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उत्तरकाण्ड, सर्ग 106

शृणु राजन् महासत्त्व यदर्थमहमागतः । पितामहेन देवेन प्रेषितोऽस्मि महाबल ॥ १ ॥

भावार्थ

‘महाबली महान् सत्त्वशाली महाराज ! पितामह भगवान् ब्रह्माने जिस उद्देश्यसे मुझे यहाँ भेजा है और जिसके लिये मैं यहाँ आया हूँ; वह सब बताता हूँ; सुनिये ॥ १ ॥

तवाहं पूर्वके भावे पुत्रः परपुरंजय । मायासम्भावितो वीर कालः सर्वसमाहरः ॥ २ ॥

भावार्थ

शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले वीर ! पूर्वावस्थामें अर्थात् हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिके समय मैं मायाद्वारा आपसे उत्पन्न हुआ था, इसलिये आपका पुत्र हूँ । मुझे सर्वसंहारकारी काल कहते हैं ॥ २ ॥

पितामहश्च भगवानाह लोकपतिः प्रभुः । समयस्ते कृतः सौम्य लोकान् सम्परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘लोकनाथ प्रभु भगवान् पितामहने कहा है कि ‘सौम्य ! आपने लोकोंकी रक्षाके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, वह पूरी हो गयी ॥ ३ ॥

संक्षिप्य हि पुरा लोकान् मायया स्वयमेव हि । महार्णवे शयानोऽप्सु मां त्वं पूर्वमजीजनः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘पूर्वकालमें समस्त लोकोंको मायाके द्वारा स्वयं ही अपने-में लीन करके आपने महासमुद्रके जलमें शयन किया था । फिर इस सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले मुझे उत्पन्न किया ॥४॥

भोगवन्तं ततो नागमनन्तमुदकेशयम् । मायया जनयित्वा त्वं द्वौ च सत्त्वौ महाबलौ ॥ ५ ॥ मधुं च कैटभं चैव ययोरस्थिचयैर्वृता । इयं पर्वतसम्बाधा मेदिनी चाभवत् तदा ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘इसके बाद विशाल फण और शरीरसे युक्त एवं जलमें शयन करनेवाले ‘अनन्त’ संज्ञक नागको मायाद्वारा प्रकट करके आपने दो महाबली जीवोंको जन्म दिया, जिनका नाम था मधु और कैटभ; इन्हींके अस्थि-समूहोंसे भरी हुई यह पर्वतोंसहित पृथिवी तत्काल प्रकट हुई, जो ‘मेदिनी’ कहलायी ॥ ५-६ ॥

पद्मे दिव्येऽर्कसंकाशे नाभ्यामुत्पाद्य मामपि । प्राजापत्यं त्वया कर्म मयि सर्वं निवेशितम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘आपकी नाभिसे सूर्य-तुल्य तेजस्वी दिव्य कमल प्रकट हुआ, जिसमें आपने मुझको भी उत्पन्न किया और प्रजाकी सृष्टि रचनेका सारा कार्यभार मुझपर ही रख दिया ॥ ७ ॥

सोऽहं संन्यस्तभारो हि त्वामुपास्य जगत्पतिम् । रक्षां विधत्स्व भूतेषु मम तेजस्करो भवान् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘जब मुझपर यह भार रख दिया गया, तब मैंने आप जगदीश्वरकी उपासना करके प्रार्थना की—‘प्रभो ! आप सम्पूर्ण भूतोंमें रहकर उनकी रक्षा कीजिये; क्योंकि आप ही मुझे तेज (ज्ञान और क्रिया-शक्ति) प्रदान करनेवाले हैं’ ॥८॥

ततस्त्वमसि दुर्धर्षात् तस्माद् भावात् सनातनात् । रक्षां विधास्यन् भूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘तब आप मेरा अनुरोध स्वीकार करके प्राणियोंकी रक्षाके लिये अपरिमेय सनातन पुरुषरूपसे जगत्पालक विष्णुके रूपमें प्रकट हुए ॥ ९ ॥

अदित्यां वीर्यवान् पुत्रो भ्रातृणां वीर्यवर्धनः । समुत्पन्नेषु कृत्येषु तेषां साह्याय कल्पसे ॥ १० ॥

भावार्थ

‘फिर आपने ही अदितिके गर्भसे परम पराक्रमी वामन-रूपमें अवतार लिया । तबसे आप अपने भाई इन्द्रादि देवताओं-की शक्ति बढ़ाते और आवश्यकता पड़नेपर उनकी रक्षाके लिये उद्यत रहते हैं ॥ १० ॥

स त्वमुज्जास्यमानासु प्रजासु जगतां वर । रावणस्य वधाकाङ्क्षी मानुषेषु मनोऽदधाः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘जगदीश्वर ! जब रावणके द्वारा प्रजाका विनाश होने लगा, उस समय आपने उस निशाचरका वध करनेकी इच्छासे मनुष्य-शरीरमें अवतार लेनेका निश्चय किया ॥ ११ ॥

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । कृत्वा वासस्य नियमं स्वयमेवात्मना पुरा ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘और स्वयं ही ग्यारह हजार वर्षोंतक मर्त्यलोकमें निवास करनेकी अवधि निश्चित की थी ॥ १२ ॥

स त्वं मनोमयः पुत्रः पूर्णायुर्मानुषेष्विह । कालोऽयं ते नरश्रेष्ठ समीपमुपवर्तितुम् ॥ १३ ॥ यदि भूयो महाराज प्रजा इच्छस्युपासितुम् । वस वा वीर भद्रं ते एवमाह पितामहः ॥ १४ ॥ अथ वा विजिगीषा ते सुरलोकाय राघव । सनाथा विष्णुना देवा भवन्तु विगतज्वराः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! आप मनुष्य-लोकमें अपने संकल्पसे ही किसीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए हैं । इस अवतारमें आपने अपनी जितने समय तककी आयु निश्चित की थी, वह पूरी हो गयी; अतः अब आपके लिये यह हमलोगोंके समीप आनेका समय है ॥ ‘वीर महाराज ! यदि और अधिक कालतक यहाँ रहकर प्रजाजनोंका पालन करनेकी इच्छा हो तो आप रह सकते हैं । आपका कल्याण हो । रघुनन्दन ! अथवा यदि परमधाम-में पधारनेका विचार हो तो अवश्य आवें । आप विष्णुदेवके स्वधाममें प्रतिष्ठित होनेपर सम्पूर्ण देवता सनाथ एवं निश्चिन्त हो जायँ—ऐसा पितामहने कहा है’ ॥ १४-१५ ॥

श्रुत्वा पितामहेनोक्तं वाक्यं कालसमीरितम् । राघवः प्रहसन् वाक्यं सर्वसंहारमब्रवीत् ॥ १६ ॥

भावार्थ

कालके मुखसे कहे गये पितामह ब्रह्माके संदेशको सुनकर श्रीरघुनाथजी हँसते हुए उस सर्वसंहारी कालसे बोले—॥१६॥

श्रुत्वा मे देवदेवस्य वाक्यं परममद्भुतम् । प्रीतिर्हि महती जाता तवागमनसम्भवा ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘काल ! देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह परम अद्भुत वचन सुननेको मिला; इसलिये तुम्हारे आनेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ १७ ॥

त्रयाणामपि लोकानां कार्यार्थं मम सम्भवः । भद्रं तेऽस्तु गमिष्यामि यत एवाहमागतः ॥ १८ ॥ हृद्गतो ह्यसि सम्प्राप्तो न मे तत्र विचारणा । मया हि सर्वकृत्येषु देवानां वशवर्तिना । स्थातव्यं सर्वसंहार यथा ह्याह पितामहः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘तीनों लोकोंके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये ही मेरा यह अवतार हुआ था, वह उद्देश्य अब पूरा हो गया; इसलिये तुम्हारा कल्याण हो; अब मैं जहाँसे आया था वहीं चलूँगा ॥ ‘काल ! मैंने मनसे तुम्हारा चिन्तन किया था । उसीके अनुसार तुम यहाँ आये हो; अतः इस विषयको लेकर मेरे मनमें कोई विचार नहीं है । सर्वसंहारकारी काल ! मुझे सभी कार्योंमें सदा देवताओंका वशवर्ती होकर ही रहना चाहिये, जैसा कि पितामहका कथन है’ ॥ १९ ॥

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