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उत्तरकाण्ड, सर्ग 88

तदा वृत्रवधं सर्वमखिलेन स लक्ष्मणः । कथयित्वा नरश्रेष्ठः कथाशेषं प्रचक्रमे ॥ १ ॥

भावार्थ

उस समय वृत्रासुरके वधकी पूरी कथा सुनाकर नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने शेष कथाको इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥१॥

ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयंकरे । ब्रह्महत्यावृतः शक्रः संज्ञां लेभे न वृत्रहा ॥ २ ॥

भावार्थ

‘देवताओंको भय देनेवाले महापराक्रमी वृत्रासुरके मारे जानेपर ब्रह्महत्यासे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्रको बहुत देरतक होश नहीं हुआ ॥ २ ॥

सोऽन्तमाश्रित्य लोकानां नष्टसंज्ञो विचेतनः । कालं तत्रावसत् कंचिद् वेष्टमान इवोरगः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘लोकोंकी अन्तिम सीमाका आश्रय ले वे सर्पके समान लोटते हुए कुछ कालतक वहाँ अचेत और संज्ञाशून्य होकर पड़े रहे ॥ ३ ॥

अथ नष्टे सहस्राक्षे उद्विग्नमभवज्जगत् । भूमिश्च ध्वस्तसंकाशा निःस्नेहा शुष्ककानना ॥ ४ ॥ निःस्रोतसस्ते सर्वे तु ह्रदाश्च सरितस्तथा । संक्षोभश्चैव सत्त्वानामनावृष्टिकृतोऽभवत् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘इन्द्रके अदृश्य हो जानेसे सारा संसार व्याकुल हो उठा । धरती उजाड़-सी हो गयी । इसकी आर्द्रता नष्ट हो गयी और वन सूख गये । समस्त सरों और सरिताओंमें जल-स्रोतका अभाव हो गया और वर्षा न होनेसे सब जीवोंमें बड़ी घबराहट फैल गयी ॥ ४-५ ॥

क्षीयमाणे तु लोकेऽस्मिन् सम्भ्रान्तमनसः सुराः । यदुक्तं विष्णुना पूर्वं तं यज्ञं समुपानयन् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘समस्त लोक क्षीण होने लगे । इससे देवताओंके हृदयमें व्याकुलता छा गयी और उन्होंने उसी यज्ञका स्मरण किया, जिसे पहले भगवान् विष्णुने बताया था ॥ ६ ॥

ततः सर्वे सुरगणाः सोपाध्यायाः सहर्षिभिः । तं देशं समुपाजग्मुर्यत्रेन्द्रो भयमोहितः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर बृहस्पतिजीको साथ ले ऋषियोंसहित सब देवता उस स्थानपर गये, जहाँ इन्द्र भयसे मोहित होकर छिपे हुए थे ॥ ७ ॥

ते तु दृष्ट्वा सहस्राक्षमावृतं ब्रह्महत्यया । तं पुरस्कृत्य देवेशमश्वमेधं प्रचक्रिरे ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘वे इन्द्रको ब्रह्महत्यासे आवेष्टित देख उन्हीं देवेश्वरको आगे करके अश्वमेध यज्ञ करने लगे ॥ ८ ॥

ततोऽश्वमेधः सुमहान् महेन्द्रस्य महात्मनः । ववृते ब्रह्महत्यायाः पावनार्थं नरेश्वर ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘नरेश्वर ! फिर तो महामनस्वी महेन्द्रका वह महान् अश्वमेध यज्ञ आरम्भ हो गया । उसका उद्देश्य था ब्रह्महत्याकी निवृत्ति करके इन्द्रको पवित्र बनाना ॥ ९ ॥

ततो यज्ञे समाप्ते तु ब्रह्महत्या महात्मनः । अभिगम्याब्रवीद् वाक्यं क्व मे स्थानं विधास्यथ ॥१०॥

भावार्थ

‘तत्पश्चात् जब वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब ब्रह्महत्याने महामनस्वी देवताओंके निकट आकर पूछा—‘मेरे लिये कहाँ स्थान बनाओगे’ ॥ १० ॥

ते तामूचुस्ततो देवास्तुष्टाः प्रीतिसमन्विताः । चतुर्धा विभजात्मानमात्मनैव दुरासदे ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘यह सुनकर संतुष्ट एवं प्रसन्न हुए देवताओंने उससे कहा—‘दुर्जय शक्तिवाली ब्रह्महत्ये ! तू अपने आपको स्वयं ही चार भागोंमें विभक्त कर दे’ ॥ ११ ॥

देवानां भाषितं श्रुत्वा ब्रह्महत्या महात्मनाम् । संदधौ स्थानमन्यत्र वरयामास दुर्वसा ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘महामनस्वी देवताओंका यह कथन सुनकर महेन्द्रके शरीरमें दुःखपूर्वक निवास करनेवाली ब्रह्महत्याने अपना चार भाग कर दिया और इन्द्रके शरीरसे अन्यत्र रहनेके लिये स्थान माँगा ॥ १२ ॥

एकेनांशेन वत्स्यामि पूर्णोदासु नदीषु वै । चतुरो वार्षिकान् मासान् दर्पघ्नी कामचारिणी ॥१३॥

भावार्थ

‘( वह बोली—) ‘मैं अपने एक अंशसे वर्षाके चार महीनोंतक जलसे भरी हुई नदियोंमें निवास करूँगी । उस समय मैं इच्छानुसार विचरनेवाली और दूसरोंके दर्पका दलन करनेवाली होऊँगी ॥ १३ ॥

भूम्यामहं सर्वकालमेकेनांशेन सर्वदा । वसिष्यामि न संदेहः सत्येनैतद् ब्रवीमि वः ॥ १४ ॥ योऽयमंशस्तृतीयो मे स्त्रीषु यौवनशालिषु। त्रिरात्रं दर्पपूर्णासु वसिष्ये दर्पघातिनी ॥ १५ ॥ हन्तारो ब्राह्मणान् ये तु मृषापूर्वमदूषकान् । तांश्चतुर्थेन भागेन संश्रयिष्ये सुरर्षभाः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘दूसरे भागसे मैं सदा सब समय भूमिपर निवास करूँगी, इसमें संदेह नहीं है, यह मैं आपलोगोंसे सच्ची बात कहती हूँ।। ‘और मेरा जो यह तीसरा अंश है, इसके साथ मैं युवावस्थासे सुशोभित होनेवाली गर्वीली स्त्रियोंमें प्रतिमास तीन राततक निवास करूँगी और उनके दर्पको नष्ट करती रहूँगी।। ‘सुरश्रेष्ठगण ! जो झूठ बोलकर किसीको कलंकित नहीं करते, ऐसे ब्राह्मणोंका जो लोग वध करते हैं, उनपर मैं अपने चौथे भागसे आक्रमण करूँगी’ ॥ १६ ॥

प्रत्यूचुस्तां ततो देवा यथा वदसि दुर्वसे । तथा भवतु तत् सर्वं साधयस्व यदीप्सितम् ॥ १७ ॥ ततः प्रीत्यान्विता देवाः सहस्राक्षं ववन्दिरे । विज्वरः पूतपाप्मा च वासवः समपद्यत ॥ १८ ॥ प्रशान्तं च जगत् सर्वं सहस्राक्षे प्रतिष्ठिते । यज्ञं चाद्भुतसंकाशं तदा शक्रोऽभ्यपूजयत् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘तब देवताओंने उससे कहा—‘दुर्वसे ! तू जैसा कहती है, वह सब वैसा ही हो । जाओ अपना अभीष्ट साधन करो’ ॥ ‘तब देवताओंने बड़ी प्रसन्नताके साथ सहस्रलोचन इन्द्रकी वन्दना की । इन्द्र निश्चिन्त, निष्पाप एवं विशुद्ध हो गये ॥ ‘इन्द्रके अपने पदपर प्रतिष्ठित होते ही सम्पूर्ण जगत्में शान्ति छा गयी । उस समय इन्द्रने उस अद्भुत शक्तिशाली यज्ञकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १९ ॥

ईदृशो ह्यश्वमेधस्य प्रभावो रघुनन्दन । यजस्व सुमहाभाग हयमेधेन पार्थिव ॥ २० ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! अश्वमेध यज्ञका ऐसा ही प्रभाव है । अतः महाभाग ! पृथ्वीनाथ ! आप अश्वमेध यज्ञके द्वारा यजन कीजिये’ ॥ २० ॥

इति लक्ष्मणवाक्यमुत्तमं नृपतिरतीव मनोहरं महात्मा । परितोषमवाप हृष्टचेताः स निशम्येन्द्रसमानविक्रमौजाः ॥ २१ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके उस उत्तम और अत्यन्त मनोहर वचनको सुनकर महात्मा राजा श्रीरामचन्द्रजी, जो इन्द्रके समान पराक्रमी और बलशाली थे, मन-ही-मन बड़े प्रसन्न एवं संतुष्ट हुए ॥ २१ ॥

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