उत्तरकाण्ड, सर्ग 60
ततः प्रभाते विमले कृत्वा पौर्वाह्णिकीं क्रियाम् । धर्मासनगतो राजा रामो राजीवलोचनः ॥ १ ॥ राजधर्मानवेक्षन् वै ब्राह्मणैर्नैगमैः सह । पुरोधसा वसिष्ठेन ऋषिणा कश्यपेन च ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर निर्मल प्रभातकालमें पूर्वाह्णकालोचित संध्या-वन्दन आदि नित्य कर्म करके कमलनयन राजा श्रीराम राज-धर्मोंका पालन ( प्रजाजनोंके विवादका निपटारा ) करनेके लिये वेदवेत्ता ब्राह्मणों, पुरोहित वसिष्ठ तथा कश्यप मुनिके साथ राजसभामें उपस्थित हो धर्म ( न्याय ) के आसनपर विराजमान हुए ॥ १-२ ॥
मन्त्रिभिर्व्यवहारज्ञैस्तथान्यैर्धर्मपाठकैः । नीतिज्ञैरथ सभ्यैश्च राजभिः सा सभा वृता ॥ ३ ॥
भावार्थ
वह सभा व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले मन्त्रियों, धर्मशास्त्रोंका पाठ करनेवाले विद्वानों, नीतिज्ञों, राजाओं तथा अन्य सभासदोंसे भरी हुई थी ॥ ३ ॥
सभा यथा महेन्द्रस्य यमस्य वरुणस्य च । शुशुभे राजसिंहस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ४ ॥
भावार्थ
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले राजसिंह श्रीरामकी वह सभा इन्द्र, यम और वरुणकी सभाके समान शोभा पाती थी ॥ ४ ॥
अथ रामोऽब्रवीत् तत्र लक्ष्मणं शुभलक्षणम् । निर्गच्छ त्वं महाबाहो सुमित्रानन्दवर्धन ॥ ५ ॥ कार्यार्थिनश्च सौमित्रे व्याहर्तुं त्वमुपाक्रम ।
भावार्थ
वहाँ बैठे हुए भगवान् श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे कहा—‘माता सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर ! तुम बाहर निकलो और देखो कि कौन-कौन-से कार्यार्थी उपस्थित हैं । सुमित्राकुमार ! तुम उन कार्यार्थियोंको बारी-बारीसे बुलाना आरम्भ करो’ ॥ ५½ ॥
रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः शुभलक्षणः ॥ ६ ॥ द्वारदेशमुपागम्य कार्यिणश्चाह्वयत् स्वयम् । न कश्चिदब्रवीत् तत्र मम कार्यमिहाद्य वै ॥ ७ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर शुभलक्षण लक्ष्मणने द्वारदेशपर आकर स्वयं ही कार्यार्थियोंको पुकारा, परंतु कोई भी वहाँ यह न कह सका कि मुझे यहाँ कोई कार्य है ॥६-७॥
नाधयो व्याधयश्चैव रामे राज्यं प्रशासति । पक्वसस्या वसुमती सर्वौषधिसमन्विता ॥ ८ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्य-शासन करते समय न तो कहीं किसीको शारीरिक रोग होते थे और न मानसिक चिन्ताएँ ही सताती थीं । पृथ्वीपर सब प्रकारकी ओषधियाँ ( अन्न-फल आदि ) उत्पन्न होती थीं और पकी हुई खेती शोभा पाती थी ॥ ८ ॥
न बालो म्रियते तत्र न युवा न च मध्यमः । धर्मेण शासितं सर्वं न च बाधा विधीयते ॥ ९ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्यमें न तो बालककी मृत्यु होती थी न युवककी और न मध्यम अवस्थाके पुरुषकी ही । सबका धर्मपूर्वक शासन होता था । किसीके सामने कभी कोई बाधा नहीं आती थी ॥ ९ ॥
दृश्यते न च कार्यार्थी रामे राज्यं प्रशासति । लक्ष्मणः प्राञ्जलिर्भूत्वा रामायैवं न्यवेदयत् ॥ १० ॥ अथ रामः प्रसन्नात्मा सौमित्रिमिदमब्रवीत् । भूय एव तु गच्छ त्वं कार्यिणः प्रविचारय ॥ ११ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी कोई कार्यार्थी (अभियोग लेकर आनेवाला पुरुष ) दिखायी नहीं देता था । लक्ष्मणने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको राज्यकी ऐसी स्थिति बतायी ॥ तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए श्रीरामने सुमित्राकुमारसे पुनः इस प्रकार कहा—‘लक्ष्मण ! तुम फिर जाओ और कार्यार्थी पुरुषोंका पता लगाओ ॥ ११ ॥
सम्यक्प्रणीतया नीत्या नाधर्मो विद्यते क्वचित् । तस्माद् राजभयात् सर्वे रक्षन्तीह परस्परम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘भलीभाँति उत्तम नीतिका प्रयोग करनेसे राज्यमें कहीं अधर्म नहीं रह जाता है । अतः सभी लोग राजाके भयसे यहाँ एक दूसरेकी रक्षा करते हैं ॥ १२ ॥
बाणा इव मया मुक्ता इह रक्षन्ति मे प्रजाः । तथापि त्वं महाबाहो प्रजा रक्षस्व तत्परः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘यद्यपि राजकर्मचारी मेरे छोड़े हुए बाणोंके समान यहाँ प्रजाकी रक्षा करते हैं, तथापि महाबाहो ! तुम स्वयं भी तत्पर रहकर प्रजाका पालन किया करो’ ॥१३॥
एवमुक्तस्तु सौमित्रिर्निर्जगाम नृपालयात् । अपश्यद् द्वारदेशे वै श्वानं तावदवस्थितम् ॥ १४ ॥ तमेव वीक्षमाणं वै विक्रोशन्तं मुहुर्मुहुः । दृष्ट्वाथ लक्ष्मणस्तं वै सपप्रच्छाथ वीर्यवान् ॥ १५ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मण राजभवनसे बाहर निकले । बाहर आकर उन्होंने देखा, द्वारपर एक कुत्ता खड़ा है, जो उन्हींकी ओर देखता हुआ बारंबार भूँक रहा है । उसे इस प्रकार देखकर पराक्रमी लक्ष्मणने उससे पूछा—॥ १४–१५ ॥
किं ते कार्यं महाभाग ब्रूहि विस्रब्धमानसः । लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा सारमेयोऽभ्यभाषत ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘महाभाग ! तुम निर्भय होकर बताओ, तुम्हारा क्या काम है ?’ लक्ष्मणका यह वचन सुनकर कुत्तेने कहा—॥१६॥
सर्वभूतशरण्याय रामायाक्लिष्टकर्मणे । भयेष्वभयदात्रे च तस्मै वक्तुं समुत्सहे ॥ १७ ॥ एतच्छ्रुत्वा च वचनं सारमेयस्य लक्ष्मणः । राघवाय तदाख्यातुं प्रविवेशालयं शुभम् ॥ १८ ॥ निवेद्य रामस्य पुनर्निर्जगाम नृपालयात् । वक्तव्यं यदि ते किंचित् तत्त्वं ब्रूहि नृपाय वै ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जो समस्त भूतोंको शरण देनेवाले और क्लेशरहित कर्म करनेवाले हैं, जो भयके अवसरोंपर भी अभय देते हैं, उन भगवान् श्रीरामके समक्ष ही मैं अपना काम बता सकता हूँ’ ॥ कुत्तेका यह कथन सुनकर लक्ष्मणने श्रीरघुनाथजीको इसकी सूचना देनेके लिये सुन्दर राजभवनमें प्रवेश किया ॥ श्रीरामको उसकी बात बताकर लक्ष्मण पुनः राजभवनसे बाहर निकल आये और उससे बोले—‘यदि तुम्हें कुछ कहना है तो चलकर राजासे ही कहो’ ॥ १९ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा सारमेयोऽभ्यभाषत । देवागारे नृपागारे द्विजवेश्मसु वै तथा ॥ २० ॥ वह्निः शतक्रतुश्चैव सूर्यो वायुश्च तिष्ठति । नात्र योग्यास्तु सौमित्रे योनीनामधमा वयम् ॥ २१ ॥ प्रवेष्टुं नात्र शक्यामि धर्मो विग्रहवान् नृपः । सत्यवादी रणपटुः सर्वसत्त्वहिते रतः ॥ २२ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणकी वह बात सुनकर कुत्ता बोला—‘सुमित्रानन्दन ! देवालयमें, राजभवनमें तथा ब्राह्मणके घरोंमें अग्नि, इन्द्र, सूर्य और वायुदेवता सदा स्थित रहते हैं; अतः हम अधमयोनिके जीव स्वेच्छासे वहाँ जानेके योग्य नहीं हैं ॥ ‘मैं इस राजभवनमें प्रवेश नहीं कर सकूँगा; क्योंकि राजा श्रीराम धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप हैं । वे सत्यवादी, संग्राम-कुशल और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं ॥२२॥
षाड्गुण्यस्य पदं वेत्ति नीतिकर्ता स राघवः । सर्वज्ञः सर्वदर्शी च रामो रमयतां वरः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वे संधि-विग्रह आदि छहों गुणोंके प्रयोगके अवसरोंको जानते हैं । श्रीरघुनाथजी न्याय करनेवाले हैं । वे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हैं । श्रीराम दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ २३ ॥
स सोमः स च मृत्युश्च स यमो धनदस्तथा । वह्निः शतक्रतुश्चैव सूर्यो वै वरुणस्तथा ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘वे ही चन्द्रमा हैं, वे ही मृत्यु हैं, वे ही यम, कुबेर, अग्नि, इन्द्र, सूर्य और वरुण हैं ॥ २४ ॥
तस्य त्वं ब्रूहि सौमित्रे प्रजापालः स राघवः । अनाज्ञप्तस्तु सौमित्रे प्रवेष्टुं नेच्छयाम्यहम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! श्रीरघुनाथजी प्रजापालक हैं । आप उनसे कहिये । मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना इस भवनमें प्रवेश करना नहीं चाहता’ ॥ २५ ॥
आनृशंस्यान्महाभागः प्रविवेश महाद्युतिः । नृपालयं प्रविश्याथ लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् ॥ २६ ॥
भावार्थ
यह सुनकर महातेजस्वी महाभाग लक्ष्मणने दयावश राजभवनमें प्रवेश करके कहा—॥ २६ ॥
श्रूयतां मम विज्ञाप्यं कौसल्यानन्दवर्धन । यन्मयोक्तं महाबाहो तव शासनजं विभो ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीरघुनाथजी ! मेरा यह निवेदन सुनिये । आपने जो आदेश दिया था, उसके अनुसार मैंने बाहर जाकर कार्यार्थीको पुकारा ॥ २७ ॥
श्वा वै ते तिष्ठते द्वारि कार्यार्थी समुपागतः । लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामो वचनमब्रवीत् । सम्प्रवेशय वै क्षिप्रं कार्यार्थी योऽत्र तिष्ठति ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘इस समय आपके द्वारपर एक कुत्ता खड़ा है, जो कार्यार्थी होकर आया है ।’ लक्ष्मणकी यह बात सुनकर श्रीरामने कहा—‘यहाँ जो भी कार्यार्थी होकर खड़ा है, उसे शीघ्र इस सभाके भीतर ले आओ’ ॥ २८ ॥
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