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उत्तरकाण्ड, सर्ग 14

ततः स सचिवैः सार्धं षड्भिर्नित्यबलोद्धतः । महोदरप्रहस्ताभ्यां मारीचशुकसारणैः ॥ १ ॥ धूम्राक्षेण च वीरेण नित्यं समरगर्द्धिना । वृतः सम्प्रययौ श्रीमान् क्रोधाल्लोकान् दहन्निव ॥ २ ॥

भावार्थ

( अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) तदनन्तर बलके अभिमानसे सदा उन्मत्त रहनेवाला रावण महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक, सारण तथा सदा ही युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले वीर धूम्राक्ष–इन छः मन्त्रियोंके साथ लङ्कासे प्रस्थित हुआ । उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो अपने क्रोधसे सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर डालेगा ॥ १-२ ॥

पुराणि स नदीः शैलान् वनान्युपवनानि च । अतिक्रम्य मुहूर्तेन कैलासं गिरिमागमत् ॥ ३ ॥

भावार्थ

बहुत-से नगरों, नदियों, पर्वतों, वनों और उपवनोंको लाँघकर वह दो ही घड़ीमें कैलास पर्वतपर जा पहुँचा ॥३॥

संनिविष्टं गिरौ तस्मिन् राक्षसेन्द्रं निशम्य तु । युद्धेप्सुं तं कृतोत्साहं दुरात्मानं समन्त्रिणम् ॥ ४ ॥ यक्षा न शेकुः संस्थातुं प्रमुखे तस्य रक्षसः । राज्ञो भ्रातेति विज्ञाय गता यत्र धनेश्वरः ॥ ५ ॥

भावार्थ

यक्षोंने जब सुना कि दुरात्मा राक्षसराज रावणने युद्धके लिये उत्साहित होकर अपने मन्त्रियोंके साथ कैलास पर्वतपर डेरा डाला है, तब वे उस राक्षसके सामने खड़े न हो सके । यह राजाका भाई है, ऐसा जानकर यक्षलोग उस स्थानपर गये, जहाँ धनकें स्वामी कुबेर विद्यमान थे ॥ ४-५ ॥

ते गत्वा सर्वमाचख्युर्भ्रातुस्तस्य चिकीर्षितम् । अनुज्ञाता ययुर्युद्ध्या युद्धाय धनदेन ते ॥ ६ ॥

भावार्थ

वहाँ जाकर उन्होंने उनके भाईका सारा अभिप्राय कह सुनाया । तब कुबेरने युद्धके लिये यक्षोंको आज्ञा दे दी; फिर तो यक्ष बड़े हर्षसे भरकर चल दिये ॥ ६ ॥

ततो बलानां संक्षोभो व्यवर्धत इवोदधेः । तस्य नैर्ऋतराजस्य शैलं संचालयन्निव ॥ ७ ॥

भावार्थ

उस समय यक्षराजकी सेनाएँ समुद्रके समान क्षुब्ध हो उठीं । उनके वेगसे वह पर्वत हिलता-सा जान पड़ा ॥ ७ ॥

ततो युद्धं समभवद् यक्षराक्षससंकुलम् । व्यथिताश्चाभवंस्तत्र सचिवा राक्षसस्य ते ॥ ८ ॥

भावार्थ

तदनन्तर यक्षों और राक्षसोंमें घमासान युद्ध छिड़ गया । वहाँ रावणके वे सचिव व्यथित हो उठे ॥ ८ ॥

स दृष्ट्वा तादृशं सैन्यं दशग्रीवो निशाचरः । हर्षनादान् बहून् कृत्वा स क्रोधादभ्यधावत ॥ ९ ॥

भावार्थ

अपनी सेनाकी वैसी दुर्दशा देख निशाचर दशग्रीव बारंबार हर्षवर्धक सिंहनाद करके रोषपूर्वक यक्षोंकी ओर दौड़ा ॥ ९ ॥

ये तु ते राक्षसेन्द्रस्य सचिवा घोरविक्रमाः । तेषां सहस्रमेकैको यक्षाणां समयोधयत् ॥ १० ॥

भावार्थ

राक्षसराजके जो सचिव थे, वे बड़े भयंकर पराक्रमी थे । उनमेंसे एक-एक सचिव हजार-हजार यक्षोंसे युद्ध करने लगा ॥ १० ॥

ततो गदाभिर्मुसलैरसिभिः शक्तितोमरैः । हन्यमानो दशग्रीवस्तत्सैन्यं समगाहत ॥ ११ ॥ स निरुच्छ्वासवत् तत्र वध्यमानो दशाननः । वर्षद्भिरिव जीमूतैर्धाराभिरवरुध्यत ॥ १२ ॥

भावार्थ

उस समय यक्ष जलकी धारा गिरानेवाले मेघोंके समान गदाओं, मूसलों, तलवारों, शक्तियों और तोमरोंकी वर्षा करने लगे । उनकी चोट सहता हुआ दशग्रीव शत्रुसेनामें घुसा । वहाँ उसपर इतनी मार पड़ने लगी कि उसे दम मारनेकी भी फुरसत नहीं मिली । यक्षोंने उसका वेग रोक दिया ॥ ११-१२ ॥

न चकार व्यथां चैव यक्षशस्त्रैः समाहतः । महीधर इवाम्भोदैर्धाराशतसमुक्षितः ॥ १३ ॥

भावार्थ

यक्षोंके शस्त्रोंसे आहत होनेपर भी उसने अपने मनमें दुःख नहीं माना; ठीक उसी तरह, जैसे मेघोंद्वारा बरसायी हुई सैकड़ों जलधाराओंसे अभिषिक्त होनेपर भी पर्वत विचलित नहीं होता है ॥ १३ ॥

स महात्मा समुद्यम्य कालदण्डोपमां गदाम् । प्रविवेश ततः सैन्यं नयन् यक्षान् यमक्षयम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

उस महाकाय निशाचरने कालदण्डके समान भयंकर गदा उठाकर यक्षोंकी सेनामें प्रवेश किया और उन्हें यमलोक पहुँचाना आरम्भ कर दिया ॥ १४ ॥

स कक्षमिव विस्तीर्णं शुष्केन्धनमिवाकुलम् । वातेनाग्निरिवादीप्तो यक्षसैन्यं ददाह तत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

वायुसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान रावणने तिनकोंके समान फैली और सूखे ईंधनकी भाँति आकुल हुई यक्षोंकी सेनाको जलाना आरम्भ किया ॥ १५ ॥

तैस्तु तत्र महामात्यैर्महोदरशुकादिभिः । अल्पावशेषास्ते यक्षाः कृता वातैरिवाम्बुदाः ॥ १६ ॥

भावार्थ

जैसे हवा बादलोंको उड़ा देती है, उसी तरह उन महोदर और शुक आदि महामन्त्रियोंने वहाँ यक्षोंका संहार कर डाला । अब वे थोड़ी ही संख्यामें बच रहे ॥ १६ ॥

केचित् समाहता भग्नाः पतिताः समरे क्षितौ । ओष्ठांश्च दशनैस्तीक्ष्णैरदशन् कुपिता रणे ॥ १७ ॥

भावार्थ

कितने ही यक्ष शस्त्रोंके आघातसे अङ्ग-भङ्ग हो जानेके कारण समराङ्गणमें धराशायी हो गये । कितने ही रणभूमिमें कुपित हो अपने तीखे दाँतोंसे ओठ दबाये हुए थे ॥ १७ ॥

श्रान्ताश्चान्योन्यमालिङ्गय भ्रष्टशस्त्रा रणाजिरे । सीदन्ति च तदा यक्षाः कूला इव जलेन ह ॥ १८ ॥

भावार्थ

कोई थककर एक-दूसरेसे लिपट गये । उनके अस्त्र-शस्त्र गिर गये और वे समराङ्गणमें उसी तरह शिथिल होकर गिरे जैसे जलके वेगसे नदीके किनारे टूट पड़ते हैं ॥ १८ ॥

हतानां गच्छतां स्वर्गं युध्यतामथ धावताम् । प्रेक्षतामृषिसङ्घानां न बभूवान्तरं दिवि ॥ १९ ॥

भावार्थ

मर-मरकर स्वर्गमें जाते, जूझते और दौड़ते हुए यक्षोंकी तथा आकाशमें खड़े होकर युद्ध देखनेवाले ऋषिसमूहोंकी संख्या इतनी बढ़ गयी थी कि आकाशमें उन सबके लिये जगह नहीं अँटती थी ॥ १९ ॥

भग्नांस्तु तान् समालक्ष्य यक्षेन्द्रांस्तु महाबलान् । धनाध्यक्षो महाबाहुः प्रेषयामास यक्षकान् ॥ २० ॥

भावार्थ

महाबाहु धनाध्यक्षने उन यक्षोंको भागते देख दूसरे महाबली यक्षराजोंको युद्धके लिये भेजा ॥ २० ॥

एतस्मिन्नन्तरे राम विस्तीर्णबलवाहनः । प्रेषितो न्यपतद् यक्षो नाम्ना संयोधकण्टकः ॥ २१ ॥

भावार्थ

श्रीराम ! इसी बीचमें कुबेरका भेजा हुआ संयोधकण्टक नामक यक्ष वहाँ आ पहुँचा । उसके साथ बहुत-सी सेना और सवारियाँ थीं ॥ २१ ॥

तेन चक्रेण मारीचो विष्णुनेव रणे हतः । पतितो भूतले शैलात् क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ २२ ॥

भावार्थ

उसने आते ही भगवान् विष्णुकी भाँति चक्रसे रणभूमिमें मारीचपर प्रहार किया । उससे घायल होकर वह राक्षस कैलाससे नीचे पृथ्वीपर उसी तरह गिर पड़ा, जैसे पुण्य क्षीण होनेपर स्वर्गवासी ग्रह वहाँसे भूतलपर गिर पड़ा हो ॥ २२ ॥

ससंज्ञस्तु मुहूर्तेन स विश्रम्य निशाचरः । तं यक्षं योधयामास स च भग्नः प्रदुद्रुवे ॥ २३ ॥

भावार्थ

दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर निशाचर मारीच विश्राम करके लौटा और उस यक्षके साथ युद्ध करने लगा । तब वह यक्ष भाग खड़ा हुआ ॥ २३ ॥

ततः काञ्चनचित्राङ्गं वैदूर्यरजतोक्षितम् । मर्यादां प्रतिहाराणां तोरणान्तरमाविशत् ॥ २४ ॥

भावार्थ

तदनन्तर रावणने कुबेरपुरीके फाटकमें, जिसके प्रत्येक अङ्गमें सुवर्ण जड़ा हुआ था तथा जो नीलम और चाँदीसे भी विभूषित था, प्रवेश किया । वहाँ द्वारपालोंका पहरा लगता था । वह फाटक ही सीमा था । उससे आगे दूसरे लोग नहीं जा सकते थे ॥ २४ ॥

तं तु राजन् दशग्रीवं प्रविशन्तं निशाचरम् । सूर्यभानुरिति ख्यातो द्वारपालो न्यवारयत् ॥ २५ ॥

भावार्थ

महाराज श्रीराम ! जब निशाचर दशग्रीव फाटकके भीतर प्रवेश करने लगा, तब सूर्यभानु नामक द्वारपालने उसे रोका ॥ २५ ॥

स वार्यमाणो यक्षेण प्रविवेश निशाचरः । यदा तु वारितो राम न व्यतिष्ठत् स राक्षसः ॥ २६ ॥ ततस्तोरणमुत्पाट्य तेन यक्षेण ताडितः । रुधिरं प्रस्रवन् भाति शैलो धातुस्रवैरिव ॥ २७ ॥

भावार्थ

जब यक्षके रोकनेपर भी वह निशाचर न रुका और भीतर प्रविष्ट हो गया, तब द्वारपालने फाटकमें लगे हुए एक खंभेको उखाड़कर उसे दशग्रीवके ऊपर दे मारा । उसके शरीरसे रक्तकी धारा बहने लगी, मानो किसी पर्वतसे गेरूमिश्रित जलका झरना गिर रहा हो ॥ २६-२७ ॥

स शैलशिखराभेण तोरणेन समाहतः । जगाम न क्षतिं वीरो वरदानात् स्वयम्भुवः ॥ २८ ॥

भावार्थ

पर्वतशिखरके समान प्रतीत होनेवाले उस खंभेकी चोट खाकर भी वीर दशग्रीवकी कोई क्षति नहीं हुई । वह ब्रह्माजीके वरदानके प्रभावसे उस यक्षके द्वारा मारा न जा सका ॥२८॥

तेनैव तोरणेनाथ यक्षस्तेनाभिताडितः । नादृश्यत तदा यक्षो भस्मीकृततनुस्तदा ॥ २९ ॥

भावार्थ

तब उसने भी वही खंभ उठाकर उसके द्वारा यक्षपर प्रहार किया, इससे यक्षका शरीर चूर-चूर हो गया । फिर उसकी शकल नहीं दिखायी दी ॥ २९ ॥

ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे दृष्ट्वा रक्षःपराक्रमम् । ततो नदीर्गुहाश्चैव विविशुर्भयपीडिताः । त्यक्तप्रहरणाः श्रान्ता विवर्णवदनास्तदा ॥ ३० ॥

भावार्थ

उस राक्षसका यह पराक्रम देखकर सभी यक्ष भाग गये । कोई नदियोंमें कूद पड़े और कोई भयसे पीड़ित हो गुफाओंमें घुस गये । सबने अपने हथियार त्याग दिये थे । सभी थक गये थे और सबके मुखोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥३०॥

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