उत्तरकाण्ड, सर्ग 87
लक्ष्मणस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा शत्रुनिबर्हणः । वृत्रघातमशेषेण कथयेत्याह सुव्रत ॥ १ ॥ राघवेणैवमुक्तस्तु सुमित्रानन्दवर्धनः । भूय एव कथां दिव्यां कथयामास सुव्रतः ॥ २ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणका यह कथन सुनकर शत्रुओंका संहार करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सुमित्राकुमार ! वृत्रासुरके वधकी पूरी कथा कह सुनाओ’ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर उत्तम व्रतके पालक सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने पुनः उस दिव्य कथाको सुनाना आरम्भ किया—॥ २ ॥
सहस्राक्षवचः श्रुत्वा सर्वेषां च दिवौकसाम् । विष्णुर्देवानुवाचेदं सर्वानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘‘प्रभो ! सहस्रनेत्रधारी इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवताओंकी वह प्रार्थना सुनकर भगवान् विष्णुने इन्द्र आदि सब देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥ ३ ॥
पूर्वं सौहृदबद्धोऽस्मि वृत्रस्येह महात्मनः । तेन युष्मत्प्रियार्थं हि नाहं हन्मि महासुरम् ॥ ४ ॥ अवश्यं करणीयं च भवतां सुखमुत्तमम् । तस्मादुपायमाख्यास्ये सहस्राक्षो वधिष्यति ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘‘देवताओ ! तुम्हारी इस प्रार्थनाके पहलेसे ही मैं महामना वृत्रासुरके स्नेह-बन्धनमें बँधा हुआ हूँ । इसलिये तुम्हारा प्रिय करनेके उद्देश्यसे मैं उस महान् असुरका वध नहीं करूँगा ॥ ‘परंतु तुम सबके उत्तम सुखकी व्यवस्था करना मेरा आवश्यक कर्तव्य है; इसलिये मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे देवराज इन्द्र उसका वध कर सकेंगे ॥ ५ ॥
त्रेधाभूतं करिष्यामि आत्मानं सुरसत्तमाः । तेन वृत्रं सहस्राक्षो वधिष्यति न संशयः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘सुरश्रेष्ठगण ! मैं अपने स्वरूपभूत तेजको तीन भागोंमें विभक्त करूँगा, जिससे इन्द्र निस्संदेह वृत्रासुरका वध कर डालेंगे ॥ ६ ॥
एकांशो वासवं यातु द्वितीयो वज्रमेव तु । तृतीयो भूतलं यातु तदा वृत्रं हनिष्यति ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘मेरे तेजका एक अंश इन्द्रमें प्रवेश करे; दूसरा वज्रमें व्याप्त हो जाय और तीसरा भूतलको चला जाय,* तब इन्द्र वृत्रासुरका वध कर सकेंगे’ ॥ ७ ॥
तथा ब्रुवति देवेशे देवा वाक्यमथाब्रुवन् । एवमेतन्न संदेहो यथा वदसि दैत्यहन् ॥ ८ ॥ भद्रं तेऽस्तु गमिष्यामो वृत्रासुरवधैषिणः । भजस्व परमोदार वासवं स्वेन तेजसा ॥ ९ ॥ ततः सर्वे महात्मानः सहस्राक्षपुरोगमाः । तदरण्यमुपाक्रामन् यत्र वृत्रो महासुरः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘देवेश्वर भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर देवता बोले— ‘दैत्यविनाशन ! आप जो कहते हैं, ठीक ऐसी ही बात है, इसमें संदेह नहीं । आपका कल्याण हो । हमलोग वृत्रासुरके वधकी इच्छा मनमें लिये यहाँसे लौट जायँगे । परम उदार प्रभो ! आप अपने तेजके द्वारा देवराज इन्द्रको अनुगृहीत करें’॥ ‘तत्पश्चात् इन्द्र आदि सभी महामनस्वी देवता उस वनमें गये, जहाँ महान् असुर वृत्र तपस्या करता था ॥ १० ॥
तेऽपश्यंस्तेजसा भूतं तप्यन्तमसुरोत्तमम् । पिबन्तमिव लोकांस्त्रीन् निर्दहन्तमिवाम्बरम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने देखा, असुरश्रेष्ठ वृत्रासुर अपने तेजसे सब ओर व्याप्त हो रहा है और ऐसी तपस्या कर रहा है, मानो उसके द्वारा तीनों लोकोंको पी जायगा और आकाशको भी दग्ध कर डालेगा ॥ ११ ॥
दृष्ट्वैव चासुरश्रेष्ठं देवास्त्रासमुपागमन् । कथमेनं वधिष्यामः कथं न स्यात् पराजयः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘उस असुरश्रेष्ठ वृत्रको देखते ही देवतालोग घबरा गये और सोचने लगे—‘हम कैसे इसका वध करेंगे ? और किस उपायसे हमारी पराजय नहीं होने पायेगी ?’ ॥ १२ ॥
तेषां चिन्तयतां तत्र सहस्राक्षः पुरंदरः । वज्रं प्रगृह्य पाणिभ्यां प्राहिणोद् वृत्रमूर्धनि ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘वे लोग वहाँ इस प्रकार सोच ही रहे थे कि सहस्रनेत्रधारी इन्द्रने दोनों हाथोंसे वज्र उठाकर उसे वृत्रासुरके मस्तकपर दे मारा ॥ १३ ॥
कालाग्निनेव घोरेण दीप्तेनेव महार्चिषा । पतता वृत्रशिरसा जगत् त्रासमुपागमत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रका वह वज्र प्रलयकालकी अग्निके समान भयंकर और दीप्तिमान् था । उससे बड़ी भारी लपटें उठ रही थीं । उसकी चोटसे कटकर जब वृत्रासुरका मस्तक गिरा, तब सारा संसार भयभीत हो उठा ॥ १४ ॥
असम्भाव्यं वधं तस्य वृत्रस्य विबुधाधिपः । चिन्तयानो जगामाशु लोकस्यान्तं महायशाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘निरपराध वृत्रासुरका वध करना उचित नहीं था, अतः उसके कारण महायशस्वी देवराज इन्द्र बहुत चिन्तित हुए और तुरंत ही सब लोकोंके अन्तमें लोकालोक पर्वतसे परवर्ती अन्धकारमय प्रदेशमें चले गये ॥ १५ ॥
तमिन्द्रं ब्रह्महत्याऽऽशु गच्छन्तमनुगच्छति । अपतच्चास्य गात्रेषु तमिन्द्रं दुःखमाविशत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘जानेके समय ब्रह्महत्या तत्काल उनके पीछे लग गयी और उनके अङ्गोंपर टूट पड़ी । इससे इन्द्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ ॥ १६ ॥
हतारयः प्रणष्टेन्द्रा देवाः साग्निपुरोगमाः । विष्णुं त्रिभुवनेशानं मुहुर्मुहुरपूजयन् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘देवताओंका शत्रु मारा गया । इसलिये अग्नि आदि सब देवता त्रिभुवनके स्वामी भगवान् विष्णुकी बारंबार स्तुति-पूजा करने लगे । परंतु उनके इन्द्र अदृश्य हो गये थे ( इसके कारण उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था ) ॥ १७ ॥
त्वं गतिः परमेशान पूर्वजो जगतः पिता । रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘( देवता बोले—) ‘परमेश्वर ! आप ही जगत्के आश्रय और आदि पिता हैं । आपने सम्पूर्ण प्राणियोंकी रक्षाके लिये विष्णुरूप धारण किया है ॥ १८ ॥
हतश्चायं त्वया वृत्रो ब्रह्महत्या च वासवम् । बाधते सुरशार्दूल मोक्षं तस्य विनिर्दिश ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘आपने ही इस वृत्रासुरका वध किया है । परंतु ब्रह्महत्या इन्द्रको कष्ट दे रही है; अतः सुरश्रेष्ठ ! आप उनके उद्धारका कोई उपाय बताइये’ ॥ १९ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां विष्णुरब्रवीत् । मामेव यजतां शक्रः पावयिष्यामि वज्रिणम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बोले— ‘इन्द्र मेरा ही यजन करें । मैं उन वज्रधारी देवराज इन्द्रको पवित्र कर दूँगा ॥ २० ॥
पुण्येन हयमेधेन मामिष्ट्वा पाकशासनः । पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘पवित्र अश्वमेध यज्ञके द्वारा मुझ यज्ञ-पुरुषकी आराधना करके पाकशासन इन्द्र पुनः देवेन्द्र पदको प्राप्त कर लेंगे और फिर उन्हें किसीसे भय नहीं रहेगा’ ॥ २१ ॥
एवं संदिश्य तां वाणीं देवानां चामृतोपमाम् । जगाम विष्णुर्देवेशः स्तूयमानस्त्रिविष्टपम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘देवताओंके समक्ष अमृतमयी वाणीद्वारा उक्त संदेश देकर देवेश्वर भगवान् विष्णु अपनी स्तुति सुनते हुए परम धामको चले गये ॥ २२ ॥
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