उत्तरकाण्ड, सर्ग 58
एवं ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणः परवीरहा । प्रत्युवाच महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ १ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने तेजसे प्रज्वलित होते हुए-से महात्मा श्रीरामको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
महदद्भुतमाश्चर्यं विदेहस्य पुरातनम् । निर्वृत्तं राजशार्दूल वसिष्ठस्य मुनेश्च ह ॥ २ ॥
भावार्थ
‘नृपश्रेष्ठ ! राजा विदेह ( निमि ) तथा वसिष्ठ मुनिका पुरातन वृत्तान्त अत्यन्त अद्भुत और आश्चर्यजनक है ॥ २ ॥
निमिस्तु क्षत्रियः शूरो विशेषेण च दीक्षितः । न क्षमं कृतवान् राजा वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘परंतु राजा निमि क्षत्रिय, शूरवीर और विशेषतः यज्ञकी दीक्षा लिये हुए थे; अतः उन्होंने महात्मा वसिष्ठके प्रति उचित बर्ताव नहीं किया’ ॥ ३ ॥
एवमुक्तस्तु तेनायं रामः क्षत्रियपुङ्गवः । उवाच लक्ष्मणं वाक्यं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ ४ ॥ रामो रमयतां श्रेष्ठो भ्रातरं दीप्ततेजसम् ।
भावार्थ
लक्ष्मणके इस तरह कहनेपर दूसरोंके मनको रमाने (प्रसन्न रखने ) वालोंमें श्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि श्रीरामने सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता और उद्दीप्त तेजस्वी भ्राता लक्ष्मणसे कहा—॥ ४½ ॥
न सर्वत्र क्षमा वीर पुरुषेषु प्रदृश्यते ॥ ५ ॥ सौमित्रे दुःसहो रोषो यथा क्षान्तो ययातिना । सत्त्वानुगं पुरस्कृत्य तन्निबोध समाहितः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘वीर सुमित्राकुमार ! सभी पुरुषोंमें वैसी क्षमा नहीं दिखायी देती, जैसी राजा ययातिमें थी । राजा ययातिने सत्त्वगुणके अनुकूल मार्गका आश्रय ले दुःसह रोषको क्षमा कर लिया था । वह प्रसंग बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ५-६ ॥
नहुषस्य सुतो राजा ययातिः पौरवर्धनः । तस्य भार्याद्वयं सौम्य रूपेणाप्रतिमं भुवि ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! नहुषके पुत्र राजा ययाति पुरवासियों, प्रजाजनोंकी वृद्धि करनेवाले थे । उनके दो पत्नियाँ थीं, जिनके रूपकी इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं थी ॥ ७ ॥
एका तु तस्य राजर्षेर्नाहुषस्य पुरस्कृता । शर्मिष्ठा नाम दैतेयी दुहिता वृषपर्वणः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘नहुषनन्दन राजर्षि ययातिकी एक पत्नीका नाम शर्मिष्ठा था, जो राजाके द्वारा बहुत ही सम्मानित थी । शर्मिष्ठा दैत्य-कुलकी कन्या और वृषपर्वाकी पुत्री थी ॥ ८ ॥
अन्या तूशनसः पत्नी ययातेः पुरुषर्षभ । न तु सा दयिता राज्ञो देवयानी सुमध्यमा ॥ ९ ॥ तयोः पुत्रौ तु सम्भूतौ रूपवन्तौ समाहितौ । शर्मिष्ठाजनयत् पूरुं देवयानी यदुं तदा ॥ १० ॥
भावार्थ
‘पुरुषप्रवर ! उनकी दूसरी पत्नी शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी थी । देवयानी सुन्दरी होनेपर भी राजाको अधिक प्रिय नहीं थी । उन दोनोंके ही पुत्र बड़े रूपवान् हुए । शर्मिष्ठाने पूरुको जन्म दिया और देवयानीने यदुको । वे दोनों बालक अपने चित्तको एकाग्र रखनेवाले थे ॥ ९-१० ॥
पूरुस्तु दयितो राज्ञो गुणैर्मातृकृतेन च । ततो दुःखसमाविष्टो यदुर्मातरमब्रवीत् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘अपनी माताके प्रेमयुक्त व्यवहारसे और अपने गुणोंसे पूरु राजाको अधिक प्रिय था । इससे यदुके मनमें बड़ा दुःख हुआ । वे मातासे बोले—॥ ११ ॥
भार्गवस्य कुले जाता देवस्याक्लिष्टकर्मणः । सहसे हृद्गतं दुःखमवमानं च दुःसहम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘‘मा ! तुम अनायास ही महान् कर्म करनेवाले देवस्वरूप शुक्राचार्यके कुलमें उत्पन्न हुई हो तो भी यहाँ हार्दिक दुःख और दुःसह अपमान सहती हो ॥ १२ ॥
आवां च सहितौ देवि प्रविशाव हुताशनम् । राजा तु रमतां सार्धं दैत्यपुत्र्या बहुक्षपाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘अतः देवि ! हम दोनों एक साथ ही अग्निमें प्रवेश कर जायँ । राजा दैत्यपुत्री शर्मिष्ठाके साथ अनन्त रात्रियोंतक रमते रहें ॥ १३ ॥
यदि वा सहनीयं ते मामनुज्ञातुमर्हसि । क्षम त्वं न क्षमिष्येऽहं मरिष्यामि न संशयः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘यदि तुम्हें यह सब कुछ सहन करना है तो मुझे ही प्राणत्यागकी आज्ञा दे दो । तुम्हीं सहो । मैं नहीं सहूँगा । मैं निःसंदेह मर जाऊँगा’ ॥ १४ ॥
पुत्रस्य भाषितं श्रुत्वा परमार्तस्य रोदतः । देवयानी तु संक्रुद्धा सस्मार पितरं तदा ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘अत्यन्त आर्त होकर रोते हुए अपने पुत्र यदुकी यह बात सुनकर देवयानीको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तत्काल अपने पिता शुक्राचार्यजीका स्मरण किया ॥ १५ ॥
इङ्गितं तदभिज्ञाय दुहितुर्भार्गवस्तदा । आगतस्त्वरितं तत्र देवयानी स यत्र सा ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘शुक्राचार्य अपनी पुत्रीकी उस चेष्टाको जानकर तत्काल उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ देवयानी विद्यमान थी ॥१६॥
दृष्ट्वा चाप्रकृतिस्थां तामप्रहृष्टामचेतनाम् । पिता दुहितरं वाक्यं किमेतदिति चाब्रवीत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘बेटीको अस्वस्थ, अप्रसन्न और अचेत-सी देखकर पिताने पूछा—‘वत्से ! यह क्या बात है ?’ ॥ १७ ॥
पृच्छन्तमसकृत् तं वै भार्गवं दीप्ततेजसम् । देवयानी तु संक्रुद्धा पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८ ॥ अहमग्निं विषं तीक्ष्णमपो वा मुनिसत्तम । भक्षयिष्ये प्रवेक्ष्ये वा न तु शक्ष्यामि जीवितुम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘उद्दीप्त तेजवाले पिता भृगुनन्दन शुक्राचार्य जब बारंबार इस प्रकार पूछने लगे, तब देवयानीने अत्यन्त कुपित होकर उनसे कहा—‘मुनिश्रेष्ठ ! मैं प्रज्वलित अग्नि या अगाध जलमें प्रवेश कर जाऊँगी अथवा विष खा लूँगी; किंतु इस प्रकार अपमानित होकर जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ १८-१९ ॥
न मां त्वमवजानीषे दुःखितामवमानिताम् । वृक्षस्यावज्ञया ब्रह्मंश्छिद्यन्ते वृक्षजीविनः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘‘आपको पता नहीं है कि मैं यहाँ कितनी दुखी और अपमानित हूँ । ब्रह्मन् ! वृक्षके प्रति अवहेलना होनेसे उसके आश्रित फूलों और पत्तोंको ही तोड़ा और नष्ट किया जाता है ( इसी तरह आपके प्रति राजाकी अवहेलना होनेसे ही मेरा यहाँ अपमान हो रहा है ) ॥ २० ॥
अवज्ञया च राजर्षिः परिभूय च भार्गव । मय्यवर्णां प्रयुङ्क्ते हि न च मां बहु मन्यते ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘‘भृगुनन्दन ! राजर्षि ययाति आपके प्रति अनादरका भाव रखनेके कारण मेरी भी अवहेलना करते हैं और मुझे अधिक आदर नहीं देते हैं’ ॥ २१ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कोपेनाभिपरीवृतः । व्याहर्तुमुपचक्राम भार्गवो नहुषात्मजम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘देवयानीकी यह बात सुनकर भृगुनन्दन शुक्राचार्यको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने नहुषपुत्र ययातिको लक्ष्य करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २२ ॥
यस्मान्मामवजानीषे नाहुष त्वं दुरात्मवान् । वयसा जरया जीर्णः शैथिल्यमुपयास्यसि ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘‘नहुषकुमार ! तुम दुरात्मा होनेके कारण मेरी अवहेलना करते हो, इसलिये तुम्हारी अवस्था जरा-जीर्ण वृद्धके समान हो जायगी—तुम सर्वथा शिथिल हो जाओगे’ ॥ २३ ॥
एवमुक्त्वा दुहितरं समाश्वास्य स भार्गवः । पुनर्जगाम ब्रह्मर्षिर्भवनं स्वं महायशाः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘राजासे ऐसा कहकर पुत्रीको आश्वासन दे महायशस्वी ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य पुनः अपने घरको चले गये ॥ २४ ॥
स एवमुक्त्वा द्विजपुङ्गवाग्र्यः सुतां समाश्वास्य च देवयानीम् । पुनर्ययौ सूर्यसमानतेजा दत्त्वा च शापं नहुषात्मजाय ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्राह्मणशिरोमणियोंमें अग्रगण्य शुक्राचार्य देवयानीको आश्वासन दे नहुषपुत्र ययातिको ऐसा कहकर उन्हें पूर्वोक्त शाप दे फिर चले गये’ ॥ २५ ॥
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