उत्तरकाण्ड, सर्ग 35
अपृच्छत तदा रामो दक्षिणाशाश्रयं मुनिम् । प्राञ्जलिर्विनयोपेत इदमाह वचोऽर्थवत् ॥ १ ॥
भावार्थ
तब भगवान् श्रीरामने हाथ जोड़कर दक्षिण दिशामें निवास करनेवाले अगस्त्य मुनिसे विनयपूर्वक यह अर्थयुक्त बात कही--॥ १ ॥
अतुलं बलमेतद् वै वालिनो रावणस्य च । न त्वेताभ्यां हनुमता समं त्विति मतिर्मम ॥ २ ॥
भावार्थ
‘महर्षे ! इसमें संदेह नहीं कि वाली और रावणके इस बलकी कहीं तुलना नहीं थी; परंतु मेरा ऐसा विचार है कि इन दोनोंका बल भी हनुमान्जीके बलकी बराबरी नहीं कर सकता था ॥ २ ॥
शौर्यं दाक्ष्यं बलं धैर्यं प्राज्ञता नयसाधनम् । विक्रमश्च प्रभावश्च हनूमति कृतालयाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव--इन सभी सद्गुणोंने हनुमान्जीके भीतर घर कर रक्खा है ॥ ३ ॥
दृष्ट्वैव सागरं वीक्ष्य सीदन्तीं कपिवाहिनीम् । समाश्वास्य महाबाहुर्योजनानां शतं प्लुतः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘समुद्रको देखते ही वानर-सेना घबरा उठी है--यह देख ये महाबाहु वीर उसे धैर्य बँधाकर एक ही छलाँगमें सौ योजन समुद्रको लाँघ गये ॥ ४ ॥
धर्षयित्वा पुरीं लङ्कां रावणान्तःपुरं तदा । दृष्टा सम्भाषिता चापि सीता ह्याश्वासिता तथा ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘फिर लङ्कापुरीके आधिदैविक रूपको परास्त कर रावणके अन्तःपुरमें गये, सीताजीसे मिले, उनसे बातचीत की और उन्हें धैर्य बँधाया ॥ ५ ॥
सेनाग्रगा मन्त्रिसुताः किंकरा रावणात्मजः । एते हनुमता तत्र एकेन विनिपातिताः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘वहाँ अशोकवनमें इन्होंने अकेले ही रावणके सेनापतियों, मन्त्रिकुमारों, किंकरों तथा रावणपुत्र अक्षको मार गिराया ॥ ६ ॥
भूयो बन्धाद् विमुक्तेन भाषयित्वा दशाननम् । लङ्का भस्मीकृता येन पावकेनेव मेदिनी ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘फिर ये मेघनादके नागपाशसे बँधे और स्वयं ही मुक्त हो गये । तत्पश्चात् इन्होंने रावणसे वार्तालाप किया । जैसे प्रलयकालकी आगने यह सारी पृथ्वी जलायी थी, उसी प्रकार लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ७ ॥
न कालस्य न शक्रस्य न विष्णोर्वित्तपस्य च । कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘युद्धमें हनुमान्जीके जो पराक्रम देखे गये हैं, वैसे वीरतापूर्ण कर्म न तो कालके, न इन्द्रके, न भगवान् विष्णुके और न वरुणके ही सुने जाते हैं ॥ ८ ॥
एतस्य बाहुवीर्येण लङ्का सीता च लक्ष्मणः । प्राप्ता मया जयश्चैव राज्यं मित्राणि बान्धवाः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘मुनीश्वर ! मैंने तो इन्हींके बाहु-बलसे विभीषणके लिये लङ्का, शत्रुओंपर विजय, अयोध्याका राज्य तथा सीता, लक्ष्मण, मित्र और बन्धुजनोंको प्राप्त किया है ॥ ९ ॥
हनूमान् यदि मे न स्याद् वानराधिपतेः सखा । प्रवृत्तिमपि कोवेत्तुं जानक्याः शक्तिमान् भवेत् ॥ १० ॥ किमर्थं वाली चैतेन सुग्रीवप्रियकाम्यया । तदा वैरे समुत्पन्ने न दग्धो वीरुधो यथा ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘यदि मुझे वानरराज सुग्रीवके सखा हनुमान् न मिलते तो जानकीका पता लगानेमें भी कौन समर्थ हो सकता था ? ॥ ‘जिस समय वाली और सुग्रीवमें विरोध हुआ, उस समय सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये इन्होंने जैसे दावानल वृक्षको जला देता है, उसी प्रकार वालीको क्यों नहीं भस्म कर डाला ? यह समझमें नहीं आता ॥ ११ ॥
नहि वेदितवान् मन्ये हनूमानात्मनो बलम् । यद् दृष्टवाञ्जीवितेष्टं क्लिश्यन्तं वानराधिपम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘मैं तो ऐसा मानता हूँ कि उस समय हनुमान्जीको अपने बलका पता ही नहीं था । इसीसे ये अपने प्राणोंसे भी प्रिय वानरराज सुग्रीवको कष्ट उठाते देखते रहे ॥ १२ ॥
एतन्मे भगवन् सर्वं हनूमति महामुने । विस्तरेण यथातत्त्वं कथयामरपूजित ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘देववन्द्य महामुने ! भगवन् ! आप हनुमान्जीके विषयमें ये सब बातें यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बताइये’ ॥ १३ ॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा हेतुयुक्तमृषिस्ततः । हनूमतः समक्षं तमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥ सत्यमेतद् रघुश्रेष्ठ यद् ब्रवीषि हनूमति । न बले विद्यते तुल्यो न गतौ न मतौ परः ॥ १५ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके ये युक्तियुक्त वचन सुनकर महर्षि अगस्त्यजी हनुमान्जीके सामने ही उनसे इस प्रकार बोले—॥ ‘रघुकुलतिलक श्रीराम ! हनुमान्जीके विषयमें आप जो कुछ कहते हैं, यह सब सत्य ही है । बल, बुद्धि और गतिमें इनकी बराबरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥ १५ ॥
अमोघशापैः शापस्तु दत्तोऽस्य मुनिभिः पुरा । न वेत्ता हि बलं सर्वं बली सन्नरिमर्दन ॥ १६ ॥ बाल्येऽप्येतेन यत् कर्म कृतं राम महाबल । तन्न वर्णयितुं शक्यमिति बाल्यतयास्यते ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘शत्रुसूदन रघुनन्दन ! जिनका शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता, ऐसे मुनियोंने पूर्वकालमें इन्हें यह शाप दे दिया था कि बल रहनेपर भी इनको अपने पूरे बलका पता नहीं रहेगा ॥ ‘महाबली श्रीराम ! इन्होंने बचपनमें भी जो महान् कर्म किया था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । उन दिनों ये बालभावसे—अनजानकी तरह रहते थे ॥ १७ ॥
यदि वास्ति त्वभिप्रायः संश्रोतुं तव राघव । समाधाय मतिं राम निशामय वदाम्यहम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! यदि हनुमान्जीका चरित्र सुननेके लिये आपकी हार्दिक इच्छा हो तो चित्तको एकाग्र करके सुनिये । मैं सारी बातें बता रहा हूँ ॥ १८ ॥
सूर्यदत्तवरस्वर्णः सुमेरुर्नाम पर्वतः । यत्र राज्यं प्रशास्त्यस्य केसरी नाम वै पिता ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘भगवान् सूर्यके वरदानसे जिसका स्वरूप सुवर्णमय हो गया है, ऐसा एक सुमेरु नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ हनुमान्जीके पिता केसरी राज्य करते हैं ॥ १९ ॥
तस्य भार्या बभूवेष्टा अञ्जनेति परिश्रुता । जनयामास तस्यां वै वायुरात्मजमुत्तमम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘उनकी अञ्जना नामसे विख्यात प्रियतमा पत्नी थी । उसके गर्भसे वायुदेवने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया ॥२०॥
शालिशूकनिभाभासं प्रासूतेमं तदाञ्जना । फलान्याहर्तुकामा वै निष्क्रान्ता गहने वरा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘अञ्जनाने जब इनको जन्म दिया, उस समय इनकी अङ्गकान्ति जाड़ेमें पैदा होनेवाले धानके अग्रभागकी भाँति पिंगल वर्णकी थी । एक दिन माता अञ्जना फल लानेके लिये आश्रमसे निकली और गहन वनमें चली गयी ॥ २१ ॥
एष मातुर्वियोगाच्च क्षुधया च भृशार्दितः । रुरोद शिशुरत्यर्थं शिशुः शरवणे यथा ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘उस समय मातासे बिछुड़ जाने और भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण शिशु हनुमान् उसी तरह जोर-जोरसे रोने लगे, जैसे पूर्वकालमें सरकंडोंके वनके भीतर कुमार कार्तिकेय रोये थे ॥ २२ ॥
तदोद्यन्तं विवस्वन्तं जपापुष्पोत्करोपमम् । ददर्श फललोभाच्च ह्युत्पपात रविं प्रति ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘इतनेहीमें इन्हें जपाकुसुमके समान लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखायी दिये । हनुमान्जीने उन्हें कोई फल समझा और ये उस फलके लोभसे सूर्यकी ओर उछले ॥२३॥
बालार्काभिमुखो बालो बालार्क इव मूर्तिमान् । ग्रहीतुकामो बालार्कं प्लवतेऽम्बरमध्यगः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘बालसूर्यकी ओर मुँह किये मूर्तिमान् बालसूर्यके समान बालक हनुमान् बालसूर्यको पकड़नेकी इच्छासे आकाशमें उड़ते चले जा रहे थे ॥ २४ ॥
एतस्मिन् प्लवमाने तु शिशुभावे हनूमति । देवदानवयक्षाणां विस्मयः सुमहानभूत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘शैशवावस्थामें हनुमान्जी जब इस तरह उड़ रहे थे, उस समय उन्हें देखकर देवताओं, दानवों तथा यक्षोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २५ ॥
नाप्येवं वेगवान् वायुर्गरुडो न मनस्तथा । यथायं वायुपुत्रस्तु क्रमतेऽम्बरमुत्तमम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘वे सोचने लगे—‘यह वायुका पुत्र जिस प्रकार ऊँचे आकाशमें वेगपूर्वक उड़ रहा है, ऐसा वेग न तो वायुमें है, न गरुड़में है और न मनमें ही है ॥ २६ ॥
यदि तावच्छिशोरस्य ईदृशो गतिविक्रमः । यौवनं बलमासाद्य कथं वेगो भविष्यति ॥ २७ ॥ तमनुप्लवते वायुः प्लवन्तं पुत्रमात्मनः । सूर्यदाहभयाद् रक्षंस्तुषारचयशीतलः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘यदि बाल्यावस्थामें ही इस शिशुका ऐसा वेग और पराक्रम है तो यौवनका बल पाकर इसका वेग कैसा होगा’ ॥ ‘अपने पुत्रको सूर्यकी ओर जाते देख उसे दाहके भयसे बचानेके लिये उस समय वायुदेव भी बर्फके ढेरकी भाँति शीतल होकर उसके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ २८ ॥
बहुयोजनसाहस्रं क्रामन्नेव गतोऽम्बरम् । पितुर्बलाच्च बाल्याच्च भास्कराभ्याशमागतः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार बालक हनुमान् अपने और पिताके बलसे कई सहस्र योजन आकाशको लाँघते चले गये और सूर्यदेवके समीप पहुँच गये ॥ २९ ॥
शिशुरेष त्वदोषज्ञ इति मत्वा दिवाकरः । कार्यं चास्मिन् समायत्तमित्येवं न ददाह सः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘सूर्यदेवने यह सोचकर कि अभी यह बालक है, इसे गुण-दोषका ज्ञान नहीं है और इसके अधीन देवताओंका भी बहुत-सा भावी कार्य है—इन्हें जलाया नहीं ॥ ३० ॥
यमेव दिवसं ह्येष ग्रहीतुं भास्करं प्लुतः । तमेव दिवसं राहुर्जिघृक्षति दिवाकरम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘जिस दिन हनुमान्जी सूर्यदेवको पकड़नेके लिये उछले थे, उसी दिन राहु सूर्यदेवपर ग्रहण लगाना चाहता था ॥३१॥
अनेन च परामृष्टो राहुः सूर्यरथोपरि । अपक्रान्तस्ततस्त्रस्तो राहुश्चन्द्रार्कमर्दनः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘हनुमान्जीने सूर्यके रथके ऊपरी भागमें जब राहुका स्पर्श किया, तब चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन करनेवाला राहु भयभीत हो वहाँसे भाग खड़ा हुआ ॥ ३२ ॥
इन्द्रस्य भवनं गत्वा सरोषः सिंहिकासुतः । अब्रवीद् भ्रुकुटिं कृत्वा देवं देवगणैर्वृतम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘सिंहिकाका वह पुत्र रोषसे भरकर इन्द्रके भवनमें गया और देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके सामने भौंहें टेढ़ी करके बोला—॥ ३३ ॥
बुभुक्षापनयं दत्त्वा चन्द्रार्कौ मम वासव । किमिदं तन् त्वया दत्तमन्यस्य बलवृत्रहन् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले वासव ! आपने चन्द्रमा और सूर्यको मुझे अपनी भूख दूर करनेके साधनके रूपमें दिया थाः किंतु अब आपने उन्हें दूसरेके हवाले कर दिया है । ऐसा क्यों हुआ ? ॥ ३४ ॥
अद्याहं पर्वकाले तु जिघृक्षुः सूर्यमागतः । अथान्यो राहुरासाद्य जग्राह सहसा रविम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘आज पर्व ( अमावास्या ) के समय मैं सूर्यदेवको ग्रस्त करनेकी इच्छासे गया था । इतनेहीमें दूसरे राहुने आकर सहसा सूर्यको पकड़ लिया’ ॥ ३५ ॥
स राहोर्वचनं श्रुत्वा वासवः सम्भ्रमान्वितः । उत्पपातासनं हित्वा उद्वहन् काञ्चनीं स्रजम् ॥ ३६ ॥ ततः कैलासकूटाभं चतुर्दन्तं मदस्रवम् । शृङ्गारधारिणं प्रांशुं स्वर्णघण्टाट्टहासिनम् ॥ ३७ ॥ इन्द्रः करीन्द्रमारुह्य राहुं कृत्वा पुरःसरम् । प्रायाद् यत्राभवत् सूर्यः सहानेन हनूमता ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘राहुकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र घबरा गये और सोनेकी माला पहने अपना सिंहासन छोड़कर उठ खड़े हुए ॥ ‘फिर कैलास-शिखरके समान उज्ज्वल, चार दाँतोंसे विभूषित, मदकी धारा बहानेवाले, भाँति-भाँतिके शृङ्गारसे युक्त, बहुत ही ऊँचे और सुवर्णमयी घण्टाके नादरूप अट्टहास करनेवाले गजराज ऐरावतपर आरूढ़ हो देवराज इन्द्र राहुको आगे करके उस स्थानपर गये, जहाँ हनुमान्जीके साथ सूर्यदेव विराजमान थे ॥ ३७-३८ ॥
अथातिरभसेनागाद् राहुरुत्सृज्य वासवम् । अनेन च स वै दृष्टः प्रधावञ्शैलकूटवत् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘इधर राहु इन्द्रको छोड़कर बड़े वेगसे आगे बढ़ गया । इसी समय पर्वत-शिखरके समान आकारवाले दौड़ते हुए राहुको हनुमान्जीने देखा ॥ ३९ ॥
ततः सूर्यं समुत्सृज्य राहुं फलमवेक्ष्य च । उत्पपात पुनर्व्योम ग्रहीतुं सिंहिकासुतम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘तब राहुको ही फलके रूपमें देखकर बालक हनुमान् सूर्यदेवको छोड़ उस सिंहिकापुत्रको ही पकड़नेके लिये पुनः आकाशमें उछले ॥ ४० ॥
उत्सृज्यार्कमिमं राम प्रधावन्तं प्लवङ्गमम् । अवेक्ष्यैवं परावृत्तो मुखशेषः पराङ्मुखः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! सूर्यको छोड़कर अपनी ओर धावा करनेवाले इन वानर हनुमान्को देखते ही राहु जिसका मुखमात्र ही शेष था, पीछेकी ओर मुड़कर भागा ॥ ४१ ॥
इन्द्रमाशंसमानस्तु त्रातारं सिंहिकासुतः । इन्द्र इन्द्रेति संत्रासान्मुहुर्मुहुरभाषत ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘उस समय सिंहिकापुत्र राहु अपने रक्षक इन्द्रसे ही अपनी रक्षाके लिये कहता हुआ भयके मारे बारंबार ‘इन्द्र ! इन्द्र !’ की पुकार मचाने लगा ॥ ४२ ॥
राहोर्विक्रोशमानस्य प्रागेवालक्षितं स्वरम् । श्रुत्वेन्द्रोवाच मा भैषीरहमेनं निषूदये ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘चीखते हुए राहुके स्वरको जो पहलेका पहचाना हुआ था, सुनकर इन्द्र बोले—‘डरो मत। मैं इस आक्रमणकारीको मार डालूँगा’ ॥ ४३ ॥
ऐरावतं ततो दृष्ट्वा महत्तदिदमित्यपि । फलं तं हस्तिगजानमभिदुद्राव मारुतिः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् ऐरावतको देखकर इन्होंने उसे भी एक विशाल फल समझा और उस गजराजको पकड़नेके लिये ये उसकी ओर दौड़े ॥ ४४ ॥
तथास्य धावतो रूपमैरावतजिघृक्षया । मुहूर्तमभवद् घोरमिन्द्राग्न्योरिव भास्वरम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘ऐरावतको पकड़नेकी इच्छासे दौड़ते हुए हनुमान्जीका रूप दो घड़ीके लिये इन्द्र और अग्निके समान प्रकाशमान एवं भयंकर हो गया ॥ ४५ ॥
एवमाधावमानं तु नातिक्रुद्धः शचीपतिः । हस्तान्तादतिमुक्तेन कुलिशेनाभ्यताडयत् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘बालक हनुमान्को देखकर शचीपति इन्द्रको अधिक क्रोध नहीं हुआ । फिर भी इस प्रकार धावा करते हुए इन बालक वानरपर उन्होंने अपने हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा प्रहार किया ॥ ४६ ॥
ततो गिरौ पपातैष इन्द्रवज्राभिताडितः । पतमानस्य चैतस्य वामा हनुरभज्यत ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर ये एक पहाड़पर गिरे। वहाँ गिरते समय इनकी बायीं ठुड्डी टूट गयी ॥ ४७ ॥
तस्मिंस्तु पतिते चापि वज्रताडनविह्वले । चुक्रोधेन्द्राय पवनः प्रजानामहिताय सः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘वज्रके आघातसे व्याकुल होकर इनके गिरते ही वायुदेव इन्द्रपर कुपित हो उठे । उनका यह क्रोध प्रजाजनोंके लिये अहितकारक हुआ ॥ ४८ ॥
प्रचारं स तु संगृह्य प्रजास्वन्तर्गतः प्रभुः । गुहां प्रविष्टः स्वसुतं शिशुमादाय मारुतः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘सामर्थ्यशाली मारुतने समस्त प्रजाके भीतर रहकर भी वहाँ अपनी गति समेट ली—श्वास आदिके रूपमें संचार रोक दिया और अपने शिशुपुत्र हनुमान्को लेकर वे पर्वतकी गुफामें घुस गये ॥ ४९ ॥
विण्मूत्राशयमावृत्य प्रजानां परमार्तिकृत् । रुरोध सर्वभूतानि यथा वर्षाणि वासवः ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘जैसे इन्द्र वर्षा रोक देते हैं, उसी प्रकार वे वायुदेव प्रजाजनोंके मलाशय और मूत्राशयको रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा देने लगे । उन्होंने सम्पूर्ण भूतोंके प्राण-संचारका अवरोध कर दिया ॥ ५० ॥
वायुप्रकोपाद् भूतानि निरुच्छ्वासानि सर्वतः । संधिभिर्भिद्यमानैश्च काष्ठभूतानि जज्ञिरे ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘वायुके प्रकोपसे समस्त प्राणियोंकी साँस बंद होने लगी । उनके सभी अङ्गोंके जोड़ टूटने लगे और वे सब-के-सब काठके समान चेष्टाशून्य हो गये ॥ ५१ ॥
निःस्वाध्यायवषट्कारं निष्क्रियं धर्मवर्जितम् । वायुप्रकोपात् त्रैलोक्यं निरयस्थमिवाभवत् ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘तीनों लोकोंमें न कहीं वेदोंका स्वाध्याय होता था और न यज्ञ । सारे धर्म-कर्म बंद हो गये । त्रिभुवनके प्राणी ऐसे कष्ट पाने लगे, मानो नरकमें गिर गये हों ॥ ५२ ॥
ततः प्रजाः सगन्धर्वाः सदेवासुरमानुषाः । प्रजापतिं समाधावन् दुःखिताश्च सुखेच्छया ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘तब गन्धर्व, देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्रजा व्यथित हो सुख पानेकी इच्छासे प्रजापति ब्रह्माजीके पास दौड़ी गयी ॥ ५३ ॥
ऊचुः प्राञ्जलयो देवा महोदरनिभोदराः । त्वया तु भगवन् सृष्टाः प्रजा नाथ चतुर्विधाः ॥ ५४ ॥ त्वया दत्तोऽयमस्माकमायुषः पवनः पतिः । सोऽस्मान् प्राणेश्वरो भूत्वा कस्मादेषोऽद्य सत्तम॥ ५५॥ रुरोध दुःखं जनयन्नन्तःपुर इव स्त्रियः । तस्मात् त्वां शरणं प्राप्ता वायुनोपहता वयम् ॥ ५६ ॥ वायुसंरोधजं दुःखमिदं नो नुद दुःखहन् । एतत् प्रजानां श्रुत्वा तु प्रजानाथः प्रजापतिः ॥ ५७ ॥ कारणादिति चोक्त्वासौ प्रजाः पुनरभाषत । यस्मिंश्च कारणे वायुश्चुक्रोध च रुरोध च ॥ ५८ ॥ प्रजाः शृणुध्वं तत् सर्वं श्रोतव्यं चात्मनः क्षमम् ।
भावार्थ
‘उस समय देवताओंके पेट इस तरह फूल गये थे, मानो उन्हें महोदरका रोग हो गया हो। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन् ! स्वामिन् ! आपने चार प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि की है । आपने हम सबको हमारी आयुके अधिपतिके रूपमें वायुदेवको अर्पित किया है । साधुशिरोमणे ! ये पवन-देव हमारे प्राणोंके ईश्वर हैं तो भी क्या कारण है कि आज इन्होंने अन्तःपुरमें स्त्रियोंकी भाँति हमारे शरीरके भीतर अपने संचारको रोक दिया है और इस प्रकार ये हमारे लिये दुःखजनक हो गये हैं ॥ ५४-५५॥ ॥ ‘वायुसे पीड़ित होकर आज हमलोग आपकी शरणमें आये हैं । दुःखहारी प्रजापते ! आप हमारे इस वायुरोधजनित दुःखको दूर कीजिये’ ॥ ५६॥ ॥ ‘प्रजाजनोंकी यह बात सुनकर उनके पालक और रक्षक ब्रह्माजीने कहा—‘इसमें कुछ कारण है’ ऐसा कहकर वे प्रजाजनोंसे फिर बोले—॥ ५७॥ ॥ ‘प्रजाओ! जिस कारणको लेकर वायुदेवताने क्रोध और अपनी गतिका अवरोध किया है, उसे बताता हूँ, सुनो । वह कारण तुम्हारे सुनने योग्य और उचित है ॥ ५८½ ॥
पुत्रस्तस्यामरेशेन इन्द्रेणाद्य निपातितः ॥ ५९ ॥ राहोर्वचनमास्थाय ततः स कुपितोऽनिलः ।
भावार्थ
‘आज देवराज इन्द्रने राहुकी बात सुनकर वायुके पुत्रको मार गिराया है, इसीलिये वे कुपित हो उठे हैं ॥५९½ ॥
अशरीरः शरीरेषु वायुश्चरति पालयन् ॥ ६० ॥ शरीरं हि विना वायुं समतां याति दारुभिः ।
भावार्थ
‘वायुदेव स्वयं शरीर धारण न करके समस्त शरीरोंमें उनकी रक्षा करते हुए विचरते हैं । वायुके बिना यह शरीर सूखे काठके समान हो जाता है ॥ ६०½ ॥
वायुः प्राणः सुखं वायुर्वायुः सर्वमिदं जगत् ॥ ६१ ॥ वायुना सम्परित्यक्तं न सुखं विन्दते जगत् ।
भावार्थ
‘वायु ही सबका प्राण है । वायु ही सुख है और वायु ही यह सम्पूर्ण जगत् है । वायुसे परित्यक्त होकर जगत् कभी सुख नहीं पा सकता ॥ ६१½ ॥
अद्यैव च परित्यक्तं वायुना जगदायुषा ॥ ६२ ॥ अद्यैवते निरुच्छ्वासाः काष्ठकुड्योपमाः स्थिताः ।
भावार्थ
‘वायु ही जगत्की आयु है। इस समय वायुने संसारके प्राणियोंको त्याग दिया है, इसलिये वे सब-के-सब निष्प्राण होकर काठ और दीवारके समान हो गये हैं ॥ ६२½ ॥
तद् यामस्तत्र यत्रास्ते मारुतो रुक्प्रदो हि नः । मा विनाशं गमिष्याम अप्रसाद्यादितेः सुताः ॥ ६३ ॥
भावार्थ
‘अदिति-पुत्रो ! अतः अब हमें उस स्थानपर चलना चाहिये, जहाँ हम सबको पीड़ा देनेवाले वायुदेव छिपे बैठे हैं । कहीं ऐसा न हो कि उन्हें प्रसन्न किये बिना हम सबका विनाश हो जाय’ ॥ ६३ ॥
ततः प्रजाभिः सहितः प्रजापतिः सदेवगन्धर्वभुजङ्गगुह्यकैः । जगाम तत्रास्यति यत्र मारुतः सुतं सुरेन्द्राभिहतं प्रगृह्य सः ॥ ६४ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर देवता, गन्धर्व, नाग और गुह्यक आदि प्रजाओंको साथ ले प्रजापति ब्रह्माजी उस स्थानपर गये, जहाँ वायुदेव इन्द्रद्वारा मारे गये अपने पुत्रको लेकर बैठे हुए थे ॥ ६४ ॥
ततोऽर्कवैश्वानरकाञ्चनप्रभं सुतं तदोत्सङ्गगतं सदागतेः । चतुर्मुखो वीक्ष्य कृपामथाकरोत् सदेवगन्धर्वऋषियक्षराक्षसैः ॥ ६५ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माजीने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा यक्षोंके साथ वहाँ पहुँचकर वायुदेवताकी गोदमें सोये हुए उनके पुत्रको देखा, जिसकी अङ्गकान्ति सूर्य, अग्नि और सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी । उसकी वैसी दशा देखकर ब्रह्माजीको उसपर बड़ी दया आयी’ ॥ ६५ ॥
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