उत्तरकाण्ड, सर्ग 85
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः । द्वाःस्थः कुमारावाहूय राघवाय न्यवेदयत् ॥ १ ॥
भावार्थ
क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामका यह कथन सुनकर द्वारपालने कुमार भरत और लक्ष्मणको बुलाकर श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित कर दिया ॥ १ ॥
दृष्ट्वा तु राघवः प्राप्तावुभौ भरतलक्ष्मणौ । परिष्वज्य ततो रामो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २ ॥
भावार्थ
भरत और लक्ष्मणको आया देख रघुकुलतिलक श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और यह बात कही—॥ २ ॥
कृतं मया यथा तथ्यं द्विजकार्यमनुत्तमम् । धर्मसेतुमथो भूयः कर्तुमिच्छामि राघवौ ॥ ३ ॥ अक्षयश्चाव्ययश्चैव धर्मसेतुर्मतो मम । धर्मप्रवचनं चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘रघुवंशी राजकुमारो ! मैंने ब्राह्मणका वह परम उत्तम कार्य यथावत्रूपसे सिद्ध कर दिया । अब मैं पुनः राजधर्मकी चरम सीमारूप राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करना चाहता हूँ ॥ ‘मेरी रायमें धर्मसेतु ( राजसूय ) अक्षय एवं अविनाशी फल देनेवाला है तथा वह धर्मका पोषक एवं समस्त पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ४ ॥
युवाभ्यामात्मभूताभ्यां राजसूयमनुत्तमम् । सहितो यष्टुमिच्छामि तत्र धर्मस्तु शाश्वतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘तुम दोनों मेरे आत्मा ही हो, अतः मेरी इच्छा तुम्हारे साथ इस उत्तम राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करनेकी है; क्योंकि उसमें राजाका शाश्वत धर्म प्रतिष्ठित है ॥ ५ ॥
इष्ट्वा तु राजसूयेन मित्रः शत्रुनिबर्हणः । सुहुतेन सुयज्ञेन वरुणत्वमुपागमत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंका संहार करनेवाले मित्रदेवताने उत्तम आहुतिसे युक्त राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञद्वारा परमात्माका यजन करके वरुणका पद प्राप्त किया था ॥ ६ ॥
सोमश्च राजसूयेन इष्ट्वा धर्मेण धर्मवित् । प्राप्तश्च सर्वलोकेषु कीर्तिं स्थानं च शाश्वतम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘धर्मज्ञ सोमदेवताने धर्मपूर्वक राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करके सम्पूर्ण लोकोंमें कीर्ति तथा शाश्वत स्थानको प्राप्त कर लिया ॥७॥
अस्मिन्नहनि यच्छ्रेयश्चिन्त्यतां तन्मया सह । हितं चायतियुक्तं च प्रयतो वक्तुमर्हथः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘इसलिये आजके दिन मेरे साथ बैठकर तुमलोग यह विचार करो कि हमारे लिये कौन-सा कर्म लोक और परलोकमें कल्याणकारी होगा तथा संयत-चित्त होकर तुम दोनों इस विषयमें मुझे सलाह दो’ ॥ ८ ॥
श्रुत्वा तु राघवस्यैतद् वाक्यं वाक्यविशारदः । भरतः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ९ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर वाक्यविशारद भरतजीने हाथ जोड़कर यह बात कही—॥ ९ ॥
त्वयि धर्मः परः साधो त्वयि सर्वा वसुंधरा । प्रतिष्ठिता महाबाहो यशश्चामितविक्रम ॥ १० ॥
भावार्थ
‘साधो ! अमित पराक्रमी महाबाहो ! आपमें उत्तम धर्म प्रतिष्ठित है । यह सारी पृथ्वी भी आपपर ही आधारित है तथा आपमें ही यशकी प्रतिष्ठा है ॥ १० ॥
महीपालाश्च सर्वे त्वां प्रजापतिमिवामराः । निरीक्षन्ते महात्मानं लोकनाथं यथा वयम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘देवतालोग जैसे प्रजापति ब्रह्माको ही महात्मा एवं लोकनाथ समझते हैं, उसी प्रकार हमलोग और समस्त भूपाल आपको ही महापुरुष तथा समस्त लोकोंका स्वामी मानते हैं— उसी दृष्टिसे आपको देखते हैं ॥ ११ ॥
पुत्राश्च पितृवद् राजन् पश्यन्ति त्वां महाबल । पृथिव्या गतिभूतोऽसि प्राणिनामपि राघव ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! महाबली रघुनन्दन ! पुत्र जैसे पिताको देखते हैं, उसी प्रकार आपके प्रति सब राजाओंका भाव है । आप ही समस्त पृथ्वी और सम्पूर्ण प्राणियोंके भी आश्रय हैं ॥१२॥
स त्वमेवंविधं यज्ञमाहर्तासि कथं नृप । पृथिव्यां राजवंशानां विनाशो यत्र दृश्यते ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘नरेश्वर ! फिर आप ऐसा यज्ञ कैसे कर सकते हैं, जिसमें भूमण्डलके समस्त राजवंशोंका विनाश दिखायी देता है ॥१३॥
पृथिव्यां ये च पुरुषा राजन् पौरुषमागताः । सर्वेषां भविता तत्र संक्षयः सर्वकोपजः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! पृथ्वीपर जो पुरुषार्थी पुरुष हैं, उन सबका सभीके कोपसे उस यज्ञमें संहार हो जायगा ॥ १४ ॥
सर्वे पुरुषशार्दूल गुणैरतुलविक्रम । पृथिवीं नार्हसे हन्तुं वशे हि तव वर्तते ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! अतुल पराक्रमी वीर ! आपके सद्गुणोंके कारण सारा जगत् आपके वशमें है । आपके लिये इस भूतल के निवासियोंका विनाश करना उचित न होगा’ ॥ १५ ॥
भरतस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वामृतमयं यथा । प्रहर्षमतुलं लेभे रामः सत्यपराक्रमः ॥ १६ ॥
भावार्थ
भरतका यह अमृतमय वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥
उवाच च शुभं वाक्यं कैकेय्यानन्दवर्धनम् । प्रीतोऽस्मि परितुष्टोऽस्मि तवाद्य वचनेऽनघ ॥ १७ ॥
भावार्थ
उन्होंने कैकेयीनन्दन भरतसे यह शुभ बात कही— ‘निष्पाप भरत ! आज तुम्हारी बात सुनकर मैं बहुत प्रसन्न एवं संतुष्ट हुआ हूँ ॥ १७ ॥
इदं वचनमक्लीबं त्वया धर्मसमागतम् । व्याहृतं पुरुषव्याघ्र पृथिव्याः परिपालनम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! तुम्हारे मुखसे निकला हुआ यह उदार एवं धर्मसंगत वचन सारी पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला है ॥ १८ ॥
एष्यदस्मदभिप्रायाद् राजसूयात् क्रतूत्तमात् । निवर्तयामि धर्मज्ञ तव सुव्याहृतेन च ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘धर्मज्ञ ! मेरे हृदयमें राजसूय यज्ञका संकल्प उठ रहा था; किंतु आज तुम्हारे इस सुन्दर भाषणको सुनकर मैं उस उत्तम यज्ञकी ओरसे अपने मनको हटाये लेता हूँ ॥ १९ ॥
लोकपीडाकरं कर्म न कर्तव्यं विचक्षणैः । बालानां तु शुभं वाक्यं ग्राह्यं लक्ष्मणपूर्वज । तस्माच्छृणोमि ते वाक्यं साधु युक्तं महाबल ॥ २० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मणके बड़े भाई ! बुद्धिमान् पुरुषोंको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये, जो सम्पूर्ण जगत्को पीड़ा देनेवाला हो । बालकोंकी कही हुई बात भी यदि अच्छी हो तो उसे ग्रहण करना ही उचित है; अतः महाबली वीर ! मैंने तुम्हारी उत्तम एवं युक्तिसंगत बातको बड़े ध्यानसे सुना है’ ॥ २० ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें