सुन्दरकाण्ड, सर्ग 67
एवमुक्तस्तु हनुमान् राघवेण महात्मना । सीताया भाषितं सर्वं न्यवेदयत राघवे ॥ १ ॥
भावार्थ
महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्जीने सीताजीकी कही हुई सब बातें उनसे निवेदन कर दीं ॥ १ ॥
इदमुक्तवती देवी जानकी पुरुषर्षभ । पूर्ववृत्तमभिज्ञानं चित्रकूटे यथातथम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वे बोले—‘पुरुषोत्तम ! जानकीदेवीने पहले चित्रकूट-पर बीती हुई एक घटनाका यथावत् रूपसे वर्णन किया था । उसे उन्होंने पहचानके तौरपर इस प्रकार कहा था ॥ २ ॥
सुखसुप्ता त्वया सार्धं जानकी पूर्वमुत्थिता । वायसः सहसोत्पत्य विदद्दार स्तनान्तरम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘पहले चित्रकूटमें कभी जानकी देवी आपके साथ सुखपूर्वक सोयी थीं । वे सोकर आपसे पहले उठ गयीं । उस समय किसी कौएने सहसा उड़कर उनकी छातीमें चोंच मार दी ॥ ३ ॥
पर्यायेण च सुप्तस्त्वं देव्यङ्के भरताग्रज । पुनश्च किल पक्षी स देव्या जनयति व्यथा ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘भरताग्रज ! आपलोग बारी-बारीसे एक दूसरेके अङ्कमें सिर रखकर सोते थे । जब आप देवीके अङ्कमें मस्तक रखकर सोये थे, उस समय पुनः उसी पक्षीने आकर देवीको कष्ट देना आरम्भ किया ॥ ४ ॥
ततः पुनरुपागम्य विददार भृशं किल । ततस्त्वं बोधितस्तस्याः शोणितेन समुक्षितः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘कहते हैं उसने फिर आकर जोरसे चोंच मार दी । तब देवीके शरीरसे रक्त बहने लगा और उससे भीग जानेके कारण आप जाग उठे ॥ ५ ॥
वायसेन च तेनैवं सततं बाध्यमानया । बोधितः किल देव्या त्वं सुखसुप्तः परंतप ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन ! उस कौएने जब लगातार इस तरह पीड़ा दी, तब देवी सीताने सुखसे सोये हुए आपको जगा दिया ॥ ६ ॥
तां च दृष्ट्वा महाबाहो दारितां च स्तनान्तरे । आशीविष इव क्रुद्धस्ततो वाक्यं त्वमूचिवान् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! उनकी छातीमें घाव हुआ देख आप विषधर सर्पके समान कुपित हो उठे और इस प्रकार बोले—॥ ७ ॥
नखाग्रैः केन ते भीरु दारितं वै स्तनान्तरम् । कः क्रीडति सरोषेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘भीरु ! किसने अपने नखोंके अग्रभागसे तुम्हारी छातीमें घाव कर दिया है ? कौन कुपित हुए पाँच मुँहवाले सर्पके साथ खेल रहा है ?’ ॥ ८ ॥
निरीक्षमाणः सहसा वायसं समुदैक्षथाः । नखैः सरुधिरैस्तीक्ष्णैस्तामेवाभिमुखं स्थितम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘ऐसा कहकर आपने जब सहसा इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौएको देखा । उसके तीखे पंजे खूनमें रँगे हुए थे और वह सीता देवीकी ओर मुँह करके ही कहीं बैठा था ॥ ९ ॥
सुतः किल स शक्रस्य वायसः पततां वरः । धरान्तरगतः शीघ्रं पवनस्य गतौ समः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘सुना है, उड़नेवालोंमें श्रेष्ठ वह कौआ साक्षात् इन्द्रका पुत्र था, जो उन दिनों पृथ्वीपर विचर रहा था । वह वायुदेवताके समान शीघ्रगामी था ॥ १० ॥
ततस्तस्मिन् महाबाहो कोपसंवर्तितेक्षणः । वायसे त्वं व्यधाः क्रूरां मतिं मतिमतां वर ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘मतिमानोंमें श्रेष्ठ महाबाहो ! उस समय आपके नेत्र क्रोधसे घूमने लगे और आपने उस कौएको कठोर दण्ड देनेका विचार किया ॥ ११ ॥
स दर्भसंस्तराद् गृह्य ब्रह्मास्त्रेण न्ययोजयः । स दीप्त इव कालाग्निर्जज्वालाभिमुखं खगम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘आपने अपनी चटाईमेंसे एक कुशा निकालकर हाथमें ले लिया और उसे ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित किया । फिर तो वह कुशा प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा । उसका लक्ष्य वह कौआ ही था ॥ १२ ॥
स त्वं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भं तं वायसं प्रति । ततस्तु वायसं दीप्तः स दर्भोऽनुजगाम ह ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘आपने उस जलते हुए कुशाको कौएकी ओर छोड़ दिया । फिर तो वह दीप्तिमान् दर्भ उस कौएका पीछा करने लगा ॥ १३ ॥
भीतैश्च सम्परित्यक्तः सुरैः सर्वैश्च वायसः । त्रींल्लोकान् सम्परिक्रम्य त्रातारं नाधिगच्छति ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘आपके भयसे डरे हुए समस्त देवताओंने भी उस कौएको त्याग दिया । वह तीनों लोकोंमें चक्कर लगाता फिरा, किंतु कहीं भी उसे कोई रक्षक नहीं मिला ॥ १४ ॥
पुनरप्यागतस्तत्र त्वत्सकाशमरिंदम । त्वं तं निपतितं भूमौ शरण्यः शरणागतम् ॥ १५ ॥ वधार्हमपि काकुत्स्थ कृपया परिपालयः ।
भावार्थ
‘शत्रुदमन श्रीराम ! सब ओरसे निराश होकर वह कौआ फिर वहीं आपकी शरणमें आया । शरणमें आकर पृथ्वीपर पड़े हुए उस कौएको आपने शरणमें ले लिया; क्योंकि आप शरणागतवत्सल हैं । यद्यपि वह वधके योग्य था तो भी आपने कृपापूर्वक उसकी रक्षा की ॥ १५½ ॥
मोघमस्त्रं न शक्यं तु कर्तुमित्येव राघव ॥ १६ ॥ भवांस्तस्याक्षि काकस्य हिनस्ति स्म स दक्षिणम् ।
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! उस ब्रह्मास्त्रको व्यर्थ नहीं किया जा सकता था, इसलिये आपने उस कौएकी दाहिनी आँख फोड़ डाली ॥ १६½ ॥
राम त्वां स नमस्कृत्य राज्ञो दशरथस्य च ॥ १७ ॥ विसृष्टस्तु तदा काकः प्रतिपेदे स्वमालयम् ।
भावार्थ
‘श्रीराम ! तदनन्तर आपसे विदा ले वह कौआ भूतलपर आपको और स्वर्गमें राजा दशरथको नमस्कार करके अपने घरको चला गया ॥ १७½ ॥
एवमस्त्रविदां श्रेष्ठः सत्त्ववाञ्छीलवानपि ॥ १८ ॥ किमर्थमस्त्रं रक्षःसु न योजयसि राघव।
भावार्थ
‘( सीता कहती हैं—) ‘रघुनन्दन ! इस प्रकार अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, शक्तिशाली और शीलवान् होते हुए भी आप राक्षसोंपर अपने अस्त्रका प्रयोग क्यों नहीं करते हैं ? ॥ १८½ ॥
न दानवा न गन्धर्वा नासुरा न मरुद्गणाः ॥ १९ ॥ तव राम रणे शक्तास्तथा प्रतिसमास्थितुम्।
भावार्थ
‘‘श्रीराम ! दानव, गन्धर्व, असुर और देवता कोई भी समराङ्गणमें आपका सामना नहीं कर सकते ॥ १९½ ॥
तव वीर्यवतः कश्चिन्मयि यद्यस्ति सम्भ्रमः ॥ २० ॥ क्षिप्रं सुनिशितैर्बाणैर्हन्यतां युधि रावणः।
भावार्थ
‘‘आप बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं । यदि मेरे प्रति आपका कुछ भी आदर है तो आप शीघ्र ही अपने तीखे बाणोंसे रणभूमिमें रावणको मार डालिये ॥ २०½ ॥
भ्रातुरादेशमाज्ञाय लक्ष्मणो वा परंतपः ॥ २१ ॥ स किमर्थं नरवरो न मां रक्षति राघवः।
भावार्थ
‘‘हनुमन् ! अथवा अपने भाईकी आज्ञा लेकर शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुकुलतिलक नरश्रेष्ठ लक्ष्मण क्यों नहीं मेरी रक्षा करते हैं ? ॥ २१½ ॥
शक्तौ तौ पुरुषव्याघ्रौ वाय्वग्निसमतेजसौ ॥ २२ ॥ सुराणामपि दुर्धर्षौ किमर्थं मामुपेक्षतः।
भावार्थ
‘‘वे दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण वायु तथा अग्निके तुल्य तेजस्वी एवं शक्तिशाली हैं, देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं; फिर किसलिये मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ? ॥२२½॥
ममैव दुष्कृतं किंचिन्महदस्ति न संशयः ॥ २३ ॥ समर्थौ सहितौ यन्मां न रक्षेते परंतपौ।
भावार्थ
‘‘इसमें संदेह नहीं कि मेरा ही कोई ऐसा महान् पाप है, जिसके कारण वे दोनों शत्रुसंतापी वीर एक साथ रहकर समर्थ होते हुए मेरी रक्षा नहीं कर रहे हैं’ ॥ २३½ ॥
वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साधुभाषितम् ॥ २४ ॥ पुनरप्यहमार्यां तामिदं वचनमब्रुवम्।
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! विदेहनन्दिनीका करुणाजनक उत्तम वचन सुनकर मैंने पुनः आर्या सीतासे यह बात कही—॥२४½॥
त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे ॥ २५ ॥ रामे दुःखाभिभूते च लक्ष्मणः परितप्यते।
भावार्थ
‘देवि ! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे शोकके कारण ही सब कार्योंसे विरत हो रहे हैं । श्रीरामके दुखी होनेसे लक्ष्मण भी संतप्त हो रहे हैं ॥ २५½ ॥
कथंचिद् भवती दृष्टा न कालः परिशोचितुम् ॥ २६ ॥ अस्मिन् मुहूर्ते दुःखानामन्तं द्रक्ष्यसि भामिनि।
भावार्थ
‘किसी तरह आपका दर्शन हो गया ( आपके निवासस्थानका पता लग गया ), अतः अब शोक करनेका अवसर नहीं है । भामिनि ! आप इसी मुहूर्तमें अपने सारे दुःखोंका अन्त हुआ देखेंगी ॥ २६½ ॥
तावुभौ नरशार्दूलौ राजपुत्रौ परंतपौ ॥ २७ ॥ त्वद्दर्शनकृतोत्साहौ लङ्कां भस्मीकरिष्यतः।
भावार्थ
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ राजकुमार आपके दर्शनके लिये उत्साहित हो लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ २७½ ॥
हत्वा च समरे रौद्रं रावणं सहबान्धवम् ॥ २८ ॥ राघवस्त्वां वरारोहे स्वपुरीं नयिता ध्रुवम्।
भावार्थ
‘वरारोहे ! समराङ्गणमें रौद्र राक्षस रावणको बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर रघुनाथजी अवश्य ही आपको अपनी पुरीमें ले जायँगे ॥ २८½ ॥
यत् तु रामो विजानीयादभिज्ञानमनिन्दिते ॥ २९ ॥ प्रीतिसंजननं तस्य प्रदातुं तत् त्वमर्हसि।
भावार्थ
‘सती-साध्वी देवि ! अब आप मुझे कोई ऐसी पहचान दीजिये, जिसे श्रीरामचन्द्रजी जानते हों और जो उनके मनको प्रसन्न करनेवाला हो ॥ २९½ ॥
साभिवीक्ष्य दिशः सर्वा वेण्युद्ग्रथनमुत्तमम् ॥ ३० ॥ मुक्त्वा वस्त्राद् ददौ मह्यं मणिमेतं महाबल।
भावार्थ
‘महाबली वीर ! तब उन्होंने चारों ओर देखकर वेणीमें बाँधने योग्य इस उत्तम मणिको अपने वस्त्रसे खोलकर मुझे दे दिया ॥ ३०½ ॥
प्रतिगृह्य मणिं दोर्भ्यां तव हेतो रघुप्रिय ॥ ३१ ॥ शिरसा सम्प्रणम्यैनामहमागमने त्वरे।
भावार्थ
‘रघुवंशियोंके प्रियतम श्रीराम ! आपके लिये इस मणिको दोनों हाथोंमें लेकर मैंने सीतादेवीको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और यहाँ आनेके लिये मैं उतावला हो उठा ॥ ३१½ ॥
गमने च कृतोत्साहमवेक्ष्य वरवर्णिनी ॥ ३२ ॥ विवर्धमानं च हि मामुवाच जनकात्मजा। अश्रुपूर्णमुखी दीना बाष्पगद्गदभाषिणी ॥ ३३ ॥ ममोत्पतनसम्भ्रान्ता शोकवेगसमाहता। मामुवाच ततः सीता सभाग्योऽसि महाकपे ॥ ३४ ॥ यद् द्रक्ष्यसि महाबाहुं रामं कमललोचनम्। लक्ष्मणं च महाबाहुं देवरं मे यशस्विनम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘लौटनेके लिये उत्साहित हो मुझे अपने शरीरको बढ़ाते देख सुन्दरी जनकनन्दिनी सीता बहुत दुखी हो गयीं । उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली । मेरी उछलने-की तैयारीसे वे घबरा गयीं और शोकके वेगसे आहत हो उठीं । उस समय उनका स्वर अश्रुगद्गद हो गया था । वे मुझसे कहने लगीं—‘महाकपे ! तुम बड़े सौभाग्यशाली हो, जो मेरे महाबाहु प्रियतम कमलनयन श्रीरामको तथा मेरे यशस्वी देवर महाबाहु लक्ष्मणको भी अपनी आँखोंसे देखोगे’ ॥ ३२—३५ ॥
सीतयाप्येवमुक्तोऽहमब्रुवं मैथिलीं तथा । पृष्ठमारोह मे देवि क्षिप्रं जनकनन्दिनि ॥ ३६ ॥ यावत्ते दर्शयाम्यद्य ससुग्रीवं सलक्ष्मणम् । राघवं च महाभागे भर्तारमसितेक्षणे ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘सीताजीके ऐसा कहनेपर मैंने उन मिथिलेशकुमारीसे कहा—‘देवि ! जनकनन्दिनी ! आप शीघ्र मेरी पीठपर चढ़ जाइये । महाभागे ! श्यामलोचने ! मैं अभी सुग्रीव और लक्ष्मणसहित आपके पतिदेव श्रीरघुनाथजीका आपको दर्शन कराता हूँ’ ॥ ३६-३७ ॥
साब्रवीन्मां ततो देवी नैष धर्मो महाकपे । यत्ते पृष्ठं सिषेवेऽहं स्ववशा हरिपुङ्गव ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘यह सुनकर सीतादेवी मुझसे बोलीं—‘महाकपे ! वानरशिरोमणे ! मेरा यह धर्म नहीं है कि मैं अपने वशमें होती हुई भी स्वेच्छासे तुम्हारी पीठका आश्रय लूँ ॥ ३८ ॥
पुरा च यद्दहं वीर स्पृष्टा गात्रेषु रक्षसा । तत्राहं किं करिष्यामि कालेनोपनिपीडिता ॥ ३९ ॥ गच्छ त्वं कपिशार्दूल यत्र तौ नृपतेः सुतौ ।
भावार्थ
‘वीर ! पहले जो राक्षस रावणके द्वारा मेरे अङ्गोंका स्पर्श हो गया, उस समय वहाँ मैं क्या कर सकती थी ? मुझे तो कालने ही पीड़ित कर रक्खा था । अतः वानरप्रवर ! जहाँ वे दोनों राजकुमार हैं, वहाँ तुम जाओ’॥३९½॥
इत्येवं सा समाभाष्य भूयः संदेष्टुमास्थिता ॥ ४० ॥ हनूमन् सिंहसंकाशौ ताबुभौ रामलक्ष्मणौ । सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् ब्रूया अनामयम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘ऐसा कहकर वे फिर मुझे संदेश देने लगीं— ‘हनुमन् ! सिंहके समान पराक्रमी उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे, मन्त्रियोंसहित सुग्रीवसे तथा अन्य सब लोगोंसे भी मेरा कुशल-समाचार कहना और उनका पूछना ॥ ४०-४१ ॥
यथा च स महाबाहुर्मां तारयति राघवः । अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधात् तत् त्वमाख्यातुमर्हसि ॥४२॥
भावार्थ
‘तुम वहाँ ऐसी बात कहना, जिससे महाबाहु रघुनाथजी इस दुःखसागरसे मेरा उद्धार करें ॥ ४२ ॥
इदं च तीव्रं मम शोकवेगं रक्षोभिरेभिः परिभर्त्सनं च । ब्रूयास्तु रामस्य गतः समीपं शिवश्च तेऽध्वास्तु हरिप्रवीर ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘वानरोंके प्रमुख वीर ! मेरे इस तीव्र शोक-वेगको तथा इन राक्षसोंद्वारा जो मुझे डराया-धमकाया जाता है, इसको भी उन श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर कहना । तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो’ ॥ ४३ ॥
एतत् तवार्या नृप संयता सा सीता वचः प्राह विषादपूर्वम् । एतच्च बुद्ध्वा गदितं यथा त्वं श्रद्धत्स्व सीतां कुशलां समग्राम् ॥४४॥
भावार्थ
‘नरेश्वर ! आपकी प्रियतमा संयमशीला आर्या सीताने बड़े विषादके साथ ये सारी बातें कही हैं । मेरी कही हुई इन सब बातोंपर विचार करके आप विश्वास करें कि सतीशिरोमणि सीता सकुशल हैं’ ॥ ४४ ॥
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