सुन्दरकाण्ड, सर्ग 66
एवमुक्तो हनुमता रामो दशरथात्मजः । तं मणिं हृदये कृत्वा रुरोद सहलक्ष्मणः ॥ १ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर दशरथनन्दन श्रीराम उस मणिको अपनी छातीसे लगाकर रोने लगे । साथ ही लक्ष्मण भी रो पड़े ॥ १ ॥
तं तु दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं राघवः शोककर्शितः । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
उस श्रेष्ठ मणिकी ओर देखकर शोकसे व्याकुल हुए श्रीरघुनाथजी अपने दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर सुग्रीवसे इस प्रकार बोले—॥ २ ॥
यथैव धेनुः स्रवति स्नेहाद् वत्सस्य वत्सला । तथा ममापि हृदयं मणिश्रेष्ठस्य दर्शनात् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘मित्र ! जैसे वत्सला धेनु अपने बछड़ेके स्नेहसे थनोंसे दूध झरने लगती है, उसी प्रकार इस उत्तम मणिको देखकर आज मेरा हृदय भी द्रवीभूत हो रहा है ॥ ३ ॥
मणिरत्नमिदं दत्तं वैदेह्याः श्वशुरेण मे । वधूकाले यथा बद्धमधिकं मूर्ध्नि शोभते ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘मेरे श्वशुर राजा जनकने विवाहके समय वैदेहीको यह मणिरत्न दिया था, जो उसके मस्तकपर आबद्ध होकर बड़ी शोभा पाता था ॥ ४ ॥
अयं हि जलसम्भूतो मणिः प्रवरपूजितः । यज्ञे परमतुष्टेन दत्तः शक्रेण धीमता ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘जलसे प्रकट हुई यह मणि श्रेष्ठ देवताओंद्वारा पूजित है । किसी यज्ञमें बहुत संतुष्ट हुए बुद्धिमान् इन्द्रने राजा जनकको यह मणि दी थी ॥ ५ ॥
इमं दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं तथा तातस्य दर्शनम् । अद्यास्म्यवगतः सौम्य वैदेहस्य तथा विभोः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! इस मणिरत्नका दर्शन करके आज मुझे मानो अपने पूज्य पिताका और विदेहराज महाराज जनकका भी दर्शन मिल गया हो, ऐसा अनुभव हो रहा है ॥ ६ ॥
अयं हि शोभते तस्याः प्रियाया मूर्ध्नि मे मणिः । अद्यास्य दर्शनेनाहं प्राप्तां तामिव चिन्तये ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘यह मणि सदा मेरी प्रिया सीताके सीमन्तपर शोभा पाती थी । आज इसे देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो सीता ही मुझे मिल गयी ॥ ७ ॥
किमाह सीता वैदेही ब्रूहि सौम्य पुनः पुनः । परासुमिव तोयेन सिञ्चन्ती वाक्यवारिणा ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘सौम्य पवनकुमार ! जैसे बेहोश हुए मनुष्यको होशमें लानेके लिये उसपर जलके छींटे दिये जाते हैं, उसी प्रकार विदेहनन्दिनी सीताने मूर्च्छित हुए-से मुझ रामको अपने वाक्यरूपी शीतल जलसे सींचते हुए क्या-क्या कहा है ? यह बारंबार बताओ’ ॥ ८ ॥
इतस्तु किं दुःखतरं यदिमं वारिसम्भवम् । मणिं पश्यामि सौमित्रे वैदेहीमागतां विना ॥ ९ ॥
भावार्थ
( अब वे लक्ष्मणसे बोले— ) ‘सुमित्रानन्दन ! सीताके यहाँ आये बिना ही जो जलसे उत्पन्न हुई इस मणिको मैं देख रहा हूँ । इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है’ ॥ ९ ॥
चिरं जीवति वैदेही यदि मासं धरिष्यति । क्षणं वीर न जीवेयं विना तामसितेक्षणाम् ॥ १० ॥
भावार्थ
( फिर वे हनुमान्जीसे बोले— ) ‘वीर पवनकुमार ! यदि विदेहनन्दिनी सीता एक मासतक जीवन धारण कर लेगी, तब तो वह बहुत समयतक जी रही है । मैं तो कजरारे नेत्रोंवाली जानकीके बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता ॥ १० ॥
नय मामपि तं देशं यत्र दृष्टा मम प्रिया । न तिष्ठेयं क्षणमपि प्रवृत्तिमुपलभ्य च ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘तुमने जहाँ मेरी प्रियाको देखा है, उसी देशमें मुझे भी ले चलो । उसका समाचार पाकर अब मैं एक क्षण भी यहाँ नहीं रुक सकता ॥ ११ ॥
कथं सा मम सुश्रोणी भीरुर्भीरुः सती तदा । भयावहानां घोराणां मध्ये तिष्ठति रक्षसाम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘हाय ! मेरी सती-साध्वी सुमध्यमा सीता बड़ी भीरु है । वह उन घोर रूपधारी भयंकर राक्षसोंके बीचमें कैसे रहती होगी ? ॥ १२ ॥
शारदस्तिमिरोन्मुक्तो नूनं चन्द्र इवाम्बुदैः । आवृतो वदनं तस्या न विराजति साम्प्रतम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘निश्चय ही अन्धकारसे मुक्त किंतु बादलोंसे ढके हुए शरत्कालीन चन्द्रमाके समान सीताका मुख इस समय शोभा नहीं पा रहा होगा ॥ १३ ॥
किमाह सीता हनुमंस्तत्त्वतः कथयस्व मे । एतेन खलु जीविष्ये भेषजेनातुरो यथा ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘हनुमन् ! मुझे ठीक-ठीक बताओ, सीताने क्या-क्या कहा है ? जैसे रोगी दवा लेनेसे जीता है, उसी प्रकार मैं सीताके इस संदेश-वाक्यको सुनकर ही जीवन धारण करूँगा ॥ १४ ॥
मधुरा मधुरालापा किमाह मम भामिनी । मद्विहीना वरारोहा हनुमन् कथयस्व मे । दुःखाद् दुःखतरं प्राप्य कथं जीवति जानकी ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘हनुमन् ! मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी सुन्दर कटिप्रदेशवाली मधुरभाषिणी सुन्दरी प्रियतमा जनकनन्दिनी सीताने मेरे लिये कौन-सा संदेश दिया है ? वह दुःख-पर-दुःख उठाकर भी कैसे जीवन धारण कर रही है ?’ ॥ १५ ॥
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