उत्तरकाण्ड, सर्ग 13
अथ लोकेश्वरोत्सृष्टा तत्र कालेन केनचित् । निद्रा समभवत् तीव्रा कुम्भकर्णस्य रूपिणी ॥ १ ॥
भावार्थ
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन !) तदनन्तर कुछ काल बीतनेपर लोकेश्वर ब्रह्माजीकी भेजी हुई निद्रा जँभाई आदिके रूपमें मूर्तिमती हो कुम्भकर्णके भीतर तीव्र वेगसे प्रकट हुई ॥१॥
ततो भ्रातरमासीनं कुम्भकर्णोऽब्रवीद् वचः । निद्रा मां बाधते राजन् कारयस्व ममालयम् ॥ २ ॥
भावार्थ
तब कुम्भकर्णने पास ही बैठे हुए अपने भाई रावणसे कहा—‘राजन् ! मुझे नींद सता रही है; अतः मेरे लिये शयन करनेके योग्य घर बनवा दें’ ॥ २ ॥
विनियुक्तास्ततो राज्ञा शिल्पिनो विश्वकर्मवत् । विस्तीर्णं योजनं स्निग्धं ततो द्विगुणमायतम् ॥ ३ ॥ दर्शनीयं निराबाधं कुम्भकर्णस्य चक्रिरे । स्फाटिकैः काञ्चनैश्चित्रैः स्तम्भैः सर्वत्र शोभितम् ॥
भावार्थ
यह सुनकर राक्षसराजने विश्वकर्माके समान सुयोग्य शिल्पियोंको घर बनानेके लिये आज्ञा दे दी । उन शिल्पियोंने दो योजन लंबा और एक योजन चौड़ा चिकना घर बनाया, जो देखने ही योग्य था । उसमें किसी प्रकारकी बाधाका अनुभव नहीं होता था । उसमें सर्वत्र स्फटिकमणि एवं सुवर्णके बने हुए खम्भे लगे थे, जो उस भवनकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ३-४ ॥
वैदूर्यकृतसोपानं किङ्किणीजालकं तथा । दान्ततोरणविन्यस्तं वज्रस्फटिकवेदिकम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उसमें नीलमकी सीढ़ियाँ बनी थीं । सब ओर घुघुरूदार झालरें लगायी गयी थीं । उसका सदर फाटक हाथी-दाँतका बना हुआ था और हीरे तथा स्फटिकमणिकी वेदी एवं चबूतरे शोभा दे रहे थे ॥ ५ ॥
मनोहरं सर्वसुखं कारयामास राक्षसः । सर्वत्र सुखदं नित्यं मेरोः पुण्यां गुहामिव ॥ ६ ॥
भावार्थ
वह भवन सब प्रकारसे सुखद एवं मनोहर था । मेरुकी पुण्यमयी गुफाके समान सदा सर्वत्र सुख प्रदान करनेवाला था । राक्षसराज रावणने कुम्भकर्णके लिये ऐसा सुन्दर एवं सुविधाजनक शयनागार बनवाया ॥ ६ ॥
तत्र निद्रां समाविष्टः कुम्भकर्णो महाबलः । बहून्यब्दसहस्राणि शयानो न च बुध्यते ॥ ७ ॥
भावार्थ
महाबली कुम्भकर्ण उस घरमें जाकर निद्राके वशीभूत हो कई हजार वर्षोंतक सोता रहा । जाग नहीं पाता था ॥ ७ ॥
निद्राभिभूते तु तदा कुम्भकर्णे दशाननः । देवर्षियक्षगन्धर्वान् संजघ्ने हि निरङ्कुशः ॥ ८ ॥
भावार्थ
जब कुम्भकर्ण निद्रासे अभिभूत होकर सो गया, तब दशमुख रावण उच्छृङ्खल हो देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गन्धर्वोंके समूहोंको मारने तथा पीड़ा देने लगा ॥ ८ ॥
उद्यानानि विचित्राणि नन्दनादीनि यानि च । तानि गत्वा सुसंक्रुद्धो भिनत्ति स दशाननः ॥ ९ ॥
भावार्थ
देवताओंके नन्दनवन आदि जो विचित्र उद्यान थे, उनमें जाकर दशानन अत्यन्त कुपित हो उन सबको उजाड़ देता था ॥ ९ ॥
नदीं गज इव क्रीडन् वृक्षान् वायुरिव क्षिपन् । नगान् वज्र इवोत्सृष्टो विध्वंसयति राक्षसः ॥ १० ॥
भावार्थ
वह राक्षस नदीमें हाथीकी भाँति क्रीडा करता हुआ उसकी धाराओंको छिन्न-भिन्न कर देता था । वृक्षोंको वायुकी भाँति झकझोरता हुआ उखाड़ फेंकता था और पर्वतोंको इन्द्रके हाथसे छूटे हुए वज्रकी भाँति तोड़-फोड़ डालता था ॥ १० ॥
तथावृत्तं तु विज्ञाय दशग्रीवं धनेश्वरः । कुलानुरूपं धर्मज्ञो वृत्तं संस्मृत्य चात्मनः ॥ ११ ॥ सौभ्रात्रदर्शनार्थं तु दूतं वैश्रवणस्तदा । लङ्कां सम्प्रेषयामास दशग्रीवस्य वै हितम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
दशग्रीवके इस निरंकुश बर्तावका समाचार पाकर धनके स्वामी धर्मज्ञ कुबेरने अपने कुलके अनुरूप आचार-व्यवहारका विचार करके उत्तम भ्रातृप्रेमका परिचय देनेके लिये लङ्कामें एक दूत भेजा । उनका उद्देश्य यह था कि मैं रावणको उसके हितकी बात बताकर राहपर लाऊँ ॥ ११-१२ ॥
स गत्वा नगरीं लङ्कामाससाद विभीषणम् । मानितस्तेन धर्मेण पृष्ठश्चागमनं प्रति ॥ १३ ॥
भावार्थ
वह दूत लङ्कापुरीमें जाकर पहले विभीषणसे मिला । विभीषणने धर्मके अनुसार उसका सत्कार किया और लङ्कामें आनेका कारण पूछा ॥ १३ ॥
पृष्ट्वा च कुशलं राज्ञो ज्ञातीनां च विभीषणः । सभायां दर्शयामास तमासीनं दशाननम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
फिर बन्धु-बान्धवोंका कुशल-समाचार पूछकर विभीषणने उस दूतको ले जाकर राजसभामें बैठे हुए रावणसे मिलाया॥१४॥
स दृष्ट्वा तत्र राजानं दीप्यमानं स्वतेजसा । जयेति वाचा सम्पूज्य तूष्णीं समभिवर्तत ॥ १५ ॥
भावार्थ
राजा रावण सभामें अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहा था, उसे देखकर दूतने ‘महाराजकी जय हो, ऐसा कहकर वाणीद्वारा उसका सत्कार किया और फिर वह कुछ देरतक चुपचाप खड़ा रहा ॥ १५ ॥
स तत्रोत्तमपर्यङ्के वरास्तरणशोभिते । उपविष्टं दशग्रीवं दूतो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उत्तम बिछौनेसे सुशोभित एक श्रेष्ठ पलंगपर बैठे हुए दशग्रीवसे उस दूतने इस प्रकार कहा—॥१६ ॥
राजन् वदामि ते सर्वं भ्राता तव यदब्रवीत् । उभयोः सदृशं वीर वृत्तस्य च कुलस्य च ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘वीर महाराज ! आपके भाई धनाध्यक्ष कुबेरने आपके पास जो संदेश भेजा है, वह माता-पिता दोनोंके कुल तथा सदाचारके अनुरूप है, मैं उसे पूर्णरूपसे आपको बता रहा हूँ; सुनिये—॥ १७ ॥
साधु पर्याप्तमेतावत् कृत्यश्चारित्रसंग्रहः । साधु धर्मे व्यवस्थानं क्रियतां यदि शक्यते ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘दशग्रीव ! तुमने अबतक जो कुछ कुकृत्य किया है, इतना ही बहुत है । अब तो तुम्हें भलीभाँति सदाचारका संग्रह करना चाहिये । यदि हो सके तो धर्मके मार्गपर स्थित रहो; यही तुम्हारे लिये अच्छा होगा ॥ १८ ॥
दृष्टं मे नन्दनं भग्नमृषयो निहताः श्रुताः । देवतानां समुद्योगस्त्वत्तो राजन् मया श्रुतः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘तुमने नन्दनवनको उजाड़ दिया—यह मैंने अपनी आँखों देखा है । तुम्हारे द्वारा बहुत-से ऋषियोंका वध हुआ है, यह भी मेरे सुननेमें आया है । राजन् ! (इससे तंग आकर देवता तुमसे बदला लेना चाहते हैं ) मैंने सुना है कि तुम्हारे विरुद्ध देवताओंका उद्योग आरम्भ हो गया है ॥ १९ ॥
निराकृतश्च बहुशस्त्वयाहं राक्षसाधिप । सापराधोऽपि बालो हि रक्षितव्यः स्वबान्धवैः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘राक्षसराज ! तुमने कई बार मेरा भी तिरस्कार किया है; तथापि यदि बालक अपराध कर दे तो भी अपने बन्धु-बान्धवोंको तो उसकी रक्षा ही करनी चाहिये ( इसीलिये तुम्हें हितकारक सलाह दे रहा हूँ ) ॥ २० ॥
अहं तु हिमवत्पृष्ठं गतो धर्ममुपासितुम् । रौद्रं व्रतं समास्थाय नियतो नियतेन्द्रियः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘मैं शौच-संतोषादि नियमोंके पालन और इन्द्रियसंयमपूर्वक ‘रौद्र-व्रत’का आश्रय ले धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये हिमालयके एक शिखरपर गया था ॥ २१ ॥
तत्र देवो मया दृष्ट उमया सहितः प्रभुः । सव्यं चक्षुर्मया दैवात् तत्र देव्यां निपातितम् ॥ २२ ॥ का न्वेषेति महाराज न खल्वन्येन हेतुना । रूपं चानुपमं कृत्वा रुद्राणी तत्र तिष्ठति ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वहाँ मुझे उमासहित भगवान् महादेवजीका दर्शन हुआ । महाराज ! उस समय मैंने केवल यह जाननेके लिये कि देखूँ ये कौन हैं ? दैववश देवी पार्वतीपर अपनी बायीं दृष्टि डाली थी । निश्चय ही मैंने दूसरे किसी हेतुसे ( विकारयुक्त भावनासे ) उनकी ओर नहीं देखा था । उस वेलामें देवी रुद्राणी अनुपम रूप धारण करके वहाँ खड़ी थीं ॥२२-२३॥
देव्या दिव्यप्रभावेण दग्धं सव्यं ममेक्षणम् । रेणुध्वस्तामिव ज्योतिः पिङ्गलत्वमुपागतम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘देवीके दिव्य प्रभावसे उस समय मेरी बायीं आँख जल गयी और दूसरी ( दायीं आँख ) भी धूलसे भरी हुई-सी पिङ्गल वर्णकी हो गयी ॥ २४ ॥
ततोऽहमन्यद् विस्तीर्णं गत्वा तस्य गिरेस्तटम् । तूष्णीं वर्षशतान्यष्टौ समधारं महाव्रतम् ॥ २५ ॥ समाप्ते नियमे तस्मिस्तत्र देवो महेश्वरः । ततः प्रीतेन मनसा प्राह वाक्यमिदं प्रभुः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर मैंने पर्वतके दूसरे विस्तृत तटपर जाकर आठ सौ वर्षोंतक मौनभावसे उस महान् व्रतको धारण किया ॥ ‘उस नियमके समाप्त होनेपर भगवान् महेश्वरदेवने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्न मनसे कहा—॥ २६ ॥
प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञ तपसानेन सुव्रत । मया चैतद् व्रतं चीर्णं त्वया चैव धनाधिप ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ धनेश्वर ! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ । एक तो मैंने इस व्रतका आचरण किया है और दूसरे तुमने ॥ २७ ॥
तृतीयः पुरुषो नास्ति यश्चरेद् व्रतमीदृशम् । व्रतं सुदुष्करं ह्येतन्मयैवोत्पादितं पुरा ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘‘तीसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो ऐसे कठोर व्रतका पालन कर सके । इस अत्यन्त दुष्कर व्रतको पूर्वकालमें मैंने ही प्रकट किया था ॥ २८ ॥
तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर । तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘‘अतः सौम्य धनेश्वर ! अब तुम मेरे साथ मित्रताका सम्बन्ध स्थापित करो, यह सम्बन्ध तुम्हें पसंद आना चाहिये । अनघ ! तुमने अपने तपसे मुझे जीत लिया है; अतः मेरा मित्र बनकर रहो ॥ २९ ॥
देव्या दग्धं प्रभावेण यच्च सव्यं तवेक्षणम् । पैङ्गल्यं यदवाप्तं हि देव्या रूपनिरीक्षणात् ॥ ३० ॥ एकाक्षपिङ्गलीत्येव नाम स्थास्यति शाश्वतम् । एवं तेन सखित्वं च प्राप्यानुज्ञां च शङ्करात् ॥ ३१ ॥ आगतेन मया चैवं श्रुतस्ते पापनिश्चयः ।
भावार्थ
‘‘देवी पार्वतीके रूपपर दृष्टिपात करनेसे देवीके प्रभावसे जो तुम्हारा बायाँ नेत्र जल गया और दूसरा नेत्र भी पिङ्गल-वर्णका हो गया, इससे सदा स्थिर रहनेवाला तुम्हारा ‘एकाक्ष-पिङ्गली’ यह नाम चिरस्थायी होगा ।’ इस प्रकार भगवान् शङ्करके साथ मैत्री स्थापित करके उनकी आज्ञा लेकर जब मैं घर लौटा हूँ, तब मैंने तुम्हारे पापपूर्ण निश्चयकी बात सुनी है ॥ ३०-३१½ ॥
तदधर्मिष्ठसंयोगान्निवर्त कुलदूषणात् ॥ ३२ ॥ चिन्त्यते हि वधोपायः सर्विसङ्घैः सुरैस्तव ।
भावार्थ
‘अतः अब तुम अपने कुलमें कलंक लगानेवाले पापकर्मके संसर्गसे दूर हट जाओ; क्योंकि ऋषि-समुदायसहित देवता तुम्हारे वधका उपाय सोच रहे हैं’ ॥ ३२½ ॥
एवमुक्तो दशग्रीवः कोपसंरक्तलोचनः ॥ ३३ ॥ हस्तान् दन्तांश्च सम्पिष्य वाक्यमेतदुवाच ह ।
भावार्थ
दूतके मुँहसे ऐसी बात सुनकर दशग्रीव रावणके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । वह हाथ मलता हुआ दाँत पीसकर बोला—॥ ३३½ ॥
विज्ञातं ते मया दूत वाक्यं यत् त्वं प्रभाषसे ॥ ३४ ॥ नैव त्वमसि नैवासौ भ्रात्रा येनासि चोदितः ।
भावार्थ
‘दूत ! तू जो कुछ कह रहा है, उसका अभिप्राय मैंने समझ लिया । अब तो न तू जीवित रह सकता है और न वह भाई ही, जिसने तुझे यहाँ भेजा है ॥ ३४½ ॥
हितं नैष ममैतद्धि ब्रवीति धनरक्षकः ॥ ३५ ॥ महेश्वरसखित्वं तु मूढः श्रावयते किल ।
भावार्थ
‘धनरक्षक कुबेरने जो संदेश दिया है, वह मेरे लिये हितकर नहीं है । वह मूढ मुझे ( डरानेके लिये ) महादेवजीके साथ अपनी मित्रताकी कथा सुना रहा है ! ॥ ३५½ ॥
नैवेदं क्षमणीयं मे यदेतद् भाषितं त्वया ॥ ३६ ॥ यदेतावन्मया कालं दूत तस्य तु मर्षितम् । न हन्तव्यो गुरुर्ज्येष्ठो मयायमिति मन्यते ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘दूत ! तूने जो बात यहाँ कही है, यह मेरे लिये सहन करनेयोग्य नहीं है । कुबेर मेरे बड़े भाई हैं, अतः उनका वध करना उचित नहीं है—ऐसा समझकर ही मैंने आजतक उन्हें क्षमा किया है ॥ ३६-३७ ॥
तस्य त्विदानीं श्रुत्वा मे वाक्यमेषा कृता मतिः । त्रींल्लोकानपि जेष्यामि बाहुवीर्यमुपाश्रितः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘किंतु इस समय उनकी बात सुनकर मैंने यह निश्चय किया है कि मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके तीनों लोकोंको जीतूँगा ॥ ३८ ॥
एतन्मुहूर्तमेवाहं तस्यैकस्य तु वै कृते । चतुरो लोकपालांस्तान् नयिष्यामि यमक्षयम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘इसी मुहूर्तमें मैं एकके ही अपराधसे उन चारों लोकपालोंको यमलोक पहुँचाऊँगा’ ॥ ३९ ॥
एवमुक्त्वा तु लङ्केशो दूतं खड्गेन जघ्निवान् । ददौ भक्षयितुं होनं राक्षसानां दुरात्मनाम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर लङ्केश रावणने तलवारसे उस दूतके दो टुकड़े कर डाले और उसकी लाश उसने दुरात्मा राक्षसोंको खानेके लिये दे दी ॥ ४० ॥
ततः कृतस्वस्त्ययनो रथमारुह्य रावणः । त्रैलोक्यविजयाकाङ्क्षी ययौ यत्र धनेश्वरः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् रावण स्वस्तिवाचन करके रथपर चढ़ा और तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छासे उस स्थानपर गया, जहाँ धनपति कुबेर रहते थे ॥ ४१ ॥
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