उत्तरकाण्ड, सर्ग 86
तथोक्तवति रामे तु भरते च महात्मनि । लक्ष्मणोऽथ शुभं वाक्यमुवाच रघुनन्दनम् ॥ १ ॥ अश्वमेधो महायज्ञः पावनः सर्वपाप्मनाम् । पावनस्तव दुर्धर्षो रोचतां रघुनन्दन ॥ २ ॥
भावार्थ
श्रीराम और महात्मा भरतके इस प्रकार बातचीत करनेपर लक्ष्मणने रघुकुलनन्दन श्रीरामसे यह शुभ बात कही—॥ ‘रघुनन्दन ! अश्वमेध नामक महान् यज्ञ समस्त पापोंको दूर करनेवाला, परमपावन और दुष्कर है। अतः इसका अनुष्ठान आप पसंद करें ॥ २ ॥
श्रूयते हि पुरावृत्तं वासवे सुमहात्मनि । ब्रह्महत्यावृतः शक्रो हयमेधेन पावितः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘महात्मा इन्द्रके विषयमें यह प्राचीन वृत्तान्त सुननेमें आता है कि इन्द्रको जब ब्रह्महत्या लगी थी, तब वे अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करके ही पवित्र हुए थे ॥ ३ ॥
पुरा किल महाबाहो देवासुरसमागमे । वृत्रो नाम महानासीद् दैतेयो लोकसम्मतः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! पहलेकी बात है, जब देवता और असुर परस्पर मिलकर रहते थे, उन दिनों वृत्रनामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़ा असुर रहता था । लोकमें उसका बड़ा आदर था ॥ ४ ॥
विस्तीर्णो योजनशतमुच्छ्रितस्त्रिगुणं ततः । अनुरागेण लोकांस्त्रीन् स्नेहात् पश्यति सर्वतः ॥ ५
भावार्थ
‘वह सौ योजन चौड़ा और तीन सौ योजन ऊँचा था । वह तीनों लोकोंको आत्मीय समझकर प्यार करता था और सबको स्नेहभरी दृष्टिसे देखता था ॥ ५ ॥
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च बुद्ध्या च परिनिष्ठितः । शशास पृथिवीं स्फीतां धर्मेण सुसमाहितः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘उसे धर्मका यथार्थ ज्ञान था । वह कृतज्ञ और स्थिरप्रज्ञ था तथा पूर्णतः सावधान रहकर धन-धान्यसे भरी-पूरी पृथ्वीका धर्मपूर्वक शासन करता था ॥ ६ ॥
तस्मिन् प्रशासति तदा सर्वकामदुघा मही । रसवन्ति प्रसूनानि मूलानि च फलानि च ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘उसके शासनकालमें पृथ्वी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली थी । यहाँ फल, फूल और मूल सभी सरस होते थे ॥ ७ ॥
अकृष्टपच्या पृथिवी सुसम्पन्ना महात्मनः । स राज्यं तादृशं भुङ्क्ते स्फीतमद्भुतदर्शनम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘महात्मा वृत्रासुरके राज्यमें यह भूमि बिना जोते-बोये ही अन्न उत्पन्न करती तथा धन-धान्यसे भलीभाँति सम्पन्न रहती थी । इस प्रकार वह असुर समृद्धिशाली एवं अद्भुत राज्यका उपभोग करता था ॥ ८ ॥
तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना तपः कुर्यामनुत्तमम् । तपो हि परमं श्रेयः सम्मोहमितरत् सुखम् ॥ ९
भावार्थ
‘एक समय वृत्रासुरके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं परम उत्तम तप करूँ; क्योंकि तप ही परम कल्याणका साधन है। दूसरा सारा सुख तो मोहमात्र ही है ॥ ९ ॥
स निक्षिप्य सुतं ज्येष्ठं पौरेषु मधुरेश्वरम् । तप उग्रं समातिष्ठत् तापयन् सर्वदेवताः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र मधुरेश्वरको राजा बना पुरवासियोंको सौंप दिया और सम्पूर्ण देवताओंको ताप देता हुआ वह कठोर तपस्या करने लगा ॥१०॥
तपस्तप्यति वृत्रे तु वासवः परमार्तवत् । विष्णुं समुपसंक्रम्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘वृत्रासुरके तपस्यामें लग जानेपर इन्द्र बड़े दुखी-से होकर भगवान् विष्णुके पास गये और इस प्रकार बोले—॥ ११ ॥
तपस्यता महाबाहो लोकाः सर्वे विनिर्जिताः । बलवान् स हि धर्मात्मा नैनं शक्यामि शासितुम् ॥१२॥
भावार्थ
‘‘महाबाहो ! तपस्या करते हुए वृत्रासुरने समस्त लोक जीत लिये । वह धर्मात्मा असुर बलवान् हो गया है; अतः अब उसपर मैं शासन नहीं कर सकता ॥ १२ ॥
यद्यसौ तप आतिष्ठेद् भूय एव सुरेश्वर । यावल्लोका धरिष्यन्ति तावदस्य वशानुगाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘‘सुरेश्वर ! यदि वह फिर इसी प्रकार तपस्या करता रहा तो जबतक ये तीनों लोक रहेंगे, तबतक हम सब देवताओंको उसके अधीन रहना पड़ेगा ॥ १३ ॥
तं चैनं परमोदारमुपेक्षसि महाबल । क्षणं हि न भवेद् वृत्रः क्रुद्धे त्वयि सुरेश्वर ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘‘महाबली देवेश्वर ! उस परम उदार असुरकी आप उपेक्षा कर रहे हैं ( इसीलिये वह शक्तिशाली होता जा रहा है ) । यदि आप कुपित हो जाएँ तो वह क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता ॥१४॥
यदा हि प्रीतिसंयोगं त्वया विष्णो समागतः । तदाप्रभृति लोकानां नाथत्वमुपलब्धवान् ॥ १५ ॥ स त्वं प्रसादं लोकानां कुरुष्व सुसमाहितः । त्वत्कृतेन हि सर्वं स्यात् प्रशान्तमरुजं जगत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘‘विष्णो ! जबसे आपके साथ उसका प्रेम हो गया है, तभीसे उसने सम्पूर्ण लोकोंका आधिपत्य प्राप्त कर लिया है ॥ ‘‘अतः आप अच्छी तरह ध्यान देकर सम्पूर्ण लोकोंपर कृपा कीजिये । आपके रक्षा करनेसे ही सारा जगत् शान्त एवं नीरोग हो सकता है ॥ १६ ॥
इमे हि सर्वे विष्णो त्वां निरीक्षन्ते दिवौकसः । वृत्रघातेन महता तेषां साह्यं कुरुष्व ह ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘‘विष्णो ! ये सब देवता आपकी ओर देख रहे हैं। वृत्रासुरका वध एक महान् कार्य है । उसे करके आप उन देवताओंका उपकार कीजिये ॥ १७ ॥
त्वया हि नित्यशः साह्यं कृतमेषां महात्मनाम् । असह्यमिदमन्येषामगतीनां गतिर्भवान् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘‘प्रभो ! आपने सदा ही इन महात्मा देवताओंकी सहायता की है। यह असुर दूसरोंके लिये अजेय है; अतः आप हम निराश्रित देवताओंके आश्रयदाता हों’’ ॥ १८ ॥
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