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उत्तरकाण्ड, सर्ग 37

अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे धर्मेण विदितात्मनि। व्यतीता या निशा पूर्वा पौराणां हर्षवर्धिनी ॥ १॥

भावार्थ

ककुत्स्थकुलभूषण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजीका धर्मपूर्वक राज्याभिषेक हो जानेपर पुरवासियोंका हर्ष बढ़ानेवाली उनकी पहली रात्रि व्यतीत हुई ॥ १ ॥

तस्यां रजन्यां व्युष्टायां प्रातर्नृपतिबोधकाः। बन्दिनः समुपातिष्ठन् सौम्या नृपतिवेश्मनि ॥ २॥

भावार्थ

वह रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब प्रातःकाल महाराज श्रीरामको जगानेवाले सौम्य वन्दीजन राजमहलमें उपस्थित हुए ॥ २ ॥

ते रक्तकण्ठिनः सर्वे किन्नरा इव शिक्षिताः। तुष्टुवुर्नृपतिं वीरं यथावत् सम्प्रहर्षिणः ॥ ३॥

भावार्थ

उनके कण्ठ बड़े मधुर थे। वे संगीतकी कलामें किन्नरोंके समान सुशिक्षित थे। उन्होंने बड़े हर्षमें भरकर यथावत्रूपसे वीर नरेश श्रीरघुनाथजीका स्तवन आरम्भ किया ॥ ३ ॥

वीर सौम्य प्रबुध्यस्व कौसल्याप्रीतिवर्धन। जगद्धि सर्वं स्वपिति त्वयि सुप्ते नराधिप ॥ ४॥

भावार्थ

‘श्रीकौसल्याजीका आनन्द बढ़ानेवाले सौम्य-स्वरूप वीर श्रीरघुवीर ! आप जागिये। महाराज ! आपके सोये रहनेपर तो सारा जगत् ही सोया रहेगा ( ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्मानुष्ठानमें नहीं लग सकेगा ) ॥ ४ ॥

विक्रमस्ते यथा विष्णो रूपं चैवाश्विनोरिव । बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यः प्रजापतिसमो ह्यसि ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘आपका पराक्रम भगवान् विष्णुके समान तथा रूप अश्विनीकुमारोंके समान है । बुद्धिमें आप बृहस्पतिके तुल्य हैं और प्रजा-पालनमें साक्षात् प्रजापतिके सदृश हैं !! ५ ॥

क्षमा ते पृथिवीतुल्या तेजसा भास्करोपमः । वेगस्ते वायुना तुल्यो गाम्भीर्यमुदधेरिव ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘आपकी क्षमा पृथ्वीके समान और तेज भगवान् भास्करके समान है । वेग वायुके तुल्य और गम्भीरता समुद्रके सदृश है ॥ ६ ॥

अप्रकम्प्यो यथा स्थाणुश्चन्द्रे सौम्यत्वमीदृशम् । नेदृशाः पार्थिवाः पूर्वं भवितारो नराधिप ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘नरेश्वर ! आप भगवान् शंकरके समान युद्धमें अविचल हैं । आपकी-सी सौम्यता चन्द्रमामें ही पायी जाती है । आपके समान राजा न पहले थे और न भविष्यमें होंगे ॥ ७ ॥

यथा त्वमसि दुर्धर्षो धर्मनित्यः प्रजाहितः । न त्वां जहाति कीर्तिश्च लक्ष्मीश्च पुरुषर्षभ ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘पुरुषोत्तम ! आपको परास्त करना कठिन ही नहीं, असम्भव है । आप सदा धर्ममें संलग्न रहते हुए प्रजाके हित-साधनमें तत्पर रहते हैं, अतः कीर्ति और लक्ष्मी आपको कभी नहीं छोड़ती हैं ॥ ८ ॥

श्रीश्च धर्मश्च काकुत्स्थ त्वयि नित्यं प्रतिष्ठितौ । एताश्चान्याश्च मधुरा वन्दिभिः परिकीर्तिताः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलनन्दन ! ऐश्वर्य और धर्म आपमें नित्य प्रतिष्ठित हैं ।’ वन्दीजनोंने ये तथा और भी बहुत-सी सुमधुर स्तुतियाँ सुनायीं ॥ ९ ॥

सूताश्च संस्तवैर्दिव्यैर्बोधयन्ति स्म राघवम् । स्तुतिभिः स्तूयमानाभिः प्रत्यबुध्यत राघवः ॥ १० ॥

भावार्थ

सूत भी दिव्य स्तुतियोंद्वारा श्रीरघुनाथजीको जगाते रहे । इस प्रकार सुनायी जाती हुई स्तुतियोंके द्वारा भगवान् श्रीराम जागे ॥ १० ॥

स तद्विहाय शयनं पाण्डुराच्छादनास्तृतम् । उत्तस्थौ नागशयनाद्धरिर्नारायणो यथा ॥ ११ ॥

भावार्थ

जैसे पापहारी भगवान् नारायण सर्पशय्यासे उठते हैं, उसी प्रकार वे भी श्वेत बिछौनोंसे ढकी हुई शय्याको छोड़कर उठ बैठे ॥ ११ ॥

तमुत्थितं महात्मानं प्रह्वाः प्राञ्जलयो नराः । सलीलं भाजनैः शुभ्रैरुपतस्थुः सहस्रशः ॥ १२ ॥

भावार्थ

महाराजके शय्यासे उठते ही सहस्रों सेवक विनयपूर्वक हाथ जोड़ उज्ज्वल पात्रोंमें जल लिये उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ १२ ॥

कृतोदकः शुचिर्भूत्वा काले हुतहुताशनः । देवागारं जगामाशु पुण्यमिक्ष्वाकुसेवितम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

स्नान आदि करके शुद्ध हो उन्होंने समयपर अग्निमें आहुति दी और शीघ्र ही इक्ष्वाकुवंशियोंद्वारा सेवित पवित्र देवमन्दिरमें वे पधारे ॥ १३ ॥

तत्र देवान् पितॄन् विप्रानर्चयित्वा यथाविधि । बाह्यकक्षान्तरं रामो निर्जगाम जनैर्वृतः ॥ १४ ॥ उपतस्थुर्महात्मानो मन्त्रिणः सपुरोहिताः । वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे दीप्यमाना इवाग्नयः ॥ १५ ॥

भावार्थ

वहाँ देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंका विधिवत् पूजन करके वे अनेक कर्मचारियोंके साथ बाहरकी ड्योढ़ीमें आये ॥ इसी समय प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी वसिष्ठ आदि सभी महात्मा मन्त्री और पुरोहित वहाँ उपस्थित हुए ॥ १५ ॥

क्षत्रियाश्च महात्मानो नानाजनपदेश्वराः । रामस्योपाविशन् पार्श्वे शक्रस्येव यथामराः ॥ १६ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् अनेकानेक जनपदोंके स्वामी महामनस्वी क्षत्रिय श्रीरामचन्द्रजीके पास उसी तरह आकर बैठे, जैसे इन्द्रके समीप देवतालोग आकर बैठा करते हैं ॥ १६ ॥

भरतो लक्ष्मणश्चात्र शत्रुघ्नश्च महायशाः । उपासांचक्रिरे हृष्टा वेदास्त्रय इवाध्वरम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

महायशस्वी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—ये तीनों भाई बड़े हर्षके साथ उसी तरह भगवान् श्रीरामकी सेवामें उपस्थित रहते थे, जैसे तीनों वेद यज्ञकी ॥ १७ ॥

याताः प्राञ्जलयो भूत्वा किंकरा मुदिताननाः । मुदिता नाम पार्श्वस्था बहवः समुपाविशन् ॥ १८ ॥

भावार्थ

इसी समय मुदित नामसे प्रसिद्ध बहुत-से सेवक भी, जिनके मुखपर प्रसन्नता खेलती रहती थी, हाथ जोड़े सभाभवनमें आये और श्रीरघुनाथजीके पास बैठ गये ॥ १८ ॥

वानराश्च महावीर्या विंशतिः कामरूपिणः । सुग्रीवप्रमुखा राममुपासन्ते महौजसः ॥ १९ ॥

भावार्थ

फिर महापराक्रमी महातेजस्वी तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि बीस वानर भगवान् श्रीरामके समीप आकर बैठे ॥ १९ ॥

विभीषणश्च रक्षोभिश्चतुर्भिः परिवारितः । उपासते महात्मानं धनेशमिव गुह्यकः ॥ २० ॥

भावार्थ

अपने चार राक्षस मन्त्रियोंसे घिरे हुए विभीषण भी उसी प्रकार महात्मा श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए, जैसे गुह्यकगण धनपति कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं ॥२०॥

तथा निगमवृद्धाश्च कुलीना ये च मानवाः । शिरसा वन्द्य राजानमुपासन्ते विचक्षणाः ॥ २१ ॥

भावार्थ

जो लोग शास्त्रज्ञानमें बढ़े-चढ़े और कुलीन थे, वे चतुर मनुष्य भी महाराजको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके वहाँ बैठ गये ॥ २१ ॥

तथा परिवृतो राजा श्रीमद्भिर्ऋषिभिर्वरैः । राजभिश्च महावीर्यैर्वानरैश्च सराक्षसैः ॥ २२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार बहुत-से श्रेष्ठ एवं तेजस्वी महर्षि, महापराक्रमी राजा, वानर और राक्षसोंसे घिरे राजसभामें बैठे हुए श्रीरघुनाथजी बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ २२ ॥

यथा देवेश्वरो नित्यमृषिभिः समुपास्यते । अधिकस्तेन रूपेण सहस्राक्षाद् विरोचते ॥ २३ ॥

भावार्थ

जैसे देवराज इन्द्र सदा ऋषियोंसे सेवित होते हैं, उसी तरह महर्षि-मण्डलीसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उस समय सहस्रलोचन इन्द्रसे भी अधिक शोभा पा रहे थे ॥ २३ ॥

तेषां समुपविष्टानां तास्ताः सुमधुराः कथाः । कथ्यन्ते धर्मसंयुक्ताः पुराणैर्महात्मभिः ॥ २४ ॥

भावार्थ

जब सब लोग यथास्थान बैठ गये, तब पुराणवेत्ता महात्मा लोग भिन्न-भिन्न धर्म-कथाएँ कहने लगे॥ ॥२४॥

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