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उत्तरकाण्ड, सर्ग 15

ततस्ताँल्लक्ष्य वित्रस्तान् यक्षेन्द्रांश्च सहस्रशः । धनाध्यक्षो महायक्षं माणिभद्रमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) धनाध्यक्षने देखा, हजारों यक्षप्रवर भयभीत होकर भाग रहे हैं; तब उन्होंने माणिभद्र नामक एक महायक्षसे कहा—॥ १ ॥

रावणं जहि यक्षेन्द्र दुर्वृत्तं पापचेतसम् । शरणं भव वीराणां यक्षाणां युद्धशालिनाम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘यक्षप्रवर ! रावण पापात्मा एवं दुराचारी है, तुम उसे मार डालो और युद्धमें शोभा पानेवाले वीर यक्षोंको शरण दो—उनकी रक्षा करो’ ॥ २ ॥

एवमुक्तो महाबाहुर्माणिभद्रः सुदुर्जयः । वृतो यक्षसहस्रैस्तु चतुर्भिः समयोधयत् ॥ ३ ॥

भावार्थ

महाबाहु माणिभद्र अत्यन्त दुर्जय वीर थे । कुबेरकी उक्त आज्ञा पाकर वे चार हजार यक्षोंकी सेना साथ ले फाटकपर गये और राक्षसोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३ ॥

ते गदामुसलप्रासैः शक्तितोमरमुद्गरैः । अभिघ्नन्तस्तदा यक्षा राक्षसान् समुपाद्रवन् ॥ ४ ॥

भावार्थ

उस समय यक्षयोद्धा गदा, मूसल, प्रास, शक्ति, तोमर तथा मुद्गरोंका प्रहार करते हुए राक्षसोंपर टूट पड़े ॥ ४ ॥

कुर्वन्तस्तुमुलं युद्धं चरन्तः श्येनवल्लघु । बाढं प्रयच्छ नेच्छामि दीयतामिति भाषिणः ॥ ५ ॥

भावार्थ

वे घोर युद्ध करते हुए बाज पक्षीकी तरह तीव्र गतिसे सब ओर विचरने लगे । कोई कहता ‘मुझे युद्धका अवसर दो ।’ दूसरा बोलता—‘मैं यहाँसे पीछे हटना नहीं चाहता ।’ फिर तीसरा बोल उठता—‘मुझे अपना हथियार दो’ ॥५॥

ततो देवाः सगन्धर्वा ऋषयो ब्रह्मवादिनः । दृष्ट्वा तत् तुमुलं युद्धं परं विस्मयमागमन् ॥ ६ ॥

भावार्थ

उस तुमुल युद्धको देखकर देवता, गन्धर्व तथा ब्रह्मवादी ऋषि भी बड़े आश्चर्यमें पड़ गये थे ॥ ६ ॥

यक्षाणां तु प्रहस्तेन सहस्रं निहतं रणे । महोदरेण चानिन्द्यं सहस्रमपरं हतम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

उस रणभूमिमें प्रहस्तने एक हजार यक्षोंका संहार कर डाला । फिर महोदरने दूसरे एक सहस्र प्रशंसनीय यक्षोंका विनाश किया ॥ ७ ॥

क्रुद्धेन च तदा राजन् मारीचेन युयुत्सुना । निमेषान्तरमात्रेण द्वे सहस्रे निपातिते ॥ ८ ॥

भावार्थ

राजन् ! उस समय कुपित हुए रणोत्सुक मारीचने पलक मारते मारते शेष दो हजार यक्षोंको धराशायी कर दिया ॥ ८ ॥

क्व च यक्षार्जवं युद्धं क्व च मायाबलाश्रयम् । रक्षसां पुरुषव्याघ्र तेन तेऽभ्यधिका युधि ॥ ९ ॥

भावार्थ

पुरुषसिंह ! कहाँ यक्षोंका सरलतापूर्वक युद्ध ? और कहाँ राक्षसोंका मायामय संग्राम ? वे अपने मायाबलके भरोसे ही यक्षोंकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए ॥ ९ ॥

धूम्राक्षेण समागम्य माणिभद्रो महारणे । मुसलेनोरसि क्रोधात् ताडितो न च कम्पितः ॥ १० ॥

भावार्थ

उस महासमरमें धूम्राक्षने आकर क्रोधपूर्वक माणिभद्रकी छातीमें मूसलका प्रहार किया; किंतु इससे वे विचलित नहीं हुए ॥ १० ॥

ततो गदां समाविध्य माणिभद्रेण राक्षसः । धूम्राक्षस्ताडितो मूर्ध्नि विह्वलः स पपात ह ॥ ११ ॥

भावार्थ

फिर माणिभद्रने भी गदा घुमाकर उसे राक्षस धूम्राक्षके मस्तकपर दे मारा । उसकी चोटसे व्याकुल हो धूम्राक्ष धरतीपर गिर पड़ा ॥ ११ ॥

धूम्राक्षं ताडितं दृष्ट्वा पतितं शोणितोक्षितम् । अभ्यधावत संग्रामे माणिभद्रं दशाननः ॥ १२ ॥

भावार्थ

धूम्राक्षको गदाकी चोटसे घायल एवं खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देख दशमुख रावणने रणभूमिमें माणि-भद्रपर धावा किया ॥ १२ ॥

संक्रुद्धमभिधावन्तं माणिभद्रो दशाननम् । शक्तिभिस्ताडयामास तिसृभिर्यक्षपुङ्गवः ॥ १३ ॥

भावार्थ

दशाननको क्रोधमें भरकर धावा करते देख यक्षप्रवर माणिभद्रने उसके ऊपर तीन शक्तियोंद्वारा प्रहार किया ॥१३॥

ताडितो माणिभद्रस्य मुकुटे प्राहरद् रणे । तस्य तेन प्रहारेण मुकुटं पार्श्वमागतम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

चोट खाकर रावणने रणभूमिमें माणिभद्रके मुकुटपर वार किया । उसके उस प्रहारसे उनका मुकुट खिसककर बगलमें आ गया ॥ १४ ॥

ततःप्रभृति यक्षोऽसौ पार्श्वमौलिरभूत् किल । तस्मिंस्तु विमुखीभूते माणिभद्रे महात्मनि । संनादः सुमहान् राजंस्तस्मिन् शैले व्यवर्धत ॥ १५ ॥

भावार्थ

तबसे माणिभद्र यक्ष पार्श्वमौलिके नामसे प्रसिद्ध हुए । महामना माणिभद्र यक्ष युद्धसे भाग चले । राजन् ! उनके युद्धसे विमुख होते ही उस पर्वतपर राक्षसोंका महान् सिंहनाद सब ओर फैल गया ॥ १५ ॥

ततो दूरात् प्रददृशे धनाध्यक्षो गदाधरः । शुक्रप्रोष्ठपदाभ्यां च पद्मशङ्खसमावृतः ॥ १६ ॥

भावार्थ

इसी समय धनके स्वामी गदाधारी कुबेर दूरसे आते दिखायी दिये । उनके साथ शुक्र और प्रोष्ठपद नामक मन्त्री तथा शङ्ख और पद्मनामक धनके अधिष्ठाता देवता भी थे ॥ १६ ॥

स दृष्ट्वा भ्रातरं संख्ये शापाद् विभ्रष्टगौरवम् । उवाच वचनं धीमान् युक्तं पैतामहे कुले ॥ १७ ॥

भावार्थ

विश्रवा मुनिके शापसे क्रूर प्रकृति हो जानेके कारण जो गुरुजनोंके प्रति प्रणाम आदि व्यवहार भी नहीं कर पाता था— गुरुजनोचित शिष्टाचारसे भी वञ्चित था, उस अपने भाई रावणको युद्धमें उपस्थित देख बुद्धिमान् कुबेरने ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषके योग्य बात कही—॥ १७ ॥

यन्मया वार्यमाणस्त्वं नावगच्छसि दुर्मतेः । पश्चादस्य फलं प्राप्य ज्ञास्यसे निरयं गतः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘दुर्बुद्धि दशग्रीव ! मेरे मना करनेपर भी इस समय तुम समझ नहीं रहे हो, किंतु आगे चलकर जब इस कुकर्मका फल पाओगे और नरकमें पड़ोगे, उस समय मेरी बात तुम्हारी समझमें आयेगी ॥ १८ ॥

यो हि मोहाद् विषं पीत्वा नावगच्छति दुर्मतिः । स तस्य परिणामान्ते जानीते कर्मणः फलम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘जो खोटी बुद्धिवाला पुरुष मोहवश विषको पीकर भी उसे विष नहीं समझता है, उसे उसका परिणाम प्राप्त हो जानेपर अपने किये हुए उस कर्मके फलका ज्ञान होता है ॥ १९ ॥

दैवतानि न नन्दन्ति धर्मयुक्तेन केनचित् । येन त्वमीदृशं भावं नीतस्तच्च न बुद्ध्यसे ॥ २० ॥

भावार्थ

‘तुम्हारे किसी व्यापारसे, वह तुम्हारी मान्यताके अनुसार धर्मयुक्त ही क्यों न हो, देवता प्रसन्न नहीं होते हैं; इसीलिये तुम ऐसे क्रूरभावको प्राप्त हो गये हो, परंतु यह बात तुम्हारी समझमें नहीं आती है ॥ २० ॥

मातरं पितरं विप्रमाचार्यं चावमन्यते । स पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं गतः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘जो माता, पिता, ब्राह्मण और आचार्यका अपमान करता है, वह यमराजके वशमें पड़कर उस पापका फल भोगता है ॥ २१ ॥

अध्रुवे हि शरीरे यो न करोति तपोऽर्जनम् । स पश्चात् तप्यते मूढो मृतो गत्वाऽऽत्मनो गतिम् ॥२२॥

भावार्थ

‘यह शरीर क्षणभङ्गुर है । इसे पाकर जो तपका उपार्जन नहीं करता, वह मूर्ख मरनेके बाद जब उसे अपने दुष्कर्मोंका फल मिलता है, पश्चात्ताप करता है ॥ २२ ॥

धर्माद् राज्यं धनं सौख्यमधर्माद् दुःखमेव च । तस्माद् धर्मं सुखार्थाय कुर्यात् पापं विसर्जयेत् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘धर्मसे राज, धन और सुखकी प्राप्ति होती है । अधर्मसे केवल दुःख ही भोगना पड़ता है, अतः सुखके लिये धर्मका आचरण करे, पापको सर्वथा त्याग दे ॥ २३ ॥

पापस्य हि फलं दुःखं तद् भोक्तव्यमिहात्मना । तस्मादात्मापघातार्थं मूढः पापं करिष्यति ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘पापका फल केवल दुःख है और उसे स्वयं ही यहाँ भोगना पड़ता है; इसलिये जो मूढ़ पाप करेगा, वह मानो स्वयं ही अपना वध कर लेगा ॥२४॥

कस्यचिन्न हि दुर्बुद्धेरिच्छन्दतो जायते मतिः । यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘किसी भी दुर्बुद्धि पुरुषको ( शुभ कर्मका अनुष्ठान और गुरुजनोंकी सेवा किये बिना ) स्वेच्छामात्रसे उत्तम बुद्धिकी प्राप्ति नहीं होती । वह जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है ॥ २५ ॥

ऋद्धिं रूपं बलं पुत्रान् वित्तं शूरत्वमेव च । प्राप्नुवन्ति नरा लोके निर्जितं पुण्यकर्मभिः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘संसारके पुरुषोंको समृद्धि, सुन्दर रूप, बल, वैभव, वीरता तथा पुत्र आदिकी प्राप्ति पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे ही होती है ॥ २६ ॥

एवं निरयगामी त्वं यस्य ते मतिरीदृशी । नत्वां समभिभाषिष्येऽसद्वृत्तेष्वेव निर्णयः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘इसी प्रकार अपने दुष्कर्मोंके कारण तुम्हें भी नरकमें जाना पड़ेगा; क्योंकि तुम्हारी बुद्धि ऐसी पापासक्त हो रही है । दुराचारियोंसे बात नहीं करना चाहिये, यही शास्त्रोंका निर्णय है; अतः मैं भी अब तुमसे कोई बात नहीं करूँगा’ ॥ २७॥

एवमुक्तास्ततस्तेन तस्यामात्याः समाहताः । मारीचप्रमुखाः सर्वे विमुखा विप्रदुद्रुवुः ॥ २८॥

भावार्थ

इसी तरहकी बात उन्होंने रावणके मन्त्रियोंसे भी कही । फिर उनपर शस्त्रोंद्वारा प्रहार किया । इससे आहत होकर वे मारीच आदि सब राक्षस युद्धसे मुँह मोड़कर भाग गये ॥२८॥

ततस्तेन दशग्रीवो यक्षेन्द्रेण महात्मना । गदयाभिहतो मूर्ध्नि न च स्थानात् प्रकम्पितः ॥ २९ ॥

भावार्थ

तदनन्तर महामना यक्षराज कुबेरने अपनी गदासे रावणके मस्तकपर प्रहार किया । उससे आहत होकर भी वह अपने स्थानसे विचलित नहीं हुआ ॥ २९ ॥

ततस्तौ राम निघ्नन्तौ तदान्योन्यं महामृधे । न विह्वलौ न च श्रान्तौ तावुभौ यक्षराक्षसौ ॥ ३० ॥ आग्नेयमस्त्रं तस्मै स मुमोच धनदस्तदा । राक्षसेन्द्रो वारुणेन तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

श्रीराम ! तत्पश्चात् वे दोनों यक्ष और राक्षस—कुबेर तथा रावण दोनों उस महासमरमें एक दूसरेपर प्रहार करने लगे; परंतु दोनोंमेंसे कोई भी न तो घबराता था न थकता ही था ॥ उस समय कुबेरने रावणपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया, परंतु राक्षसराज रावणने वारुणास्त्रके द्वारा उनके उस अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ ३१ ॥

ततो मायां प्रविष्टोऽसौ राक्षसीं राक्षसेश्वरः । रूपाणां शतसाहस्रं विनाशाय चकार च ॥ ३२ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् उस राक्षसराजने राक्षसी मायाका आश्रय लिया और कुबेरका विनाश करनेके लिये लाखों रूप धारण कर लिये ॥ ३२ ॥

व्याघ्रो वराहो जीमूतः पर्वतः सागरो द्रुमः । यक्षो दैत्यस्वरूपी च सोऽदृश्यत दशाननः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उस समय दशमुख रावण बाघ, सूअर, मेघ, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, यक्ष और दैत्य सभी रूपोंमें दिखायी देने लगा ॥ ३३ ॥

बहूनि च करोति स्म दृश्यन्ते न त्वसौ ततः । प्रतिगृह्य ततो राम महदस्त्रं दशाननः ॥ ३४ ॥ जघान मूर्ध्नि धनदं व्याविद्ध्य महतीं गदाम् ।

भावार्थ

इस प्रकार वह बहुत-से रूप प्रकट करता था । वे रूप ही दिखायी देते थे, वह स्वयं दृष्टिगोचर नहीं होता था । श्रीराम ! तदनन्तर दशमुखने एक बहुत बड़ी गदा हाथमें ली और उसे घुमाकर कुबेरके मस्तकपर दे मारा ॥ ३४½ ॥

एवं स तेनाभिहतो विह्वलः शोणितोक्षितः ॥ ३५ ॥ कृत्तमूल इवाशोको निपपात धनाधिपः ।

भावार्थ

इस प्रकार रावणद्वारा आहत हो धनके स्वामी कुबेर रक्तसे नहा उठे और व्याकुल हो जड़से कटे हुए अशोककी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५½ ॥

ततः पद्मादिभिस्तत्र निधिभिः स तदा वृतः ॥ ३६ ॥ धनदोच्छ्वासितस्तैस्तु वनमानीय नन्दनम् ।

भावार्थ

तत्पश्चात् पद्म आदि निधियोंके अधिष्ठाता देवताओंने उन्हें घेरकर उठा लिया और नन्दनवनमें ले जाकर चेत कराया ॥ ३६½ ॥

निर्जित्य राक्षसेन्द्रस्तं धनदं हृष्टमानसः ॥ ३७ ॥ पुष्पकं तस्य जग्राह विमानं जयलक्षणम् ।

भावार्थ

इस तरह कुबेरको जीतकर राक्षसराज रावण अपने मनमें बहुत प्रसन्न हुआ और अपनी विजयके चिह्नके रूपमें उसने उनका पुष्पकविमान अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ३७½ ॥

काञ्चनस्तम्भसंवीतं वैदूर्यमणितोरणम् ॥ ३८ ॥ मुक्ताजालप्रतिच्छन्नं सर्वकालफलद्रुमम् ।

भावार्थ

उस विमानमें सोनेके खम्भे और वैदूर्यमणिके फाटक लगे थे । वह सब ओरसे मोतियोंकी जालीसे ढका हुआ था । उसके भीतर ऐसे-ऐसे वृक्ष लगे थे, जो सभी ऋतुओंमें फल देनेवाले थे ॥ ३८½ ॥

मनोजवं कामगमं कामरूपं विहंगमम् ॥ ३९ ॥ मणिकाञ्चनसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ।

भावार्थ

उसका वेग मनके समान तीव्र था । वह अपने ऊपर बैठे हुए लोगोंकी इच्छाके अनुसार सब जगह जा सकता था तथा चालक जैसा चाहे, वैसा छोटा या बड़ा रूप धारण कर लेता था । उस आकाशचारी विमानमें मणि और सुवर्णकी सीढ़ियाँ तथा तपाये हुए सोनेकी वेदियाँ बनी थीं ॥ ३९½ ॥

देवोपवाह्यमक्षय्यं सदा हृष्टिमनःसुखम् ॥ ४० ॥ ब्रह्माश्चर्यं भक्तिचित्रं ब्रह्मणा परिनिर्मितम् ।

भावार्थ

वह देवताओंका ही वाहन था और टूटने-फूटनेवाला नहीं था । सदा देखनेमें सुन्दर और चित्तको प्रसन्न करनेवाला था । उसके भीतर अनेक प्रकारके आश्चर्यजनक चित्र थे । उसकी दीवारोंपर तरह-तरहके बेल-बूटे बने थे, जिनसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी । ब्रह्मा (विश्वकर्मा) ने उसका निर्माण किया था ॥ ४०½ ॥

निर्मितं सर्वकामैस्तु मनोहरमनुत्तमम् ॥ ४१ ॥ न तु शीतं न चोष्णं च सर्वर्तुसुखदं शुभम् । स तं राजा समारुह्य कामगं वीर्यनिर्जितम् ॥ ४२ ॥ जितं त्रिभुवनं मेने दर्पोत्सेकात् सुदुर्मतिः । जित्वा वैश्रवणं देवं कैलासात् समवातरत् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

वह सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंसे सम्पन्न, मनोहर और परम उत्तम था । न अधिक ठंडा था और न अधिक गरम । सभी ऋतुओंमें आराम पहुँचानेवाला तथा मङ्गलकारी था । अपने पराक्रमसे जीते हुए उस इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर आरूढ़ हो अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला राजा रावण अहंकारकी अधिकतासे ऐसा मानने लगा कि मैंने तीनों लोकोंको जीत लिया । इस प्रकार वैश्रवणदेवको पराजित करके वह कैलाससे नीचे उतरा ॥ ४१-४३ ॥

स तेजसा विपुलमवाप्य तं जयं प्रतापवान् विमलकिरीटहारवान् । रराज वै परमविमानमास्थितो निशाचरः सदसि गतो यथानलः ॥ ४४ ॥

भावार्थ

निर्मल किरीट और हारसे विभूषित वह प्रतापी निशाचर अपने तेजसे उस महान् विजयको पाकर उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हो यज्ञमण्डपमें प्रज्वलित होनेवाले अग्निदेवकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ ४४ ॥

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