उत्तरकाण्ड, सर्ग 109
विसृज्य लक्ष्मणं रामो दुःखशोकसमन्वितः । पुरोधसं मन्त्रिणश्च नैगमांश्चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणका त्याग करके श्रीराम दुःख शोकमें मग्न हो गये तथा पुरोहित, मन्त्री और महाजनोंसे इस प्रकार बोले—॥१॥
अद्य राज्येऽभिषेक्ष्यामि भरतं धर्मवत्सलम् । अयोध्यायाः पतिं वीरं ततो यास्याम्यहं वनम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘आज मैं अयोध्याके राज्यपर धर्मवत्सल वीर भाई भरतका राजाके पदपर अभिषेक करूँगा । उसके बाद वनको चला जाऊँगा ॥ २ ॥
प्रवेशयत सम्भारान् मा भूत् कालात्ययो यथा । अद्यैवाहं गमिष्यामि लक्ष्मणेन गतां गतिम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘शीघ्र ही सब सामग्री जुटाकर ले आओ । अब अधिक समय नहीं बीतना चाहिये । मैं आज ही लक्ष्मणके पथका अनुसरण करूँगा’ ॥ ३ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं सर्वाः प्रकृतयो भृशम् । मूर्धभिः प्रणता भूमौ गतसत्त्वा इवाभवन् ॥ ४ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर प्रजावर्गके सभी लोग धरतीपर माथा टेककर पड़ गये और प्राणहीन-से हो गये ॥४॥
भरतश्च विसंज्ञोऽभूच्छ्रुत्वा राघवभाषितम् । राज्यं विगर्हयामास वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीकी वह बात सुनकर भरतका तो होश ही उड़ गया । वे राज्यकी निन्दा करने लगे और इस प्रकार बोले—॥ ५ ॥
सत्येनाहं शपे राजन् स्वर्गभोगेन चैव हि । न कामये यथा राज्यं त्वां विना रघुनन्दन ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! रघुनन्दन ! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके बिना मुझे राज्य नहीं चाहिये, स्वर्गका भोग भी नहीं चाहिये ॥ ६ ॥
इमौ कुशीलवौ राजन्नभिषिच्य नराधिप । कोशलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! नरेश्वर ! आप इन कुश और लवका राज्याभिषेक कीजिये । दक्षिण कोशलमें कुशको और उत्तर कोशलमें लवको राजा बनाइये ॥ ७ ॥
शत्रुघ्नस्य च गच्छन्तु दूतास्त्वरितविक्रमाः । इदं गमनमस्माकं शीघ्रमाख्यातु मा चिरम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘तेज चलनेवाले दूत शीघ्र ही शत्रुघ्नके पास भी जायँ और उन्हें हमलोगोंकी इस महायात्राका वृत्तान्त सुनायें । इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’ ॥ ८ ॥
तच्छ्रुत्वा भरतेनोक्तं दृष्ट्वा चापि ह्यधोमुखान् । पौरान् दुःखेन संतप्तान् वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥
भावार्थ
भरतकी बात सुनकर तथा पुरवासियोंको नीचे मुख किये दुःखसे संतप्त होते देख महर्षि वसिष्ठने कहा—॥ ९ ॥
वत्स राम इमाः पश्य धरणि प्रकृतीर्गताः । ज्ञात्वैषामीप्सितं कार्यं मा चैषां विप्रियं कृथाः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वत्स श्रीराम ! पृथ्वीपर पड़े हुए इन प्रजाजनोंकी ओर देखो । इनका अभिप्राय जानकर इसीके अनुसार कार्य करो । इनकी इच्छाके विपरीत करके इन बेचारोंका दिल न दुखाओ’ ॥ १० ॥
वसिष्ठस्य तु वाक्येन उत्थाप्य प्रकृतीजनम् । किं करोमीति काकुत्स्थः सर्वान् वचनमब्रवीत् ॥ ११ ॥
भावार्थ
वसिष्ठजीके कहनेसे श्रीरघुनाथजीने प्रजाजनोंको उठाया और सबसे पूछा—‘मैं आपलोगोंका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ ?’ ॥ ११ ॥
ततः सर्वाः प्रकृतयो रामं वचनमब्रुवन् । गच्छन्तमनुगच्छामो यत्र राम गमिष्यसि ॥ १२ ॥
भावार्थ
तब प्रजावर्गके सभी लोग श्रीरामसे बोले—‘रघुनन्दन ! आप जहाँ भी जायँगे, आपके पीछे-पीछे हम भी वहीं चलेंगे ॥ १२ ॥
पौरेषु यदि ते प्रीतिर्यदि स्नेहो ह्यनुत्तमः । सपुत्रदाराः काकुत्स्थ समं गच्छाम सत्पथम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘काकुत्स्थ ! यदि पुरवासियोंपर आपका प्रेम है, यदि हमपर आपका परम उत्तम स्नेह है तो हमें साथ चलनेकी आज्ञा दीजिये । हम अपने स्त्री-पुत्रोंसहित आपके साथ ही सन्मार्गपर चलनेको उद्यत हैं ॥ १३ ॥
तपोवनं वा दुर्गं वा नदीमम्भोनिधिं तथा । वयं ते यदि न त्याज्याः सर्वाभ्यो नय ईश्वर ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘स्वामिन् ! आप तपोवनमें या किसी दुर्गम स्थानमें अथवा नदी या समुद्रमें–जहाँ कहीं भी जायँ, हम सबको साथ ले चलें । यदि आप हमें त्याग देने योग्य नहीं मानते हैं तो ऐसा ही करें ॥ १४ ॥
एषा नः परमा प्रीतिरेष नः परमो वरः । हृद्गता नः सदा प्रीतिस्त्वानुगमने नृप ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘यही हमारे ऊपर आपकी सबसे बड़ी कृपा होगी और यही हमारे लिये आपका परम उत्तम वर होगा । आपके पीछे चलनेमें ही हमें सदा हार्दिक प्रसन्नता होगी’ ॥ १५ ॥
पौराणां दृढभक्तिं च बाढमित्येव सोऽब्रवीत् । स्वकृतात्तं चान्वेक्ष्य तस्मिन्नहनि राघवः ॥ १६ ॥ कोशलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् । अभिषिच्य महात्मानावुभौ रामः कुशीलवौ ॥ १७ ॥ अभिषिक्तौ सुतावङ्के प्रतिष्ठाप्य पुरे ततः । परिष्वज्य महाबाहुर्मूर्ध्न्युपाघ्राय चासकृत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
पुरवासियोंकी दृढ़ भक्ति देख श्रीरामने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी इच्छाका अनुमोदन किया और अपने कर्तव्यका निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने उसी दिन दक्षिण कोशलके राज्यपर वीर कुशको और उत्तर कोशलके राजसिंहासनपर लवको अभिषिक्त कर दिया । अभिषिक्त हुए अपने उन दोनों महामनस्वी पुत्र कुश और लवको गोदमें बिठाकर उनका गाढ़ आलिङ्गन करके महाबाहु श्रीरामने बारंबार उन दोनोंके मस्तक सूँघे; फिर उन्हें अपनी-अपनी राजधानीमें भेज दिया १६–१८
रथानां तु सहस्राणि नागानामयुतानि च । दशायुतानि चाश्वानामेकैकस्य धनं ददौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
उन्होंने अपने एक-एक पुत्रको कई हजार रथ, दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े दिये ॥ १९ ॥
बहुरत्नौ बहुधनौ हृष्टपुष्टजनावृतौ । स्वे पुरे प्रेषयामास भ्रातरौ तौ कुशीलवौ ॥ २० ॥
भावार्थ
दोनों भाई कुश और लव प्रचुर रत्न और धनसे सम्पन्न हो गये । वे हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे घिरे रहने लगे । उन दोनोंको श्रीरामने उनकी राजधानियोंमें भेज दिया ॥ २० ॥
अभिषिच्य ततो वीरौ प्रस्थाप्य स्वपुरे तदा । दूतान् सम्प्रेषयामास शत्रुघ्नाय महात्मने ॥ २१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उन दोनों वीरोंको अभिषिक्त करके अपने-अपने नगरमें भेजकर श्रीरघुनाथजीने महात्मा शत्रुघ्नके पास दूत भेजे ॥ २१ ॥
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