उत्तरकाण्ड, सर्ग 81
तदद्भुततमं वाक्यं श्रुत्वागस्त्यस्य राघवः। गौरवाद् विस्मयाच्चैव भूयः प्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ १ ॥
भावार्थ
अगस्त्यजीका यह अत्यन्त अद्भुत वचन सुनकर श्रीरघुनाथजीके मनमें उनके प्रति विशेष गौरवका उदय हुआ और उन्होंने विस्मित होकर पुनः उनसे पूछना आरम्भ किया—॥ १ ॥
भगवंस्तद् वनं घोरं तपस्तप्यति यत्र सः। श्वेतो वैदर्भको राजा कथं तद्मृगद्विजम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘भगवन्! वह भयंकर वन, जिसमें विदर्भदेशके राजा श्वेत घोर तपस्या करते थे, पशु-पक्षियोंसे रहित क्यों हो गया था ? ॥ २ ॥
तद् वनं स कथं राजा शून्यं मनुजवर्जितम्। तपश्चर्तुं प्रविष्टः स श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वे विदर्भराज उस सूने निर्जन वनमें तपस्या करनेके लिये क्यों गये ? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ’ ॥ ३ ॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम्। वाक्यं परमतेजस्वी वक्तुमेवोपचक्रमे ॥ ४ ॥
भावार्थ
श्रीरामका कौतूहलयुक्त वचन सुनकर वे परम तेजस्वी महर्षि पुनः इस प्रकार कहने लगे—॥ ४ ॥
पुरा कृतयुगे राम मनुर्दण्डधरः प्रभुः। तस्य पुत्रो महानासीदिक्ष्वाकुः कुलनन्दनः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है, दण्डधारी राजा मनु इस भूतलपर शासन करते थे। उनके एक श्रेष्ठ पुत्र हुआ, जिसका नाम इक्ष्वाकु था। राजकुमार इक्ष्वाकु अपने कुलको आनन्दित करनेवाले थे ॥ ५ ॥
तं पुत्रं पूर्वकं राज्ये निक्षिप्य भुवि दुर्जयम्। पृथिव्यां राजवंशानां भव कर्तेत्युवाच तम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘अपने उन ज्येष्ठ एवं दुर्जय पुत्रको भूमण्डलके राज्यपर स्थापित करके मनुने उनसे कहा—‘बेटा! तुम भूतलपर राजवंशोंकी सृष्टि करो’ ॥ ६ ॥
तथैव च प्रतिज्ञातं पितुः पुत्रेण राघव। ततः परमसंतुष्टो मनुः पुत्रमुवाच ह ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन! पुत्र इक्ष्वाकुने पिताके सामने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की। इससे मनु बहुत संतुष्ट हुए और अपने पुत्रसे बोले—॥ ७ ॥
प्रीतोऽस्मि परमोदार कर्ता चासि न संशयः। दण्डेन च प्रजा रक्ष मा च दण्डमकारणे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘परम उदार पुत्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम राजवंशकी सृष्टि करोगे, इसमें संशय नहीं है। तुम दण्डके द्वारा दुष्टोंका दमन करते हुए प्रजाकी रक्षा करो, परंतु बिना अपराधके ही किसीको दण्ड न देना ॥ ८ ॥
अपराधिषु यो दण्डः पात्यते मानवेषु वै। स दण्डो विधिवन्मुक्तः स्वर्गं नयति पार्थिवम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘अपराधी मनुष्योंपर जो दण्डका प्रयोग किया जाता है, वह विधिपूर्वक दिया हुआ दण्ड राजाको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है ॥ ९ ॥
तस्माद् दण्डे महाबाहो यत्नवान् भव पुत्रक। धर्मो हि परमो लोके कुर्वतस्ते भविष्यति ॥ १० ॥
भावार्थ
‘इसलिये महाबाहु पुत्र! तुम दण्डका समुचित प्रयोग करनेके लिये प्रयत्नशील रहना। ऐसा करनेसे तुम्हें संसारमें परम धर्मकी प्राप्ति होगी’ ॥ १० ॥
इति तं बहु संदिश्य मनुः पुत्रं समाधिना। जगाम त्रिदिवं हृष्टो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ ११ ॥ प्रयाते त्रिदिवं तस्मिन्निक्ष्वाकुरमितप्रभः। जनयिष्ये कथं पुत्रानिति चिन्तापरोऽभवत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘‘इस प्रकार पुत्रको बहुत-सा संदेश दे मनु समाधि लगाकर बड़े हर्षके साथ स्वर्गको—सनातन ब्रह्मलोकको चले गये॥ ‘उनके ब्रह्मलोकवासी हो जानेपर अमित तेजस्वी राजा इक्ष्वाकु इस चिन्तामें पड़े कि मैं किस प्रकार पुत्रोंको उत्पन्न करूँ ? ॥ १२ ॥
कर्मभिर्बहुरूपैश्च तैस्तैर्मनुसुतस्तदा। जनयामास धर्मात्मा शतं देवसुतोपमान् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘तब यज्ञ, दान और तपस्यारूप विविध कर्मोंद्वारा धर्मात्मा मनुपुत्रने सौ पुत्र उत्पन्न किये, जो देवकुमारोंके समान तेजस्वी थे ॥ १३ ॥
तेषामवरजस्तात सर्वेषां रघुनन्दन। मूढश्चाकृतविद्यश्च न शुश्रूषति पूर्वजान् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘तात रघुनन्दन! उनमें जो सबसे छोटा पुत्र था, वह मूढ़ और विद्याविहीन था, इसलिये अपने बड़े भाइयोंकी सेवा नहीं करता था ॥ १४ ॥
नाम तस्य च दण्डेति पिता चक्रेऽल्पमेधसः। अवश्यं दण्डपतनं शरीरेऽस्य भविष्यति ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘इसके शरीरपर अवश्य दण्डपात होगा, ऐसा सोचकर पिताने उस मन्दबुद्धि पुत्रका नाम दण्ड रख दिया ॥ १५ ॥
अपश्यमानस्तं देशं घोरं पुत्रस्य राघव। विन्ध्यशैवलयोर्मध्ये राज्यं प्रादादरिंदम ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम! शत्रुदमन नरेश! उस पुत्रके योग्य दूसरा कोई भयंकर देश न देखकर राजाने उसे विन्ध्य और शैवल पर्वतके बीचका राज्य दे दिया॥ १६ ॥
स दण्डस्तत्र राजाभूद् रम्ये पर्वतरोधसि। पुरं चाप्रतिमं राम न्यवेशयदनुत्तमम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! पर्वतके उस रमणीय तटप्रान्तमें दण्ड राजा हुआ । उसने अपने रहनेके लिये एक बहुत ही अनुपम और उत्तम नगर बसाया ॥ १७ ॥
पुरस्य चाकरोन्नाम मधुमन्तमिति प्रभो । पुरोहितं तूशनसं वरयामास सुव्रतम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! उसने उस नगरका नाम रखा मधुमन्त और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बनाया ॥ १८ ॥
एवं स राजा तद् राज्यमकरोत् सपुरोहितः । प्रहृष्टमनुजाकीर्णं देवराजो यथा दिवि ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार स्वर्गमें देवराजकी भाँति भूतलपर राजा दण्डने पुरोहितके साथ रहकर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस राज्यका पालन आरम्भ किया ॥ १९ ॥
ततः स राजा मनुजेन्द्रपुत्रः सार्धं च तेनोशनसा तदानीम् । चकार राज्यं सुमहान्महात्मा शक्रो दिवीवोशनसा समेतः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘उस समय वह महामनस्वी महाराजकुमार तथा महान् राजा दण्ड शुक्राचार्यके साथ रहकर अपने राज्यका उसी तरह पालन करने लगा जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्र देवगुरु बृहस्पतिके साथ रहकर अपने राज्यका पालन करते हैं’ ॥ २० ॥
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