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उत्तरकाण्ड, सर्ग 78

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः । अवाक्शिरास्तथाभूतो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥

भावार्थ

क्लेशरहित कर्म करनेवाले भगवान् रामका यह वचन सुनकर नीचे मस्तक किये लटका हुआ वह तथाकथित तपस्वी इस प्रकार बोला--॥ १ ॥

शूद्रयोन्यां प्रजातोऽस्मि तप उग्रं समास्थितः । देवत्वं प्रार्थये राम सशरीरो महायशः ॥ २ ॥

भावार्थ

‘महायशस्वी श्रीराम ! मैं शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ और सदेह स्वर्गलोकमें जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूँ । इसीलिये ऐसा उग्र तप कर रहा हूँ ॥ २ ॥

न मिथ्याहं वदे राम देवलोकजिगीषया । शूद्रं मां विद्धि काकुत्स्थ शम्बूकं नाम नामतः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! मैं झूठ नहीं बोलता । देवलोकपर विजय पानेकी इच्छासे ही तपस्यामें लगा हूँ । आप मुझे शूद्र समझिये । मेरा नाम शम्बूक है’ ॥ ३ ॥

भाषतस्तस्य शूद्रस्य खड्गं सुरुचिरप्रभम् । निष्कृष्य कोशाद् विमलं शिरश्चिच्छेद राघवः ॥ ४ ॥

भावार्थ

वह इस प्रकार कह ही रहा था कि श्रीरामचन्द्रजीने म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींच ली और उसीसे उसका सिर काट लिया ॥ ४ ॥

तस्मिञ्शूद्रे हते देवाः सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः । साधुसाध्विति काकुत्स्थं ते शशंसुर्मुहुर्मुहुः ॥ ५ ॥

भावार्थ

उस शूद्रका वध होते ही इन्द्र और अग्निसहित सम्पूर्ण देवता ‘बहुत ठीक, बहुत ठीक’ कहकर भगवान् श्रीरामकी बारंबार प्रशंसा करने लगे ॥ ५ ॥

पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् दिव्यानां सुसुगन्धिनाम् । पुष्पाणां वायुमुक्तानां सर्वतः प्रपपात ह ॥ ६ ॥

भावार्थ

उस समय उनके ऊपर सब ओरसे वायुदेवताद्वारा बिखेरे गये दिव्य एवं परम सुगन्धित पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी ॥ ६ ॥

सुप्रीताश्चाब्रुवन् रामं देवाः सत्यपराक्रमम् । सुरकार्यमिदं देव सुकृतं ते महामते ॥ ७ ॥

भावार्थ

वे सब देवता अत्यन्त प्रसन्न होकर सत्यपराक्रमी श्रीरामसे बोले—‘देव ! महामते ! आपने यह देवताओंका ही कार्य सम्पन्न किया है ॥ ७ ॥

गृहाण च वरं सौम्य यं त्वमिच्छस्यरिंदम । स्वर्गभाङ् नहि शूद्रोऽयं त्वत्कृते रघुनन्दन ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन सौम्य श्रीराम ! आपके इस सत्कर्मसे ही यह शूद्र सशरीर स्वर्गलोकमें नहीं जा सका है । अतः आप जो वर चाहें माँग लें’ ॥ ८ ॥

देवानां भाषितं श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः । उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सहस्राक्षं पुरंदरम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

देवताओंका यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने दोनों हाथ जोड़ सहस्रनेत्रधारी देवराज इन्द्रसे कहा—॥९॥

यदि देवाः प्रसन्ना मे द्विजपुत्रः स जीवतु । दिशन्तु वरमेतं मे ईप्सितं परमं मम ॥ १० ॥

भावार्थ

‘यदि देवता मुझपर प्रसन्न हैं तो वह ब्राह्मणपुत्र जीवित हो जाय । यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वर है । देवतालोग मुझे यही वर दें ॥ १० ॥

ममापचाराद् बालोऽसौ ब्राह्मणस्यैकपुत्रकः । अप्राप्तकालः कालेन नीतो वैवस्वतक्षयम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘मेरे ही किसी अपराधसे ब्राह्मणका वह इकलौता बालक असमयमें ही कालके गालमें चला गया है ॥ ११ ॥

तं जीवयत भद्रं वो नानृतं कर्तुमर्हथ । द्विजस्य संश्रुतोऽर्थो मे जीवयिष्यामि ते सुतम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘मैंने ब्राह्मणके सामने यह प्रतिज्ञा की है कि ‘मैं आपके पुत्रको जीवित कर दूँगा ।’ अतः आपलोगोंका कल्याण हो । आप उस ब्राह्मण-बालकको जीवित कर दें । मेरी बातको झूठी न करें’ ॥ १२ ॥

राघवस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा विबुधसत्तमाः । प्रत्यूचू राघवं प्रीता देवाः प्रीतिसमन्वितम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर वे विबुधशिरोमणि देवता उनसे प्रसन्नतापूर्वक बोले—॥ १३ ॥

निर्वृतो भव काकुत्स्थ सोऽस्मिन्नहनि बालकः । जीवितं प्राप्तवान् भूयः समेतश्चापि बन्धुभिः ॥ १४ ॥ यस्मिन् मुहूर्ते काकुत्स्थ शूद्रोऽयं विनिपातितः । तस्मिन् मुहूर्ते बालोऽसौ जीवेन समयुज्यत ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण ! आप संतुष्ट हों । वह बालक आज फिर जीवित हो गया और अपने भाई-बन्धुओंसे जा मिला ॥ ‘काकुत्स्थ ! आपने जिस मुहूर्तमें इस शूद्रको धराशायी किया है, उसी मुहूर्तमें वह बालक जी उठा है ॥ १५ ॥

स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते साधु याम नरर्षभ । अगस्त्यस्याश्रमपदं द्रष्टुमिच्छाम राघव ॥ १६ ॥ तस्य दीक्षा समाप्ता हि ब्रह्मर्षेः सुमहाद्युतेः । द्वादशं हि गतं वर्षं जलशय्यां समासतः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! आपका कल्याण हो । भला हो । अब हम अगस्त्याश्रमको जा रहे हैं । रघुनन्दन ! हम महर्षि अगस्त्यका दर्शन करना चाहते हैं । उन्हें जलशय्या लिये पूरे बारह वर्ष बीत चुके हैं । अब उन महातेजस्वी ब्रह्मर्षिकी वह जलशयन-सम्बन्धी व्रतकी दीक्षा समाप्त हुई है ॥१६-१७॥

काकुत्स्थ तद् गमिष्यामो मुनिं समभिनन्दितुम् । त्वं चापि गच्छ भद्रं ते द्रष्टुं तमृषिसत्तमम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! इसीलिये हमलोग उन महर्षिका अभिनन्दन करनेके लिये जायँगे । आपका कल्याण हो । आप भी उन मुनिश्रेष्ठका दर्शन करनेके लिये चलिये’ ॥ १८ ॥

स तथेति प्रतिज्ञाय देवानां रघुनन्दनः । आरुरोह विमानं तं पुष्पकं हेमभूषितम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर रघुकुलनन्दन श्रीराम देवताओंके सामने वहाँ जानेकी प्रतिज्ञा करके उस सुवर्णभूषित पुष्पकविमानपर चढ़े ॥ १९ ॥

ततो देवाः प्रयातास्ते विमानैर्बहुविस्तरैः । रामोऽप्यनुजगामाशु कुम्भयोनेस्तपोवनम् ॥ २० ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् देवता बहुसंख्यक विमानोंपर आरूढ़ हो वहाँसे प्रस्थित हुए । फिर श्रीराम भी उन्हींके साथ शीघ्रतापूर्वक कुम्भज ऋषिके तपोवनको चल दिये ॥ २० ॥

दृष्ट्वा तु देवान् सम्प्राप्तानगस्त्यस्तपसां निधिः । अर्चयामास धर्मात्मा सर्वांस्तानविशेषतः ॥ २१ ॥

भावार्थ

देवताओंको आया देख तपस्याकी निधि धर्मात्मा अगस्त्यने उन सबकी समानरूपसे पूजा की ॥ २१ ॥

प्रतिगृह्य ततः पूजां सम्पूज्य च महामुनिम् । जग्मुस्ते त्रिदशा हृष्ट्वा नाकपृष्ठं सहानुगाः ॥ २२ ॥

भावार्थ

उनकी पूजा ग्रहण करके उन महामुनिका अभिनन्दन कर वे सब देवता अनुचरोंसहित बड़े हर्षके साथ स्वर्गको चले गये ॥ २२ ॥

गतेषु तेषु काकुत्स्थः पुष्पकादवरुह्य च । ततोऽभिवादयामास अगस्त्यमृषिसत्तमम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

उनके चले जानेपर श्रीरघुनाथजीने पुष्पकविमानसे उतरकर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको प्रणाम किया ॥ २३ ॥

सोऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा । आतिथ्यं परमं प्राप्य निषसाद नराधिपः ॥ २४ ॥

भावार्थ

अपने तेजसे प्रज्वलित-से होनेवाले महात्मा अगस्त्यका अभिवादन करके उनसे उत्तम आतिथ्य पाकर नरेश्वर श्रीराम आसनपर बैठे ॥ २४ ॥

तमुवाच महातेजाः कुम्भयोनिर्महातपाः । स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥ २५ ॥

भावार्थ

उस समय महातेजस्वी महातपस्वी कुम्भज मुनिने कहा--‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन ! आपका स्वागत है । आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ २५ ॥

त्वं मे बहुमतो राम गुणैर्बहुभिरुत्तमैः । अतिथिः पूजनीयश्च मम राजन् हृदि स्थितः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘महाराज श्रीराम ! बहुत से उत्तम गुणोंके कारण आपके लिये मेरे हृदयमें बड़ा सम्मान है । आप मेरे आदरणीय अतिथि हैं और सदा मेरे मनमें बसे रहते हैं ॥ २६ ॥

सुरा हि कथयन्ति त्वामागतं शूद्रघातिनम् । ब्राह्मणस्य तु धर्मेण त्वया जीवापितः सुतः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘देवतालोग कहते थे कि ‘आप अधर्मपरायण शूद्रका वध करके आ रहे हैं तथा धर्मके बलसे आपने ब्राह्मणके उस मरे हुए पुत्रको जीवित कर दिया है’ ॥२७॥

उष्यतां चेह रजनीं सकाशे मम राघव । प्रभाते पुष्पकेण त्वं गन्तासि पुरमेव हि ॥ २८ ॥ त्वं हि नारायणः श्रीमांस्त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । त्वं प्रभुः सर्वदेवानां पुरुषस्त्वं सनातनः ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! आज रातको आप मेरे ही पास इस आश्रममें निवास कीजिये । कल सबेरे पुष्पकविमानद्वारा अपने नगरको जाइयेगा । आप साक्षात् श्रीमान् नारायण हैं । सारा जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है और आप ही समस्त देवताओंके स्वामी तथा सनातन पुरुष हैं ॥ २८-२९ ॥

इदं चाभरणं सौम्य निर्मितं विश्वकर्मणा । दिव्यं दिव्येन वपुषा दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ३० ॥ प्रतिगृह्णीष्व काकुत्स्थ मत्प्रियं कुरु राघव । दत्तस्य हि पुनर्दाने सुमहत् फलमुच्यते ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! यह विश्वकर्माका बनाया हुआ दिव्य आभूषण है, जो अपने दिव्य रूप और तेजसे प्रकाशित हो रहा है ॥ ‘ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन ! आप इसे लीजिये और मेरा प्रिय कीजिये; क्योंकि किसीकी दी हुई वस्तुका पुनः दान कर देनेसे महान् फलकी प्राप्ति बतायी जाती है ॥ ३१ ॥

भरणे हि भवाञ्शक्तः फलानां महतामपि । त्वं हि शक्तस्तारयितुं सेन्द्रानपि दिवौकसः ॥ ३२ ॥ तस्मात् प्रदास्ये विधिवत् तत् प्रतीच्छ नराधिप ।

भावार्थ

‘इस आभूषणको धारण करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं तथा बड़े-से-बड़े फलोंकी प्राप्ति करानेकी शक्ति भी आपमें ही है । आप इन्द्र आदि देवताओंको भी तारनेमें समर्थ हैं, इसलिये नरेश्वर ! यह भूषण भी मैं आपको ही दूँगा । आप इसे विधिपूर्वक ग्रहण करें’ ॥ ३२½ ॥

अथोवाच महात्मानमिक्ष्वाकूणां महारथः ॥ ३३ ॥ रामो मतिमतां श्रेष्ठः क्षत्रधर्ममनुस्मरन् । प्रतिग्रहोऽयं भगवन् ब्राह्मणस्याविगर्हितः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और इक्ष्वाकुकुलके महारथी वीर श्रीरामने क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए वहाँ महात्मा अगस्त्यजीसे कहा--‘भगवन् ! दान लेनेका काम तो केवल ब्राह्मणके लिये ही निन्दित नहीं है ॥ ३३-३४॥

क्षत्रियेण कथं विप्र प्रतिग्राह्यं भवेत् ततः । प्रतिग्रहो हि विप्रेन्द्र क्षत्रियाणां सुगर्हितः ॥ ३५ ॥ ब्राह्मणेन विशेषेण दत्तं तद् वक्तुमर्हसि ।

भावार्थ

‘विप्रवर ! क्षत्रियोंके लिये तो प्रतिग्रह स्वीकार करना अत्यन्त निन्दित बताया गया है। फिर क्षत्रिय प्रतिग्रह-विशेषतः ब्राह्मणका दिया हुआ दान कैसे ले सकता है ? यह बतानेकी कृपा करें’ ॥ ३५½ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण प्रत्युवाच महान्ऋषिः ॥ ३६ ॥ आसन् कृतयुगे राम ब्रह्मभूते पुरायुगे । अपार्थिवाः प्रजाः सर्वाः सुराणां तु शतक्रतुः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर महर्षि अगस्त्यने उत्तर दिया--‘रघुनन्दन ! पहले ब्रह्मस्वरूप सत्ययुगमें सारी प्रजा बिना राजाके ही थी, आगे चलकर इन्द्र देवताओंके राजा बनाये गये ॥ ३६-३७ ॥

ताः प्रजा देवदेवेशं राजार्थं समुपाद्रवन् । सुराणां स्थापितो राजा त्वया देव शतक्रतुः ॥ ३८ ॥ प्रयच्छास्मासु लोकेश पार्थिवं नरपुङ्गवम् । यस्मै पूजां प्रयुञ्जाना धूतपापाश्चरेमहि ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘तब सारी प्रजाएँ देवदेवेश्वर ब्रह्माजीके पास राजाके लिये गयीं और बोलीं—‘देव ! आपने इन्द्रको देवताओंके राजाके पदपर स्थापित किया है । इसी तरह हमारे लिये भी किसी श्रेष्ठ पुरुषको राजा बना दीजिये, जिसकी पूजा करके हम पापरहित हो इस भूतलपर विचरें ॥ ३८-३९ ॥

न वसामो विना राज्ञा एष नो निश्चयः परः । ततो ब्रह्मा सुरश्रेष्ठो लोकपालान् सवासवान् ॥ ४० ॥ समाहूयाब्रवीत् सर्वांस्तेजोभागान् प्रयच्छत । ततो ददुर्लोकपालाः सर्वे भागान् स्वतेजसः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘‘हम बिना राजाके नहीं रहेंगी। यह हमारा उत्तम निश्चय है ।’ तब सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने इन्द्रसहित समस्त लोकपालोंको बुलाकर कहा—‘तुम सब लोग अपने तेजका एक-एक भाग दो ।’ तब समस्त लोकपालोंने अपने-अपने तेजका भाग अर्पित किया ॥ ४०-४१ ॥

अक्षुपच्च ततो ब्रह्मा यतो जातः क्षुपो नृपः । तं ब्रह्मा लोकपालानां समांशैः समयोजयत् ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘उसी समय ब्रह्माजीको छींक आयी, जिससे क्षुप नामक राजा उत्पन्न हुआ । ब्रह्माजीने उस राजाको लोकपालोंके दिये हुए तेजके उन सभी भागोंसे संयुक्त कर दिया ॥ ४२ ॥

ततो ददौ नृपं तासां प्रजानामीश्वरं क्षुपम् । तत्रैन्द्रेण च भागेन महीमाज्ञापयन्नृपः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘तत्पश्चात् उन्होंने क्षुपको ही उन प्रजाजनोंके लिये उनके शासक नरेशके रूपमें समर्पित किया । क्षुपने वहाँ राजा होकर इन्द्रके दिये हुए तेजोभागसे पृथ्वीका शासन किया ॥ ४३ ॥

वारुणेन तु भागेन वपुः पुष्यति पार्थिवः । कौबेरेण तु भागेन वित्तपाभां ददौ तदा ॥ ४४ ॥ यस्तु याम्योऽभवद् भागस्तेन शास्तिस्म स प्रजाः ।

भावार्थ

‘वरुणके तेजोभागसे वे भूपाल प्रजाके शरीरका पोषण करने लगे । कुबेरके तेजोभागसे उन्होंने उन्हें धनपतिकी आभा प्रदान की तथा उनमें जो यमराजका तेजोभाग था, उससे वे प्रजाजनोंको अपराध करनेपर दण्ड देते थे ॥ ४४½ ॥

तत्रैन्द्रेण नरश्रेष्ठ भागेन रघुनन्दन ॥ ४५ ॥ प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते तारणार्थं मम प्रभो ।

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन ! आप भी राजा होनेके कारण सभी लोकपालोंके तेजसे सम्पन्न हैं । अतः प्रभो ! इन्द्र-सम्बन्धी तेजोभागके द्वारा आप मेरे उद्धारके लिये यह आभूषण ग्रहण कीजिये । आपका भला हो’ ॥ ४५½ ॥

तद् रामः प्रतिजग्राह मुनेस्तस्य महात्मनः ॥ ४६ ॥ दिव्यमाभरणं चित्रं प्रदीप्तमिव भास्करम् । प्रतिगृह्य ततो रामस्तदाभरणमुत्तमम् ॥ ४७ ॥ आगमं तस्य दीप्तस्य प्रष्टुमेवोपचक्रमे ।

भावार्थ

तब भगवान् श्रीराम उन महात्मा मुनिके दिये हुए उस सूर्यके समान दीप्तिमान्, दिव्य, विचित्र एवं उत्तम आभूषणको ग्रहण करके उसकी उपलब्धिके विषयमें पूछने लगे—४६-४७½

अत्यद्भुतमिदं दिव्यं वपुषा युक्तमद्भुतम् ॥ ४८ ॥ कथं वा भवता प्राप्तं कुतो वा केन वाऽऽहृतम् । कौतूहलतया ब्रह्मन् पृच्छामि त्वां महायशः ॥ ४९ ॥ आश्चर्याणां बहूनां हि निधिः परमको भवान् ।

भावार्थ

‘महायशस्वी मुने ! यह अत्यन्त अद्भुत तथा दिव्य आकारसे युक्त आभूषण आपको कैसे प्राप्त हुआ, अथवा इसे कौन कहाँसे ले आया ? ब्रह्मन् ! मैं कौतूहलवश ये बातें आपसे पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप बहुत-से आश्चर्योंकी उत्तम निधि हैं’ ॥ ४८-४९½ ॥

एवं ब्रुवति काकुत्स्थे मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ५० ॥ शृणु राम यथावृत्तं पुरा त्रेतायुगे युगे ॥ ५१ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर मुनिवर अगस्त्यने कहा—‘श्रीराम! पूर्व चतुर्युगीके त्रेतायुगमें जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसे बताता हूँ सुनिये’ ॥ ५०-५१ ॥

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