उत्तरकाण्ड, सर्ग 90
तां कथामैलसम्बद्धां रामेण समुदीरिताम् । लक्ष्मणो भरतश्चैव श्रुत्वा परमविस्मितौ ॥ १ ॥
भावार्थ
श्रीरामकी कही हुई इलके चरित्रसे सम्बन्ध रखनेवाली उस कथाको सुनकर लक्ष्मण और भरत दोनों ही बड़े विस्मित हुए ॥ १ ॥
तौ रामं प्राञ्जली भूत्वा तस्य राज्ञो महात्मनः । विस्तरं तस्य भावस्य तदा पप्रच्छतुः पुनः ॥ २ ॥
भावार्थ
उन दोनों भाइयोंने हाथ जोड़कर श्रीरामसे महामना राजा इलके स्त्री-पुरुषभावके विस्तृत वृत्तान्तके विषयमें पुनः पूछा—॥ २ ॥
कथं स राजा स्त्रीभूतो वर्तयामास दुर्गतिः । पुरुषः स यदा भूतः कां वृत्तिं वर्तयत्यसौ ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! राजा इल स्त्री होकर तो बड़ी दुर्गतिमें पड़ गये होंगे । उन्होंने वह समय कैसे बिताया ? और जब वे पुरुषरूपमें रहते थे, तब किस वृत्तिका आश्रय लेते थे ?’ ॥ ३ ॥
तयोस्तद् भाषितं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम् । कथयामास काकुत्स्थस्तस्य राज्ञो यथागमम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
लक्ष्मण और भरतका वह कौतूहलपूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने राजा इलके वृत्तान्तको, जैसा वह उपलब्ध था, उसी रूपमें पुनः सुनाना आरम्भ किया—– ॥ ४ ॥
तमेव प्रथमं मासं स्त्री भूत्वा लोकसुन्दरी । ताभिः परिवृता स्त्रीभिर्येऽस्य पूर्वं पदानुगाः ॥ ५ ॥ तत्काननं विगाह्याशु विजहे लोकसुन्दरी । द्रुमगुल्मलताकीर्णं पद्भ्यां पद्मदलेक्षणा ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर उस प्रथम मासमें ही इला त्रिभुवनसुन्दरी नारी होकर वनमें विचरने लगी । जो पहले उसके चरणसेवक थे, वे भी स्त्रीरूपमें परिणत हो गये थे; उन्हीं स्त्रियोंसे घिरी हुई लोकसुन्दरी कमललोचना इला वृक्षों, झाड़ियों और लताओंसे भरे हुए एक वनमें शीघ्र प्रवेश करके पैदल ही सब ओर घूमने लगी ॥ ५-६ ॥
वाहनानि च सर्वाणि संत्यक्त्वा वै समन्ततः । पर्वताभोगविवरे तस्मिन् रेमे इला तदा ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘उस समय सारे वाहनोंको सब ओर छोड़कर इला विस्तृत पर्वतमालाओंके मध्यभागमें भ्रमण करने लगी ॥ ७ ॥
अथ तस्मिन् वनोद्देशे पर्वतस्याविदूरतः । सरः सुरुचिरप्रख्यं नानापक्षिगणायुतम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘उस वनप्रान्तमें पर्वतके पास ही एक सुन्दर सरोवर था, जिसमें नाना प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ८ ॥
ददर्श सा इला तस्मिन् बुधं सोमसुतं तदा । ज्वलन्तं स्वेन वपुषा पूर्णं सोममिवोदितम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘उस सरोवरमें सोमपुत्र बुध तपस्या करते थे, जो अपने तेजस्वी शरीरसे उदित हुए पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे थे । इलाने उन्हें देखा* ॥ ९ ॥
तपन्तं च तपस्तीव्रमम्भोमध्ये दुरासदम् । यशस्करं कामकरं तारुण्ये पर्यवस्थितम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वे जलके भीतर तीव्र तपस्यामें संलग्न थे । उन्हें पराभूत करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। वे यशस्वी, पूर्णकाम और तरुण-अवस्थामें स्थित थे ॥ १० ॥
स तं जलाशयं सर्वं क्षोभयामास विस्मिता । सह तैः पूर्वपुरुषैः स्त्रीभूतै रघुनन्दन ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! उन्हें देखकर इला चकित हो उठी और जो पहले पुरुष थीं, उन स्त्रियोंके साथ जलमें उतरकर उसने सारे जलाशयको क्षुब्ध कर दिया ॥ ११ ॥
बुधस्तु तां समीक्ष्यैव कामबाणवशं गतः । नोपलेभे तदात्मानं स चचाल तदाम्भसि ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘इलापर दृष्टि पड़ते ही बुध कामदेवके बाणोंका निशाना बन गये । उन्हें अपने तन-मनकी सुध न रही और वे उस समय जलमें विचलित हो उठे ॥ १२ ॥
इलां निरीक्षमाणस्तु त्रैलोक्यादधिकां शुभाम् । चित्तं समभ्यतिक्रामत् का न्वियं देवताधिका ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘इला त्रिलोकीमें सबसे अधिक सुन्दरी थी । उसे देखते हुए बुधका मन उसीमें आसक्त हो गया और वे सोचने लगे, ‘यह कौन-सी स्त्री है, जो देवाङ्गनाओंसे भी बढ़कर रूपवती है ॥ १३ ॥
न देवीषु न नागीषु नासुरीष्वप्सरःसु च । दृष्टपूर्वा मया काचिद् रूपेणानेन शोभिता ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘‘न देववनिताओंमें, न नागवधुओंमें, न असुरोंकी स्त्रियोंमें और न अप्सराओंमें ही मैंने पहले कभी कोई ऐसे मनोहर रूपसे सुशोभित होनेवाली स्त्री देखी है ॥ १४ ॥
सदृशीयं मम भवेद् यदि नान्यपरिग्रहः । इति बुद्धिं समास्थाय जलात् कूलमुपागमत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘‘यदि यह दूसरेको ब्याही न गयी हो तो सर्वथा मेरी पत्नी बनने योग्य है।’ ऐसा विचार वे जलसे निकलकर किनारे आये ॥ १५ ॥
आश्रमं समुपागम्य ततस्ताः प्रमदोत्तमाः । शब्दापयत धर्मात्मा नाञ्चैनं च ववन्दिरे ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘फिर आश्रममें पहुँचकर उन धर्मात्माने पूर्वोक्त सभी सुन्दरियोंको आवाज देकर बुलाया और उन सबने आकर उन्हें प्रणाम किया ॥ १६ ॥
स ताः पप्रच्छ धर्मात्मा कस्यैषा लोकसुन्दरी । किमर्थमागता चैव सर्वमाख्यात मा चिरम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘तब धर्मात्मा बुधने उन सब स्त्रियोंसे पूछा–‘यह लोकसुन्दरी नारी किसकी पत्नी है और किसलिये यहाँ आयी है ? ये सब बातें तुम शीघ्र मुझे बताओ’ ॥ १७ ॥
शुभं तु तस्य तद् वाक्यं मधुरं मधुराक्षरम् । श्रुत्वा स्त्रियश्च ताः सर्वा ऊचुर्मधुरया गिरा ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘बुधके मुखसे निकला हुआ वह शुभ वचन मधुर पदावली-से युक्त तथा मीठा था । उसे सुनकर उन सब स्त्रियोंने मधुर वाणीमें कहा–॥ १८ ॥
अस्माकमेषा सुश्रोणी प्रभुत्वे वर्तते सदा । अपतिः काननान्तेषु सहास्माभिश्चरत्यसौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘‘ब्रह्मन् ! यह सुन्दरी हमारी सदाकी स्वामिनी है । इसका कोई पति नहीं है । यह हम लोगोंके साथ अपनी इच्छाके अनुसार वनप्रान्तमें विचरती रहती है’ ॥ १९ ॥
तद् वाक्यमाव्यक्तपदं तासां स्त्रीणां निशम्य च । विद्यामावर्तनीं पुण्यामावर्तयत स द्विजः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘उन स्त्रियोंका वचन सब प्रकारसे सुस्पष्ट था । उसे सुनकर ब्राह्मण बुधने पुण्यमयी आवर्तनी विद्याका आवर्तन (स्मरण) किया ॥ २० ॥
सोऽर्थं विदित्वा सकलं तस्य राज्ञो यथा तथा । सर्वा एव स्त्रियस्ताश्च बभाषे मुनिपुङ्गवः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘उस राजाके विषयकी सारी बातें यथार्थरूपसे जानकर मुनिवर बुधने उन सभी स्त्रियोंसे कहा–॥ २१ ॥
अत्र किंपुरुषीभूत्वा शैलरोधसि वत्स्यथ । आवासस्तु गिरावस्मिञ्शीघ्रमेव विधीयताम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘‘तुम सब लोग किंपुरुषी ( किन्नरी ) होकर पर्वतके किनारे रहोगी । इस पर्वतपर शीघ्र ही अपने लिये निवासस्थान बना लो ॥ २२ ॥
मूलपत्रफलैः सर्वा वर्तयिष्यथ नित्यदा । स्त्रियः किंपुरुषान्नाम भर्तॄन् समुपलप्स्यथ ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘‘पत्र और फल-मूलसे ही तुम सबको सदा जीवन-निर्वाह करना होगा । आगे चलकर तुम सभी स्त्रियाँ किंपुरुष नामक पतियोंको प्राप्त कर लोगी’ ॥ २३ ॥
ताः श्रुत्वा सोमपुत्रस्य स्त्रियः किंपुरुषीकृताः । उपासांचक्रिरे शैलं वध्यस्ता बहुलास्तदा ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘किंपुरुषी नामसे प्रसिद्ध हुई वे स्त्रियाँ सोमपुत्र बुधकी उपर्युक्त बात सुनकर उस पर्वतपर रहने लगीं । उन स्त्रियोंकी संख्या बहुत अधिक थी’ ॥ २४ ॥
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