Ramayana.com

उत्तरकाण्ड, सर्ग 84

ऋषेर्वचनमाज्ञाय रामः संध्यामुपासितुम् । अपाक्रामत् सरः पुण्यमप्सरोगणसेवितम् ॥ १ ॥

भावार्थ

ऋषिका यह आदेश पाकर श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना करनेके लिये अप्सराओंसे सेवित उस पवित्र सरोवरके तटपर गये ॥ १ ॥

तत्रोदकमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्य पश्चिमाम् । आश्रमं प्राविशद् रामः कुम्भयोनेर्महात्मनः ॥ २ ॥ तस्यागस्त्यो बहुगुणं कन्दमूलं तथौषधम् । शाल्यादीनि पवित्राणि भोजनार्थमकल्पयत् ॥ ३ ॥

भावार्थ

वहाँ आचमन और सायंकालकी संध्योपासना करके श्रीरामने पुनः महात्मा कुम्भजके आश्रममें प्रवेश किया ॥ अगस्त्यजीने उनके भोजनके लिये अनेक गुणोंसे युक्त कन्द, मूल, जरावस्थाको निवारण करनेवाली दिव्य ओषधि, पवित्र भात आदि वस्तुएँ अर्पित कीं ॥ ३ ॥

स भुकवान् नरश्रेष्ठस्तदन्नममृतोपमम् । प्रीतश्च परितुष्टश्च तां रात्रिं समुपाविशत् ॥ ४ ॥

भावार्थ

नरश्रेष्ठ श्रीराम वह अमृततुल्य स्वादिष्ट भोजन करके परम तृप्त और प्रसन्न हुए और वह रात्रि उन्होंने बड़े संतोषसे बितायी ॥ ४ ॥

प्रभाते काल्यमुत्थाय कृत्वाऽऽह्निकमरिंदमः । ऋषिं समुपचक्राम गमनाय रघूत्तमः ॥ ५ ॥

भावार्थ

सबेरे उठकर शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलभूषण श्रीराम नित्यकर्म करके वहाँसे जानेकी इच्छासे महर्षिके पास गये ॥ ५ ॥

अभिवाद्याब्रवीद् रामो महर्षिं कुम्भसम्भवम् । आपृच्छे त्वां पुरीं गन्तुं मामनुज्ञातुमर्हसि ॥ ६ ॥

भावार्थ

वहाँ महर्षि कुम्भजको प्रणाम करके श्रीरामने कहा— ‘महर्षे ! अब मैं अपनी पुरीको जानेके लिये आपकी आज्ञा चाहता हूँ । कृपया मुझे आज्ञा प्रदान करें ॥ ६ ॥

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि दर्शनेन महात्मनः । द्रष्टुं चैवागमिष्यामि पावनार्थमिहात्मनः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘आप महात्माके दर्शनसे मैं धन्य और अनुगृहीत हुआ । अब अपने आपको पवित्र करनेके लिये फिर कभी आपके दर्शनकी इच्छासे यहाँ आऊँगा’ ॥ ७ ॥

तथा वदति काकुत्स्थे वाक्यमद्भुतदर्शनम् । उवाच परमप्रीतो धर्मनेत्रस्तपोधनः ॥ ८ ॥ अत्यद्भुतमिदं वाक्यं तव राम शुभाक्षरम् । पावनः सर्वभूतानां त्वमेव रघुनन्दन ॥ ९ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार अद्भुत वचन कहनेपर धर्मचक्षु तपोधन अगस्त्यजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे बोले–॥ ‘श्रीराम ! आपके ये सुन्दर वचन बड़े अद्भुत हैं । रघुनन्दन ! समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाले तो आप ही हैं ॥ ९ ॥

मुहूर्तमपि राम त्वां येऽनुपश्यन्ति केचन । पाविताः स्वर्गभूताश्च पूज्यास्ते त्रिदिवेश्वरैः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! जो कोई एक मुहूर्तके लिये भी आपका दर्शन पा जाते हैं, वे पवित्र, स्वर्गके अधिकारी तथा देवताओंके लिये भी पूजनीय हो जाते हैं ॥ १० ॥

ये च त्वां घोरचक्षुर्भिः पश्यन्ति प्राणिनो भुवि । हतास्ते यमदण्डेन सद्यो निरयगामिनः ॥ ११ ॥ ईदृशस्त्वं रघुश्रेष्ठ पावनः सर्वदेहिनाम् । भुवि त्वां कथयन्तो हि सिद्धिमेष्यन्ति राघव ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘इस भूतलपर जो प्राणी आपको क्रूर दृष्टिसे देखते हैं, वे यमराजके दण्डसे पीटे जाकर तत्काल नरकमें गिरते हैं ॥ ‘रघुश्रेष्ठ ! ऐसे माहात्म्यशाली आप समस्त देहधारियोंको पवित्र करनेवाले हैं । रघुनन्दन ! पृथ्वीपर जो लोग आपकी कथाएँ कहते हैं, वे सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं ॥ १२ ॥

त्वं गच्छारिष्टमव्यग्रः पन्थानमकुतोभयम् । प्रशाधि राज्यं धर्मेण गतिर्हि जगतो भवान् ॥ १३ ॥ एवमुक्तस्तु मुनिना प्राञ्जलिः प्रग्रहो नृपः । अभ्यवादयत प्राञ्जस्तमृषिं सत्यशीलिनम् ॥ १४ ॥ अभिवाद्य ऋषिश्रेष्ठं तांश्च सर्वांस्तपोधनान् । अध्यारोहत् तदव्यग्रः पुष्पकं हेमभूषितम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘आप निश्चिन्त होकर कुशलपूर्वक पधारिये । आपके मार्गमें कहींसे कोई भय न रहे । आप धर्मपूर्वक राज्यका शासन करें; क्योंकि आप ही संसारके परम आश्रय हैं’ ॥ मुनिके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् राजा श्रीरामने भुजाएँ ऊपर उठा हाथ जोड़कर उन सत्यशील महर्षिको प्रणाम किया॥ इस प्रकार मुनिवर अगस्त्य तथा अन्य सब तपोधन ऋषियोंका भी यथोचित अभिवादन कर वे बिना किसी व्यग्रताके उस सुवर्णभूषित पुष्पक विमानपर चढ़ गये ॥१५॥

तं प्रयान्तं मुनिगणा आशीर्वादैः समन्ततः । अपूजयन् महेन्द्राभं सहस्राक्षमिवामराः ॥ १६ ॥

भावार्थ

जैसे देवता सहस्रनेत्रधारी इन्द्रकी पूजा करते हैं, उसी प्रकार जाते समय उन महेन्द्रतुल्य तेजस्वी श्रीरामको ऋषि-समूहोंने सब ओरसे आशीर्वाद दिया ॥ १६ ॥

खस्थः स दद्दशे रामः पुष्पके हेमभूषिते । शशी मेघसमीपस्थो यथा जलधरागमे ॥ १७ ॥

भावार्थ

उस सुवर्णभूषित पुष्पकविमानपर आकाशमें स्थित हुए श्रीराम वर्षाकालमें मेघोंके समीपवर्ती चन्द्रमाके समान दिखायी देते थे ॥ १७ ॥

ततोऽर्धदिवसे प्राप्ते पूज्यमानस्ततस्ततः । अयोध्यां प्राप्य काकुत्स्थो मध्यकक्षामवातरत् ॥ १८ ॥

भावार्थ

तदनन्तर जगह-जगह सम्मान पाते हुए वे श्रीरघुनाथजी मध्याह्नके समय अयोध्यामें पहुँचकर मध्यम कक्षा ( बीचकी ड्योढ़ी ) में उतरे ॥ १८ ॥

ततो विसृज्य रुचिरं पुष्पकं कामगामिनम् । विसर्जयित्वा गच्छेति स्वस्ति तेऽस्त्विति च प्रभुः ॥ १९ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् इच्छानुसार चलनेवाले उस सुन्दर पुष्पकविमानको वहीं छोड़कर भगवान्ने उससे कहा—‘अब तुम जाओ । तुम्हारा कल्याण हो’ ॥ १९ ॥

कक्षान्तरस्थितं क्षिप्रं द्वाःस्थं रामोऽब्रवीद् वचः । लक्ष्मणं भरतं चैव गत्वा तौ लघुविक्रमौ । ममागमनमाख्याय शब्दापयत मा चिरम् ॥ २० ॥

भावार्थ

फिर श्रीरामने ड्योढ़ीके भीतर खड़े हुए द्वारपालसे शीघ्रतापूर्वक कहा—‘तुम अभी जाकर शीघ्रपराक्रमी भरत और लक्ष्मणको मेरे आनेकी सूचना दो और उन्हें जल्दी बुला लाओ’ ॥ २० ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें