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उत्तरकाण्ड, सर्ग 104

तच्छ्रुत्वा हर्षमापेदे राघवो भ्रातृभिः सह । वाक्यं चाद्भुतसंकाशं भ्रातॄन् प्रोवाच राघवः ॥ १ ॥

भावार्थ

भरतके मुँहसे गन्धर्वदेशका समाचार सुनकर भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता हुई । तत्पश्चात् श्रीराघवेन्द्र अपने भाइयोंसे यह अद्भुत वचन बोले—॥ १ ॥

इमौ कुमारौ सौमित्रे तव धर्मविशारदौ । अङ्गदश्चन्द्रकेतुश्च राज्यार्थे दृढविक्रमौ ॥ २ ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! तुम्हारे ये दोनों कुमार अङ्गद और चन्द्रकेतु धर्मके ज्ञाता हैं । इनमें राज्यकी रक्षाके लिये उपयुक्त दृढ़ता और पराक्रम है ॥ २ ॥

इमौ राज्येऽभिषेक्ष्यामि देशः साधु विधीयताम् । रमणीयो ह्यसम्बाधो रमेतां यत्र धन्विनौ ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘अतः मैं इनका भी राज्याभिषेक करूँगा । तुम इनके लिये किसी अच्छे देशका चुनाव करो, जो रमणीय होनेके साथ ही विघ्न बाधाओंसे रहित हो और जहाँ ये दोनों धनुर्धर वीर आनन्दपूर्वक रह सकें ॥ ३ ॥

न राज्ञां यत्र पीडा स्यान्नाश्रमाणां विनाशनम् । स देशो दृश्यतां सौम्य नापराध्यामहे यथा ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! ऐसा देश देखो, जहाँ निवास करनेसे दूसरे राजाओंको पीड़ा या उद्वेग न हो, आश्रमोंका भी नाश न करना पड़े और हमलोगोंको किसीकी दृष्टिमें अपराधी भी न बनना पड़े’ ॥ ४ ॥

तथोक्तवति रामे तु भरतः प्रत्युवाच ह । अयं कारुपथो देशो रमणीयो निरामयः ॥ ५ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भरतने उत्तर दिया–– आर्य ! यह कारुपथ नामक देश बड़ा सुन्दर है । वहाँ किसी प्रकारकी रोग-व्याधिका भय नहीं है ॥ ५ ॥

निवेश्यतां तत्र पुरमङ्गदस्य महात्मनः । चन्द्रकेतोः सुरुचिरं चन्द्रकान्तं निरामयम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘वहाँ महात्मा अङ्गदके लिये नयी राजधानी बसायी जाय तथा चन्द्रकेतु ( या चन्द्रकान्त )के रहनेके लिये ‘चन्द्रकान्त’ नामक नगरका निर्माण कराया जाय, जो सुन्दर और आरोग्यवर्धक हो’ ॥ ६ ॥

तद् वाक्यं भरतेनोक्तं प्रतिजग्राह राघवः । तं च कृत्वा वशे देशमङ्गदस्य न्यवेशयत् ॥ ७ ॥

भावार्थ

भरतकी कही हुई इस बातको श्रीरघुनाथजीने स्वीकार किया और कारुपथ देशको अपने अधिकारमें करके अङ्गदको वहाँका राजा बना दिया ॥ ७ ॥

अङ्गदीया पुरी रम्याप्यङ्गदस्य निवेशिता । रमणीया सुगुप्ता च रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ८ ॥

भावार्थ

क्लेशरहित कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामने अङ्गदके लिये ‘अङ्गदीया’ नामक रमणीय पुरी बसायी, जो परम सुन्दर होनेके साथ ही सब ओरसे सुरक्षित भी थी ॥ ८ ॥

चन्द्रकेतोश्च मल्लस्य मल्लभूम्यां निवेशिता । चन्द्रकान्तेति विख्याता दिव्या स्वर्गपुरी यथा ॥ ९ ॥

भावार्थ

चन्द्रकेतु अपने शरीरसे मल्लके समान हृष्ट-पुष्ट थे; उनके लिये मल्ल देशमें ‘चन्द्रकान्ता’ नामसे विख्यात दिव्य पुरी बसायी गयी, जो स्वर्गकी अमरावती नगरीके समान सुन्दर थी ॥ ९ ॥

ततो रामः परां प्रीतिं लक्ष्मणो भरतस्तथा । ययुर्युद्धे दुराधर्षा अभिषेकं च चक्रिरे ॥ १० ॥

भावार्थ

इससे श्रीराम, लक्ष्मण और भरत तीनोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन सभी रणदुर्जय वीरोंने स्वयं उन कुमारोंका अभिषेक किया ॥ १० ॥

अभिषिच्य कुमारौ द्वौ प्रस्थाप्य सुसमाहितौ । अङ्गदं पश्चिमां भूमिं चन्द्रकेतुमुदङ्मुखम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

एकाग्रचित्त तथा सावधान रहनेवाले उन दोनों कुमारोंका अभिषेक करके अङ्गदको पश्चिम तथा चन्द्रकेतुको उत्तर दिशामें भेजा गया ॥ ११ ॥

अङ्गदं चापि सौमित्रिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह । चन्द्रकेतोस्तु भरतः पार्ष्णिग्राहो बभूव ह ॥ १२ ॥

भावार्थ

अङ्गदके साथ तो स्वयं सुमित्राकुमार लक्ष्मण गये और चन्द्रकेतुके सहायक या पार्श्वक भरतजी हुए ॥ १२ ॥

लक्ष्मणस्त्वङ्गदीयायां संवत्सरमथोषितः । पुत्रे स्थिते दुराधर्षे अयोध्यां पुनरागमत् ॥ १३ ॥

भावार्थ

लक्ष्मण अङ्गदीया पुरीमें एक वर्षतक रहे और उनका दुर्धर्ष पुत्र अङ्गद जब दृढ़तापूर्वक राज्य सँभालने लगा, तब वे पुनः अयोध्याको लौट आये ॥ १३ ॥

भरतोऽपि तथैवोष्य संवत्सरमतोऽधिकम् । अयोध्यां पुनरागम्य रामपादावुपास्त सः ॥ १४ ॥

भावार्थ

इसी प्रकार भरत भी चन्द्रकान्ता नगरीमें एक वर्षसे कुछ अधिक कालतक ठहरे रहे और चन्द्रकेतुका राज्य जब दृढ़ हो गया, तब वे पुनः अयोध्यामें आकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी सेवा करने लगे ॥ १४ ॥

उभौ सौमित्रिभरतौ रामपादावनुव्रतौ । कालं गतमपि स्नेहान्न जज्ञातेऽतिधार्मिकौ ॥ १५ ॥

भावार्थ

लक्ष्मण और भरत दोनोंका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनन्य अनुराग था । दोनों ही अत्यन्त धर्मात्मा थे । श्रीरामकी सेवामें रहते उन्हें बहुत समय बीत गया, परंतु स्नेहाधिक्यके कारण उनको कुछ भी ज्ञात न हुआ ॥ १५ ॥

एवं वर्षसहस्राणि दश तेषां ययुस्तदा । धर्मे प्रयतमानानां पौरकार्येषु नित्यदा ॥ १६ ॥

भावार्थ

वे तीनों भाई पुरवासियोंके कार्यमें सदा संलग्न रहते और धर्मपालनके लिये प्रयत्नशील रहा करते थे । इस प्रकार उनके दस हजार वर्ष बीत गये ॥ १६ ॥

विहृत्य कालं परिपूर्णमानसाः श्रिया वृता धर्मपुरे च संस्थिताः । त्रयः समिद्धाहुतिदीप्ततेजसो हुताग्नयः साधुमहाध्वरे त्रयः ॥ १७ ॥

भावार्थ

धर्मसाधनके स्थानभूत अयोध्यापुरीमें वैभवसम्पन्न होकर रहते हुए वे तीनों भाई यथासमय घूम-फिरकर प्रजाकी देखभाल करते थे । उनके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये थे तथा वे महायज्ञमें आहुति पाकर प्रज्वलित हुए दीप्त तेजस्वी गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण नामक त्रिविध अग्नियोंके समान प्रकाशित होते थे ॥ १७ ॥

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