उत्तरकाण्ड, सर्ग 108
अवाङ्मुखमथो दीनं दृष्ट्वा सोममिवाप्लुतम् । राघवं लक्ष्मणो वाक्यं हृष्टो मधुरमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान दीन हो गये थे, उन्हें सिर झुकाये खेद करते देख लक्ष्मणने बड़े हर्षके साथ मधुर वाणीमें कहा—॥ १ ॥
न संतापं महाबाहो मदर्थं कर्तुमर्हसि । पूर्वनिर्माणबद्धा हि कालस्य गतिरीदृशी ॥ २ ॥ जहि मां सौम्य विस्रब्धं प्रतिज्ञां परिपालय । हीनप्रतिज्ञाः काकुत्स्थ प्रयान्ति नरकं नराः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! आपको मेरे लिये संताप नहीं करना चाहिये; क्योंकि पूर्वजन्मके कर्मोंसे बँधी हुई कालकी गति ऐसी ही है ॥ ‘सौम्य ! आप निश्चिन्त होकर मेरा वध कर डालें और ऐसा करके अपनी प्रतिज्ञाका पालन करें । काकुत्स्थ ! प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाले मनुष्य नरकमें पड़ते हैं ॥ ३ ॥
यदि प्रीतिर्महाराज यद्यनुग्राह्यता मयि । जहि मां निर्विशङ्कस्त्वं धर्मं वर्धय राघव ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! यदि आपका मुझपर प्रेम है और यदि आप मुझे कृपापात्र समझते हैं तो निःशङ्क होकर मुझे प्राणदण्ड दें । रघुनन्दन ! आप अपने धर्मकी वृद्धि करें’ ॥ ४ ॥
लक्ष्मणेन तथोक्तस्तु रामः प्रचलितेन्द्रियः । मन्त्रिणः समुपानीय तथैव च पुरोधसम् ॥ ५ ॥ अब्रवीच्च तदा वृत्तं तेषां मध्ये स राघवः । दुर्वासोऽभिगमं चैव प्रतिज्ञां तापसस्य च ॥ ६ ॥ तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणः सर्वे सोपाध्यायाः समासत । वसिष्ठस्तु महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ७ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर श्रीरामकी इन्द्रियाँ चञ्चल हो उठीं—वे धैर्यसे विचलित-से हो गये और मन्त्रियों तथा पुरोहितजीको बुलाकर उन सबके बीचमें वह सारा वृत्तान्त बताने लगे । श्रीरघुनाथजीने दुर्वासाके आगमन और तापस-रूपधारी कालके समक्ष की हुई प्रतिज्ञाकी बात भी बतायी ॥ यह सुनकर सब मन्त्री और उपाध्याय चुपचाप बैठे रह गये ( कोई कुछ बोल न सका ) । तब महातेजस्वी वसिष्ठजीने यह बात कही—॥ ७ ॥
दृष्टमेतन्महाबाहो क्षयं ते रोमहर्षणम् । लक्ष्मणेन वियोगश्च तव राम महायशः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! महायशस्वी श्रीराम ! इस समय जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला विकट विनाश आनेवाला है ( तुम्हारे साथ ही बहुत-से प्राणियोंका जो साकेत-गमन होनेवाला है ) और लक्ष्मणके साथ जो वियोग हो रहा है, यह सब मैंने तपोबल-द्वारा पहलेसे ही देख लिया है ॥ ८ ॥
त्यजैनं बलवान् कालो मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः । प्रतिज्ञायां हि नष्टायां धर्मो हि विलयं व्रजेत् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘काल बड़ा प्रबल है । तुम लक्ष्मणका परित्याग कर दो । प्रतिज्ञा झूठी न करो; क्योंकि प्रतिज्ञाके नष्ट होनेपर धर्मका लोप हो जायगा ॥ ९ ॥
ततो धर्मे विनष्टे तु त्रैलोक्यं सचराचरम् । सदेवर्षिगणं सर्वं विनश्येत् तु न संशयः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘धर्मका लोप होनेपर चराचर प्राणियों, देवताओं तथा ऋषियोंसहित सारी त्रिलोकी नष्ट हो जायगी । इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥
स त्वं पुरुषशार्दूल त्रैलोक्यस्याभिपालनात् । लक्ष्मणेन विना चाद्य जगत् स्वस्थं कुरुष्व ह ॥ ११ ॥ तेषां तत् समवेतानां वाक्यं धर्मार्थसंहितम् । श्रुत्वा परिषदो मध्ये रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘अतः पुरुषसिंह ! तुम त्रिभुवनकी रक्षापर दृष्टि रखते हुए लक्ष्मणको त्याग दो और उनके बिना अब धर्मपूर्वक स्थित रहकर सम्पूर्ण जगत्को स्वस्थ एवं सुखी बनाओ’ ॥ वहाँ एकत्र हुए मन्त्री, पुरोहित आदि सब सभासदोंकी उस सभाके बीच वसिष्ठ मुनिकी कही हुई वह बात सुनकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ १२ ॥
विसर्जये त्वां सौमित्रे मा भूद् धर्मविपर्ययः । त्यागो वधो वा विहितः साधूनां ह्यभयं समम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! मैं तुम्हारा परित्याग करता हूँ, जिससे धर्मका लोप न हो । साधु पुरुषोंका त्याग किया जाय अथवा वध—दोनों समान ही हैं’ ॥ १३ ॥
रामेण भाषिते वाक्ये बाष्पव्याकुलितेन्द्रियः । लक्ष्मणस्त्वरितं प्रायात् स्वगृहं न विवेश ह ॥ १४ ॥
भावार्थ
श्रीरामके इतना कहते ही लक्ष्मणके नेत्रोंमें आँसू भर आये । वे तुरंत वहाँसे चल दिये । अपने घर तक नहीं गये ॥ १४ ॥
स गत्वा सरयूतीरमुपस्पृश्य कृताञ्जलिः । निगृह्य सर्वस्रोतांसि निःश्वासं न मुमोच ह ॥ १५ ॥
भावार्थ
सरयूके किनारे जाकर उन्होंने आचमन किया और हाथ जोड़ सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके प्राणवायुको रोक लिया ॥ १५ ॥
अनिःश्वसन्तं युक्तं तं सशक्राः साप्सरोगणाः । देवाः सर्षिगणाः सर्वे पुष्पैरभ्यकिरंस्तदा ॥ १६ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणने योगयुक्त होकर श्वास लेना बंद कर दिया है— यह देख इन्द्र आदि सब देवता, ऋषि और अप्सराएँ उस समय उनपर फूलोंकी वर्षा करने लगीं ॥ १६ ॥
अदृश्यं सर्वमनुजैः सशरीरं महाबलम् । प्रगृह्य लक्ष्मणं शक्रस्त्रिदिवं संविवेश ह ॥ १७ ॥
भावार्थ
महाबली लक्ष्मण अपने शरीरके साथ ही सब मनुष्योंकी दृष्टिसे ओझल हो गये । उस समय देवराज इन्द्र उन्हें साथ लेकर स्वर्गमें चले गये ॥ १७ ॥
ततो विष्णोश्चतुर्भागमागतं सुरसत्तमाः । हृष्टाः प्रमुदिताः सर्वे पूजयन्ति स्म राघवम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
भगवान् विष्णुके चतुर्थ अंश लक्ष्मणको आया देख सभी देवता हर्षसे भर गये और उन सबने प्रसन्नतापूर्वक लक्ष्मणकी पूजा की ॥ १८ ॥
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