उत्तरकाण्ड, सर्ग 89
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणेनोक्तं वाक्यं वाक्यविशारदः । प्रत्युवाच महातेजाः प्रहसन् राघवो वचः ॥ १ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणकी कही हुई यह बात सुनकर बातचीतकी कलामें निपुण महातेजस्वी श्रीरघुनाथजी हँसते हुए बोले—॥ १ ॥
एवमेव नरश्रेष्ठ यथा वदसि लक्ष्मण । वृत्रघातमशेषेण वाजिमेधफलं च यत् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! वृत्रासुरका सारा प्रसंग और अश्वमेध यज्ञका जो फल तुमने जैसा बताया है, वह सब उसी रूपमें ठीक है ॥ २ ॥
श्रूयते हि पुरा सौम्य कर्दमस्य प्रजापतेः । पुत्रो बाह्लीश्वरः श्रीमानिलो नाम सुधार्मिकः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! सुना जाता है कि पूर्वकालमें प्रजापति कर्दमके पुत्र श्रीमान् इल बाह्लिकदेशके राजा थे । वे बड़े धर्मात्मा नरेश थे ॥ ३ ॥
स राजा पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा महायशाः । राज्यं चैव नरव्याघ्र पुत्रवत् पर्यपालयत् ॥ ४ ॥ सुरैश्च परमोदारैर्दैतेयैश्च महाधनैः । नागराक्षसगन्धर्वैर्यक्षैश्च सुमहात्मभिः ॥ ५ ॥ पूज्यते नित्यशः सौम्य भयार्तैः रघुनन्दन । अभिभ्यंश्च त्रयो लोकाः सरोषस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! वे महायशस्वी भूपाल सारी पृथ्वीको वशमें करके अपने राज्यकी प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते थे ॥ ‘सौम्य ! रघुनन्दन ! परम उदार देवता, महाधनी दैत्य तथा नाग, राक्षस, गन्धर्व और महामनस्वी यक्ष—ये सब भयभीत होकर सदा राजा इलकी स्तुति-पूजा करते थे तथा उन महामना नरेशके रुष्ट हो जानेपर तीनों लोकोंके प्राणी भयसे थर्रा उठते थे ॥ ५-६ ॥
स राजा तादृशोऽप्यासीद् धर्मे वीर्ये च निष्ठितः । बुद्ध्या च परमोदारो बाह्लीकेशो महायशाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘ऐसे प्रभावशाली होनेपर भी बाह्लीक देशके स्वामी महायशस्वी परम उदार राजा इल धर्म और पराक्रममें दृढ़तापूर्वक स्थित रहते थे और उनकी बुद्धि भी स्थिर थी ॥ ७ ॥
स प्रचक्रे महाबाहुर्मृगयां रुचिरे वने । चैत्रे मनोरमे मासे सभृत्यबलवाहनः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘एक समयकी बात है सेवक, सेना और सवारियोंसहित उन महाबाहु नरेशने मनोरम चैत्रमासमें एक सुन्दर वनके भीतर शिकार खेलना आरम्भ किया ॥ ८ ॥
प्रजघ्ने स नृपोऽरण्ये मृगाञ्शतसहस्रशः । हत्वैव तृप्तिर्नाभूच राज्ञस्तस्य महात्मनः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘राजाने उस वनमें सैकड़ों-हजारों हिंसक जन्तुओंका वध किया, किंतु इतने ही जन्तुओंका वध करके उन महामनस्वी नरेशको तृप्ति नहीं हुई ॥ ९ ॥
नानामृगाणामयुतं वध्यमानं महात्मना । यत्र जातो महासेनस्तं देशमुपचक्रमे ॥ १० ॥
भावार्थ
‘फिर उन महामना इलके हाथसे नाना प्रकारके दस हजार हिंसक पशु मारे गये । तत्पश्चात् वे उस प्रदेशमें गये, जहाँ महासेन ( स्वामी कार्तिकेय ) का जन्म हुआ था ॥१०॥
तस्मिन् प्रदेशे देवेशः शैलराजसुतां हरः । रमयामास दुर्धर्षः सर्वैरनुचरैः सह ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उस स्थानमें देवताओंके स्वामी दुर्जय देवता भगवान् शिव अपने समस्त सेवकोंके साथ रहकर गिरिराजकुमारी उमा-का मनोरञ्जन करते थे ॥ ११ ॥
कृत्वा स्त्रीरूपमात्मानमुमेशो गोपतिध्वजः । देव्याः प्रियचिकीर्षुः संस्तस्मिन् पर्वतनिर्झरे ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘जिनकी ध्वजापर वृषभका चिह्न सुशोभित होता है, वे भगवान् उमावल्लभ अपने-आपको भी स्त्रीरूपमें प्रकट करके देवी पार्वतीका प्रिय करनेकी इच्छासे वहाँके पर्वतीय झरनेके पास उनके साथ विहार करते थे ॥ १२ ॥
यत्र यत्र वनोद्देशे सत्त्वाः पुरुषवादिनः । वृक्षाः पुरुषनामानस्ते सर्वे स्त्रीजना भवन् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘उस वनके विभिन्न भागोंमें जहाँ-जहाँ पुँल्लिग नामधारी जन्तु अथवा वृक्ष थे, वे सब-के-सब स्त्रीलिंगमें परिणत हो गये थे ॥ १३ ॥
यच्च किंचन तत् सर्वं नारीसंज्ञं बभूव ह । पतस्मिन्नन्तरे राजा स इलः कर्दमात्मजः ॥ १४ ॥ निघ्नन् मृगसहस्राणि तं देशमुपचक्रमे ।
भावार्थ
‘वहाँ जो कुछ भी चराचर प्राणियोंका समूह था, वह सब स्त्रीनामधारी हो गया था । इसी समय कर्दमके पुत्र राजा इल सहस्रों हिंसक पशुओंका वध करते हुए उस देशमें आ गये ॥ १४½ ॥
स दृष्ट्वा स्त्रीकृतं सर्वं सव्यालमृगपक्षिणम् ॥ १५ ॥ आत्मानं स्त्रीकृतं चैव सानुगं रघुनन्दन ।
भावार्थ
‘वहाँ आकर उन्होंने देखा, सर्प, पशु और पक्षियोंसहित उस वनका सारा प्राणिसमुदाय स्त्रीरूप हो गया है । रघुनन्दन ! सेवकोंसहित अपने आपको भी उन्होंने स्त्रीरूपमें परिणत हुआ देखा ॥ १५½ ॥
तस्य दुःखं महच्चासीद् दृष्ट्वाऽऽत्मानं तथागतम् ॥ १६ ॥ उमापतेश्च तत् कर्म ज्ञात्वा त्रासमुपागमत् ।
भावार्थ
‘अपनेको उस अवस्थामें देखकर राजाको बड़ा दुःख हुआ । यह सारा कार्य उमावल्लभ महादेवजीकी इच्छासे हुआ है, ऐसा जानकर वे भयभीत हो उठे ॥ १६½ ॥
ततो देवं महात्मानं शितिकण्ठं कपर्दिनम् ॥ १७ ॥ जगाम शरणं राजा सभृत्यबलवाहनः ।
भावार्थ
‘तदनन्तर सेवक, सेना और सवारियोंसहित राजा इल जटाजूटधारी महात्मा भगवान् नीलकण्ठकी शरणमें गये ॥१७½॥
ततः प्रहस्य वरदः सह देव्या महेश्वरः ॥ १८ ॥ प्रजापतिसुतं वाक्यमुवाच वरदः स्वयम् ।
भावार्थ
‘तब पार्वतीदेवीके साथ विराजमान वरदायक देवता महेश्वर हँसकर प्रजापतिपुत्र इलसे स्वयं बोले—॥ १८½ ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे कार्दमेय महाबल ॥ १९ ॥ पुरुषत्वमृते सौम्य वरं वरय सुव्रत ।
भावार्थ
‘‘कर्दमकुमार महाबली राजर्षे ! उठो-उठो । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सौम्य नरेश ! पुरुषत्व छोड़कर जो चाहो, वह वर माँग लो’ ॥ १९½ ॥
ततः स राजा शोकार्तः प्रत्याख्यातो महात्मना ॥२०॥ स्त्रीभूतोऽसौ न जग्राह वरमन्यं सुरोत्तमात् ।
भावार्थ
‘महात्मा भगवान् शङ्करके इस प्रकार पुरुषत्व देनेसे इन्कार कर देनेपर स्त्रीरूप हुए राजा इल शोकसे व्याकुल हो गये । उन्होंने उन सुरश्रेष्ठ महादेवजीसे दूसरा कोई वर नहीं ग्रहण किया ॥ २०½ ॥
ततः शोकेन महता शैलराजसुतां नृपः ॥ २१ ॥ प्रणिपत्य उमां देवीं सर्वेणैवान्तरात्मना । ईदृशे वराणां वरदे लोकानामसि भामिनी ॥ २२ ॥ अमोघदर्शने देवि भज सौम्येन चक्षुषा ।
भावार्थ
‘तदनन्तर महान् शोकसे पीड़ित हो राजाने गिरिराजकुमारी उमादेवीके चरणोंमें सम्पूर्ण हृदयसे प्रणाम करके यह प्रार्थना की—‘सम्पूर्ण वरोंकी अधीश्वरी देवि ! आप मानिनी हैं । समस्त लोकोंको वर देनेवाली हैं । देवि ! आपका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता । अतः आप अपनी सौम्य दृष्टिसे मुझपर अनुग्रह कीजिये’ ॥ २१-२२½ ॥
हृद्गतं तस्य राजर्षेर्विज्ञाय हरसंनिधौ ॥ २३ ॥ प्रत्युवाच शुभं वाक्यं देवी रुद्रस्य सम्मता ।
भावार्थ
‘राजर्षि इलके हार्दिक अभिप्रायको जानकर रुद्रप्रिया देवी पार्वतीने महादेवजीके समीप यह शुभ बात कही—॥ २३½ ॥
अर्धस्य देवो वरदो वरार्धस्य तव ह्यहम् ॥ २४ ॥ तस्मादर्धं गृहाण त्वं स्त्रीपुंसोर्यावदिच्छसि ।
भावार्थ
‘‘राजन् ! तुम पुरुषत्व-प्राप्तिरूप जो वर चाहते हो, उसके आधे भागके दाता तो महादेवजी हैं और आधा वर तुम्हें मैं दे सकती हूँ ( अर्थात् तुम्हें सम्पूर्ण जीवनके लिये जो स्त्रीत्व मिल गया है, उसे मैं आधे जीवनके लिये पुरुषत्वमें परिवर्तित कर सकती हूँ ) । इसलिये तुम मेरा दिया हुआ आधा वर स्वीकार करो । तुम जितने-जितने कालतक स्त्री और पुरुष रहना चाहो, उसे मेरे सामने कहो’ ॥ २४½ ॥
तदद्भुततरं श्रुत्वा देव्या वरमनुत्तमम् ॥ २५ ॥ सम्प्रहृष्टमना भूत्वा राजा वाक्यमथाब्रवीत् । यदि देवि प्रसन्ना मे रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ २६ ॥ मासं स्त्रीत्वमुपासित्वा मासं स्यां पुरुषः पुनः ।
भावार्थ
‘देवी पार्वतीका वह परम उत्तम और अत्यन्त अद्भुत वर सुनकर राजाके मनमें बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले—‘देवि ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं एक मासतक भूतलपर अनुपम रूपवती स्त्रीके रूपमें रहकर फिर एक मासतक पुरुष होकर रहूँ’ ॥ २५-२६½ ॥
ईप्सितं तस्य विज्ञाय देवी सुरुचिरानना ॥ २७ ॥ प्रत्युवाच शुभं वाक्यमेवमेव भविष्यति । राजन् पुरुषभूतस्त्वं स्त्रीभावं न स्मरिष्यसि ॥ २८ ॥ स्त्रीभूतश्च परं मासं न स्मरिष्यसि पौरुषम् ।
भावार्थ
‘राजाके मनोभावको जानकर सुन्दर मुखवाली पार्वती-देवीने यह शुभ वचन कहा—‘ऐसा ही होगा ! राजन् ! जब तुम पुरुषरूपमें रहोगे, उस समय तुम्हें अपने स्त्रीजीवनकी याद नहीं रहेगी और जब तुम स्त्रीरूपमें रहोगे, उस समय तुम्हें एक मासतक अपने पुरुषभावका स्मरण नहीं होगा’२७-२८½
एवं स राजा पुरुषो मासं भूत्वाथ कार्दमिः । त्रैलोक्यसुन्दरी नारी मासमेकमिलाभवत् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार कर्दमकुमार राजा इल एक मासतक पुरुष रहकर फिर एक मास त्रिलोकसुन्दरी नारी इलाके रूपमें रहने लगे’ ॥ २९ ॥
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