उत्तरकाण्ड, सर्ग 76
तथा तु करुणं तस्य द्विजस्य परिदेवनम् । शुश्राव राघवः सर्वं दुःखशोकसमन्वितम् ॥ १ ॥
भावार्थ
महाराज श्रीरामने उस ब्राह्मणका इस तरह दुःख और शोकसे भरा हुआ वह सारा करुण-क्रन्दन सुना ॥ १ ॥
स दुःखेन च संतप्तो मन्त्रिणस्तानुपाह्वयत् । वसिष्ठं वामदेवं च भ्रातॄंश्च सह नैगमान् ॥ २ ॥
भावार्थ
इससे वे दुःखसे संतप्त हो उठे । उन्होंने अपने मन्त्रियोंको बुलाया तथा वसिष्ठ और वामदेवको एवं महाजनोंसहित अपने भाइयोंको भी आमन्त्रित किया ॥ २ ॥
ततो द्विजा वसिष्ठेन सार्धमष्टौ प्रवेशिताः । राजानं देवसंकाशं वर्धस्वेति ततोऽब्रुवन् ॥ ३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वसिष्ठजीके साथ आठ ब्राह्मणोंने राजसभामें प्रवेश किया और उन देवतुल्य नरेशसे कहा—‘महाराज ! आपकी जय हो’ ॥ ३ ॥
मार्कण्डेयोऽथ मौद्गल्यो वामदेवश्च काश्यपः । कात्यायनोऽथ जाबालिर्गौतमो नारदस्तथा ॥ ४ ॥ एते द्विजर्षभाः सर्वे आसनेषूपवेशिताः । महर्षीन् समनुप्राप्तानभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ ५ ॥
भावार्थ
उन आठोंके नाम इस प्रकार हैं—मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, काश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम तथा नारद ॥ इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्तम आसनोंपर बैठाया गया । वहाँ पधारे हुए उन महर्षियोंको श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और वे स्वयं भी अपने स्थानपर बैठ गये ॥ ५ ॥
मन्त्रिणो नैगमाश्चैव यथार्हमनुकूलतः । तेषां समुपविष्टानां सर्वेषां दीप्ततेजसाम् ॥ ६ ॥ राघवः सर्वमाचष्टे द्विजोऽयमुपरोधते । तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राज्ञो दीनस्य नारदः ॥ ७ ॥ प्रत्युवाच शुभं वाक्यमृषीणां संनिधौ स्वयम् ।
भावार्थ
फिर मन्त्री और महाजनोंके साथ यथायोग्य शिष्टाचारका उन्होंने निर्वाह किया । उद्दीप्त तेजवाले वे सब लोग जब यथास्थान बैठ गये, तब श्रीरघुनाथजीने उनसे सब बातें बतायीं और कहा—‘यह ब्राह्मण राजद्वारपर धरना दिये पड़ा है’ ॥ ब्राह्मणके दुःखसे दुखी हुए उन महाराजका यह वचन सुनकर अन्य सब ऋषियोंके समीप स्वयं नारदजीने यह शुभ बात कही—॥ ७½ ॥
शृणु राजन् यथाकाले प्राप्तो बालस्य संक्षयः ॥ ८ ॥ श्रुत्वा कर्तव्यतां राजन् कुरुष्व रघुनन्दन ।
भावार्थ
‘राजन् ! जिस कारणसे इस बालककी अकाल-मृत्यु हुई है, वह बताता हूँ, सुनिये । रघुकुलनन्दन नरेश ! मेरी बात सुनकर जो उचित कर्तव्य हो उसका पालन कीजिये ॥ ८½ ॥
पुरा कृतयुगे राजन् ब्राह्मणा वै तपस्विनः ॥ ९ ॥ अब्राह्मणस्तदा राजन् न तपस्वी कथंचन ।
भावार्थ
‘राजन् ! पहले सत्ययुगमें केवल ब्राह्मण ही तपस्वी हुआ करते थे । महाराज ! उस समय ब्राह्मणेतर मनुष्य किसी तरह तपस्यामें प्रवृत्त नहीं होता था ॥ ९½ ॥
तस्मिन् युगे प्रज्वलिते ब्रह्मभूते त्वनावृते ॥ १० ॥ अमृत्यवस्तदा सर्वे जज्ञिरे दीर्घदर्शिनः ।
भावार्थ
‘वह युग तपस्याके तेजसे प्रकाशित होता था । उसमें ब्राह्मणोंकी ही प्रधानता थी । उस समय अज्ञानका वातावरण नहीं था । इसलिये उस युगके सभी मनुष्य अकाल-मृत्युसे रहित तथा त्रिकालदर्शी होते थे ॥ १०½ ॥
ततस्त्रेतायुगं नाम मानवानां वपुष्मताम् ॥ ११ ॥ क्षत्रिया यत्र जायन्ते पूर्वेण तपसान्विताः ।
भावार्थ
‘सत्ययुगके बाद त्रेतायुग आया । इसमें सुदृढ़ शरीरवाले क्षत्रियोंकी प्रधानता हुई और वे क्षत्रिय भी उसी प्रकारकी तपस्या करने लगे ॥ ११½ ॥
वीर्येण तपसा चैव तेऽधिकाः पूर्वजन्मनि ॥ १२ ॥ मानवा ये महात्मानस्तत्र त्रेतायुगे युगे । ब्रह्म क्षत्रं च तत् सर्वं यत् पूर्वमपरं च यत् ॥ १३ ॥ युगयोरुभयोरासीत् समवीर्यसमन्वितम् ।
भावार्थ
‘परंतु त्रेतायुगमें जो महात्मा पुरुष हैं, उनकी अपेक्षा सत्ययुगके लोग तप और पराक्रमकी दृष्टिसे बढ़े-चढ़े थे ॥ ‘इस प्रकार दोनों युगोंमेंसे पूर्व युगमें जहाँ ब्राह्मण उत्कृष्ट और क्षत्रिय अपकृष्ट थे, वहाँ त्रेतायुगमें वे समान-शक्तिशाली हो गये ॥ १३½ ॥
अपश्यन्तस्तु ते सर्वे विशेषमधिकं ततः ॥ १४ ॥ स्थापनं चक्रिरे तत्र चातुर्वर्ण्यस्य सम्मतम् । तस्मिन् युगे प्रज्वलिते धर्मभूते ह्यनावृते ॥ १५ ॥ अधर्मः पादमेकं तु पातयत् पृथिवीतले । अधर्मेण हि संयुक्तस्तेजो मन्दं भविष्यति ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘तब मनु आदि सभी धर्मप्रवर्तकोंने ब्राह्मण और क्षत्रियमें एककी अपेक्षा दूसरेमें कोई विशेषता या न्यूनाधिकता न देखकर सर्वलोकसम्मत चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाकी स्थापना की ॥ ‘त्रेतायुग वर्णाश्रम-धर्म-प्रधान है । वह धर्मके प्रकाशसे प्रकाशित होता है । वह धर्ममें बाधा डालनेवाले पापसे रहित है । इस युगमें अधर्मने भूतलपर अपना एक पैर रक्खा है । अधर्मसे युक्त होनेके कारण यहाँ लोगोंका तेज धीरे-धीरे घटता जायगा ॥ १५-१६ ॥
आमिषं यच्च पूर्वेषां राजसं च मलं भृशम् । अनृतं नाम तद् भूतं पादेन पृथिवीतले ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘सत्ययुगमें जीविकाका साधनभूत कृषि आदि रजोगुणमूलक कर्म ‘अनृत’ कहलाता था और मलके समान अत्यन्त त्याज्य था । वह अनृत ही अधर्मका एक पाद होकर त्रेतामें इस भूतलपर स्थित हुआ ॥ १७ ॥
अनृतं पातयित्वा तु पादमेकमधर्मतः । ततः प्रादुष्कृतं पूर्वमायुषः परिनिष्ठितम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार अनृत ( असत्य ) रूपी एक पैरको भूतलपर रखकर अधर्मने त्रेतामें सत्ययुगकी अपेक्षा आयुको सीमित कर दिया ॥ १८ ॥
पातिते त्वनृते तस्मिन्नधर्मेण महीतले । शुभान्येवाचरँल्लोकः सत्यधर्मपरायणः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘अतः पृथ्वीपर अधर्मके इस अनृतरूपी चरणके पड़नेपर सत्यधर्मपरायण पुरुष उस अनृतके कुपरिणामसे बचनेके लिये शुभकर्मोंका ही आचरण करते हैं ॥ १९ ॥
त्रेतायुगे च वर्तन्ते ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च ये । तपोऽतप्यन्त ते सर्वे शुश्रूषामपरे जनाः ॥ २० ॥ स्वधर्मः परमस्तेषां वैश्यशूद्रं तदागमत् । पूजां च सर्ववर्णानां शूद्राश्चक्रुर्विशेषतः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘तथापि त्रेतायुगमें जो ब्राह्मण और क्षत्रिय हैं, वे ही सब तपस्या करते हैं । अन्य वर्णके लोग सेवा-कार्य किया करते हैं॥ ‘उन चारों वर्णोंमेंसे वैश्य और शूद्रको सेवारूपी उत्कृष्ट धर्म स्वधर्मके रूपमें प्राप्त हुआ ( वैश्य कृषि आदिके द्वारा ब्राह्मण आदिकी सेवा करने लगे और ) शूद्र सब वर्णोंकी ( तीनों वर्णोंके लोगोंकी ) विशेषरूपसे पूजा—आदर-सत्कार करने लगे ॥ २१ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तेषामधर्मे चानृते च ह । ततः पूर्वं पुनर्ह्रासमगमन्नृपसत्तम ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘नृपश्रेष्ठ ! इसी बीचमें जब त्रेतायुगका अवसान होता है और वैश्यों तथा शूद्रोंको अधर्मके एक-पादरूप अनृतकी प्राप्ति होने लगती है, तब पूर्व वर्णवाले ब्राह्मण और क्षत्रिय फिर ह्रासको प्राप्त होने लगते हैं ( क्योंकि उन दोनोंको अन्तिम दो वर्णोंका संसर्गजनित दोष प्राप्त हो जाता है ) ॥ २२ ॥
ततः पादमधर्मस्य द्वितीयमवतारयत् । ततो द्वापरसंख्या सा युगस्य समजायत ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर अधर्म अपने दूसरे चरणको पृथ्वीपर उतारता है । द्वितीय पैर उतारनेके कारण ही उस युगकी ‘द्वापर’ संज्ञा हो गयी है ॥ २३ ॥
तस्मिन् द्वापरसंख्ये तु वर्तमाने युगक्षये । अधर्मश्चानृतं चैव ववृधे पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘पुरुषोत्तम ! उस द्वापरनामक युगमें जो अधर्मके दो चरणोंका आश्रय है--अधर्म और अनृत दोनोंकी वृद्धि होने लगती है ॥ २४ ॥
अस्मिन् द्वापरसंख्याने तपो वैश्यान् समाविशत् । त्रिभ्यो युगेभ्यस्त्रीन् वर्णान् क्रमाद् वै तप आविशत्॥ २५॥
भावार्थ
‘इस द्वापर युगमें तपस्यारूप कर्म वैश्योंको भी प्राप्त होता है । इस तरह तीन युगोंमें क्रमशः तीन वर्णोंको तपस्याका अधिकार प्राप्त होता है ॥ २५ ॥
त्रिभ्यो युगेभ्यस्त्रीन् वर्णान् धर्मश्च परिनिष्ठितः । न शूद्रो लभते धर्मं युगतस्तु नरर्षभ ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘तीन युगोंमें तीन वर्णोंका ही आश्रय लेकर तपस्यारूपी धर्म प्रतिष्ठित होता है; किंतु नरश्रेष्ठ ! शूद्रको इन तीनों ही युगोंमें तपरूपी धर्मका अधिकार नहीं प्राप्त होता है ॥ २६ ॥
हीनवर्णो नृपश्रेष्ठ तप्यते सुमहत्तपः। भविष्यच्छूद्रयोन्यां हि तपश्चर्या कलौ युगे ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘नृपशिरोमणे ! एक समय ऐसा आयगा, जब हीन वर्णका मनुष्य भी बड़ी भारी तपस्या करेगा । कलियुग आनेपर भविष्यमें होनेवाली शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्योंके समुदायमें तपश्चर्याकी प्रवृत्ति होगी ॥ २७ ॥
अधर्मः परमो राजन् द्वापरे शूद्रजन्मनः। स वै विषयपर्यन्ते तव राजन् महातपाः ॥ २८ ॥ अद्य तप्यति दुर्बुद्धिस्तेन बालवधो ह्ययम् । यो ह्यधर्ममकार्यं वा विषये पार्थिवस्य तु ॥ २९ ॥ करोति चाश्रीमूलं तत्पुरे वा दुर्मतिर्नरः। क्षिप्रं च नरकं याति स च राजा न संशयः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘राजन् ! द्वापरमें भी शूद्रका तपमें प्रवृत्त होना महान् अधर्म माना गया है । ( फिर त्रेताके लिये तो कहना ही क्या है ! ) महाराज ! निश्चय ही आपके राज्यकी किसी सीमापर कोई खोटी बुद्धिवाला शूद्र महान् तपका आश्रय ले तपस्या कर रहा है, उसीके कारण इस बालककी मृत्यु हुई है ॥ ‘जो कोई भी दुर्बुद्धि मानव जिस किसी भी राजाके राज्य अथवा नगरमें अधर्म या न करने योग्य काम करता है, उसका वह कार्य उस राज्यके अनैश्वर्य ( दरिद्रता ) का कारण बन जाता है और वह राजा शीघ्र ही नरकमें पड़ता है, इसमें संशय नहीं ॥ २९-३० ॥
अधीतस्य च तपस्य कर्मणः सुकृतस्य च। षष्ठं भजति भागं तु प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘इसी प्रकार जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, वह प्रजाके वेदाध्ययन, तप और शुभ कर्मोंके पुण्यका छठा भाग प्राप्त कर लेता है ॥ ३१ ॥
षड्भागस्य च भोक्तासौ रक्षते न प्रजाः कथम्। स त्वं पुरुषशार्दूल मार्गस्व विषयं स्वकम् ॥ ३२ ॥ दुष्कृतं यत्र पश्येथास्तत्र यत्नं समाचर।
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! जो प्रजाके शुभ-कर्मोंके छठे भागका उपभोक्ता है, वह प्रजाकी रक्षा कैसे नहीं करेगा ? अतः आप अपने राज्यमें खोज कीजिये और जहाँ कोई दुष्कर्म दिखायी दे, वहाँ उसके रोकनेका प्रयत्न कीजिये ॥ ३२½ ॥
एवं चेद् धर्मवृद्धिश्च नृणां चायुर्विवर्धनम्। भविष्यति नरश्रेष्ठ बालस्यास्य च जीवितम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! ऐसा करनेसे धर्मकी वृद्धि होगी और मनुष्यों· की आयु बढ़ेगी । साथ ही इस बालकको भी नया जीवन प्राप्त होगा’ ॥ ३३ ॥
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