उत्तरकाण्ड, सर्ग 79
पुरा त्रेतायुगे राम बभूव बहुविस्तरम् । समन्ताद् योजनशतं विमृगं पक्षिवर्जितम् ॥ १ ॥
भावार्थ
( अगस्त्यजी कहते हैं— ) श्रीराम ! प्राचीनकालके त्रेतायुगकी बात है, एक बहुत ही विस्तृत वन था, जो चारों ओर सौ योजनतक फैला हुआ था; परंतु उस वनमें न तो कोई पशु था और न पक्षी ही ॥ १ ॥
तस्मिन् निर्मानुषेऽरण्ये कुर्वाणस्तप उत्तमम् । अहमाक्रमितुं सौम्य तदरण्यमुपागमम् ॥ २ ॥
भावार्थ
सौम्य ! उस निर्जन वनमें उत्तम तपस्या करनेके लिये घूम-घूमकर उपयुक्त स्थानका पता लगानेके निमित्त मैं वहाँ गया ॥ २ ॥
तस्य रूपमरण्यस्य निर्देष्टुं न शशाक ह । फलमूलैः सुखास्वादैर्बहुरूपैश्च पादपैः ॥ ३ ॥
भावार्थ
उस वनका स्वरूप कितना सुखदायी था, यह बतानेमें मैं असमर्थ हूँ । सुखद स्वादिष्ट फल-मूल तथा अनेक रूप-रंगके वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ३ ॥
तस्यारण्यस्य मध्ये तु सरो योजनमायतम् । हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
उस वनके मध्यभागमें एक सरोवर था, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी थी । उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी फैले हुए थे और चक्रवाकोंके जोड़े उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ४ ॥
पद्मोत्पलसमाकीर्णं समतिक्रान्तशैवलम् । तदाश्चर्यमिवात्यर्थं सुखास्वादमनुत्तमम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उसमें कमल और उत्पल छा रहे थे । सेवारका कहीं नाम भी नहीं था । वह परम उत्तम सरोवर अत्यन्त आश्चर्यमय-सा जान पड़ता था । उसका जल पीनेमें अत्यन्त सुखद एवं स्वादिष्ट था ॥ ५ ॥
अरजस्कं तदक्षोभ्यं श्रीमत्पक्षिगणायुतम् । तस्मिन् सरःसमीपे तु महदद्भुतमाश्रमम् ॥ ६ ॥ पुराणं पुण्यमत्यर्थं तपस्विजनवर्जितम् ।
भावार्थ
उसमें कीचड़ नहीं था, वह सर्वथा निर्मल था । उसे कोई पार नहीं कर सकता था । उसके भीतर सुन्दर पक्षी कलरव कर रहे थे । उस सरोवरके पास ही एक विशाल, अद्भुत एवं अत्यन्त पवित्र पुराना आश्रम था; जिसमें एक भी तपस्वी नहीं था ॥ ६½ ॥
तत्राहमवसं रात्रिं नैदाघीं पुरुषर्षभ ॥ ७ ॥ प्रभाते कल्यमुत्थाय सरस्तदुपचक्रमे ।
भावार्थ
पुरुषप्रवर ! जेठकी रातमें मैं उस आश्रमके भीतर एक रात रहा और प्रातःकाल सबेरे उठकर स्नान आदिके लिये उस सरोवरके तटपर जाने लगा ॥ ७½ ॥
अथापश्यं शवं तत्र सुपुष्टपरजः कचित् ॥ ८ ॥ तिष्ठन्तं परया लक्ष्म्या तस्मिंस्तोयाशये नृप ।
भावार्थ
उसी समय मुझे वहाँ एक शव दिखायी दिया जो हृष्ट-पुष्ट होनेके साथ ही अत्यन्त निर्मल था । उसमें कहीं कोई मलिनता नहीं थी । नरेश्वर ! वह शव उस जलाशयके तटपर बड़ी शोभासे सम्पन्न होकर पड़ा था ॥ ८½ ॥
तमर्थं चिन्तयानोऽहं मुहूर्तं तत्र राघव ॥ ९ ॥ विष्ठितोऽस्मि सरस्तीरे किं न्विदं स्यादिति प्रभो ।
भावार्थ
प्रभो ! रघुनन्दन ! मैं उस शवके विषयमें यह सोचता हुआ कि ‘यह क्या है ?’ वहाँ दो घड़ी तक उस तालाबके किनारे बैठा रहा ॥ ९½ ॥
अथापश्यं मुहूर्तात् तु दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥ १० ॥ विमानं परमोदारं हंसयुक्तं मनोजवम् । अत्यर्थं स्वर्गिणं तत्र विमाने रघुनन्दन ॥ ११ ॥ उपास्तेऽप्सरसां वीर सहस्रं दिव्यभूषणम् । गायन्ति काश्चिद् रम्याणि वादयन्ति तथापराः ॥ १२ ॥ मृदङ्गवीणापणवान् नृत्यन्ति च तथापराः । अपराश्चन्द्ररश्म्याभैर्हेमदण्डैर्महाधनैः ॥ १३ ॥ दोधूयुर्वदनं तस्य पुण्डरीकनिभेक्षणाः ।
भावार्थ
दो घड़ी बीतते ही मैंने वहाँ एक दिव्य, अद्भुत, अत्यन्त उत्तम, हंसयुक्त और मनके समान वेगशाली विमान उतरता देखा । रघुनन्दन ! उस विमानपर एक स्वर्गवासी देवता बैठे थे, जो अत्यन्त रूपवान् थे । वीर ! वहाँ उनकी सेवामें सहस्रों अप्सराएँ बैठी थीं, जो दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थीं ॥ उनमेंसे कुछ मनोहर गीत गा रही थीं, दूसरी मृदङ्ग, वीणा और पणव आदि बाजे बजा रही थीं । अन्य बहुत-सी अप्सराएँ नृत्य करती थीं तथा प्रफुल्ल कमल-जैसे नेत्रोंवाली अन्य कितनी ही अप्सराएँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एवं चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल बहुमूल्य चँवर लेकर उन स्वर्गवासी देवताके मुखपर हवा कर रही थीं ॥ १२-१३½ ॥
ततः सिंहासनं हित्वा मेरुकूटमिवांशुमान् ॥ १४ ॥ पश्यतो मे तदा राम विमानादवरुह्य च । तं शवं भक्षयामास स स्वर्गी रघुनन्दन ॥ १५ ॥
भावार्थ
रघुकुलनन्दन श्रीराम ! तदनन्तर जैसे अंशुमाली सूर्य मेरुपर्वतके शिखरको छोड़कर नीचे उतरते हैं, उसी प्रकार उन स्वर्गवासी पुरुषने विमानसे उतरकर मेरे देखते देखते उस शवका भक्षण किया ॥ १४-१५ ॥
ततो भुक्त्वा यथाकामं मांसं बहु सुपीवरम् । अवतीर्य सरः स्वर्गी संस्प्रष्टुमुपचक्रमे ॥ १६ ॥
भावार्थ
इच्छानुसार उस सुपुष्ट एवं प्रचुर मांसको खाकर वे स्वर्गीय देवता सरोवरमें उतरे और हाथ-मुँह धोने लगे ॥१६॥
उपस्पृश्य यथान्यायं स स्वर्गी रघुनन्दन । आरोढुमुपचक्राम विमानवरमुत्तमम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! यथोचित रीतिसे कुल्ला-आचमन करके वे स्वर्गवासी पुरुष उस उत्तम एवं श्रेष्ठ विमानपर चढ़नेको उद्यत हुए ॥ १७ ॥
तमहं देवसंकाशमारोहन्तमुदीक्ष्य वै । अथाहमब्रुवं वाक्यं तमेव पुरुषर्षभ ॥ १८ ॥
भावार्थ
पुरुषोत्तम ! उन देवतुल्य पुरुषको विमानपर चढ़ते देख मैंने उनसे यह बात पूछी—॥ १८ ॥
को भवान् देवसंकाश आहारश्च विगर्हितः । त्वयेदं भुज्यते सौम्य किमर्थं वक्तुमर्हसि ॥ १९ ॥ कस्य स्यादीदृशो भाव आहारो देवसम्मतः । आश्चर्यं वर्तते सौम्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । नाहमौपयिकं मन्ये तव भक्ष्यमिमं शवम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! देवोपम पुरुष ! आप कौन हैं और किसलिये ऐसा घृणित आहार ग्रहण करते हैं ? यह बतानेका कष्ट करें ॥ ‘देवतुल्य तेजस्वी पुरुष ! ऐसा दिव्य स्वरूप और ऐसा घृणित आहार किसका हो सकता है ? सौम्य ! आपमें ये दोनों आश्चर्यजनक बातें हैं, अतः मैं इसका यथार्थ रहस्य सुनना चाहता हूँ; क्योंकि मैं इस शवको आपके योग्य आहार नहीं मानता हूँ’ ॥ २० ॥
इत्येवमुक्तः स नरेन्द्र नाकी कौतूहलात् सूनृतया गिरा च । श्रुत्वा च वाक्यं मम सर्वमेतत् सर्वं तथा चाकथयन्ममेति ॥ २१ ॥
भावार्थ
नरेश्वर ! जब कौतूहलवश मैंने मधुर वाणीमें उन स्वर्गीय पुरुषसे इस प्रकार पूछा, तब मेरी बातें सुनकर उन्होंने यह सब कुछ मेरे सामने बताया ॥ २१ ॥
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