उत्तरकाण्ड, सर्ग 61
श्रुत्वा रामस्य वचनं लक्ष्मणस्त्वरितस्तदा। श्वानमाहूय मतिमान् राघवाय न्यवेदयत् ॥ १ ॥ दृष्ट्वा समागतं श्वानं रामो वचनमब्रवीत्। विवक्षितार्थं मे ब्रूहि सारमेय न ते भयम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामका यह वचन सुनकर बुद्धिमान् लक्ष्मणने तत्काल उस कुत्तेको बुलाया और श्रीरामको उसके आनेकी सूचना दी॥ वहाँ आये हुए कुत्तेकी ओर देखकर श्रीरामने कहा— ‘सारमेय ! तुम्हें जो कुछ कहना है, उसे मेरे सामने कहो। यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं है’ ॥ २ ॥
अथापश्यत तत्रस्थं रामं श्वा भिन्नमस्तकः। ततो दृष्ट्वा स राजानं सारमेयोऽब्रवीद् वचः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘कुत्तेका मस्तक फट गया था। उसने राजसभामें बैठे हुए महाराज श्रीरामकी ओर देखा और देखकर इस प्रकार कहा—॥ ३ ॥
राजैव कर्ता भूतानां राजा चैव विनायकः। राजा सुप्तेषु जागर्ति राजा पालयति प्रजाः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘राजा ही समस्त प्राणियोंका उत्पादक और नायक है। राजा सबके सोते रहनेपर भी जागता है और प्रजाओंका पालन करता है ॥ ४ ॥
नीत्या सुनीतया राजा धर्मं रक्षति रक्षिता। यदा न पालयेद् राजा क्षिप्रं नश्यन्ति वै प्रजाः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘राजा सबका रक्षक है। वह उत्तम नीतिका प्रयोग करके सबकी रक्षा करता है। यदि राजा पालन न करे तो समस्त प्रजाएँ शीघ्र नष्ट हो जाती हैं ॥ ५ ॥
राजा कर्ता च गोप्ता च सर्वस्य जगतः पिता। राजा कालो युगं चैव राजा सर्वमिदं जगत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘राजा कर्ता, राजा रक्षक और राजा सम्पूर्ण जगत्का पिता है। राजा काल और युग है तथा राजा यह सम्पूर्ण जगत् है ॥ ६ ॥
धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः। यस्माद् धारयते सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ७ ॥ धारणाद् विद्विषां चैव धर्मेणारञ्जयन् प्रजाः। तस्माद् धारणमित्युक्तं स धर्म इति निश्चयः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘धर्म सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है, इसीलिये उसका नाम धर्म है। धर्मने ही समस्त प्रजाको धारण कर रक्खा है; क्योंकि वही चराचर प्राणियोंसहित सारी त्रिलोकीका आधार है॥ ‘राजा अपने द्रोहियोंको भी धारण करता है ( अथवा वह दुष्टोंको भी मर्यादामें स्थापित करता है ) तथा वह धर्मके द्वारा प्रजाको प्रसन्न रखता है; इसलिये उसके शासनरूप कर्मको धारण कहा गया है और धारण ही धर्म है, यह शास्त्रका सिद्धान्त है ॥ ८ ॥
एष राजन् परो धर्मः फलवान् प्रेत्य राघव। नहि धर्माद् भवेत् किंचिद् दुष्प्रापमिति मे मतिः ॥९॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! यह प्रजापालनरूप परम धर्म राजाको परलोकमें उत्तम फल देनेवाला होता है। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि धर्मसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ९ ॥
दानं दया सतां पूजा व्यवहारेषु चार्जवम्। एष राम परो धर्मो रक्षणात् प्रेत्य चेह च ॥ १० ॥ त्वं प्रमाणं प्रमाणानामसि राघव सुव्रत। विदितश्चैव ते धर्मः सद्भिराचरितस्तु वै ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! दान, दया, सत्पुरुषोंका सम्मान और व्यवहार-में सरलता यह परम धर्म है। प्रजाजनोंकी रक्षासे होनेवाला उत्कृष्ट धर्म इहलोक और परलोकमें भी सुख देनेवाला होता है॥ ‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले रघुनन्दन ! आप समस्त प्रमाणोंके भी प्रमाण हैं। सत्पुरुषोंने जिस धर्मका आचरण किया है, वह आपको भलीभाँति विदित ही है ॥ ११ ॥
धर्माणां त्वं परं धाम गुणानां सागरोपमः। अज्ञानाच्च मया राजन्नुक्तस्त्वं राजसत्तम ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! आप धर्मोंके परम धाम और गुणोंके सागर हैं। नृपश्रेष्ठ ! मैंने अज्ञानवश ही आपके सामने धर्मकी व्याख्या की है ॥ १२ ॥
प्रसादयामि शिरसा न त्वं क्रोद्धुमिहार्हसि। शुनः स वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘इसके लिये मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर क्षमा चाहता और आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ। आप यहाँ मुझपर कुपित न हों।’ कुत्तेकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजी बोले—॥ १३ ॥
किं ते कार्यं करोम्यद्य ब्रूहि विस्रब्धं मा चिरम्। रामस्य वचनं श्रुत्वा सारमेयोऽब्रवीदिदम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘तुम निर्भय होकर बताओ। आज मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ। अपना काम बतानेमें विलम्ब न करो।’ श्रीरामकी यह बात सुनकर कुत्ता बोला—॥ १४ ॥
धर्मेण राष्ट्रं विन्देत धर्मेणैवानुपालयेत्। धर्माच्छरण्यतां याति राजा सर्वभयापहः ॥ १५ ॥ इदं विज्ञाय यत् कृत्यं श्रूयतां मम राघव।
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! राजा धर्मसे ही राज्य प्राप्त करे और धर्मसे ही निरन्तर उसका पालन करे। धर्मसे ही राजा सबको शरण देनेवाला और सबका भय दूर करनेवाला होता है। ऐसा जानकर आप मेरा जो कार्य है, उसे सुनिये ॥ १५½ ॥
भिक्षुः सर्वार्थसिद्धश्च ब्राह्मणावसथे वसन् ॥ १६ ॥ तेन दत्तः प्रहारो मे निष्कारणमनागसः । एतच्छ्रुत्वा तु रामेण द्वाःस्थः सम्प्रेषितस्तदा ॥ १७ ॥ आनीतश्च द्विजस्तेन सर्वसिद्धार्थकोविदः ।
भावार्थ
‘प्रभो ! सर्वार्थसिद्ध नामसे प्रसिद्ध एक भिक्षु है, जो ब्राह्मणोंके घरमें रहा करता है । उसने आज अकारण मुझपर प्रहार किया है । मैंने उसका कोई अपराध नहीं किया था’ ॥ कुत्तेकी यह बात सुनकर श्रीरामने तत्काल एक द्वारपाल भेजा और उस सर्वार्थसिद्ध नामक विद्वान् भिक्षु ब्राह्मणको बुलवाया ॥ १७½ ॥
अथ द्विजवरस्तत्र रामं दृष्ट्वा महाद्युतिः ॥ १८ ॥ किं ते कार्यं मया राम तद् ब्रूहि त्वं ममानघ ।
भावार्थ
श्रीरामको देखकर उस महातेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणने पूछा— ‘निष्पाप रघुनन्दन ! मुझसे आपको क्या काम है ?’ ॥१८½॥
एवमुक्तस्तु विप्रेण रामो वचनमब्रवीत् ॥ १९ ॥ त्वया दत्तः प्रहारोऽयं सारमेयस्य वै द्विज । किं तवापकृतं विप्र दण्डेनाभिहतो यतः ॥ २० ॥
भावार्थ
ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर श्रीराम बोले—‘ब्रह्मन् ! आपने इस कुत्तेके सिरपर जो यह प्रहार किया है, उसका क्या कारण है ? विप्रवर ! इसने आपका क्या अपराध किया था, जिसके कारण आपने इसे डंडा मारा है ?॥ १९-२० ॥
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः । क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽपकर्षति ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘क्रोध प्राणहारी शत्रु है । क्रोधको मित्रमुख शत्रु बताया गया है । क्रोध अत्यन्त तीखी तलवार है तथा क्रोध सारे सद्गुणोंको खींच लेता है ॥ २१ ॥
तपते यजते चैव यच्च दानं प्रयच्छति । क्रोधेन सर्वं हरति तस्मात् क्रोधं विसर्जयेत् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मनुष्य जो तप करता, यज्ञ करता और दान देता है, उन सबके पुण्यको वह क्रोधके द्वारा नष्ट कर देता है । इसलिये क्रोधको त्याग देना चाहिये ॥ २२ ॥
इन्द्रियाणां प्रदुष्टानां हयानामिव धावताम् । कुर्वीत धृत्या सारथ्यं संहृत्येन्द्रियगोचरम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘दुष्ट घोड़ोंकी तरह विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन्द्रियोंको उन विषयोंकी ओरसे हटाकर धैर्यपूर्वक उन्हें नियन्त्रणमें रक्खे ॥ २३ ॥
मनसा कर्मणा वाचा चक्षुषा च समाचरेत् । श्रेयो लोकस्य चरतो न द्वेष्टि न च लिप्यते ॥ २४ ॥ न तत् कुर्यादसिस्तीक्ष्णः सर्पो वा व्याहतः पदा । अरिर्वा नित्यसंक्रुद्धो यथाऽऽत्मा दुरनुष्ठितः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘मनुष्यको चाहिये कि वह अपने पास विचरनेवाले लोगोंकी मन, वाणी, क्रिया और दृष्टिद्वारा भलाई ही करे । किसीसे द्वेष न रक्खे । ऐसा करनेसे वह पापसे लिप्त नहीं होता ॥ ‘अपना दुष्ट मन जो अनिष्ट या अनर्थ कर सकता है, वैसा तीखी तलवार, पैरोंतले कुचला हुआ सर्प अथवा सदा क्रोधसे भरा रहनेवाला शत्रु भी नहीं कर सकता ॥ २५ ॥
विनीतविनयस्यापि प्रकृतिर्न विधीयते । प्रकृतिं गूहमानस्य निश्चयेन कृतिर्ध्रुवा ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘जिसे विनयकी शिक्षा मिली हो, उसकी भी प्रकृति नयी नहीं बनती है । कोई अपनी दुष्ट प्रकृतिको कितना ही क्यों न छिपाये, उसके कार्यमें उसकी दुष्टता निश्चय ही प्रकट हो जाती है’ ॥ २६ ॥
एवमुक्तः स विप्रो वै रामेणाक्लिष्टकर्मणा । द्विजः सर्वार्थसिद्धस्तु अब्रवीद् रामसंनिधौ ॥ २७ ॥ मया दत्तप्रहारोऽयं क्रोधेनाविष्टचेतसा । भिक्षार्थमटमानेन काले विगतभैक्षके ॥ २८ ॥ रथ्यास्थितस्त्वयं श्वा वै गच्छ गच्छेति भाषितः । अथ स्वैरेण गच्छंस्तु रथ्यान्ते विषमं स्थितः ॥ २९ ॥
भावार्थ
क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामके ऐसा कहनेपर सर्वार्थसिद्ध नामक ब्राह्मणने उनके निकट इस प्रकार कहा–॥ ‘प्रभो ! मेरा मन क्रोधसे भर गया था, इसलिये मैंने इसे डंडेसे मारा है । भिक्षाका समय बीत चुका था, तथापि भूखे रहनेके कारण भिक्षा माँगनेके लिये मैं द्वार-द्वार घूम रहा था । यह कुत्ता बीच गस्तेमें खड़ा था । मैंने बार-बार कहा—‘तुम रास्तेसे हट जाओ, हट जाओ’ फिर यह अपनी मौजसे चला और सड़कके बीचमें बेढंगे खड़ा हो गया ॥ २८-२९ ॥
क्रोधेन क्षुधयाविष्टस्ततो दत्तोऽस्य राघव । प्रहारो राजराजेन्द्र शाधि मामपराधिनम् ॥ ३० ॥ त्वया शस्तस्य राजेन्द्र नास्ति मे नरकाद्भयम् ।
भावार्थ
‘मैं भूखा तो था ही, क्रोध चढ़ आया । राजाधिराज रघुनन्दन ! उस क्रोधसे ही प्रेरित होकर मैंने इसके सिरपर डंडा मार दिया । मैं अपराधी हूँ । आप मुझे दण्ड दीजिये । राजेन्द्र ! आपसे दण्ड मिल जानेपर मुझे नरकमें पड़नेका डर नहीं रहेगा’ ॥ ३०½ ॥
अथ रामेण सम्पृष्ठाः सर्वं एव सभासदः ॥ ३१ ॥ किं कार्यमस्य वै ब्रूत दण्डो वै कोऽस्य पात्यताम् । सम्यक्प्रणिहिते दण्डे प्रजा भवति रक्षिता ॥ ३२ ॥
भावार्थ
तब श्रीरामने सभी सभासदोंसे पूछा—‘आपलोग बतावें, इसके लिये क्या करना चाहिये ? इसे कौन-सा दण्ड दिया जाय ? क्योंकि भलीभाँति दण्डका प्रयोग होनेपर प्रजा सुरक्षित रहती है’ ॥ ३१-३२ ॥
भृग्वाङ्गिरसकुत्साद्या वसिष्ठश्च सकाश्यपः । धर्मपाठकमुख्याश्च सचिवा नैगमास्तथा ॥ ३३ ॥ एते चान्ये च बहवः पण्डितास्तत्र संगताः । अवध्यो ब्राह्मणो दण्डैरिति शास्त्रविदो विदुः ॥ ३४ ॥ ब्रुवते राघवं सर्वे राजधर्मेषु निष्ठिताः ।
भावार्थ
उस सभामें भृगु, आङ्गिरस, कुत्स, वसिष्ठ और काश्यप आदि मुनि थे । धर्मशास्त्रोंका पाठ करनेवाले मुख्य-मुख्य विद्वान् उपस्थित थे । मन्त्री और महाजन मौजूद थे—ये तथा और बहुत-से पण्डित वहाँ एकत्र हुए थे । राजधर्मोंके ज्ञानमें परिनिष्ठित वे सभी विद्वान् श्रीरघुनाथजीसे बोले—‘भगवन्! ब्राह्मण दण्डद्वारा अवध्य है, उसे शारीरिक दण्ड नहीं मिलना चाहिये, यही समस्त शास्त्रज्ञोंका मत है’ ॥ ३३-३४½ ॥
अथ ते मुनयः सर्वे राममेवाब्रुवंस्तदा ॥ ३५ ॥ राजा शास्ता हि सर्वस्य त्वं विशेषेण राघव । त्रैलोक्यस्य भवाञ्शास्ता देवो विष्णुः सनातनः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वे सब मुनि उस समय श्रीरामसे ही बोले— ‘रघुनन्दन ! राजा सबका शासक होता है । विशेषतः आप तो तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले साक्षात् सनातन देवता भगवान् विष्णु हैं’ ॥ ३५-३६ ॥
एवमुक्ते तु तैः सर्वैः श्वा वै वचनमब्रवीत् । यदि तुष्टोऽसि मे राम यदि देयो वरो मम ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उन सबके ऐसा कहनेपर कुत्ता बोला—‘श्रीराम ! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं, यदि आपको मुझे इच्छानुसार वर देना है तो मेरी बात सुनिये ॥ ३७ ॥
प्रतिज्ञातं त्वया वीर किं करोमीति विश्रुतम् । प्रयच्छ ब्राह्मणस्यास्य कौलपत्यं नराधिप ॥ ३८ ॥ कालञ्जरे महाराज कौलपत्यं प्रदीयताम् ।
भावार्थ
‘वीर नरेश्वर ! आपने प्रतिज्ञापूर्वक पूछा है कि मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ । इस प्रकार आप मेरी इच्छा पूर्ण करनेको प्रतिज्ञाबद्ध हो चुके हैं । अतः मैं कहता हूँ कि इस ब्राह्मणको कुलपति ( महन्त ) बना दीजिये । महाराज ! इसे कालञ्जरमें एक मठका आधिपत्य ( वहाँकी महन्थी ) प्रदान कर दीजिये’ ॥ ३८½ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु रामेण कौलपत्येऽभिषेचितः ॥ ३९ ॥ प्रययौ ब्राह्मणो हृष्टो गजस्कन्धेन सोऽर्चितः ।
भावार्थ
यह सुनकर श्रीरामने उसका कुलपतिके पदपर अभिषेक कर दिया । इस प्रकार पूजित हुआ वह ब्राह्मण हाथीकी पीठपर बैठकर बड़े हर्षके साथ वहाँसे चला गया ॥ ३९½ ॥
अथ ते रामसचिवाः स्मयमाना वचोऽब्रवन् ॥ ४० ॥ वरोऽयं दत्त एतस्य नायं शापो महाद्युते ।
भावार्थ
तब श्रीरामचन्द्रजीके मन्त्री मुस्कराते हुए बोले— ‘महातेजस्वी महाराज ! यह तो इसे वर दिया गया है, शाप या दण्ड नहीं’ ॥ ४०½ ॥
एवमुक्तस्तु सचिवै रामो वचनमब्रवीत् ॥ ४१ ॥ न यूयं गतितत्त्वज्ञाः श्वा वै जानाति कारणम् ।
भावार्थ
मन्त्रियोंके ऐसा कहनेपर श्रीरामने कहा—‘किस कर्मका क्या परिणाम होता है अथवा उससे जीवकी कैसी गति होती है, इसका तत्त्व तुमलोग नहीं जानते । ब्राह्मणको मठाधीशका पद क्यों दिया गया ? इसका कारण यह कुत्ता जानता है’ ॥ ४१½ ॥
अथ पृष्टस्तु रामेण सारमेयोऽब्रवीदिदम् ॥ ४२ ॥ अहं कुलपतिस्तत्र आसं शिष्यान्नभोजनः । देवद्विजातिपूजायां दासीदासेषु राघव ॥ ४३ ॥ संविभागी शुभरतिर्देवद्रव्यस्य रक्षिता । विनीतः शीलसम्पन्नः सर्वसत्त्वहिते रतः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् श्रीरामके पूछनेपर कुत्तेने इस प्रकार कहा— ‘रघुनन्दन ! मैं पहले जन्ममें कालञ्जरके मठमें कुलपति ( मठाधीश ) था । वहाँ यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता, देवता और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहता, दास-दासियोंको उनका न्यायोचित भाग बाँट देता, शुभ कर्मोंमें अनुरक्त रहता, देवसम्पत्तिकी रक्षा करता तथा विनय और शीलसे सम्पन्न होकर समस्त प्राणियोंके हित-साधनमें संलग्न रहता था ॥ ४२-४४ ॥
सोऽहं प्राप्त इमां घोरामवस्थामधमां गतिम् । एवं क्रोधान्वितो विप्रस्त्यक्तधर्माहिते रतः ॥ ४५ ॥ क्रुद्धो नृशंसः परुष अविद्वांश्चाप्यधार्मिकः । कुलानि पातयत्येव सप्त सप्त च राघव ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘तो भी मुझे यह घोर अवस्था एवं अधम गति प्राप्त हुई । फिर जो ऐसा क्रोधी है, धर्मको छोड़ चुका है, दूसरोंके अहितमें लगा हुआ है तथा क्रोध करनेवाला, क्रूर, कठोर, मूर्ख और अधर्मी है, वह ब्राह्मण तो मठाधीश होकर अपने साथ ही ऊपर और नीचेकी सात-सात पीढ़ियोंको भी नरकमें गिराकर ही रहेगा ॥ ४५-४६ ॥
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु कौलपत्यं न कारयेत् । यमिच्छेन्नरकं नेतुं सपुत्रपशुबान्धवम् ॥ ४७ ॥ देवेष्वधिष्ठितं कुर्याद् गोषु च ब्राह्मणेषु च ।
भावार्थ
‘इसलिये किसी भी दशामें मठाधीशका पद नहीं ग्रहण करना चाहिये । जिसे पुत्र, पशु और बन्धु-बान्धवोंसहित नरकमें गिरा देनेकी इच्छा हो, उसे देवताओं, गौओं और ब्राह्मणोंका अधिष्ठाता बना दे ॥ ४७½ ॥
ब्रह्मस्वं देवताद्रव्यं स्त्रीणां बालधनं च यत् ॥ ४८ ॥ दत्तं हरति यो भूय इष्टैः सह विनश्यति ।
भावार्थ
‘जो ब्राह्मणका, देवताका, स्त्रियोंका और बालकोंका धन हर लेता है तथा जो अपनी दान की हुई सम्पत्तिको फिर वापस ले लेता है, वह इष्टजनोंसहित नष्ट हो जाता है ॥४८½॥
ब्राह्मणद्रव्यमादत्ते देवानां चैव राघव ॥ ४९॥ सद्यः पतति घोरे वै नरकेऽवीचिसंज्ञके ।
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! जो ब्राह्मणों और देवताओंका द्रव्य हड़प लेता है, वह शीघ्र ही अवीचि नामक घोर नरकमें गिर जाता है ॥ ४९½ ॥
मनसापि हि देवस्वं ब्रह्मस्वं च हरेत्तु यः ॥ ५० ॥ निरयान्निरयं चैव पतत्येव नराधमः ।
भावार्थ
‘जो देवता और ब्राह्मणकी सम्पत्तिको हर लेनेका विचार भी मनमें लाता है, वह नराधम निश्चय ही एक नरकसे दूसरे नरकमें गिरता रहता है’ ॥ ५०½ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं रामो विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ ५१ ॥ श्वाप्यगच्छन्महातेजा यत एवागतस्ततः ।
भावार्थ
कुत्तेका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और वह महातेजस्वी कुत्ता भी जिधरसे आया था, उधर ही चला गया ॥ ५१½ ॥
मनस्वी पूर्वजात्या स जातिमात्रोऽपदूषितः । वाराणस्यां महाभागः प्रायं चोपविवेश ह ॥ ५२ ॥
भावार्थ
वह पूर्वजन्ममें बड़ा मनस्वी था, परंतु इस जन्ममें वह कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न होनेके कारण दूषित हो गया था । उस महाभाग कुत्तेने काशीमें जाकर प्रायोपवेशन कर लिया । ( अन्न-जल छोड़कर अपने प्राण त्याग दिये ) ॥ ५२ ॥
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