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उत्तरकाण्ड, सर्ग 36

ततः पितामहं दृष्ट्वा वायुः पुत्रवधार्दितः । शिशुकं तं समादाय उत्तस्थौ धातुरग्रतः ॥ १ ॥

भावार्थ

‘पुत्रके मारे जानेसे वायुदेवता बहुत दुखी थे । ब्रह्माजीको देखकर वे उस शिशुको लिये हुए ही उनके आगे खड़े हो गये ॥ १ ॥

चलकुण्डलमौलिस्रक् तपनीयविभूषणः । पादयोर्न्यपतद् वायुस्त्रिरुपस्थाय वेधसे ॥ २ ॥

भावार्थ

‘उनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे थे, माथेपर मुकुट और कण्ठमें हार शोभा दे रहे थे और वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थे । वायुदेवता तीन बार उपस्थान करके ब्रह्माजीके चरणोंमें गिर पड़े ॥ २ ॥

तं तु वेदविदातेन लम्बाभरणशोभिना । वायुमुत्थाप्य हस्तेन शिशुं तं परिमृष्टवान् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘वेदवेत्ता ब्रह्माजीने अपने लम्बे, फैले हुए और आभरण-भूषित हाथसे वायुदेवताको उठाकर खड़ा किया तथा उनके उस शिशुपर भी हाथ फेरा ॥ ३ ॥

स्पृष्टमात्रस्ततः सोऽथ सलीलं पद्मजन्मना । जलसिक्तं यथा सस्यं पुनर्जीवितमाप्तवान् ॥ ४ ॥ प्राणवन्तमिमं दृष्ट्वा प्राणो गन्धवहो मुदा । चचार सर्वभूतेषु संनिरुद्धं यथा पुरा ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘जैसे पानीसे सींच देनेपर सूखती हुई खेती हरी हो जाती है, उसी प्रकार कमलयोनि ब्रह्माजीके हाथका लीलापूर्वक स्पर्श पाते ही शिशु हनुमान् पुनः जीवित हो गये ॥ ‘हनुमान्को जीवित हुआ देख जगत्के प्राणस्वरूप गन्धवाहन वायुदेव समस्त प्राणियोंके भीतर अवरुद्ध हुए प्राण आदिका पूर्ववत् प्रसन्नतापूर्वक संचार करने लगे ॥ ५ ॥

मरुद्रोधाद् विनिर्मुक्तास्ताः प्रजा मुदिताऽभवन् । शीतवातविनिर्मुक्ताः पद्मिन्य इव साम्बुजाः ॥ ६ ॥

भावार्थ

वायुके अवरोधसे छूटकर सारी प्रजा प्रसन्न हो गयी । ठीक उसी तरह, जैसे हिमयुक्त वायुके आघातसे मुक्त होकर खिले हुए कमलोंसे युक्त पुष्करिणियाँ सुशोभित होने लगती हैं ॥ ६ ॥

तत्स्त्रियुग्मस्त्रिककुत् त्रिधामा त्रिदशार्चितः । उवाच देवता ब्रह्मा मारुतप्रियकाम्यया ॥ ७ ॥

भावार्थ

तदनन्तर तीन युग्मोंसे सम्पन्न, प्रधानतः तीन मूर्ति धारण करनेवाले, त्रिलोकरूपी गृहमें रहनेवाले तथा तीन दशाओंसे युक्त देवताओंद्वारा पूजित ब्रह्माजी वायुदेवताका प्रिय करनेकी इच्छासे देवगणोंसे बोले—॥ ७ ॥

भो महेन्द्राग्निवरुणा महेश्वरधनेश्वराः । जानतामपि वः सर्वं वक्ष्यामि श्रूयतां हितम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘इन्द्र, अग्नि, वरुण, महादेव और कुबेर आदि देवताओ ! यद्यपि आप सब लोग जानते हैं तथापि मैं आपलोगोंके हितकी सारी बातें बताऊँगा, सुनिये ॥ ८ ॥

अनेन शिशुना कार्यं कर्तव्यं वो भविष्यति । तद् दद्ध्वं वरान् सर्वे मारुतस्यास्य तुष्टये ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘इस बालकके द्वारा भविष्यमें आपलोगोंके बहुत-से कार्य सिद्ध होंगे, अतः वायुदेवताकी प्रसन्नताके लिये आप सब लोग इसे वर दें’ ॥ ९ ॥

ततः सहस्रनयनः प्रीतियुक्तः शुभाननः । कुशेशयमयीं मालामुत्क्षेप्येदं वचोऽब्रवीत् ॥ १० ॥

भावार्थ

तब सुन्दर मुखवाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्रने शिशु हनुमान्के गलेमें बड़ी प्रसन्नताके साथ कमलोंकी माला पहना दी और यह बात कही—॥ १० ॥

मत्करोत्सृष्टवज्रेण हनुरस्य यथा हतः । नाम्ना वै कपिशार्दूलो भविता हनुमानिति ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘मेरे हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा इस बालककी हनु ( ठुड्डी ) टूट गयी थी; इसलिये इस कपिश्रेष्ठका नाम ‘हनुमान्’ होगा ॥ ११ ॥

अहमस्य प्रदास्यामि परमं वरमद्भुतम् । इतःप्रभृति वज्रस्य ममावध्यो भविष्यति ॥ १२ ॥ मार्तण्डस्त्वब्रवीत् तत्र भगवांस्तिमिरापहः । तेजसोऽस्य मदीयस्य ददामि शतिकां कलाम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘इसके सिवा मैं इसे दूसरा अद्भुत वर यह देता हूँ कि आजसे यह मेरे वज्रके द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा’ ॥ इसके बाद वहाँ अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यने कहा— ‘मैं इसे अपने तेजका सौवाँ भाग देता हूँ ॥ १३ ॥

यदा च शास्त्राण्यध्येतुं शक्तिरस्य भविष्यति । तदास्य शास्त्रं दास्यामि येन वाग्मी भविष्यति । न चास्य भविता कश्चित् सदृशः शास्त्रदर्शने ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘इसके सिवा जब इसमें शास्त्राध्ययन करनेकी शक्ति आ जायगी, तब मैं ही इसे शास्त्रोंका ज्ञान प्रदान करूँगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा । शास्त्रज्ञानमें कोई भी इसकी समानता करनेवाला न होगा’ ॥ १४ ॥

वरुणश्च वरं प्रादाद्यास्य मृत्युर्भविष्यति । वर्षायुतशतेनापि मत्पाशादुदकादपि ॥ १५ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् वरुणने वर देते हुए कहा—‘दस लाख वर्षोंकी आयु हो जानेपर भी मेरे पाश और जलसे इस बालककी मृत्यु नहीं होगी’ ॥ १५ ॥

यमो दण्डादवध्यत्वमरोगत्वं च दत्तवान् । वरं ददामि संतुष्ट अविषादं च संयुगे ॥ १६ ॥ गदेयं मामिका नैनं संयुगेषु वधिष्यति । इत्येवं धनदः प्राह तदा ह्येकाक्षिपिङ्गलः ॥ १७ ॥

भावार्थ

फिर यमने वर दिया—‘यह मेरे दण्डसे अवध्य और नीरोग होगा ।’ तदनन्तर पिंगलवर्णकी एक आँखवाले कुबेरने कहा—‘मैं संतुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्धमें कभी इसे विषाद न होगा तथा मेरी यह गदा संग्राममें इसका वध न कर सकेगी’ ॥ १६-१७ ॥

मत्तो मदायुधानां च अवध्योऽयं भविष्यति । इत्येवं शंकरेणापि दत्तोऽस्य परमो वरः ॥ १८ ॥

भावार्थ

इसके बाद भगवान् शंकरने यह उत्तम वर दिया कि ‘यह मेरे और मेरे आयुधोंके द्वारा भी अवध्य होगा’ ॥ १८ ॥

विश्वकर्मा च दृष्ट्वैमं बालसूर्योपमं शिशुम् । शिल्पिनां प्रवरः प्रादाद् वरमस्य महामतिः ॥ १९ ॥

भावार्थ

शिल्पियोंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् विश्वकर्माने बालसूर्यके समान अरुण कान्तिवाले उस शिशुको देखकर उसे इस प्रकार वर दिया—॥ १९ ॥

मत्कृतानि च शस्त्राणि यानि दिव्यानि तानि च । तैरवध्यत्वमापन्नश्चिरजीवी भविष्यति ॥ २० ॥

भावार्थ

‘मेरे बनाये हुए जितने दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे अवध्य होकर यह बालक चिरंजीवी होगा’ ॥ २० ॥

दीर्घायुश्च महात्मा च ब्रह्मा तं प्राब्रवीद् वचः । सर्वेषां ब्रह्मदण्डानामवध्योऽयं भविष्यति ॥ २१ ॥

भावार्थ

अन्तमें ब्रह्माजीने उस बालकको लक्ष्य करके कहा— ‘यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकारके ब्रह्मदण्डोंसे अवध्य होगा’ ॥ २१ ॥

ततः सुराणां तु वरैर्हृष्टा ह्येनमलंकृतम् । चतुर्मुखस्तुष्टमना वायुमाह जगद्गुरुः ॥ २२ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् हनुमान्जीको इस प्रकार देवताओंके वरोंसे अलंकृत देख चार मुखोंवाले जगद्गुरु ब्रह्माजीका मन प्रसन्न हो गया और वे वायुदेवसे बोले—॥ २२ ॥

अमित्राणां भयकरो मित्राणामभयंकरः । अजेयो भविता पुत्रस्तव मारुत मारुतिः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘मारुत ! तुम्हारा यह पुत्र मारुति शत्रुओंके लिये भयंकर और मित्रोंके लिये अभयदाता होगा । युद्धमें कोई भी इसे जीत न सकेगा ॥ २३ ॥

कामरूपः कामचारी कामगः प्लवतां वरः । भवत्यव्याहतगतिः कीर्तिमांश्च भविष्यति ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा, जहाँ चाहेगा जा सकेगा । इसकी गति इसकी इच्छाके अनुसार तीव्र या मन्द होगी तथा वह कहीं भी रुक नहीं सकेगी । यह कपिश्रेष्ठ बड़ा यशस्वी होगा ॥ २४ ॥

रावणोत्सादनार्थानि रामप्रीतिकराणि च । रोमहर्षकराण्येव कर्ता कर्माणि संयुगे ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘यह युद्धस्थलमें रावणका संहार और भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताका सम्पादन करनेवाले अनेक अद्भुत एवं रोमाञ्चकारी कर्म करेगा’ ॥ २५ ॥

एवमुक्त्वा तमामन्त्र्य मारुतं त्वमरैः सह । यथागतं ययुः सर्वे पितामहपुरोगमाः ॥ २६ ॥

भावार्थ

इस प्रकार हनुमान्जीको वर देकर वायुदेवताकी अनुमति ले ब्रह्मा आदि सब देवता जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २६ ॥

सोऽपि गन्धवहः पुत्रं प्रगृह्य गृहमानयत् । अञ्जनायास्तमाख्याय वरदत्तं विनिर्गतः ॥ २७ ॥

भावार्थ

गन्धवाहन वायु भी पुत्रको लेकर अञ्जनाके घर आये और उसे देवताओंके दिये हुए वरदानकी बात बताकर चले गये ॥ २७ ॥

प्राप्य राम वगनेष वरदानबलान्वितः । जवेनात्मनि संस्थेन सोऽसौ पूर्ण इवार्णवः ॥ २८ ॥

भावार्थ

श्रीराम ! इस प्रकार ये हनुमान्जी बहुत-से वर पाकर वरदानजनित शक्तिसे सम्पन्न हो गये और अपने भीतर विद्यमान अनुपम वेगसे पूर्ण हो भरे हुए महासागरके समान शोभा पाने लगे ॥ २८ ॥

तरसा पूर्यमाणोऽपि तदा वानरपुङ्गवः । आश्रमेषु महर्षीणामपराध्यति निर्भयः ॥ २९ ॥

भावार्थ

उन दिनों वेगसे भरे हुए ये वानरशिरोमणि हनुमान् निर्भय हो महर्षियोंके आश्रमोंमें जा-जाकर उपद्रव किया करते थे ॥ २९ ॥

स्रुग्भाण्डान्यग्निहोत्राणि वल्कलानां च संचयान् । भग्नविच्छिन्नविध्वस्तान् संशान्तानां करोत्ययम् ॥ ३० ॥

भावार्थ

ये शान्तचित्त महात्माओंके यज्ञोपयोगी पात्र फोड़ डालते, अग्निहोत्रके साधनभूत स्रुक्, स्रुवा आदिको तोड़ डालते और ढेर-के-ढेर रखे गये वल्कलोंको चीर-फाड़ देते थे ॥ ३० ॥

एवंविधानि कर्माणि प्रावर्तत महाबलः । सर्वेषां ब्रह्मदण्डानामवध्यः शम्भुना कृतः ॥ ३१ ॥ जानन्त ऋषयः सर्वे सहन्ते तस्य शक्तितः ।

भावार्थ

महाबली पवनकुमार इस तरहके उपद्रवपूर्ण कार्य करने लगे । कल्याणकारी भगवान् ब्रह्माने इन्हें सब प्रकारके ब्रह्मदण्डोंसे अवध्य कर दिया है—यह बात सभी ऋषि जानते थे; अतः इनकी शक्तिसे विवश हो वे इनके सारे अपराध चुपचाप सह लेते थे ॥ ३१½ ॥

तथा केसरिणा त्वेष वायुना सोऽञ्जनीसुतः ॥ ३२ ॥ प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येव वानरः ।

भावार्थ

यद्यपि केसरी तथा वायुदेवताने भी इन अञ्जनीकुमारको बारंबार मना किया तो भी ये वानरवीर मर्यादाका उल्लङ्घन कर ही देते थे ॥ ३२½ ॥

ततो महर्षयः क्रुद्धा भृग्वङ्गिरसवंशजाः ॥ ३३ ॥ शेपुरेनं रघुश्रेष्ठ नातिक्रुद्धातिमन्यवः । बाधसे यत् समाश्रित्य बलमस्मान् प्लवङ्गम ॥ ३४ ॥ तद् दीर्घकालं वेत्तासि नास्माकं शापमोहितः । यदा ते स्मार्यते कीर्तिस्तदा ते वर्धते बलम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

इससे भृगु और अङ्गिराके वंशमें उत्पन्न हुए महर्षि कुपित हो उठे । रघुश्रेष्ठ ! उन्होंने अपने हृदयमें अधिक खेद पा दुःखको स्थान न देकर इन्हें शाप देते हुए कहा–॥ ‘वानरवीर ! तुम जिस बलका आश्रय लेकर हमें सता रहे हो, उसे हमारे शापसे मोहित होकर तुम दीर्घकालतक भूले रहोगे—तुम्हें अपने बलका पता ही नहीं चलेगा । जब कोई तुम्हें तुम्हारी कीर्तिका स्मरण दिला देगा, तभी तुम्हारा बल बढ़ेगा’ ॥ ३४-३५ ॥

ततस्तु हृततेजौजा महर्षिवचनौजसा । एषोऽऽश्रमाणि तान्येव मृदुभावं गतोऽचरत् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

इस प्रकार महर्षियोंके इस वचनके प्रभावसे इनका तेज और ओज घट गया । फिर ये उन्हीं आश्रमोंमें मृदुल प्रकृतिके होकर विचरने लगे ॥ ३६ ॥

अथर्क्षरजसो नाम वालिसुग्रीवयोः पिता । सर्ववानरराजासीत् तेजसा इव भास्करः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

वाली और सुग्रीवके पिताका नाम ऋक्षरजा था । वे सूर्यके समान तेजस्वी तथा समस्त वानरोंके राजा थे ॥३७॥

स तु राज्यं चिरं कृत्वा वानराणां महेश्वरः । ततस्त्वर्क्षरजा नाम कालधर्मेण योजितः ॥ ३८ ॥ तस्मिन्नस्तमिते चाथ मन्त्रिभिर्मन्त्रकोविदैः । पित्र्ये पदे कृतो वाली सुग्रीवो वालिनः पदे ॥ ३९ ॥

भावार्थ

वे वानरराज ऋक्षरजा चिरकालतक वानरोंके राज्यका शासन करके अन्तमें कालधर्म ( मृत्यु ) को प्राप्त हुए ॥ उनका देहावसान हो जानेपर मन्त्रवेत्ता मन्त्रियोंने पिताके स्थानपर वालीको राजा और वालीके स्थानपर सुग्रीवको युवराज बनाया ॥ ३९ ॥

सुग्रीवेण समं त्वस्य अद्वैधं छिद्रवर्जितम् । आबाल्यं सख्यमभवदनिलस्याग्निना यथा ॥ ४० ॥

भावार्थ

जैसे अग्निके साथ वायुकी स्वाभाविक मित्रता है, उसी प्रकार सुग्रीवके साथ वालीका बचपनसे ही सख्यभाव था । उन दोनोंमें परस्पर किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था । उनमें अटूट प्रेम था ॥ ४० ॥

एष शापवशादेव न वेद बलमात्मनः । वालिसुग्रीवयोर्वैरं यदा राम समुत्थितम् ॥ ४१ ॥ न ह्येष राम सुग्रीवो भ्राम्यमाणोऽपि वालिना । देव जानाति न ह्येष बलमात्मनि मारुतिः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

श्रीराम ! फिर जब वाली और सुग्रीवमें वैर उठ खड़ा हुआ, उस समय ये हनुमान्जी शापवश ही अपने बलको न जान सके । देव ! वालीके भयसे भटकते रहनेपर भी न तो इन सुग्रीवको इनके बलका स्मरण हुआ और न स्वयं ये पवनकुमार ही अपने बलका पता पा सके ॥ ४१-४२ ॥

ऋषिशापाहतबलस्तदैव कपिसत्तमः । सिंहः कुञ्जररुद्धो वा आस्थितः सहितो रणे ॥ ४३ ॥ पराक्रमोत्साहमतिप्रताप- सौशील्यमाधुर्यनयानयैश्च । गाम्भीर्यचातुर्यसुवीर्यधैर्यै- र्हनूमतः कोऽप्यधिकोऽस्ति लोके ॥ ४४ ॥

भावार्थ

सुग्रीवके ऊपर जब वह विपत्ति आयी थी, उन दिनों ऋषियोंके शापके कारण इनको अपने बलका ज्ञान भूल गया था, इसीलिये जैसे कोई सिंह हाथीके द्वारा अवरुद्ध होकर चुपचाप खड़ा रहे, उसी प्रकार ये वाली और सुग्रीवके युद्धमें चुपचाप खड़े-खड़े तमाशा देखते रहे, कुछ कर न सके ॥ संसारमें ऐसा कौन है जो पराक्रम, उत्साह, बुद्धि, प्रताप, सुशीलता, मधुरता, नीति-अनीतिके विवेक, गम्भीरता, चतुरता, उत्तम बल और धैर्यमें हनुमान्जीसे बढ़कर हो ॥४४॥

असौ पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन् सूर्योन्मुखः प्रष्टुमनाः कपीन्द्रः । उद्यद्गिरेरस्तगिरिं जगाम ग्रन्थं महद्धारयनप्रमेयः ॥ ४५ ॥

भावार्थ

ये असीम शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान् व्याकरणका अध्ययन करनेके लिये शङ्काएँ पूछनेकी इच्छासे सूर्यकी ओर मुँह रखकर महान् ग्रन्थ धारण किये उनके आगे-आगे उदयाचलसे अस्ताचलतक जाते थे ॥ ४५ ॥

ससूत्रवृत्त्यर्थपदं महार्थं ससंग्रहं सिद्ध्यति वै कपीन्द्रः । नह्यस्य कश्चित् सदृशोऽस्ति शास्त्रे वैशारदे छन्दगतौ तथैव ॥ ४६ ॥

भावार्थ

इन्होंने सूत्र, वृत्ति, वार्तिक, महाभाष्य और संग्रह—इन सबका अच्छी तरह अध्ययन किया है । अन्यान्य शास्त्रोंके ज्ञान तथा छन्दःशास्त्रके अध्ययनमें भी इनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई विद्वान् नहीं है ॥ ४६ ॥

सर्वासु विद्यासु तपोविधाने प्रस्पर्धतेऽयं हि गुरुं सुराणाम् । सोऽयं नवव्याकरणार्थवेत्ता ब्रह्मा भविष्यत्यपि ते प्रसादात् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञान तथा तपस्याके अनुष्ठानमें ये देवगुरु बृहस्पतिकी बराबरी करते हैं । नव व्याकरणोंके सिद्धान्तको जाननेवाले ये हनुमान्जी आपकी कृपासे साक्षात् ब्रह्माके समान आदरणीय होंगे ॥ ४७ ॥

प्रवीविविक्षोरिव सागरस्य लोकान् दिधक्षोरिव पावकस्य । लोकक्षयेष्वेव यथान्तकस्य हनूमतः स्थास्यति कः पुरस्तात् ॥ ४८ ॥

भावार्थ

प्रलयकालमें भूतलको आप्लावित करनेके लिये भूमिके भीतर प्रवेश करनेकी इच्छावाले महासागर, सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध कर डालनेके लिये उद्यत हुए संवर्तक अग्नि तथा लोकसंहारके लिये उठे हुए कालके समान प्रभावशाली इन हनुमान्जीके सामने कौन ठहर सकेगा ॥ ४८ ॥

एषेव चान्ये च महाकपीन्द्राः सुग्रीवमैन्दद्विविदाः सनीलाः । सतारतारेयनलाः सरम्भा- स्त्वत्कारणाद् राम सुरैर्हि सृष्टाः ॥ ४९ ॥

भावार्थ

श्रीराम ! वास्तवमें ये तथा इन्हींके समान दूसरे-दूसरे जो सुग्रीव, मैन्द, द्विविद, नील, तार, तारेय ( अङ्गद ), नल तथा रम्भ आदि महाकपीश्वर हैं; इन सबकी सृष्टि देवताओंने आपकी सहायताके लिये ही की है ॥ ४९ ॥

गजो गवाक्षो गवयः सुदंष्ट्रो मैन्दः प्रभो ज्योतिमुखो नलश्च । एते च ऋक्षाः सह वानरेन्द्रै- स्त्वत्कारणाद् राम सुरैर्हि सृष्टाः ॥ ५० ॥

भावार्थ

श्रीराम ! गज, गवाक्ष, गवय, सुदंष्ट्र, मैन्द, प्रभ, ज्योतिमुख और नल—इन सब वानरेश्वरों तथा रीछोंकी सृष्टि देवताओंने आपके सहयोगके लिये ही की है ॥ ५० ॥

तदेतत् कथितं सर्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । हनूमतो बालभावे कर्मैतत् कथितं मया ॥ ५१ ॥

भावार्थ

रघुनन्दन ! आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया । हनुमान्जीकी बाल्यावस्थाके इस चरित्रका भी वर्णन कर दिया ॥ ५१ ॥

श्रुत्वागस्त्यस्य कथितं रामः सौमित्रिरेव च। विस्मयं परमं जग्मुर्वानरा राक्षसैः सह ॥ ५२॥

भावार्थ

अगस्त्यजीका यह कथन सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण बड़े विस्मित हुए। वानरों और राक्षसोंको भी बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ५२ ॥

अगस्त्यस्त्वब्रवीद् रामं सर्वमेतच्छ्रुतं त्वया। दृष्टः सम्भाषितश्चासि राम गच्छामहे वयम् ॥ ५३॥

भावार्थ

तत्पश्चात् अगस्त्यजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘योगियों-के हृदयमें रमण करनेवाले श्रीराम ! आप यह सारा प्रसङ्ग सुन चुके। हमलोगोंने आपका दर्शन और आपके साथ वार्तालाप कर लिया। इसलिये अब हम जा रहे हैं’ ॥ ५३ ॥

श्रुत्वैतद् राघवो वाक्यमगस्त्यस्योग्रतेजसः। प्राञ्जलिः प्रणतश्चापि महर्षिमिदमब्रवीत् ॥ ५४॥

भावार्थ

उग्र तेजस्वी अगस्त्यजीकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़ विनयपूर्वक उन महर्षिसे इस प्रकार कहा—॥५४॥

अद्य मे देवतास्तुष्टाः पितरः प्रपितामहाः। युष्माकं दर्शनादेव नित्यं तुष्टाः सबान्धवाः ॥ ५५॥

भावार्थ

‘मुनीश्वर ! आज मुझपर देवता, पितर और पितामह आदि विशेषरूपसे संतुष्ट हैं। बन्धु-बान्धवोंसहित हमलोगोंको तो आप-जैसे महात्माओंके दर्शनसे ही सदा संतोष है ॥ ५५ ॥

विज्ञाप्यं तु ममैतद्धि यद् वदाम्यागतस्पृहः। तद् भवद्भिर्मम कृते कर्तव्यमनुकम्पया ॥ ५६॥

भावार्थ

‘मेरे मनमें एक इच्छाका उदय हुआ है, अतः मैं यह सूचित करने योग्य बात आपकी सेवामें निवेदन कर रहा हूँ। मुझपर अनुग्रह करके आपलोगोंको मेरे उस अभीष्ट कार्यको पूरा करना होगा ॥ ५६ ॥

पौरजानपदान् स्थाप्य स्वकार्येष्वहमागतः। क्रतूनहं करिष्यामि प्रभावाद् भवतां सताम् ॥ ५७॥

भावार्थ

‘मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियोंको अपने-अपने कार्योंमें लगाकर मैं आप सत्पुरुषोंके प्रभावसे यज्ञोंका अनुष्ठान करूँ ॥ ५७ ॥

सदस्या मम यज्ञेषु भवन्तो नित्यमेव तु। भविष्यथ महावीर्या ममानुग्रहकाङ्क्षिणः ॥ ५८॥

भावार्थ

‘मेरे उन यज्ञोंमें आप महान् शक्तिशाली महात्मा मुझपर अनुग्रह करनेके लिये नित्य सदस्य बने रहें ॥ ५८ ॥

अहं युष्मान् समाश्रित्य तपोनिर्धूतकल्मषान्। अनुगृहीतः पितृभिर्भविष्यामि सुनिर्वृतः ॥ ५९॥ तदागन्तव्यमनिशं भवद्भिरिह संगतैः। अगस्त्याद्यास्तु तच्छ्रुत्वा ऋषयः संशितव्रताः ॥ ६०॥ एवमस्त्विति तं प्रोच्य प्रयातुमुपचक्रमुः। एवमुक्त्वा गताः सर्वे ऋषयस्ते यथागतम् ॥ ६१॥ राघवश्च तमेवार्थं चिन्तयामास विस्मितः। ततोऽस्तं भास्करे याते विसृज्य नृपवानरान् ॥ ६२॥ संध्यामुपास्य विधिवत् तदा नरवरोत्तमः। प्रवृत्तायां रजन्यां तु सोऽन्तःपुरचरोऽभवत् ॥ ६३॥

भावार्थ

‘आप तपस्यासे निष्पाप हो चुके हैं। मैं आपलोगोंका आश्रय लेकर सदा संतुष्ट एवं पितरोंसे अनुगृहीत होऊँगा ॥ ‘यज्ञ-आरम्भके समय सब लोग एकत्र होकर निरन्तर यहाँ आते रहें।’ श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले अगस्त्य आदि महर्षि उनसे ‘एवमस्तु ( ऐसा ही होगा )’ कहकर वहाँसे जानेको उद्यत हुए ॥६०॥॥ इस प्रकार बातचीत करके सब ऋषि जैसे आये थे, वैसे चले गये। इधर श्रीरामचन्द्रजी विस्मित होकर उन्हीं बातोंपर विचार करते रहे ॥ ६१॥ ॥ तदनन्तर सूर्यास्त होनेपर राजाओं और वानरोंको विदा करके नरेशोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक संध्योपासना की और रात होनेपर वे अन्तःपुरमें पधारे ॥ ६२-६३ ॥

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