सुन्दरकाण्ड, सर्ग 68
अथाहमुत्तरं देव्या पुनरुक्तः ससम्भ्रमम् । तव स्नेहान्नरव्याघ्र सौहार्दादनुमान्य च ॥ १ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह रघुनन्दन ! आपके प्रति स्नेह और सौहार्दके कारण देवी सीताने मेरा सत्कार करके जानेके लिये उतावले हुए मुझसे पुनः यह उत्तम बात कही—॥ १ ॥
एवं बहुविधं वाच्यो रामो दाशरथिस्त्वया । यथा मां प्राप्नुयाच्छीघ्रं हत्वा रावणमाहवे ॥ २ ॥
भावार्थ
‘‘पवनकुमार ! तुम दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामसे अनेक प्रकारसे ऐसी बातें कहना, जिससे वे समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करके मुझे प्राप्त कर लें ॥ २ ॥
यदि वा मन्यसे वीर वसैकाहमरिंदम । कस्मिंश्चित् संवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि ॥३॥
भावार्थ
‘‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर ! यदि तुम ठीक समझो तो यहाँ किसी गुप्त स्थानमें एक दिनके लिये ठहर जाओ । आज विश्राम करके कल सबेरे यहाँसे चले जाना ॥ ३ ॥
मम चाप्यल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर । अस्य शोकविपाकस्य मुहूर्तं स्याद् विमोक्षणम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘‘वानर ! तुम्हारे निकट रहनेसे मुझ मन्दभागिनीको इस शोकविपाकसे थोड़ी देरके लिये भी छुटकारा मिल जाय ॥४॥
गते हि त्वयि विक्रान्ते पुनरागमनाय वै । प्राणानामपि संदेहो मम स्यान्नात्र संशयः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘‘तुम पराक्रमी वीर हो । जब पुनः आनेके लिये यहाँसे चले जाओगे, तब मेरे प्राणोंके लिये भी संदेह उपस्थित हो जायगा । इसमें संशय नहीं है ॥ ५ ॥
तवादर्शनजः शोको भूयो मां परितापयेत् । दुःखाद् दुःखपराभूतां दुर्गतां दुःखभागिनीम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘‘तुम्हें न देखनेसे होनेवाला शोक दुःख-पर-दुःख उठाने-से पराभव तथा दुर्गतिमें पड़ी हुई मुझ दुखियाको और भी संताप देता रहेगा ॥ ६ ॥
अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः । सुमहांस्त्वत्सहायेषु हर्यृक्षेषु हरीश्वर ॥ ७ ॥ कथं नु खलु दुष्पारं तरिष्यन्ति महोदधिम् । तानि हर्यृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘‘वीर ! वानरराज ! मेरे सामने यह महान् संदेह-सा खड़ा हो गया है कि तुम जिनके सहायक हो, उन वानरों और भालुओंके होते हुए भी रीछों और वानरोंकी वे सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण इस अपार पारावार-को कैसे पार करेंगे ? ॥ ७-८ ॥
त्रयाणामेव भूतानां सागरस्यास्य लङ्घने । शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य वायोर्वा तव चानघ ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘‘निष्पाप पवनकुमार ! तीन ही भूतोंमें इस समुद्रको लाँघनेकी शक्ति देखी जाती है—विनतानन्दन गरुड़में, वायुदेवतामें और तुममें ॥ ९ ॥
तदस्मिन् कार्यनियोगे वीरैवं दुरतिक्रमे । किं पश्यसि समाधानं ब्रूहि कार्यविदां वर ॥ १० ॥
भावार्थ
‘‘वीर ! जब इस प्रकार इस कार्यका साधन दुष्कर हो गया है, तब इसकी सिद्धिके लिये तुम कौन-सा समाधान (उपाय) देखते हो । कार्यसिद्धिके उपाय जाननेवालोंमें तुम श्रेष्ठ हो, अतः मेरी बातका उत्तर दो ॥ १० ॥
काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने । पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते बलोदयः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘‘विपक्षी वीरोंका नाश करनेवाले कपिश्रेष्ठ ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्यकी सिद्धिके लिये तुम अकेले ही बहुत हो, तथापि तुम्हारे बलका यह उद्रेक तुम्हारे लिये ही यशकी वृद्धि करनेवाला होगा ( श्रीरामके लिये नहीं ) ॥ ११ ॥
बलैः समग्रैर्यदि मां हत्वा रावणमाहवे । विजयी स्वपुरीं रामो नयेत् तत् स्याद् यशस्करम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘‘यदि श्रीराम अपनी सम्पूर्ण सेनाके साथ यहाँ आकर युद्धमें रावणको मार डालें और विजयी होकर मुझे अपनी पुरीको ले चलें तो यह उनके लिये यशकी वृद्धि करनेवाला होगा ॥ १२ ॥
यथाहं तस्य वीरस्य वनादुपधिना हृता । रक्षसा तद्भयादेव तथा नार्हति राघवः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘‘जिस प्रकार राक्षस रावणने वीरवर भगवान् श्रीरामके भयसे ही उनके सामने न जाकर छलपूर्वक वनसे मेरा अपहरण किया था, उस तरह श्रीरघुनाथजीको मुझे नहीं प्राप्त करना चाहिये ( वे रावणको मारकर ही मुझे ले चलें ) ॥१३॥
बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः । मां नयेद् यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘‘शत्रुसेनाका संहार करनेवाले ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम यदि अपने सैनिकोंद्वारा लङ्काको पददलित करके मुझे अपने साथ ले जायँ तो यह उनके योग्य पराक्रम होगा ॥ १४ ॥
तद् यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः । भवत्याहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘‘महात्मा श्रीराम संग्राममें शौर्य प्रकट करनेवाले हैं, अतः जिस प्रकार उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो सके, वैसा ही उपाय तुम करो’ ॥ १५ ॥
तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम् । निशम्याहं ततः शेषं वाक्यमुत्तरमब्रवम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘सीतादेवीके उस अभिप्राययुक्त, विनयपूर्ण और युक्तिसंगत वचनको सुनकर अन्तमें मैंने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १६ ॥
देवि हर्यृक्षसैन्यानामीश्वरः प्लवतां वरः । सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नस्त्वदर्थे कृतनिश्चयः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘‘देवि ! वानर और भालुओंकी सेनाके स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव बड़े शक्तिशाली हैं। वे आपका उद्धार करनेके लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं ॥ १७ ॥
तस्य विक्रमसम्पन्नाः सत्त्ववन्तो महाबलाः । मनःसंकल्पसदृशा निदेशे हरयः स्थिताः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘‘उनके पास पराक्रमी, शक्तिशाली और महाबली वानर हैं, जो मनके संकल्पके समान तीव्र गतिसे चलते हैं। वे सब-के-सब सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं ॥ १८ ॥
येषां नोपरि नाधस्तान्न तिर्यक् सज्जते गतिः । न च कर्मसु सीदन्ति महत्स्वमिततेजसः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘‘नीचे, ऊपर और अगल-बगलमें कहीं भी उनकी गति नहीं रुकती है। वे अमिततेजस्वी वानर बड़े-से-बड़े कार्य आ पड़नेपर भी कभी शिथिल नहीं होते हैं ॥ १९ ॥
असकृत् तैर्महाभागैर्वानरैर्बलसंयुतैः । प्रदक्षिणीकृता भूमिर्वायुमार्गानुसारिभिः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘‘वायुमार्ग ( आकाश ) का अनुसरण करनेवाले उन महाभाग बलवान् वानरोंने अनेक बार इस पृथ्वीकी परिक्रमा की है ॥ २० ॥
मद्विशिष्टाश्च तुल्याश्च सन्ति तत्र वनौकसः । मत्तः प्रत्यवरः कश्चिन्नास्ति सुग्रीवसंनिधौ ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘‘वहाँ मुझसे बढ़कर तथा मेरे समान शक्तिशाली बहुत-से वानर हैं। सुग्रीवके पास कोई ऐसा वानर नहीं है, जो मुझसे किसी बातमें कम हो ॥ २१ ॥
अहं तावदिह प्राप्तः किं पुनस्ते महाबलाः । नहि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘‘जब मैं ही यहाँ आ गया, तब फिर उन महाबली वानरोंके आनेमें क्या संदेह हो सकता है ? आप जानती होंगी कि दूत या घावन बनाकर वे ही लोग भेजे जाते हैं, जो निम्नश्रेणीके होते हैं। अच्छी श्रेणीके लोग नहीं भेजे जाते ॥२२॥
तदलं परितापेन देवि मन्युरपैतु ते । एकोत्पातेन ते लङ्कामेष्यन्ति हरियूथपाः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘‘अतः देवि ! अब संताप करनेकी आवश्यकता नहीं है। आपका मानसिक दुःख दूर हो जाना चाहिये। वे वानरयूथपति एक ही छलाँगमें लङ्कामें पहुँच जायँगे ॥ २३ ॥
मम पृष्ठगतौ तौ च चन्द्रसूर्याविवोदितौ । त्वत्सकाशं महाभागे नृसिंहावागमिष्यतः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘‘महाभागे ! वे पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण भी उदयाचलपर उदित होनेवाले चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति मेरी पीठपर बैठकर आपके पास आ जायँगे ॥ २४ ॥
अरिघ्नं सिंहसंकाशं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् । लक्ष्मणं च धनुष्मन्तं लङ्काद्वारमुपागतम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘‘आप शीघ्र ही देखेंगी कि सिंहके समान पराक्रमी शत्रुनाशक श्रीराम और लक्ष्मण हाथमें धनुष लिये लङ्काके द्वारपर आ पहुँचे हैं ॥ २५ ॥
नखदंष्ट्रायुधान् वीरान् सिंहशार्दूलविक्रमान् । वानरान् वारणेन्द्राभान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि संगतान् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘‘नख और दाढ़ें ही जिनके आयुध हैं, जो सिंह और बाघके समान पराक्रमी हैं तथा बड़े-बड़े गजराजोंके समान जिनकी विशाल काया है, उन वीर वानरोंको आप शीघ्र ही यहाँ एकत्र हुआ देखेंगी ॥ २६ ॥
शैलाम्बुदनिकाशानां लङ्कामलयसानुषु । नर्दतां कपिमुख्यानां नचिराच्छ्रोष्यसे स्वनम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘‘लङ्कावर्ती मलयपर्वतके शिखरोंपर पहाड़ों और मेघोंके समान विशाल शरीरवाले प्रधान-प्रधान वानर आकर गर्जना करेंगे और आप शीघ्र ही उनका सिंहनाद सुनेंगी ॥ २७ ॥
निवृत्तवनवासं च त्वया सार्धमरिंदमम् । अभिषिक्तमयोध्यायां क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘‘आपको जल्दी ही यह देखनेका भी सौभाग्य प्राप्त होगा कि शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीरघुनाथजी वनवासकी अवधि पूरी करके आपके साथ अयोध्यामें जाकर वहाँके राज्यपर अभिषिक्त हो गये हैं’ ॥ २८ ॥
ततो मया वाग्भिरदीनभाषिणी शिवाभिरिष्टाभिरभिप्रसादिता । उवाह शान्तिं मम मैथिलात्मजा तवातिशोकेन तथातिपीडिता ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘‘आपके अत्यन्त शोकसे बहुत ही पीड़ित होनेपर भी जिनकी वाणीमें कभी दीनता नहीं आने पाती, उन मिथिलेशकुमारीको जब मैंने प्रिय एवं मङ्गलमय वचनोंद्वारा सान्त्वना देकर प्रसन्न किया, तब उनके मनको कुछ शान्ति मिली’ ॥ २९ ॥
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