सुन्दरकाण्ड, सर्ग 5
ततः स मध्यंगतमंशुमन्तं ज्योत्स्नावितानं मुहुरुद्वमन्तम् । ददर्श धीमान् भुवि भानुमन्तं गोष्ठे वृषं मत्तमिव भ्रमन्तम् ॥ १ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् बुद्धिमान् हनुमान्जीने देखा, जिस प्रकार गोशालाके भीतर गौओंके झुंडमें मतवाला साँड़ विचरता है, उसी प्रकार पृथ्वीके ऊपर बारंबार अपनी चाँदनीका चँदोवा तानते हुए चन्द्रदेव आकाशके मध्यभागमें तारिकाओंके बीच विचरण कर रहे हैं ॥ १ ॥
लोकस्य पापानि विनाशयन्तं महोदधिं चापि समेधयन्तम् । भूतानि सर्वाणि विराजयन्तं ददर्श शीतांशुमथाभियान्तम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वे शीतरश्मि चन्द्रमा जगत्के पाप तापका नाश कर रहे हैं, महासागरमें ज्वार उठा रहे हैं, समस्त प्राणियोंको नयी दीप्ति एवं प्रकाश दे रहे हैं और आकाशमें क्रमशः ऊपरकी ओर उठ रहे हैं ॥ २ ॥
या भाति लक्ष्मीर्भुवि मन्दरस्था यथा प्रदोषेषु च सागरस्था । तथैव तोयेषु च पुष्करस्था रराज सा चारुनिशाकरस्था ॥ ३ ॥
भावार्थ
भूतलपर मन्दराचलमें, संध्याके समय महासागरमें और जलके भीतर कमलोंमें जो लक्ष्मी जिस प्रकार सुशोभित होती हैं, वे ही उसी प्रकार मनोहर चन्द्रमामें शोभा पा रही थीं ॥ ३ ॥
हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः । वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थ- श्चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः ॥ ४ ॥
भावार्थ
जैसे चाँदीके पिंजरेमें हंस, मन्दराचलकी कन्दरामें सिंह तथा मदमत्त हाथीकी पीठपर वीर पुरुष शोभा पाते हैं, उसी प्रकार आकाशमें चन्द्रदेव सुशोभित हो रहे थे ॥ ४ ॥
स्थितः ककुद्मानिव तीक्ष्णशृङ्गो महाचलः श्वेत इवोर्ध्वशृङ्गः । हस्तीव जाम्बूनदबद्धशृङ्गो विभाति चन्द्रः परिपूर्णशृङ्गः ॥ ५ ॥
भावार्थ
जैसे तीखे सींगवाला बैल खड़ा हो, जैसे ऊपरको उठे शिखरवाला महान् पर्वत श्वेत (हिमालय) शोभा पाता हो और जैसे सुवर्णजटित दाँतोंसे युक्त गजराज सुशोभित होता हो, उसी प्रकार हरिणके शृङ्गरूपी चिह्नसे युक्त परिपूर्ण चन्द्रमा छवि पा रहे थे ॥ ५ ॥
विनष्टशीताम्बुतुषारपङ्को महाग्रहग्राहविनष्टपङ्कः । प्रकाशलक्ष्म्याश्रयनिर्मलाङ्को रराज चन्द्रो भगवान्शशाङ्कः ॥ ६ ॥
भावार्थ
जिनका शीतल जल और हिमरूपी पङ्कसे संसर्गका दोष नष्ट हो गया है, अर्थात् जो इनके संसर्गसे बहुत दूर है, सूर्य-किरणोंको ग्रहण करनेके कारण जिन्होंने अपने अन्धकाररूपी पङ्कको भी नष्ट कर दिया है तथा प्रकाशरूप लक्ष्मीका आश्रयस्थान होनेके कारण जिनकी कालिमा भी निर्मल प्रतीत होती है, वे भगवान् शशलाञ्छन चन्द्रदेव आकाशमें प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६ ॥
शिलातलं प्राप्य यथा मृगेन्द्रो महारणं प्राप्य यथा गजेन्द्रः । राज्यं समासाद्य यथा नरेन्द्र- स्तथा प्रकाशो विरराज चन्द्रः ॥ ७ ॥
भावार्थ
जैसे गुफाके बाहर शिलातलपर बैठा हुआ मृगराज (सिंह) शोभा पाता है, जैसे विशाल वनमें पहुँचकर गजराज सुशोभित होता है तथा जैसे राज्य पाकर राजा अधिक शोभासे सम्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार निर्मल प्रकाशसे युक्त होकर चन्द्रदेव सुशोभित हो रहे थे ॥ ७ ॥
प्रकाशचन्द्रोदयनष्टदोषः प्रवृद्धरक्षःपिशिताशदोषः । रामाभिरामेरितचित्तदोषः स्वर्गप्रकाशो भगवान् प्रदोषः ॥ ८ ॥
भावार्थ
प्रकाशयुक्त चन्द्रमाके उदयसे जिसका अन्धकाररूपी दोष दूर हो गया है, जिसमें राक्षसोंके जीव-हिंसा और मांसभक्षणरूपी दोष बढ़ गये हैं तथा रमणियोंके रमण-विषयक चित्तदोष (प्रणय-कलह) निवृत्त हो गये हैं, वह पूजनीय प्रदोषकाल स्वर्गसदृश सुखका प्रकाश करने लगा ॥८॥
तन्त्रीस्वराः कर्णसुखाः प्रवृत्ताः स्वपन्ति नार्यः पतिभिः सुवृत्ताः । नक्तंचराश्चापि तथा प्रवृत्ता विहर्तुमत्यद्भुतरौद्रवृत्ताः ॥ ९ ॥
भावार्थ
वीणाके श्रवणसुखद शब्द झङ्कृत हो रहे थे, सदाचारिणी स्त्रियाँ पतियोंके साथ सो रही थीं तथा अत्यन्त अद्भुत और भयंकर शील-स्वभाववाले निशाचर निशीथ कालमें विहार कर रहे थे ॥ ९ ॥
मत्तप्रमत्तानि समाकुलानि रथाश्वभद्रासनसंकुलानि । वीरश्रिया चापि समाकुलानि ददर्श धीमान् स कपिः कुलानि ॥ १० ॥
भावार्थ
बुद्धिमान् वानर हनुमान्ने वहाँ बहुत-से घर देखे । किन्हींमें ऐश्वर्य-मदसे मत्त निशाचर निवास करते थे, किन्हींमें मदिरापानसे मतवाले राक्षस भरे हुए थे । कितने ही घर रथ, घोड़े आदि वाहनों और भद्रासनोंसे सम्पन्न थे तथा कितने ही वीर-लक्ष्मीसे व्याप्त दिखायी देते थे । वे सभी गृह एक-दूसरेसे मिले हुए थे ॥ १० ॥
परस्परं चाधिकमाक्षिपन्ति भुजांश्च पीनानधिविक्षिपन्ति । मत्तप्रलापानधिविक्षिपन्ति मत्तानि चान्योन्यमधिक्षिपन्ति ॥ ११ ॥
भावार्थ
राक्षसलोग आपसमें एक-दूसरेपर अधिक आक्षेप करते थे । अपनी मोटी-मोटी भुजाओंको भी हिलाते और चलाते थे । मतवालोंकी-सी बहकी-बहकी बातें करते थे और मदिरासे उन्मत्त होकर परस्पर कटु वचन बोलते थे ॥ ११ ॥
रक्षांसि वक्षांसि च विक्षिपन्ति गात्राणि कान्तासु च विक्षिपन्ति। रूपाणि चित्राणि च विक्षिपन्ति दृढानि चापानि च विक्षिपन्ति ॥ १२ ॥
भावार्थ
इतना ही नहीं, वे मतवाले राक्षस अपनी छाती भी पीटते थे । अपने हाथ आदि अङ्गोंको अपनी प्यारी पत्नियोंपर रख देते थे। सुन्दर रूपवाले चित्रोंका निर्माण करते थे और अपने सुदृढ़ धनुषोंको कानतक खींचा करते थे ॥ १२ ॥
ददर्श कान्ताश्च समालभन्त्य- स्तथापरास्तत्र पुनः स्वपन्त्यः । सुरूपवक्त्राश्च तथा हसन्त्यः क्रुद्धाः पराश्चापि विनिःश्वसन्त्यः॥ १३ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीने यह भी देखा कि नायिकाएँ अपने अङ्गोंमें चन्दन आदिका अनुलेपन करती हैं । दूसरी वहीं सोती हैं । तीसरी सुन्दर रूप और मनोहर मुखवाली ललनाएँ हँसती हैं तथा अन्य वनिताएँ प्रणय-कलहसे कुपित हो लंबी साँसें खींच रही हैं ॥ १३ ॥
महागजैश्चापि तथा नदद्भिः सुपूजितैश्चापि तथा सुसद्भिः । रराज वीरैश्च विनिःश्वसद्भि- र्ह्रदा भुजंगैरिव निःश्वसद्भिः ॥ १४ ॥
भावार्थ
चिग्घाड़ते हुए महान् गजराजों, अत्यन्त सम्मानित श्रेष्ठ सभासदों तथा लंबी साँसें छोड़नेवाले वीरोंके कारण वह लङ्कापुरी फुफकारते हुए सर्पोंसे युक्त सरोवरोंके समान शोभा पा रही थी ॥ १४ ॥
बुद्धिप्रधानान् रुचिराभिधानान् संश्रद्धधानाञ्जगतः प्रधानान् । नानाविधानान् रुचिराभिधानान् ददर्श तस्यां पुरि यातुधानान् ॥ १५ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीने उस पुरीमें बहुत-से उत्कृष्ट बुद्धिवाले, सुन्दर बोलनेवाले, सम्यक् श्रद्धा रखनेवाले, अनेक प्रकारके रूप-रंगवाले और मनोहर नाम धारण करनेवाले विश्व-विख्यात राक्षस देखे ॥ १५ ॥
ननन्द दृष्ट्वा स च तान् सुरूपान्- नानागुणानात्मगुणानुरूपान् । विद्योतमानान् स च तान् सुरूपान् ददर्श कांश्चिच्च पुनर्विरूपान् ॥ १६ ॥
भावार्थ
वे सुन्दर रूपवाले, नाना प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न, अपने गुणोंके अनुरूप व्यवहार करनेवाले और तेजस्वी थे । उन्हें देखकर हनुमान्जी बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने बहुतेरे राक्षसोंको सुन्दर रूपसे सम्पन्न देखा और कोई-कोई उन्हें बड़े कुरूप दिखायी दिये ॥ १६ ॥
ततो वराहाः सुविशुद्धभावा- स्तेषां स्त्रियस्तत्र महानुभावाः। प्रियेषु पानेषु च सक्तभावा ददर्श तारा इव सुखभावाः ॥ १७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वहाँ उन्होंने सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करनेके योग्य सुन्दरी राक्षस-रमणियोंको देखा, जिनका भाव अत्यन्त विशुद्ध था । वे बड़ी प्रभावशालिनी थीं । उनका मन प्रियतममें तथा मधुपानमें आसक्त था । वे तारिकाओंकी भाँति कान्तिमती और सुन्दर स्वभाववाली थीं ॥ १७ ॥
स्त्रियो ज्वलन्तीस्त्रपयोपगूढा निशीथकाले रमणोपगूढाः । ददर्श काश्चित् प्रमदोपगूढा यथा विहंगा विहगोपगूढाः ॥ १८ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीकी दृष्टिमें कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी आयीं, जो अपने रूप-सौन्दर्यसे प्रकाशित हो रही थीं । वे बड़ी लजीली थीं और आधी रातके समय अपने प्रियतमके आलिङ्गन-पाशमें इस प्रकार बँधी हुई थीं जैसे पक्षिणी पक्षीके द्वारा आलिङ्गित होती है । वे सब-के-सब आनन्दमें मग्न थीं ॥ १८ ॥
अन्याः पुनर्हर्म्यतलोपविष्टा- स्तत्र प्रियाङ्केषु सुखोपविष्टाः । भर्तुः परा धर्मपरा निविष्टा ददर्श धीमान् मदनोपविष्टाः ॥ १९ ॥
भावार्थ
दूसरी बहुत-सी स्त्रियाँ महलोंकी छतोंपर बैठी थीं । वे पतिकी सेवामें तत्पर रहनेवाली, धर्मपरायणा, विवाहिता और कामभावनासे भावित थीं । हनुमान्जीने उन सबको अपने प्रियतमके अङ्कमें सुखपूर्वक बैठी देखा ॥ १९ ॥
अप्रावृताः काञ्चनराजिवर्णाः काश्चित्परार्ध्यास्तपनीयवर्णाः । पुनश्च काश्चिच्छशलक्ष्मवर्णाः कान्तप्रहीणा रुचिराङ्गवर्णाः ॥ २० ॥
भावार्थ
कितनी ही कामिनियाँ सुवर्ण-रेखाके समान कान्तिमती दिखायी देती थीं । उन्होंने अपनी ओढ़नी उतार दी थी । कितनी ही उत्तम वनिताएँ तपाये हुए सुवर्णके समान रंगवाली थीं तथा कितनी ही पतिवियोगिनी बालाएँ चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णकी दिखायी देती थीं । उनकी अङ्गकान्ति बड़ी ही सुन्दर थी ॥ २० ॥
ततः प्रियान् प्राप्य मनोऽभिरामान् सुप्रीतियुक्ताः सुमनोऽभिरामाः। गृहेषु दृष्टः परमाभिरामा हरिप्रवीरः स ददर्श रामाः ॥ २१ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वानरोंके प्रमुख वीर हनुमान्जीने विभिन्न गृहोंमें ऐसी परम सुन्दरी रमणियोंका अवलोकन किया, जो मनोभिराम प्रियतमका संयोग पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो रही थीं। फूलोंके हारसे विभूषित होनेके कारण उनकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी और वे सब-की-सब हर्षसे उत्फुल्ल दिखायी देती थीं ॥ २१ ॥
चन्द्रप्रकाशाश्च हि वक्त्रमाला वक्राः सुपक्ष्माश्च सुनेत्रमालाः। विभूषणानां च ददर्श मालाः शतह्रदानामिव चारुमालाः ॥ २२ ॥
भावार्थ
उन्होंने चन्द्रमाके समान प्रकाशमान मुखोंकी पंक्तियाँ, सुन्दर पलकोंवाले तिरछे नेत्रोंकी पंक्तियाँ और चमचमाती हुई विद्युल्लेखाओंके समान आभूषणोंकी भी मनोहर पंक्तियाँ देखीं ॥ २२ ॥
न त्वेव सीतां परमाभिजातां पथि स्थिते राजकुले प्रजाताम्। लतां प्रफुल्लामिव साधुजातां ददर्श तन्वीं मनसाभिजाताम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
किंतु जो परमात्माके मानसिक संकल्पसे धर्ममार्गपर स्थिर रहनेवाले राजकुलमें प्रकट हुई थीं, जिनका प्रादुर्भाव परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाला है, जो परम सुन्दर रूपमें उत्पन्न हुई प्रफुल्ल लताके समान शोभा पाती थीं, उन कृशाङ्गी सीताको उन्होंने वहाँ कहीं नहीं देखा था ॥ २३ ॥
सनातने वर्त्मनि संनिविष्टां रामेक्षणीं तां मदनाभिविष्टाम्। भर्तुर्मनः श्रीमदनुप्रविष्टां स्त्रीभ्यः पराभ्यश्च सदा विशिष्टाम् ॥ २४ ॥ उष्णार्दितां सानुसुताम्रकण्ठीं पुरा वराहोत्तमनिष्ककण्ठीम्। सुजातपक्ष्मामभिरक्तकण्ठीं वने प्रनृत्तामिव नीलकण्ठीम् ॥ २५ ॥ अव्यक्तरेखामिव चन्द्रलेखां पांसुप्रदिग्धामिव हेमरेखाम्। क्षतप्ररूढामिव वर्णरेखां वायुप्रभुग्नामिव मेघरेखाम् ॥ २६ ॥ सीतामपश्यन्मनुजेश्वरस्य रामस्य पत्नीं वदतां वरस्य। बभूव दुःखोपहतश्चिरस्य प्लवंगमो मन्द इवाचिरस्य ॥ २७ ॥
भावार्थ
जो सदा सनातन मार्गपर स्थित रहनेवाली, श्रीरामपर ही दृष्टि रखनेवाली, श्रीरामविषयक काम या प्रेमसे परिपूर्ण, अपने पतिके तेजस्वी मनमें बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियोंसे सदा ही श्रेष्ठ थीं; जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रोंसे निरन्तर आँसुओंकी झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओंसे गद्गद रहता था, पहले संयोगकालमें जिनका कण्ठ श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य निष्क ( पदक ) से विभूषित रहा करता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था तथा जो वनमें नृत्य करनेवाली मयूरीके समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदिसे आच्छादित होनेके कारण अव्यक्त रेखावाली चन्द्रलेखाके समान दिखायी देती थीं, धूलि-धूसर सुवर्ण-रेखा-सी प्रतीत होती थीं, बाणके आघातसे उत्पन्न हुई रेखा ( चिह्न )-सी जान पड़ती थीं तथा वायुके द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलोंकी रेखा-सी दृष्टिगोचर होती थीं। वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी उन सीताजीको बहुत देरतक ढूँढ़नेपर भी जब हनुमान्जी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दुखी और शिथिल हो गये ॥ २४-२७ ॥
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