उत्तरकाण्ड, सर्ग 75
प्रस्थाप्य तु स शत्रुघ्नं भ्रातृभ्यां सह राघवः । प्रमुमोद सुखी राज्यं धर्मेण परिपालयन् ॥ १ ॥
भावार्थ
शत्रुघ्नको मथुरा भेजकर भगवान् श्रीराम भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयोंके साथ धर्मपूर्वक राज्यका पालन करते हुए बड़े सुख और आनन्दसे रहने लगे ॥ १ ॥
ततः कतिपयाहःसु वृद्धो जानपदो द्विजः । मृतं बालमुपादाय राजद्वारमुपागमत् ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद उस जनपदके भीतर रहनेवाला एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुए बालकका शव लेकर राजद्वारपर आया ॥ २ ॥
रुदन् बहुविधा वाचः स्नेहदुःखसमन्वितः । असकृत् पुत्रपुत्रेति वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ३ ॥
भावार्थ
वह स्नेह और दुःखसे आकुल हो नाना प्रकारकी बातें कहता हुआ रो रहा था और बार-बार ‘बेटा ! बेटा !’ की पुकार मचाता हुआ इस प्रकार विलाप करता था—॥ ३ ॥
किं नु मे दुष्कृतं कर्म पुरा देहान्तरे कृतम् । यदहं पुत्रमेकं तु पश्यामि निधनं गतम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘हाय ! मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके कारण आज इन आँखोंसे मैं अपने इकलौते बेटेकी मृत्यु देख रहा हूँ ॥ ४ ॥
अप्राप्तयौवनं बालं पञ्चवर्षसहस्रकम् । अकाले कालमापन्नं मम दुःखाय पुत्रक ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! अभी तो तू बालक था । जवान भी नहीं होने पाया था । केवल पाँच हजार दिन * ( तेरह वर्ष दस महीने बीस दिन ) की तेरी अवस्था थी । तो भी तू मुझे दुःख देनेके लिये असमयमें ही कालके गालमें चला गया ॥ ५ ॥
अल्पैरहोभिर्निधनं गमिष्यामि न संशयः । अहं च जननी चैव तव शोकेन पुत्रक ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘वत्स ! तेरे शोकसे मैं और तेरी माता—दोनों थोड़े ही दिनोंमें मर जायँगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
न स्मराम्यनृतं ह्युक्तं न च हिंसां स्मराम्यहम् । सर्वेषां प्राणिनां पापं न स्मरामि कदाचन ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी मैंने झूठ बात मुँहसे निकाली हो । किसीकी हिंसा की हो अथवा समस्त प्राणियोंमेंसे किसीको भी कभी कष्ट पहुँचाया हो ॥ ७ ॥
केनाद्य दुष्कृतेनायं बाल एव ममात्मजः । अकृत्वा पितृकार्याणि गतो वैवस्वतक्षयम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘फिर आज किस पापसे मेरा यह बेटा पितृकर्म किये बिना इस बाल्यावस्थामें ही यमराजके घर चला गया ॥ ८ ॥
नेदृशं दृष्टपूर्वं मे श्रुतं वा घोरदर्शनम् । मृत्युरप्राप्तकालानां रामस्य विषये ह्ययम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें तो अकाल-मृत्युकी ऐसी भयंकर घटना न पहले कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी ॥ ९ ॥
रामस्य दुष्कृतं किञ्चिन्महदस्ति न संशयः । यथा हि विषयस्थानां बालानां मृत्युरागतः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘निस्संदेह श्रीरामका ही कोई महान् दुष्कर्म है, जिससे इनके राज्यमें रहनेवाले बालकोंकी मृत्यु होने लगी ॥ १० ॥
नह्यन्यविषयस्थानां बालानां मृत्युतो भयम् । स राजञ्जीवयस्वैनं बालं मृत्युवशं गतम् ॥ ११ ॥ राजद्वारि मरिष्यामि पत्न्या सार्धमनाथवत् । ब्रह्महत्यां ततो राम समुपेत्य सुखी भव ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘दूसरे राज्यमें रहनेवाले बालकोंको मृत्युसे भय नहीं है; अतः राजन् ! मृत्युके वशमें पड़े हुए इस बालकको जीवित कर दो, नहीं तो मैं अपनी स्त्रीके साथ इस राजद्वारपर अनाथकी भाँति प्राण दे दूँगा । श्रीराम ! फिर ब्रह्महत्याका पाप लेकर तुम सुखी होना ॥ ११-१२ ॥
भ्रातृभिः सहितो राजन् दीर्घमायुरवाप्स्यसि । उषिताः स्म सुखं राज्ये तवास्मिन् सुमहाबल ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘महाबली नरेश ! हम तुम्हारे राज्यमें बड़े सुखसे रहे हैं, इसलिये तुम अपने भाइयोंके साथ दीर्घजीवी होओगे ॥ १३ ॥
इदं तु पतितं तस्मात् तव राम वशे स्थितान् । कालस्य वशमापन्नाः स्वल्पं हि नहि नः सुखम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! तुम्हारे अधीन रहनेवाले हमलोगोंपर यह बालक-मरणरूपी दुःख सहसा आ पड़ा है, जिससे हम स्वयं भी कालके अधीन हो गये हैं; अतः तुम्हारे इस राज्यमें हमें थोड़ा-सा भी सुख नहीं मिला ॥ १४ ॥
सम्प्रत्यनाथो विषय इक्ष्वाकूणां महात्मनाम् । रामं नाथमिहासाद्य बालान्तकरणं ध्रुवम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंका यह राज्य अब अनाथ हो गया है । श्रीरामको स्वामीके रूपमें पाकर यहाँ बालकोंकी मृत्यु अटल है ॥ १५ ॥
राजदोषैर्विपद्यन्ते प्रजा ह्यविधिपालिताः । असद्वृत्ते हि नृपतावकाले म्रियते जनः ॥ १६ ॥ यद् वा पुरेष्वयुक्तानि जना जनपदेषु च । कुर्वते न च रक्षास्ति तदा कालकृतं भयम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘राजाके दोषसे जब प्रजाका विधिवत् पालन नहीं होता, तभी प्रजावर्गको ऐसी विपत्तियोंका सामना करना पड़ता है । राजाके दुराचारी होनेपर ही प्रजाकी अकाल-मृत्यु होती है ॥ ‘अथवा नगरों तथा जनपदोंमें रहनेवाले लोग जब अनुचित कर्म—पापाचार करते हैं और वहाँ रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं होती, उन्हें अनुचित कर्मसे रोकनेके लिये कोई उपाय नहीं किया जाता, तभी देशकी प्रजामें अकाल-मृत्युका भय प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
सुव्यक्तं राजदोषो हि भविष्यति न संशयः । पुरे जनपदे चापि तथा बालवधो ह्ययम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘अतः यह स्पष्ट है कि नगर या राज्यमें कहीं राजासे ही कोई अपराध हुआ होगा; तभी इस तरह बालककी मृत्यु हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है’ ॥ १८ ॥
एवं बहुविधैर्वाक्यैरुपरुध्य मुहुर्मुहुः । राजानं दुःखसंतप्तः सुतं तमुपगूहति ॥ १९ ॥
भावार्थ
इस तरह अनेक प्रकारके वाक्योंसे उसने बारंबार राजाके सामने अपना दुःख निवेदन किया और बारंबार शोकसे संतप्त होकर वह अपने मरे हुए पुत्रको उठा-उठाकर हृदयसे लगाता रहा ॥ १९ ॥
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