उत्तरकाण्ड, सर्ग 91
श्रुत्वा किंपुरुषोत्पत्तिं लक्ष्मणो भरतस्तथा । आश्चर्यमिति च ब्रूतामुभौ रामं जनेश्वरम् ॥ १ ॥
भावार्थ
‘किंपुरुषजातिकी उत्पत्तिका यह प्रसंग सुनकर लक्ष्मण और भरत दोनोंने महाराज श्रीरामसे कहा–‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’ ॥ १ ॥
अथ रामः कथामेतां भूय एव महायशाः । कथयामास धर्मात्मा प्रजापतिसुतस्य वै ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीरामने प्रजापति कर्दमके पुत्र इलकी इस कथाको फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २ ॥
सर्वास्ता विहता दृष्ट्वा किन्नरीर्ऋषिसत्तमः । उवाच रूपसम्पन्नां तां स्त्रियं प्रहसन्निव ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वे सब किन्नरियाँ पर्वतके किनारे चली गयीं । यह देख मुनिश्रेष्ठ बुधने उस रूपवती स्त्रीसे हँसते हुए-से कहा––॥३॥
सोमस्याहं सुदयितः सुतः सुरुचिरानने । भजस्व मां वरारोहे भक्त्या स्निग्धेन चक्षुषा ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘‘सुमुखि ! मैं सोमदेवताका परम प्रिय पुत्र हूँ। वरारोहे ! मुझे अनुराग और स्नेहभरी दृष्टिसे देखकर अपनाओ’ ॥ ४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शून्ये स्वजनवर्जिते । इला सुरुचिरप्रख्यं प्रत्युवाच महाप्रभम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘स्वजनोंसे रहित उस सूने स्थानमें बुधकी यह बात सुनकर इला उन परम सुन्दर महातेजस्वी बुधसे इस प्रकार बोली—॥ ५ ॥
अहं कामचरी सौम्य तवास्मि वशवर्तिनी । प्रशाधि मां सोमसुत यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘‘सौम्य सोमकुमार ! मैं अपनी इच्छाके अनुसार विचरनेवाली ( स्वतन्त्र ) हूँ, किंतु इस समय आपकी आज्ञाके अधीन हो रही हूँ; अतः मुझे उचित सेवाके लिये आदेश दीजिये और जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा कीजिये’ ॥ ६ ॥
तस्यास्तदद्भुतप्रख्यं श्रुत्वा हर्षमुपागतः । स वै कामी सह तया रेमे चन्द्रमसः सुतः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘इलाका यह अद्भुत वचन सुनकर कामासक्त सोमपुत्रको बड़ा हर्ष हुआ । वे उसके साथ रमण करने लगे ॥ ७ ॥
बुधस्य माधवो मासस्तामिलां रुचिराननाम् । गतो रमयतोऽत्यर्थं क्षणवत् तस्य कामिनः ॥ ८ ॥ अथ मासे तु सम्पूर्णे पूर्णेन्दुसदृशाननः । प्रजापतिसुतः श्रीमाञ्छयने प्रत्यबुध्यत ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘मनोहर मुखवाली इलाके साथ अतिशय रमण करनेवाले कामासक्त बुधका वैशाख मास एक क्षणके समान बीत गया ॥ ‘एक मास पूर्ण होनेपर पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले प्रजापति-पुत्र श्रीमान् इल अपनी शय्यापर जाग उठे ॥ ९ ॥
सोऽपश्यत् सोमजं तत्र तपन्तं सलिलाशये । ऊर्ध्वबाहुं निरालम्बं तं राजा प्रत्यभाषत ॥ १० ॥
भावार्थ
‘उन्होंने देखा, सोमपुत्र बुध वहाँ जलाशयमें तप कर रहे हैं । उनकी भुजाएँ ऊपरको उठी हुई हैं और वे निराधार खड़े हैं। उस समय राजाने बुधसे पूछा––॥ १० ॥
भगवन् पर्वतं दुर्गं प्रविष्टोऽस्मि सहानुगः । न च पश्यामि तत् सैन्यं क नु ते मामका गताः॥ ११ ॥
भावार्थ
‘‘भगवन् ! मैं अपने सेवकोंके साथ दुर्गम पर्वतपर आ गया था, परंतु यहाँ मुझे अपनी वह सेना नहीं दिखायी देती है । पता नहीं, वे मेरे सैनिक कहाँ चले गये ?’ ॥ ११ ॥
तच्छ्रुत्वा तस्य राजर्षेर्नष्टसंज्ञस्य भाषितम् । प्रत्युवाच शुभं वाक्यं सान्त्वयन् परया गिरा ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘राजर्षि इलकी स्त्रीत्व-प्राप्तिविषयक स्मृति नष्ट हो गयी थी । उनकी बात सुनकर बुध उत्तम वाणीद्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ वचन बोले––॥ १२ ॥
अश्मवर्षेण महता भृत्यास्ते विनिपातिताः । त्वं चाश्रमपदे सुप्तो वातवर्षभयार्दितः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘‘राजन् ! आपके सारे सेवक ओलोंकी भारी वर्षासे मारे गये । आप भी आँधी-पानीके भयसे पीड़ित हो इस आश्रममें आकर सो गये थे ॥ १३ ॥
समाश्वसिहि भद्रं ते निर्भयो विगतज्वरः । फलमूलाशनो वीर निवसेह यथासुखम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘वीर ! अब आप धैर्य धारण करें । आपका कल्याण हो । आप निर्भय और निश्चिन्त होकर फल-मूलका आहार करते हुए यहाँ सुखपूर्वक निवास कीजिये’ ॥ १४ ॥
स राजा तेन वाक्येन प्रत्याश्वस्तो महामतिः । प्रत्युवाच ततो वाक्यं दीनो भृत्यजनक्षयात् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘बुधके इस वचनसे परम बुद्धिमान् राजा इलको बड़ा आश्वासन मिला, परंतु अपने सेवकोंके नष्ट होनेसे वे बहुत दुखी थे; इसलिये उनसे इस प्रकार बोले––॥ १५ ॥
त्यक्ष्याम्यहं स्वकं राज्यं नाहं भृत्यैर्विनाकृतः । वर्तयेयं क्षणं ब्रह्मन् समनुज्ञातुमर्हसि ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! मैं सेवकोंसे रहित हो जानेपर भी राज्यका परित्याग नहीं करूँगा । अब क्षणभर भी मुझसे यहाँ नहीं रहा जायगा; अतः मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये ॥ १६ ॥
सुतो धर्मपरो ब्रह्मन् ज्येष्ठो मम महायशाः । शशबिन्दुरिति ख्यातः स मे राज्यं प्रपत्स्यते ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘‘ब्रह्मन् ! मेरे धर्मपरायण ज्येष्ठ पुत्र बड़े यशस्वी हैं । उनका नाम शशबिन्दु है । जब मैं वहाँ जाकर उनका अभिषेक करूँगा, तभी वे मेरा राज्य ग्रहण करेंगे ॥ १७ ॥
नहि शक्ष्याम्यहं हित्वा भृत्यदारान् सुखान्वितान् । प्रतिवक्तुं महातेजः किंचिदप्यशुभं वचः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘महातेजस्वी मुने ! देशमें जो मेरे सेवक और स्त्री, पुत्र आदि परिवारके लोग मुखसे रह रहे हैं, उन सबको छोड़कर मैं यहाँ नहीं ठहर सकूँगा । अतः मुझसे ऐसी कोई अशुभ बात आप न कहें, जिससे स्वजनोंसे बिछुड़कर मुझे यहाँ दुःखपूर्वक रहनेके लिये विवश होना पड़े’ ॥ १८ ॥
तथा ब्रुवति राजेन्द्रे बुधः परममद्भुतम् । सान्त्वपूर्वमथोवाच वासस्त इह रोचताम् ॥ १९ ॥ न संतापस्त्वया कार्यः कार्दमेय महाबल । संवत्सरोषितस्येह कारयिष्यामि ते हितम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘राजेन्द्र इलके ऐसा कहनेपर बुधने उन्हें सान्त्वना देते हुए अत्यन्त अद्भुत बात कही—‘राजन् ! तुम प्रसन्नतापूर्वक यहाँ रहना स्वीकार करो । कर्दमके महाबली पुत्र ! तुम्हें संताप नहीं करना चाहिये । जब तुम एक वर्षतक यहाँ निवास कर लोगे, तब मैं तुम्हारा हित साधन करूँगा’ ॥ १९-२० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा बुधस्याक्लिष्टकर्मणः । वासाय विदधे बुद्धिं यदुक्तं ब्रह्मवादिना ॥ २१ ॥ मासं स स्त्री तदा भूत्वा रमयत्यनिशं सदा । मासं पुरुषभावेन धर्मबुद्धिं चकार सः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘पुण्यकर्मा बुधका यह वचन सुनकर उन ब्रह्मवादी महात्माके कथनानुसार राजाने वहाँ रहनेका निश्चय किया ॥ ‘वे एक मासतक स्त्री होकर निरन्तर बुधके साथ रमण करते और फिर एक मासतक पुरुष होकर धर्मानुष्ठानमें मन लगाते थे ॥ २२ ॥
ततः सा नवमे मासि इला सोमसुतात् सुतम् । जनयामास सुश्रोणी पुरूरवसमूर्जितम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर नवें मासमें सुन्दरी इलाने सोमपुत्र बुधसे एक पुत्रको जन्म दिया, जो बड़ा ही तेजस्वी और बलवान् था । उसका नाम था पुरूरवा ॥ २३ ॥
जातमात्रे तु सुश्रोणी पितुर्हस्ते न्यवेशयत् । बुधस्य समवर्णं च इला पुत्रं महाबलम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘उसके उस महाबली पुत्रकी अङ्गकान्ति बुधके ही समान थी । वह जन्म लेते ही उपनयनके योग्य अवस्थाका बालक हो गया, इसलिये सुन्दरी इलाने उसे पिताके हाथमें सौंप दिया ॥ २४ ॥
बुधस्तु पुरुषीभूतं स वै संवत्सरान्तरम् । कथाभी रमयामास धर्मयुक्ताभिरात्मवान् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘वर्ष पूरा होनेमें जितने मास शेष थे, उतने समयतक जब-जब राजा पुरुष होते थे, तब-तब मनको वशमें रखनेवाले बुध धर्मयुक्त कथाओंद्वारा उनका मनोरञ्जन करते थे’ ॥२५॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें