उत्तरकाण्ड, सर्ग 59
श्रुत्वा तूशनसं क्रुद्धं तदार्तो नहुषात्मजः । जरां परमिकां प्राप्य यदुं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
शुक्राचार्यके कुपित होनेका समाचार सुनकर नहुषकुमार ययातिको बड़ा दुःख हुआ । उन्हें ऐसी वृद्धावस्था प्राप्त हुई, जो दूसरेकी जवानीसे बदली जा सकती थी । उस विलक्षण जरावस्थाको पाकर राजाने यदुसे कहा—॥ १ ॥
यदो त्वमसि धर्मज्ञो मदर्थं प्रतिगृह्यताम् । जरा परमिका पुत्र भोगे रंस्ये महायशः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘यदो ! तुम धर्मके ज्ञाता हो । मेरे महायशस्वी पुत्र ! तुम मेरे लिये दूसरेके शरीरमें संचारित करनेके योग्य इस जरावस्थाको ले लो । मैं भोगोंद्वारा रमण करूँगा—अपनी भोगविषयक इच्छाको पूर्ण करूँगा ॥ २ ॥
न तावत् कृतकृत्योऽस्मि विषयेषु नरर्षभ । अनुभूय तदा कामं ततः प्राप्स्याम्यहं जराम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! अभीतक मैं विषयभोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ । इच्छानुसार विषयसुखका अनुभव करके फिर अपनी वृद्धावस्था मैं तुमसे ले लूँगा’ ॥ ३ ॥
यदुस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच नरर्षभम् । पुत्रस्ते दयितः पूरुः प्रतिगृह्णातु वै जराम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
उनकी यह बात सुनकर यदुने नरश्रेष्ठ ययातिको उत्तर दिया—‘आपके लाड़ले बेटे पूरु ही इस वृद्धावस्थाको ग्रहण करें ॥ ४ ॥
बहिष्कृतोऽहमर्थेषु संनिकर्षाच्च पार्थिव । प्रतिगृह्णातु वै राजन् यैः सहाश्नासि भोजनम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘पृथ्वीनाथ ! मुझे तो आपने धनसे तथा पास रहकर लाड़-प्यार पानेके अधिकारसे भी वञ्चित कर दिया है; अतः जिनके साथ बैठकर आप भोजन करते हैं, उन्हीं लोगोंसे युवावस्था ग्रहण कीजिये’ ॥ ५ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा पूरुमथाब्रवीत् । इयं जरा महाबाहो मदर्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
यदुकी यह बात सुनकर राजाने पूरुसे कहा—‘महाबाहो ! मेरी सुख-सुविधाके लिये तुम इस वृद्धावस्थाको ग्रहण कर लो’ ॥ ६ ॥
नाहुषेणैवमुक्तस्तु पूरुः प्राञ्जलिरब्रवीत् । धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि शासनेऽस्मि तव स्थितः ॥ ७ ॥
भावार्थ
नहुष-पुत्र ययातिके ऐसा कहनेपर पूरु हाथ जोड़कर बोले—‘पिताजी ! आपकी सेवाका अवसर पाकर मैं धन्य हो गया । यह आपका मेरे ऊपर महान् अनुग्रह है । आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये मैं हर तरहसे तैयार हूँ’ ॥७॥
पूरोर्वचनमाज्ञाय नाहुषः परया मुदा । प्रहर्षमतुलं लेभे जरां संक्रामयच्च ताम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
पूरुका यह स्वीकारसूचक वचन सुनकर नहुषकुमार ययातिको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्हें अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और उन्होंने अपनी वृद्धावस्था पूरुके शरीरमें संचारित कर दी ॥ ८ ॥
ततः स राजा तरुणः प्राप्य यज्ञान् सहस्रशः । बहुवर्षसहस्राणि पालयामास मेदिनीम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
तदनन्तर तरुण हुए राजा ययातिने सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए कई हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन किया ॥ ९ ॥
अथ दीर्घस्य कालस्य राजा पूरुमथाब्रवीत् । आनयस्व जरां पुत्र न्यासं निर्यातयस्व मे ॥ १० ॥
भावार्थ
इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजाने पूरुसे कहा— ‘बेटा ! तुम्हारे पास धरोहरके रूपमें रक्खी हुई मेरी वृद्धावस्थाको मुझे लौटा दो ॥ १० ॥
न्यासभूता मया पुत्र त्वयि संक्रामिता जरा । तस्मात् प्रतिग्रहीष्यामि तां जरां मा व्यथां कृथाः ॥११॥
भावार्थ
‘पुत्र ! मैंने वृद्धावस्थाको धरोहरके रूपमें ही तुम्हारे शरीरमें संचारित किया था; इसलिये उसे वापस ले लूँगा । तुम अपने मनमें दुःख न मानना ॥ ११ ॥
प्रीतश्चास्मि महाबाहो शासनस्य प्रतिग्रहात् । त्वां चाहमभिषेक्ष्यामि प्रीतियुक्तो नराधिपम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! तुमने मेरी आज्ञा मान ली, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई । अब मैं बड़े प्रेमसे राजाके पदपर तुम्हारा अभिषेक करूँगा’ ॥ १२ ॥
एवमुक्त्वा सुतं पूरुं ययातिर्नहुषात्मजः । देवयानीसुतं क्रुद्धो राजा वाक्यमुवाच ह ॥ १३ ॥
भावार्थ
अपने पुत्र पूरुसे ऐसा कहकर नहुषकुमार राजा ययाति देवयानीके बेटेसे कुपित होकर बोले—॥ १३ ॥
राक्षसस्त्वं मया जातः क्षत्ररूपो दुरासदः । प्रतिहंसि ममाज्ञां त्वं प्रजार्थं विफलो भव ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘यदो ! मैंने दुर्जय क्षत्रियके रूपमें तुम-जैसे राक्षसको जन्म दिया । तुमने मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है, अतः तुम अपनी संतानोंको राज्याधिकारी बनानेके विषयमें विफलमनोरथ हो जाओ ॥ १४ ॥
पितरं गुरुभूतं मां यस्मात् त्वमवमन्यसे । राक्षसान् यातुधानांस्त्वं जनयिष्यसि दारुणान् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘मैं पिता हूँ, गुरु हूँ; फिर भी तुम मेरा अपमान करते हो, इसलिये भयंकर राक्षसों और यातुधानोंको तुम जन्म दोगे ॥ १५ ॥
न तु सोमकुलोत्पन्ने वंशे स्थास्यति दुर्मतेः । वंशोऽपि भवतस्तुल्यो दुर्विनीतो भविष्यति ॥ १६ ॥ तमेवमुक्त्वा राजर्षिः पूरुं राज्यविवर्धनम् । अभिषेकेण सम्पूज्य आश्रमं प्रविवेश ह ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारी बुद्धि बहुत खोटी है । अतः तुम्हारी संतान सोमकुलमें उत्पन्न वंशपरम्परामें राजाके रूपसे प्रतिष्ठित नहीं होगी । तुम्हारी संतति भी तुम्हारे ही समान उद्दण्ड होगी’ ॥ यदुसे ऐसा कहकर राजर्षि ययातिने राज्यकी वृद्धि करनेवाले पूरुको अभिषेकके द्वारा सम्मानित करके वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश किया ॥ १७ ॥
ततः कालेन महता दिष्टान्तमुपजग्मिवान् । त्रिदिवं स गतो राजा ययातिर्नहुषात्मजः ॥ १८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् प्रारब्ध-भोगका क्षय होनेपर नहुषपुत्र राजा ययातिने शरीरको त्याग दिया और स्वर्गलोकको प्रस्थान किया ॥ १८ ॥
पूरुश्चकार तद् राज्यं धर्मेण महता वृतः । प्रतिष्ठाने पुरवरे काशिराज्ये महायशाः ॥ १९ ॥
भावार्थ
उसके बाद महायशस्वी पूरुने महान् धर्मसे संयुक्त हो काशिराजकी श्रेष्ठ राजधानी प्रतिष्ठानपुरमें रहकर उस राज्यका पालन किया ॥ १९ ॥
यदुस्तु जनयामास यातुधानान् सहस्रशः । पुरे क्रौञ्चवने दुर्गे राजवंशबहिष्कृतः ॥ २० ॥
भावार्थ
राजकुलसे बहिष्कृत यदुने नगरमें तथा दुर्गम क्रौञ्चवनमें सहस्रों यातुधानोंको जन्म दिया ॥ २० ॥
एष तूशनसा मुक्तः शापोत्सर्गो ययातिना । धारितः क्षत्रधर्मेण यं निमिश्चक्षमे न च ॥ २१ ॥
भावार्थ
शुक्राचार्यके दिये हुए इस शापको राजा ययातिने क्षत्रिय-धर्मके अनुसार धारण कर लिया । परंतु राजा निमिने वसिष्ठजीके शापको नहीं सहन किया ॥ २१ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं दर्शनं सर्वकारिणाम् । अनुवर्तामहे सौम्य दोषो न स्याद् यथा नृगे ॥ २२ ॥
भावार्थ
सौम्य ! यह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें सुना दिया । समस्त कृत्योंका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंकी दृष्टि (विचार)का ही हम अनुसरण करते हैं, जिससे राजा मृगकी भाँति हमें भी दोष न प्राप्त हो ॥ २२ ॥
इति कथयति रामे चन्द्रतुल्याननेन प्रविरलतरतारं व्योम ग्रन्थे तदानीम् । अरुणकिरणरक्ता दिग् बभौ चैव पूर्वा कुसुमरसविमुक्तं वस्त्रमागुण्ठितेव ॥२३॥
भावार्थ
चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले श्रीराम जब इस प्रकार कथा कह रहे थे, उस समय आकाशमें दो-ही-एक तारे रह गये। पूर्व दिशा अरुण किरणोंसे रक्षित हो लाल दिखायी देने लगी, मानो कुसुमरंगमें रँगे हुए अरुण वस्त्रसे उसने अपने अङ्गोंको ढक लिया हो ॥ २३ ॥
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