उत्तरकाण्ड, सर्ग 103
श्रुत्वा सेनापतिं प्राप्तं भरतं केकयाधिपः । युधाजिद् गार्ग्यसहितं परां प्रीतिमुपागमत् ॥ १ ॥
भावार्थ
केकयराज युधाजित्ने जब सुना कि महर्षि गार्ग्यके साथ स्वयं भरत सेनापति होकर आ रहे हैं, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १ ॥
स निर्ययौ जनौघेन महता केकयाधिपः । त्वरमाणोऽभिचक्राम गन्धर्वान् कामरूपिणः ॥ २ ॥
भावार्थ
वे केकयनरेश भारी जनसमुदायके साथ निकले और भरतसे मिलकर बड़ी उतावलीके साथ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले गन्धर्वोंके देशकी ओर चले ॥ २ ॥
भरतश्च युधाजिच्च समेतौ लघुविक्रमैः । गन्धर्वनगरं प्राप्तौ सबलौ सपदानुगौ ॥ ३ ॥
भावार्थ
भरत और युधाजित् दोनोंने मिलकर बड़ी तीव्रगतिसे सेना और सवारियोंके साथ गन्धर्वोंकी राजधानीपर धावा किया ॥ ३ ॥
श्रुत्वा तु भरतं प्राप्तं गन्धर्वास्ते समागताः । योद्धुकामा महावीर्या व्यनदंस्ते समन्ततः ॥ ४ ॥
भावार्थ
भरतका आगमन सुनकर वे महापराक्रमी गन्धर्व युद्धकी इच्छासे एकत्र हो सब ओर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥४॥
ततः समभवद्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । सप्तरात्रं महाभीमं न चान्यतरयोर्जयः ॥ ५ ॥
भावार्थ
फिर तो दोनों ओरकी सेनाओंमें बड़ा भयंकर और रोंगटे खड़े कर देनेवाला युद्ध छिड़ गया । वह महाभयंकर संग्राम लगातार सात राततक चलता रहा, परंतु दोनोंमेंसे किसी भी एक पक्षकी विजय नहीं हुई ॥ ५ ॥
खड्गशक्तिधनुर्ग्राहा नद्यः शोणितसंस्रवाः । नृकलेवरवाहिन्यः प्रवृत्ताः सर्वतोदिशम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
चारों ओर खूनकी नदियाँ बह चलीं । तलवार, शक्ति और धनुष उस नदीमें विचरनेवाले ग्राहोंके समान जान पड़ते थे, उनकी धारामें मनुष्योंकी लाशें बह जाती थीं ॥ ६ ॥
ततो रामानुजः क्रुद्धः कालस्यास्त्रं सुदारुणम् । संवर्तं नाम भरतो गन्धर्वेष्वभ्यचोदयत् ॥ ७ ॥
भावार्थ
तब रामानुज भरतने कुपित होकर गन्धर्वोंपर कालदेवताके अत्यन्त भयंकर अस्त्रका, जो संवर्त नामसे प्रसिद्ध है, प्रयोग किया ॥ ७ ॥
ते बद्धाः कालपाशेन संवर्तेन विदारिताः । क्षणेनाभिहतास्तेन तिस्रः कोट्यो महात्मना ॥ ८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार महात्मा भरतने क्षणभरमें तीन करोड़ गन्धर्वोंका संहार कर डाला । वे गन्धर्व कालपाशसे बद्ध हो संवर्तास्त्र-से विदीर्ण कर डाले गये ॥ ८ ॥
तद् युद्धं तादृशं घोरं न स्मरन्ति दिवौकसः । निमेषान्तरमात्रेण तादृशानां महात्मनाम् ॥ ९ ॥ हतेषु तेषु सर्वेषु भरतः केकयीसुतः । निवेशयामास तदा समृद्धे द्वे पुरोत्तमे ॥ १० ॥
भावार्थ
ऐसा भयंकर युद्ध देवताओंने भी कभी देखा हो, यह उन्हें याद नहीं आता था । पलक मारते-मारते वैसे पराक्रमी महामनस्वी समस्त गन्धर्वोंका संहार हो जानेपर कैकेयीकुमार भरतने उस समय वहाँ दो समृद्धिशाली सुन्दर नगर बसाये ॥९-१०॥
तक्षं तक्षशिलायां तु पुष्कलं पुष्कलावते । गन्धर्वदेशे रुचिरे गान्धारविषये च सः ॥ ११ ॥
भावार्थ
मनोहर गन्धर्वदेशमें तक्षशिला नामकी नगरी बसाकर उसमें उन्होंने तक्षको राजा बनाया और गान्धारदेशमें पुष्कलावत नगर बसाकर उसका राज्य पुष्कलको सौंप दिया ॥११॥
धनरत्नौघसंकीर्णे काननैरुपशोभिते । अन्योन्यसंघर्षकृते स्पर्धया गुणविस्तरैः ॥ १२ ॥
भावार्थ
वे दोनों नगर धन-धान्य एवं रत्नसमूहोंसे भरे थे । अनेकानेक कानन उनकी शोभा बढ़ाते थे । गुणविस्तारकी दृष्टिसे वे मानो परस्पर होड़ लगाकर संघर्षपूर्वक आगे बढ़ रहे थे ॥ १२ ॥
उभे सुरुचिरग्रख्ये व्यवहारैरकिल्बिषैः । उद्यानयानसम्पूर्णे सुविभक्तान्तरापणे ॥ १३ ॥
भावार्थ
दोनों नगरोंकी शोभा परम मनोहर थी । दोनों स्थानोंका व्यवहार ( व्यापार ) निष्कपट, शुद्ध एवं सरल था । दोनों ही नगर उद्यानों ( बाग-बगीचों ) तथा नाना प्रकारकी सवारियोंसे भरे-पूरे थे । उनके भीतर अलग-अलग कई बाजार थे ॥१३॥
उभे पुरवरे रम्ये विस्तरैरुपशोभिते । गृहमुख्यैः सुरुचिरैर्विमानैर्बहुभिर्वृते ॥ १४ ॥
भावार्थ
दोनों श्रेष्ठ पुरोंकी रमणीयता देखते ही बनती थी । अनेक ऐसे विस्तृत पदार्थ उनकी शोभा बढ़ाते थे, जिनका नाम अभीतक नहीं लिया गया है । सुन्दर श्रेष्ठ गृह तथा बहुत-से सतमहले मकान वहाँकी श्रीवृद्धि कर रहे थे ॥ १४॥
शोभिते शोभनीयैश्च देवायतनविस्तरैः । तालैस्तमालैस्तिलकैर्बकुलैरुपशोभिते ॥ १५ ॥
भावार्थ
अनेकानेक शोभासम्पन्न देवमन्दिरों तथा ताल, तमाल, तिलक और मौलसिरी आदिके वृक्षोंसे भी उन दोनों नगरोंकी शोभा एवं रमणीयता बढ़ गयी थी ॥ १५ ॥
निवेश्य पञ्चभिर्वर्षैर्भरतो राघवानुजः । पुनरायान्महाबाहुरयोध्यां केकयीसुतः ॥ १६ ॥
भावार्थ
पाँच वर्षोंमें उन राजधानियोंको अच्छी तरह आबाद करके श्रीरामके छोटे भाई कैकेयीकुमार महाबाहु भरत फिर अयोध्यामें लौट आये ॥ १६ ॥
सोऽभिवाद्य महात्मानं साक्षाद्धर्ममिवापरम् । राघवं भरतः श्रीमान् ब्रह्माणमिव वासवः ॥ १७ ॥
भावार्थ
वहाँ पहुँचकर श्रीमान् भरतने द्वितीय धर्मराजके समान महात्मा श्रीरघुनाथजीको उसी तरह प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजीको प्रणाम करते हैं ॥ १७ ॥
शशांस च यथावृत्तं गन्धर्ववधमुत्तमम् । निवेशनं च देशस्य श्रुत्वा प्रीतोऽस्य राघवः ॥ १८ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उन्होंने गन्धर्वोंके वध और उस देशको अच्छी तरह आबाद करनेका यथावत् समाचार कह सुनाया । सुनकर श्रीरघुनाथजी उनपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १८ ॥
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