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उत्तरकाण्ड, सर्ग 107

तथा तयोः संवदतोर्दुर्वासा भगवानृषिः । रामस्य दर्शनाकाङ्क्षी राजद्वारमुपागमत् ॥ १ ॥

भावार्थ

इन दोनोंमें इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि महर्षि दुर्वासा राजद्वारपर आ पहुँचे । वे श्रीरामचन्द्रजीसे मिलना चाहते थे ॥ १ ॥

सोऽभिगम्य तु सौमित्रिमुवाच ऋषिसत्तमः । रामं दर्शय मे शीघ्रं पुरा मेऽर्थोऽतिवर्तते ॥ २ ॥

भावार्थ

उन मुनिश्रेष्ठने सुमित्राकुमार लक्ष्मणके पास जाकर कहा—‘तुम शीघ्र ही मुझे श्रीरामचन्द्रजीसे मिला दो । उनसे मिले बिना मेरा एक काम बिगड़ रहा है’ ॥ २ ॥

मुनेस्तु भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा । अभिवाद्य महात्मानं वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ३ ॥

भावार्थ

मुनिकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने उन महात्माको प्रणाम करके यह बात कही—॥३॥

किं कार्यं ब्रूहि भगवन् को ह्यर्थः किं करोम्यहम् । व्यग्रो हि राघवो ब्रह्मन् मुहूर्तं परिपाल्यताम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘भगवन् ! बताइये, आपका कौन-सा काम है ? क्या प्रयोजन है ? और मैं आपकी कौन-सी सेवा करूँ ? ब्रह्मन् ! इस समय श्रीरघुनाथजी दूसरे कार्यमें संलग्न हैं; अतः दो घड़ीतक उनकी प्रतीक्षा कीजिये’ ॥ ४ ॥

तच्छ्रुत्वा ऋषिशार्दूलः क्रोधेन कलुषीकृतः । उवाच लक्ष्मणं वाक्यं निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ ५ ॥

भावार्थ

यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा रोषसे तमतमा उठे और लक्ष्मणकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो अपनी नेत्राग्निसे उन्हें भस्म कर डालेंगे । साथ ही उनसे इस प्रकार बोले—॥५॥

अस्मिन् क्षणे मां सौमित्रे रामाय प्रतिवेदय । अस्मिन् क्षणे मां सौमित्रे न निवेदयसे यदि । विषयं त्वां पुरं चैव शपिष्ये राघवं तथा ॥ ६ ॥ भरतं चैव सौमित्रे युष्माकं या च संततिः । न हि शक्ष्याम्यहं भूयो मन्युं धारयितुं हृदि ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘सुमित्राकुमार ! इसी क्षण श्रीरामको मेरे आगमनकी सूचना दो । यदि अभी-अभी उनसे मेरे आगमनका समाचार नहीं निवेदन करोगे तो मैं इस राज्यको, नगरको, तुमको, श्रीरामको, भरतको और तुमलोगोंकी जो संतति है, उसको भी शाप दे दूँगा । मैं पुनः इस क्रोधको अपने हृदयमें धारण नहीं कर सकूँगा’ ॥ ६-७ ॥

तच्छ्रुत्वा घोरसंकाशं वाक्यं तस्य महात्मनः । चिन्तयामास मनसा तस्य वाक्यस्य निश्चयम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

उन महात्माका यह घोर वचन सुनकर लक्ष्मणने उनकी वाणीसे जो निश्चय प्रकट हो रहा था, उसपर मन-ही-मन विचार किया ॥ ८ ॥

एकस्य मरणं मेऽस्तु मा भूत् सर्वविनाशनम् । इति बुद्ध्या विनिश्चित्य राघवाय न्यवेदयत् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘अकेले मेरी ही मृत्यु हो, यह अच्छा है; किंतु सबका विनाश नहीं होना चाहिये’ अपनी बुद्धिद्वारा ऐसा निश्चय करके लक्ष्मणने श्रीरघुनाथजीसे दुर्वासाके आगमनका समाचार निवेदन किया ॥ ९ ॥

लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामः कालं विसृज्य च । निःसृत्य त्वरितो राजा अत्रेः पुत्रं ददर्श ह ॥ १० ॥

भावार्थ

लक्ष्मणकी बात सुनकर राजा श्रीराम कालको बिदा करके तुरंत ही निकले और अत्रिपुत्र दुर्वासासे मिले ॥ १० ॥

सोऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा । किं कार्यमिति काकुत्स्थः कृताञ्जलिरभाषत ॥ ११ ॥

भावार्थ

अपने तेजसे प्रज्वलित-से होते हुए महात्मा दुर्वासाको प्रणाम करके श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर पूछा—‘महर्षे ! मेरे लिये क्या आज्ञा है ?’ ॥ ११ ॥

तद् वाक्यं राघवेणोक्तं श्रुत्वा मुनिवरः प्रभुः । प्रत्याह रामं दुर्वासाः श्रूयतां धर्मवत्सल ॥ १२ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीकी कही हुई उस बातको सुनकर प्रभावशाली मुनिवर दुर्वासा उनसे बोले—‘धर्मवत्सल ! सुनिये ॥१२॥

अद्य वर्षसहस्रस्य समाप्तिर्मम राघव । सोऽहं भोजनमिच्छामि यथासिद्धं तवानघ ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘निष्पाप रघुनन्दन ! मैंने एक हजार वर्षोंतक उपवास किया । आज मेरे उस व्रतकी समाप्तिका दिन है, इसलिये इस समय आपके यहाँ जो भी भोजन तैयार हो, उसे मैं ग्रहण करना चाहता हूँ’ ॥ १३ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं राजा राघवः प्रीतमानसः । भोजनं मुनिमुख्याय यथासिद्धमुपाहरत् ॥ १४ ॥

भावार्थ

यह सुनकर राजा श्रीरघुनाथजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उन मुनिश्रेष्ठको तैयार भोजन परोसा ॥१४॥

स तु भुक्त्वा मुनिश्रेष्ठस्तदन्नममृतोपमम् । साधु रामेति सम्भाष्य स्वमाश्रममुपागमत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

वह अमृतके समान अन्न ग्रहण करके दुर्वासा मुनि तृप्त हुए और श्रीरघुनाथजीको साधुवाद दे अपने आश्रमपर चले आये ॥ १५ ॥

तस्मिन् गते मुनिवरे स्वाश्रमं लक्ष्मणाग्रजः । संस्मृत्य कालवाक्यानि ततो दुःखमुपागमत् ॥ १६ ॥

भावार्थ

मुनिवर दुर्वासाके अपने आश्रमको चले जानेपर लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीराम कालके वचनोंका स्मरण करके दुखी हो गये ॥ १६ ॥

दुःखेन च सुसन्तप्तः स्मृत्वा तद्घोरदर्शनम् । अवाङ्मुखो दीनमना व्याहर्तुं न शशाक ह ॥ १७ ॥

भावार्थ

भयंकर भावी भ्रातृवियोगके दृश्यको दृष्टिपथमें लानेवाले कालके उस वचनपर विचार करके श्रीरामके मनमें बड़ा दुःख हुआ । उनका मुँह नीचेको झुक गया और वे कुछ बोल न सके ॥ १७ ॥

ततो बुद्ध्या विनिश्चित्य कालवाक्यानि राघवः । नैतदस्तीति निश्चित्य तूष्णीमासीन्महायशाः ॥ १८ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् कालके वचनोंपर बुद्धिपूर्वक सोच-विचार करके महायशस्वी श्रीरघुनाथजी इस निर्णयपर पहुँचे कि ‘अब यह सब कुछ भी न रहेगा ।’ ऐसा सोचकर वे चुप हो रहे ॥ १८ ॥

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