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उत्तरकाण्ड, सर्ग 77

नारदस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वामृतमयं यथा। प्रहर्षमतुलं लेभे लक्ष्मणं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

नारदजीके ये अमृतमय वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको अपार आनन्द प्राप्त हुआ और उन्होंने लक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

गच्छ सौम्य द्विजश्रेष्ठं समाश्वासय सुव्रत । बालस्य च शरीरं तत् तैलद्रोण्यां निधापय ॥ २ ॥ गन्धैश्च परमोदारैस्तैलैश्च सुसुगन्धिभिः । यथा न क्षीयते बालस्तथा सौम्य विधीयताम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! जाओ । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ! इन द्विजश्रेष्ठको सान्त्वना दो और इनके बालकका शरीर उत्तम गन्ध एवं सुगन्धसे युक्त तेलसे भरे हुए काठके बड़े कठौते या डोंगीमें डुबाकर रखवा दो और ऐसी व्यवस्था कर दो जिससे बालकका शरीर विकृत या नष्ट न होने पाये ॥ २-३ ॥

यथा शरीरो बालस्य गुप्तः सन् क्लिष्टकर्मणः। विपत्तिः परिभेदो वा न भवेच्च तथा कुरु ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘शुभ कर्म करनेवाले इस बालकका शरीर जिस प्रकार सुरक्षित रहे, नष्ट या खण्डित न हो, वैसा प्रबन्ध करो’ ॥४॥

एवं संदिश्य काकुत्स्थो लक्ष्मणं शुभलक्षणम्। मनसा पुष्पकं दध्यावागच्छेति महायशाः ॥ ५ ॥

भावार्थ

शुभलक्षण लक्ष्मणको ऐसा संदेश दे महायशस्वी श्रीरघुनाथजीने मन-ही-मन पुष्पकका चिन्तन किया और कहा—‘आ जाओ’ ॥ ५ ॥

इङ्गितं स तु विज्ञाय पुष्पको हेमभूषितः। आजगाम मुहूर्तेन समीपे राघवस्य वै ॥ ६ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीका अभिप्राय समझकर सुवर्णभूषित पुष्पकविमान एक ही मुहूर्तमें उनके पास आ गया ॥ ६ ॥

सोऽब्रवीत् प्रणतो भूत्वा अयमस्मि नराधिप । वश्यस्तव महाबाहो किंकरः समुपस्थितः ॥ ७ ॥

भावार्थ

आकर नतमस्तक हो वह बोला—‘नरेश्वर ! यह रहा मैं । महाबाहो ! मैं सदा आपके अधीन रहनेवाला किङ्कर हूँ और सेवाके लिये उपस्थित हुआ हूँ’ ॥ ७ ॥

भाषितं रुचिरं श्रुत्वा पुष्पकस्य नराधिपः । अभिवाद्य महर्षीन् स विमानं सोऽध्यरोहत ॥ ८ ॥ धनुर्गृहीत्वा तूणी च खड्गं च रुचिरप्रभम् । निक्षिप्य नगरे चैतौ सौमित्रिभरतावुभौ ॥ ९ ॥

भावार्थ

पुष्पकविमानका यह मनोहर वचन सुनकर वे महाराज श्रीराम महर्षियोंको प्रणाम करके उस विमानपर आरूढ़ हुए॥ उन्होंने धनुष, बाणोंसे भरे हुए दो तरकस और एक चमचमाती हुई तलवार हाथमें ले ली और लक्ष्मण तथा भरत— इन दोनों भाइयोंको नगरकी रक्षामें नियुक्त करके वहाँसे प्रस्थान किया ॥ ९ ॥

प्रायात् प्रतीचीं हरितं विचिन्वंश्च ततस्ततः । उत्तरामगमच्छ्रीमान् दिशं हिमवतावृताम् ॥ १० ॥

भावार्थ

श्रीमान् राम पहले तो इधर-उधर खोजते हुए पश्चिम दिशाकी ओर गये । फिर हिमालयसे घिरी हुई उत्तर दिशामें जा पहुँचे ॥ १० ॥

अपश्यमानस्तत्रापि स्वल्पमप्यथ दुष्कृतम् । पूर्वामपि दिशं सर्वामथापश्यन्नराधिपः ॥ ११ ॥

भावार्थ

जब उन दोनों दिशाओंमें कहीं थोड़ा-सा भी दुष्कर्म नहीं दिखायी दिया, तब नरेश्वर श्रीरामने समूची पूर्व दिशाका भी निरीक्षण किया ॥ ११ ॥

प्रविशुद्धसमाचारामादर्शतलनिर्मलाम् । पुष्पकस्थो महाबाहुस्तदापश्यन्नराधिपः ॥ १२ ॥

भावार्थ

पुष्पकपर बैठे हुए महाबाहु राजा श्रीरामने वहाँ भी शुद्ध सदाचारका पालन होता देखा । वह दिशा भी दर्पणके समान निर्मल दिखायी दी ॥ १२ ॥

दक्षिणां दिशमाक्रामत् ततो राजर्षिनन्दनः । शैवलस्योत्तरे पार्श्वे ददर्श सुमहत्सरः ॥ १३ ॥

भावार्थ

तब राजर्षिनन्दन रघुनाथजी दक्षिण दिशाकी ओर गये । वहाँ शैवल पर्वतके उत्तर भागमें उन्हें एक महान् सरोवर दिखायी दिया ॥ १३ ॥

तस्मिन् सरसि तप्यन्तं तापसं सुमहत्तपः । ददर्श राघवः श्रीमाँल्लम्बमानमधोमुखम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

उस सरोवरके तटपर एक तपस्वी बड़ी भारी तपस्या कर रहा था । वह नीचेको मुख किये लटका हुआ था । रघुकुलनन्दन श्रीरामने उसे देखा ॥ १४ ॥

राघवस्तमुपागम्य तप्यन्तं तप उत्तमम् । उवाच च नृपो वाक्यं धन्यस्त्वमसि सुव्रत ॥ १५ ॥ कस्यां योन्यां तपोवृद्ध वर्तसे दृढविक्रम । कौतूहलात् त्वां पृच्छामि रामो दाशरथिर्ह्यहम् ॥ १६ ॥ कोऽर्थो मनीषितस्तुभ्यं स्वर्गलाभोऽपरोऽथवा । वराश्रयो यदर्थं त्वं तपस्यन्यैः सुदुश्चरम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

देखकर राजा श्रीरघुनाथजी उग्र तपस्या करते हुए उस तपस्वीके पास आये और बोले—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तापस ! तुम धन्य हो । तपस्यामें बढ़े-चढ़े सुदृढ़ पराक्रमी पुरुष ! तुम किस जातिमें उत्पन्न हुए हो ? मैं दशरथकुमार राम तुम्हारा परिचय जाननेके कौतूहलसे ये बातें पूछ रहा हूँ ॥ ‘तुम्हें किस वस्तुको पानेकी इच्छा है ? तपस्याद्वारा संतुष्ट हुए इष्टदेवतासे वरके रूपमें तुम क्या पाना चाहते हो— स्वर्ग या दूसरी कोई वस्तु ? कौन-सा ऐसा पदार्थ है, जिसके लिये तुम ऐसी कठोर तपस्या करते हो, जो दूसरोंके लिये दुष्कर है ? ॥ १७ ॥

यमाश्रित्य तपस्तप्तं श्रोतुमिच्छामि तापस । ब्राह्मणो वासि भद्रं ते क्षत्रियो वासि दुर्जयः । वैश्यस्तृतीयो वर्णो वा शूद्रो वा सत्यवाग् भव ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘तापस ! जिस वस्तुके लिये तुम तपस्यामें लगे हुए हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ । इसके सिवा यह भी बताओ कि तुम ब्राह्मण हो या दुर्जय क्षत्रिय ? तीसरे वर्णके वैश्य हो अथवा शूद्र ? तुम्हारा भला हो । ठीक-ठीक बताना’ ॥१८॥

इत्येवमुक्तः स नराधिपेन अवाक्शिरा दाशरथाय तस्मै । उवाच जातिं नृपपुङ्गवाय यत्कारणं चैव तपःप्रयत्नः ॥ १९ ॥

भावार्थ

महाराज श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर नीचे सिर किये लटके हुए उस तपस्वीने उन नृपश्रेष्ठ दशरथनन्दन श्रीरामको अपनी जातिका परिचय दिया और जिस उद्देश्यसे उसने तपस्याके लिये प्रयास किया था, वह भी बताया ॥ १९ ॥

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