वह देश बहुत सुन्दर है । वहाँ दूसरे किसीकी गति नहीं है । आप उसे अपने अधिकारमें लेना स्वीकार करें । मैं आपको ऐसी सलाह नहीं देता, जो अहितकारक हो’ ॥ १२-१३ ॥

तच्छ्रुत्वा राघवः प्रीतो महर्षेर्मातुलस्य च । उवाच बाढमित्येव भरतं चान्ववैक्षत ॥ १४ ॥

भावार्थ

महर्षि और मामाका वह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरतकी ओर देखा ॥ १४ ॥

सोऽब्रवीद् राघवः प्रीतः साञ्जलिप्रग्रहो द्विजम् । इमौ कुमारौ तं देशं ब्रह्मर्षे विचरिष्यतः ॥ १५ ॥ भरतस्यात्मजौ वीरौ तक्षः पुष्कल एव च । मातुलेन सुगुप्तौ तु धर्मेण सुसमाहितौ ॥ १६ ॥

भावार्थ

तदनन्तर श्रीराघवेन्द्रने उन ब्रह्मर्षिसे प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मर्षे ! ये दोनों कुमार तक्ष और पुष्कल, जो भरतके वीर पुत्र हैं, उस देशमें विचरेंगे और मामासे सुरक्षित रहकर धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो उस देशका शासन करेंगे ॥ १५-१६ ॥

भरतं चाग्रतः कृत्वा कुमारौ सबलानुगौ । निहत्य गन्धर्वसुतान् द्वे पुरे विभजिष्यतः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘ये दोनों कुमार भरतको आगे करके सेना और सेवकोंके साथ वहाँ जायँगे तथा उन गन्धर्वपुत्रोंका संहार करके अलग-अलग दो नगर बसायेंगे ॥ १७ ॥

निवेश्य ते पुरवरे आत्मजौ संनिवेश्य च । आगमिष्यति मे भूयः सकाशमतिधार्मिकः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘उन दोनों श्रेष्ठ नगरोंको बसाकर उनमें अपने दोनों पुत्रोंको स्थापित करके अत्यन्त धर्मात्मा भरत फिर मेरे पास लौट आयेंगे’ ॥ १८ ॥

ब्रह्मर्षिमेवमुक्त्वा तु भरतं सबलानुगम् । आज्ञापयामास तदा कुमारौ चाभ्यषेचयत् ॥ १९ ॥

भावार्थ

ब्रह्मर्षिसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने भरतको वहाँ सेनाके साथ जानेकी आज्ञा दी और दोनों कुमारोंका पहले ही राज्याभिषेक कर दिया ॥ १९ ॥

नक्षत्रेण च सौम्येन पुरस्कृत्याङ्गिरःसुतम् । भरतः सह सैन्येन कुमाराभ्यां विनिर्ययौ ॥ २० ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् सौम्य नक्षत्र ( मृगशिरा ) में अङ्गिराके पुत्र महर्षि गार्ग्यको आगे करके सेना और कुमारोंके साथ भरतने यात्रा की ॥ २० ॥

सा सेना शक्रयुक्तेव नगरान्निर्ययावथ । राघवानुगता दूरं दुराधर्षा सुरैरपि ॥ २१ ॥

भावार्थ

इन्द्रद्वारा प्रेरित हुई देवसेनाके समान वह सेना नगरसे बाहर निकली । भगवान् श्रीराम भी दूरतक उसके साथ-साथ गये । वह देवताओंके लिये भी दुर्जय थी ॥ २१ ॥

मांसाशिनश्च ये सत्त्वा रक्षांसि सुमहान्ति च । अनुजग्मुर्हि भरतं रुधिरस्य पिपासया ॥ २२ ॥

भावार्थ

मांसाहारी जन्तु और बड़े-बड़े राक्षस युद्धमें रक्त-पानकी इच्छासे भरतके पीछे-पीछे गये ॥ २२ ॥

भूतग्रामाश्च बहवो मांसभक्षाः सुदारुणाः । गन्धर्वपुत्रमांसानि भोक्तुकामाः सहस्रशः ॥ २३ ॥

भावार्थ

अत्यन्त भयंकर कई हजार मांसभक्षी भूतसमूह गन्धर्वपुत्रोंका मांस खानेके लिये उस सेनाके साथ-साथ गये ॥२३॥

सिंहव्याघ्रवराहाणां खेचराणां च पक्षिणाम् । बहूनि वै सहस्राणि सेनाया ययुरग्रतः ॥ २४ ॥

भावार्थ

सिंह, बाघ, सूअर और आकाशचारी पक्षी कई हजार-की संख्यामें सेनाके आगे-आगे चले ॥ २४ ॥

अध्यर्धमासमुषिता पथि सेना निरामया । हृष्टपुष्टजनाकीर्णा केकयं समुपागमत् ॥ २५ ॥

भावार्थ

मार्गमें डेढ़ महीने बिताकर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई वह सेना कुशलपूर्वक केकयदेशमें जा पहुँची ॥ २५ ॥

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