उत्तरकाण्ड, सर्ग 80
श्रुत्वा तु भाषितं वाक्यं मम राम शुभाक्षरम् । प्राञ्जलिः प्रत्युवाचेदं स स्वर्गी रघुनन्दन ॥ १ ॥
भावार्थ
( अगस्त्यजी कहते हैं— ) रघुकुलनन्दन राम ! मेरी कही हुई शुभ अक्षरोंसे युक्त बात सुनकर उन स्वर्गीय पुरुषने हाथ जोड़कर इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥
शृणु ब्रह्मन् पुरा वृत्तं ममैतत् सुखदुःखयोः । अनतिक्रमणीयं च यथा पृच्छसि मां द्विज ॥ २ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! आप जो कुछ पूछ रहे हैं, वह मेरे सुख-दुःखका अलङ्घनीय कारण, जो पूर्वकालमें घटित हो चुका है, यहाँ बताया जाता है, सुनिये ॥ २ ॥
पुरा वैदर्भको राजा पिता मम महायशाः । सुदेव इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘पूर्वकालमें मेरे महायशस्वी पिता विदर्भ देशके राजा थे । उनका नाम सुदेव था । वे तीनों लोकोंमें विख्यात पराक्रमी थे ॥ ३ ॥
तस्य पुत्रद्वयं ब्रह्मन् द्वाभ्यां स्त्रीभ्यामजायत । अहं श्वेत इति ख्यातो यवीयान् सुरथोऽभवत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! उनके दो पत्नियाँ थीं, जिनके गर्भसे उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए । उनमें ज्येष्ठ मैं था । मेरी श्वेतके नामसे प्रसिद्धि हुई और मेरे छोटे भाईका नाम सुरथ था ॥ ४ ॥
ततः पितरि स्वर्याते पौरा मामभ्यषेचयन् । तत्राहं कृतवान् राज्यं धर्म्यं च सुसमाहितः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘पिताके स्वर्गलोकमें चले जानेपर पुरवासियोंने राजाके पदपर मेरा अभिषेक कर दिया । वहाँ परम सावधान रहकर मैंने धर्मके अनुकूल राज्यका पालन किया ॥ ५ ॥
एवं वर्षसहस्राणि समतीतानि सुव्रत । राज्यं कारयतो ब्रह्मन् प्रजा धर्मेण रक्षतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षे ! इस तरह धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा तथा राज्यका शासन करते हुए मेरे एक सहस्र वर्ष बीत गये ॥ ६ ॥
सोऽहं निमित्ते कस्मिश्चिद् विज्ञातायुर्द्विजोत्तम । कालधर्मं हृदि न्यस्य ततो वनमुपागमम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘द्विजश्रेष्ठ ! एक समय मुझे किसी निमित्तसे अपनी आयुका पता लग गया और मैंने मृत्यु-तिथिको हृदयमें रखकर वहाँसे वनको प्रस्थान किया ॥ ७ ॥
सोऽहं वनमिदं दुर्गं मृगपक्षिविवर्जितम् । तपश्चर्तुं प्रविष्टोऽस्मि समीपे सरसः शुभे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘उस समय मैं इसी दुर्गम वनमें आया, जिसमें न पशु हैं न पक्षी । वनमें प्रवेश करके मैं इसी सरोवरके सुन्दर तटके निकट तपस्या करनेके लिये बैठा ॥ ८ ॥
भ्रातरं सुरथं राज्ये अभिषिच्य महीपतिम् । इदं सरः समासाद्य तपस्तप्तं मया चिरम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘राज्यपर अपने भाई राजा सुरथका अभिषेक करके इस सरोवरके समीप आकर मैंने दीर्घकालतक तपस्या की ॥ ९ ॥
सोऽहं वर्षसहस्राणि तपस्त्रीणि महावने । तप्त्वा सुदुष्करं प्राप्तो ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘इस विशाल वनमें तीन हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके मैं परम उत्तम ब्रह्मलोकको प्राप्त हुआ ॥ १० ॥
तस्येमे स्वर्गभूतस्य क्षुत्पिपासे द्विजोत्तम । बाधेते परमोदार ततोऽहं व्यथितेन्द्रियः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘द्विजश्रेष्ठ ! परम उदार महर्षे ! ब्रह्मलोकमें पहुँच जानेपर भी मुझे भूख और प्यास बड़ा कष्ट देते हैं । उससे मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठती हैं ॥ ११ ॥
गत्वा त्रिभुवनश्रेष्ठं पितामहमुवाच ह । भगवन् ब्रह्मलोकोऽयं क्षुत्पिपासाविवर्जितः ॥ १२ ॥ कस्यायं कर्मणः पाकः क्षुत्पिपासानुगो ह्यहम् । आहारः कश्च मे देव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘एक दिन मैंने त्रिलोकीके श्रेष्ठ देवता भगवान् ब्रह्माजीसे कहा—‘भगवन् ! यह ब्रह्मलोक तो भूख-प्यासके कष्टसे रहित है, किंतु यहाँ भी क्षुधा-पिपासाका क्लेश मेरा पीछा नहीं छोड़ता है । यह मेरे किस कर्मका परिणाम है ? देव ! पितामह ! मेरा आहार क्या है ? यह मुझे बताइये’ ॥ १२-१३ ॥
पितामहस्तु मामाह तवाहारः सुदेवज । स्वादूनि स्वानि मांसानि तानि भक्षय नित्यशः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘यह सुनकर ब्रह्माजी मुझसे बोले—‘सुदेवनन्दन ! तुम मर्त्यलोकमें स्थित अपने ही शरीरका सुस्वादु मांस प्रतिदिन खाया करो; यही तुम्हारा आहार है ॥ १४ ॥
स्वशरीरं त्वया पुष्टं कुर्वता तप उत्तमम् । अनुप्तं रोहते श्वेत न कदाचिन्महामते ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘श्वेत ! तुमने उत्तम तप करते हुए केवल अपने शरीरका ही पोषण किया है । महामते ! दानरूपी बीज बोये बिना कहीं कुछ भी नहीं जमता—कोई भी भोज्य-पदार्थ उपलब्ध नहीं होता है ॥ १५ ॥
दत्तं न तेऽस्ति सूक्ष्मोऽपि तप एव निषेवसे । तेन स्वर्गगतो वत्स बाध्यसे क्षुत्पिपासया ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘तुमने देवताओं, पितरों एवं अतिथियोंके लिये कभी कुछ थोड़ा-सा भी दान किया हो, ऐसा नहीं दिखायी देता । तुम केवल तपस्या करते थे । वत्स ! इसीलिये ब्रह्मलोकमें आकर भी भूख-प्याससे पीड़ित हो रहे हो ॥ १६ ॥
स त्वं सुपुष्टमाहारैः स्वशरीरमनुत्तमम् । भक्षयित्वामृतरसं तेन वृत्तिर्भविष्यति ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘नाना प्रकारके आहारोंसे भलीभाँति पोषित हुआ तुम्हारा परम उत्तम शरीर अमृतरससे युक्त होगा और उसीका भक्षण करनेसे तुम्हारी क्षुधा-पिपासाका निवारण हो जायगा ॥ १७ ॥
यदा तु तद्वनं श्वेत अगस्त्यः स महान्ऋषिः । आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा कृच्छ्राद् विमोक्ष्यसे ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘‘श्वेत ! जब उस वनमें दुर्धर्ष महर्षि अगस्त्य पधारेंगे, तब तुम इस कष्टसे छुटकारा पा जाओगे ॥ १८ ॥
स हि तारयितुं सौम्य शक्तः सुरगणानपि । किं पुनस्त्वां महाबाहो क्षुत्पिपासावशं गतम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! महाबाहो ! वे देवताओंका भी उद्धार करनेमें समर्थ हैं, फिर भूख-प्यासके वशमें पड़े हुए तुम-जैसे पुरुषको संकटसे छुड़ाना उनके लिये कौन बड़ी बात है ?’ ॥ १९ ॥
सोऽहं भगवतः श्रुत्वा देवदेवस्य निश्चयम् । आहारं गर्हितं कुर्मि स्वशरीरं द्विजोत्तम ॥ २० ॥ बहून् वर्षगणान् ब्रह्मन् भुज्यमानमिदं मया । क्षयं नाभ्येति ब्रह्मर्षे तृप्तिश्चापि ममोत्तमा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘द्विजश्रेष्ठ ! देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माका यह निश्चय सुनकर मैं अपने शरीरका ही घृणित आहार ग्रहण करने लगा ॥ ‘ब्रह्मन् ! ब्रह्मर्षे ! बहुत वर्षोंसे मेरे द्वारा उपभोगमें लाये जानेपर भी यह शरीर नष्ट नहीं होता है और मुझे पूर्णतः तृप्ति प्राप्त होती है ॥ २१ ॥
तस्य मे कृच्छ्रभूतस्य कृच्छ्रादस्माद् विमोक्षय । अन्येषां न गतिर्ह्यत्र कुम्भयोनिमृते द्विजम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मुने ! इस प्रकार मैं संकटमें पड़ा हूँ । आप मेरे दृष्टिपथमें आ गये हैं, इसलिये इस कष्टसे मेरा उद्धार कीजिये । आप ब्रह्मर्षि कुम्भजके सिवा दूसरोंकी इस निर्जन वनमें पहुँच नहीं हो सकती ( इसलिये आप अवश्य कुम्भयोनि अगस्त्य ही हैं ) ॥ २२ ॥
इदमाभरणं सौम्य तारणार्थं द्विजोत्तम । प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! विप्रवर ! आपका कल्याण हो । आप मेरा उद्धार करनेके लिये मेरे इस आभूषणका दान ग्रहण करें और आपका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो ॥ २३ ॥
इदं तावत् सुवर्णं च धनं वस्त्राणि च द्विज । भक्ष्यं भोज्यं च ब्रह्मर्षे ददात्याभरणानि च ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! ब्रह्मर्षे ! यह दिव्य आभूषण सुवर्ण, धन, वस्त्र, भक्ष्य, भोज्य तथा अन्य नाना प्रकारके आभरण भी देता है ॥ २४ ॥
सर्वान् कामान् प्रयच्छामि भोगांश्च मुनिपुङ्गव । तारणे भगवन् मह्यं प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘मुनिश्रेष्ठ ! इस आभूषणके द्वारा मैं समस्त कामनाओं ( मनोवाञ्छित पदार्थों ) और भोगोंको भी दे रहा हूँ । भगवन् ! आप मेरे उद्धारके लिये मुझपर कृपा करें’ ॥ २५ ॥
तस्याहं स्वर्गिणो वाक्यं श्रुत्वा दुःखसमन्वितम् । तारणायोपजग्राह तदाभरणमुत्तमम् ॥ २६ ॥ मया प्रतिगृहीते तु तस्मिन्नाभरणे शुभे । मानुषः पूर्वको देहो राजर्षेर्विननाश ह ॥ २७ ॥ प्रणष्टे तु शरीरेऽसौ राजर्षिः परया मुदा । तृप्तः प्रमुदितो राजा जगाम त्रिदिवं सुखम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
स्वर्गीय राजा श्वेतकी यह दुःखभरी बात सुनकर मैंने उनका उद्धार करनेके लिये वह उत्तम आभूषण ले लिया ॥ ज्यों ही मैंने उस शुभ आभूषणका दान ग्रहण किया, त्यों ही राजर्षि श्वेतका वह पूर्व-शरीर ( शव ) अदृश्य हो गया ॥ उस शरीरके अदृश्य हो जानेपर राजर्षि श्वेत परमानन्दसे तृप्त हो प्रसन्नतापूर्वक सुखमय ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २८ ॥
तेनेदं शक्रतुल्येन दिव्यमाभरणं मम । तस्मिन्निमित्ते काकुत्स्थ दत्तमद्भुतदर्शनम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
काकुत्स्थ ! उन इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजा श्वेतने उस भूख-प्यासके निवारणरूप पूर्वोक्त निमित्तसे यह अद्भुत दिखायी देनेवाला दिव्य आभूषण मुझे दिया था ॥ २९ ॥
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