युद्धकाण्ड, सर्ग 1
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं यथावदभिभाषितम् । रामः प्रीतिसमायुक्तो वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके द्वारा यथावत्रूपसे कहे हुए इन वचनोंको सुनकर भगवान् श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार उत्तम वचन बोले—॥ १ ॥
कृतं हनूमता कार्यं सुमहद् भुवि दुर्लभम् । मनसापि यदन्येन न शक्यं धरणीतले ॥ २ ॥
भावार्थ
‘हनुमान्ने बड़ा भारी कार्य किया है । भूतलपर ऐसा कार्य होना कठिन है । इस भूमण्डलमें दूसरा कोई तो ऐसा कार्य करनेकी बात मनके द्वारा सोच भी नहीं सकता ॥ २ ॥
नहि तं परिपश्यामि यस्तरेत महोदधिम् । अन्यत्र गरुडाद् वायोरन्यत्र च हनूमतः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘गरुड़, वायु और हनुमान्को छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो महासागरको लाँघ सके ॥ ३ ॥
देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । अप्रधृष्यां पुरीं लङ्कां रावणेन सुरक्षिताम् ॥ ४ ॥ प्रविष्टः सत्त्वमाश्रित्य जीवन् को नाम निष्क्रमेत् ।
भावार्थ
‘देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस—इनमेंसे किसीके लिये भी जिसपर आक्रमण करना असम्भव है तथा जो रावणके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित है, उस लङ्कापुरीमें अपने बलके भरोसे प्रवेश करके कौन वहाँसे जीवित निकल सकता है ? ॥ ४½ ॥
को विशेत् सुदुराधर्षां राक्षसैश्च सुरक्षिताम् ॥ ५ ॥ यो वीर्यबलसम्पन्नो न समः स्याद्धनूमतः ।
भावार्थ
‘जो हनुमान्के समान बल-पराक्रमसे सम्पन्न न हो, ऐसा कौन पुरुष राक्षसोंद्वारा सुरक्षित अत्यन्त दुर्जय लङ्कामें प्रवेश कर सकता है ॥ ५½ ॥
भृत्यकार्यं हनुमता सुग्रीवस्य कृतं महत् । एवं विधाय स्वबलं सदृशं विक्रमस्य च ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘हनुमान्ने समुद्र-लङ्घन आदि कार्योंके द्वारा अपने पराक्रमके अनुरूप बल प्रकट करके एक सच्चे सेवकके योग्य सुग्रीवका बहुत बड़ा कार्य सम्पन्न किया है ॥ ६ ॥
यो हि भृत्यो नियुक्तः सन् भर्त्रा कर्मणि दुष्करे । कुर्यात् तदनुरागेण तमाहुः पुरुषोत्तमम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जो सेवक स्वामीके द्वारा किसी दुष्कर कार्यमें नियुक्त होनेपर उसे पूरा करके तदनुरूप दूसरे कार्यको भी ( यदि वह मुख्य कार्यका विरोधी न हो ) सम्पन्न करता है, वह सेवकोंमें उत्तम कहा गया है ॥ ७ ॥
यो नियुक्तः परं कार्यं न कुर्यान्नृपतेः प्रियम् । भृत्यो युक्तः समर्थश्च तमाहुर्मध्यमं नरम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जो एक कार्यमें नियुक्त होकर योग्यता और सामर्थ्य होनेपर भी स्वामीके दूसरे प्रिय कार्यको नहीं करता ( स्वामीने जितना कहा है, उतना ही करके लौट आता है ) वह मध्यम श्रेणीका सेवक बताया गया है ॥ ८ ॥
नियुक्तो नृपतेः कार्यं न कुर्याद् यः समाहितः । भृत्यो युक्तः समर्थश्च तमाहुः पुरुषाधमम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जो सेवक मालिकके किसी कार्यमें नियुक्त होकर अपनेमें योग्यता और सामर्थ्यके होते हुए भी उसे सावधानीसे पूरा नहीं करता, वह अधम कोटिका कहा गया है ॥ ९ ॥
तन्नियोगे नियुक्तेन कृतं कृत्यं हनूमता । न चात्मा लघुतां नीतः सुग्रीवश्चापि तोषितः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘हनुमान्ने स्वामीके एक कार्यमें नियुक्त होकर उसके साथ ही दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्योंको भी पूरा किया, अपने गौरवमें भी कमी नहीं आने दी—अपने-आपको दूसरोंकी दृष्टिमें छोटा नहीं बनने दिया और सुग्रीवको भी पूर्णतः संतुष्ट कर दिया ॥ १० ॥
अहं च रघुवंशश्च लक्ष्मणश्च महाबलः । वैदेह्या दर्शनेनाद्य धर्मतः परिरक्षिताः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘आज हनुमान्ने विदेहनन्दिनी सीताका पता लगाकर— उन्हें अपनी आँखों देखकर धर्मके अनुसार मेरी, समस्त रघुवंशकी और महाबली लक्ष्मणकी भी रक्षा की है ॥ ११ ॥
इदं तु मम दीनस्य मनो भूयः प्रकर्षति । यदिहास्य प्रियाख्यातुर्न कुर्मि सदृशं प्रियम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तुका अभाव है, यह बात मेरे मनमें बड़ी कसक पैदा कर रही है कि यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया, उसका मैं कोई वैसा ही प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ ॥ १२ ॥
एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः । मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘इस समय इन महात्मा हनुमान्को मैं केवल अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ, क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है’ ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वा प्रीतिहृष्टाङ्गो रामस्तं परिषस्वजे । हनूमन्तं कृतात्मानं कृतकार्यमुपागतम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
ऐसा कहते-कहते रघुनाथजीके अङ्ग-प्रत्यङ्ग प्रेमसे पुलकित हो गये और उन्होंने अपनी आज्ञाके पालनमें सफलता पाकर लौटे हुए पवित्रात्मा हनुमान्जीको हृदयसे लगा लिया ॥१४॥
ध्यात्वा पुनरुवाचेदं वचनं रघुसत्तमः । हरीणामीश्वरस्यापि सुग्रीवस्योपशृण्वतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
फिर थोड़ी देरतक विचार करके रघुवंशशिरोमणि श्रीरामने वानरराज सुग्रीवको सुनाकर यह बात कही—॥ १५ ॥
सर्वथा सुकृतं तावत् सीतायाः परिमार्गणम् । सागरं तु समासाद्य पुनर्नष्टं मनो मम ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘बन्धुओ ! सीताकी खोजका काम तो सुचारुरूपसे सम्पन्न हो गया; किंतु समुद्रतकको दुस्तरताका विचार करके मेरे मनका उत्साह फिर नष्ट हो गया ॥ १६ ॥
कथं नाम समुद्रस्य दुष्पारस्य महाम्भसः । हरयो दक्षिणं पारं गमिष्यन्ति समागताः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘महान् जलराशिसे परिपूर्ण समुद्रको पार करना तो बड़ा ही कठिन काम है । यहाँ एकत्र हुए ये वानर समुद्रके दक्षिण तटपर कैसे पहुँचेंगे ॥ १७ ॥
यद्यप्येष तु वृत्तान्तो वैदेह्या गदितो मम । समुद्रपारगमने हरीणां किमिवोत्तरम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘मेरी सीताने भी यही संदेह उठाया था, जिसका वृत्तान्त अभी-अभी मुझसे कहा गया है । इन वानरोंके समुद्रके पार जानेके विषयमें जो प्रश्न खड़ा हुआ है, उसका वास्तविक उत्तर क्या है ?’ ॥ १८ ॥
इत्युक्त्वा शोकसम्भ्रान्तो रामः शत्रुनिबर्हणः । हनूमन्तं महाबाहुस्ततो ध्यानमुपागमत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीसे ऐसा कहकर शत्रुसूदन महाबाहु श्रीराम शोकाकुल होकर बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥ १९ ॥
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