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सुन्दरकाण्ड, सर्ग 6

स निकामं विमानेषु विचरन् कामरूपधृक्। विचचार कपिर्लङ्कां लाघवेन समन्वितः ॥ १ ॥

भावार्थ

फिर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले कपिवर हनुमान्जी बड़ी शीघ्रताके साथ लङ्काके सतमहले मकानोंमें यथेच्छ विचरने लगे ॥ १ ॥

आससाद च लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम्। प्राकारेणार्कवर्णेन भास्वरेणाभिसंवृतम् ॥ २ ॥

भावार्थ

अत्यन्त बल-वैभवसे सम्पन्न वे पवनकुमार राक्षसराज रावणके महलमें पहुँचे, जो चारों ओरसे सूर्यके समान चमचमाते हुए सुवर्णमय परकोटेसे घिरा हुआ था ॥ २ ॥

रक्षितं राक्षसैर्भीमैः सिंहैरिव महद् वनम् । समीक्षमाणो भवनं चकाशे कपिकुञ्जरः ॥ ३ ॥

भावार्थ

जैसे सिंह विशाल वनकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे भयानक राक्षस रावणके उस महलकी रक्षा कर रहे थे । उस भवनका निरीक्षण करते हुए कपिकुञ्जर हनुमान्जी मन-ही-मन हर्षका अनुभव करने लगे ॥ ३ ॥

रूप्यकोपहितैश्चित्रैस्तोरणैर्हेमभूषणैः । विचित्राभिश्च कक्ष्याभिर्द्वारैश्च रुचिरैर्वृतम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

वह महल चाँदीसे मढ़े हुए चित्रों, सोने जड़े हुए दरवाजों और बड़ी अद्भुत ड्योढ़ियों तथा सुन्दर द्वारोंसे युक्त था ॥ ४ ॥

गजास्थितैर्महामात्रैः शूरैश्च विगतश्रमैः । उपस्थितमसंहार्यैर्हयैः स्यन्दनयायिभिः ॥ ५ ॥

भावार्थ

हाथीपर चढ़े हुए महावत तथा श्रमहीन शूरवीर वहाँ उपस्थित थे । जिनके वेगको कोई रोक नहीं सकता था, ऐसे रथवाहक अश्व भी वहाँ शोभा पा रहे थे ॥ ५ ॥

सिंहव्याघ्रतनुत्राणैर्दान्तकाञ्चनराजतीः । घोषवद्भिर्विचित्रैश्च सदा विचरितं रथैः ॥ ६ ॥

भावार्थ

सिंहों और बाघोंके चमड़ोंके बने हुए कवचोंसे वे रथ ढके हुए थे, उनमें हाथी-दाँत, सुवर्ण तथा चाँदीकी प्रतिमाएँ रखी हुई थीं । उन रथोंमें लगी हुई छोटी-छोटी घंटिकाओंकी मधुर ध्वनि वहाँ होती रहती थी; ऐसे विचित्र रथ उस रावण-भवनमें सदा आ-जा रहे थे ॥ ६ ॥

बहुरत्नसमाकीर्णं परार्ध्यासनभूषितम् । महारथसमावापं महारथमहासनम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

रावणका वह भवन अनेक प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त था, बहुमूल्य आसन उसकी शोभा बढ़ाते थे । उसमें सब ओर बड़े-बड़े रथोंके ठहरनेके स्थान बने थे और महारथी वीरोंके लिये विशाल वासस्थान बनाये गये थे ॥ ७ ॥

दृश्यैश्च परमोदारैस्तैस्तैश्च मृगपक्षिभिः । विविधैर्बहुसाहस्रैः परिपूर्णं समन्ततः ॥ ८ ॥

भावार्थ

दर्शनीय एवं परम सुन्दर नाना प्रकारके सहस्रों पशु और पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे ॥ ८ ॥

विनीतैरन्तपालैश्च रक्षोभिश्च सुरक्षितम् । मुख्याभिश्च वरस्त्रीभिः परिपूर्णं समन्ततः ॥ ९ ॥

भावार्थ

सीमाकी रक्षा करनेवाले विनयशील राक्षस उस भवनकी रक्षा करते थे । वह सब ओरसे मुख्य-मुख्य सुन्दरियोंसे भरा रहता था ॥ ९ ॥

मुदितप्रमदारत्नं राक्षसेन्द्रनिवेशनम् । वराभरणसंह्रादैः समुद्रस्वननिःस्वनम् ॥ १० ॥

भावार्थ

वहाँकी रत्नस्वरूपा युवती रमणियाँ सदा प्रसन्न रहा करती थीं । सुन्दर आभूषणोंकी झनकारोंसे झंकृत राक्षसराजका वह महल समुद्रके कलकलनादकी भाँति मुखरित रहता था ॥ १० ॥

तद् राजगुणसम्पन्नं मुख्यैश्च वरचन्दनैः । महाजनसमाकीर्णं सिंहैरिव महद् वनम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

वह भवन राजोचित सामग्रीसे पूर्ण था, श्रेष्ठ एवं सुन्दर चन्दनोंसे चर्चित था तथा सिंहोंसे भरे हुए विशाल वनकी भाँति प्रधान-प्रधान पुरुषोंसे परिपूर्ण था ॥ ११ ॥

भेरीमृदङ्गाभिरुतं शङ्खघोषविनादितम् । नित्यार्चितं पर्वसुतं पूजितं राक्षसैः सदा ॥ १२ ॥

भावार्थ

वहाँ भेरी और मृदङ्गकी ध्वनि सब ओर फैली हुई थी । वहाँ शङ्खकी ध्वनि गूँज रही थी । उसकी नित्य पूजा एवं सजावट होती थी । पर्वोंके दिन वहाँ होम किया जाता था । राक्षसलोग सदा ही उस राजभवनकी पूजा करते थे ॥ १२ ॥

समुद्रमिव गम्भीरं समुद्रसमनिःस्वनम् । महात्मनो महद् वेश्म महारत्नपरिच्छदम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

वह समुद्रके समान गम्भीर और उसीके समान कोलाहलपूर्ण था । महामना रावणका वह विशाल भवन महान् रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत था ॥ १३ ॥

महारत्नसमाकीर्णं ददर्श स महाकपिः । विराजमानं वपुषा गजाश्वरथसंकुलम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

उसमें हाथी-घोड़े और रथ भरे हुए थे तथा वह महान् रत्नोंसे व्याप्त होनेके कारण अपने स्वरूपसे प्रकाशित हो रहा था । महाकपि हनुमान्ने उसे देखा ॥ १४ ॥

लङ्काभरणमित्येव सोऽमन्यत महाकपिः । चचार हनुमांस्तत्र रावणस्य समीपतः ॥ १५ ॥

भावार्थ

देखकर कपिवर हनुमान्ने उस भवनको लङ्काका आभूषण ही माना । तदनन्तर वे उस रावण-भवनके आस-पास ही विचरने लगे ॥ १५ ॥

गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि च सर्वशः । वीक्षमाणोऽप्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः ॥ १६ ॥

भावार्थ

इस प्रकार वे एक घरसे दूसरे घरमें जाकर राक्षसोंके बगीचोंके सभी स्थानोंको देखते हुए बिना किसी भयसे अट्टालिकाओंपर विचरण करने लगे ॥ १६ ॥

अवप्लुत्य महावेगः प्रहस्तस्य निवेशनम् । ततोऽन्यत् पुप्लुवे वेश्म महापार्श्वस्य वीर्यवान् ॥ १७ ॥

भावार्थ

महान् वेगशाली और पराक्रमी वीर हनुमान् वहाँसे कूदकर प्रहस्तके घरमें उतर गये । फिर वहाँसे उछले और महापार्श्वके महलमें पहुँच गये ॥ १७ ॥

अथ मेघप्रतीकाशं कुम्भकर्णनिवेशनम् । विभीषणस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः ॥ १८ ॥

भावार्थ

तदनन्तर वे महाकपि हनुमान् मेघके समान प्रतीत होनेवाले कुम्भकर्णके भवनमें और वहाँसे विभीषणके महलमें कूद गये ॥ १८ ॥

महोदरस्य च तथा विरूपाक्षस्य चैव हि । विद्युज्जिह्वस्य भवनं विद्युन्मालेस्तथैव च ॥ १९ ॥

भावार्थ

इसी तरह क्रमशः वे महोदर, विरूपाक्ष, विद्युज्जिह्व और विद्युन्मालिके घरमें गये ॥ १९ ॥

वज्रदंष्ट्रस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः । शुकस्य च महावेगः सारणस्य च धीमतः ॥ २० ॥

भावार्थ

इसके बाद महान् वेगशाली महाकपि हनुमान्ने फिर छलाँग मारी और वे वज्रदंष्ट्र, शुक तथा बुद्धिमान् सारणके घरोंमें जा पहुँचे ॥ २० ॥

तथा चेन्द्रजितो वेश्म जगाम हरियूथपः । जम्बुमालेः सुमालेश्च जगाम हरिसत्तमः ॥ २१ ॥

भावार्थ

इसके बाद वे वानर-यूथपति कपिश्रेष्ठ इन्द्रजित्के घरमें गये और वहाँसे जम्बुमालि तथा सुमालिके घरमें पहुँच गये ॥ २१ ॥

रश्मिकेतोश्च भवनं सूर्यशत्रोस्तथैव च । वज्रकायस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः ॥ २२ ॥

भावार्थ

तदनन्तर वे महाकपि उछलते-कूदते हुए रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु और वज्रकायके महलोंमें जा पहुँचे ॥ २२ ॥

धूम्राक्षस्याथ सम्पातेर्भवनं मारुतात्मजः । विद्युद्रूपस्य भीमस्य घनस्य विघनस्य च ॥ २३ ॥ शुकनाभस्य चक्रस्य शठस्य कपटस्य च । ह्रस्वकर्णस्य दंष्ट्रस्य लोमशस्य च रक्षसः ॥ २४ ॥ युद्धोन्मत्तस्य मत्तस्य ध्वजग्रीवस्य सादिनः । विद्युज्जिह्वद्विजिह्वानां तथा हस्तिमुखस्य च ॥ २५ ॥ करालस्य पिशाचस्य शोणिताक्षस्य चैव हि । प्लवमानः क्रमेणैव हनुमान् मारुतात्मजः ॥ २६ ॥ तेषु तेषु महार्हेषु भवनेषु महायशाः । तेषामृद्धिमतामृद्धिं ददर्श स महाकपिः ॥ २७ ॥

भावार्थ

फिर क्रमशः वे कपिवर पवनकुमार धूम्राक्ष, सम्पाति, विद्युद्रूप, भीम, घन, विघन, शुकनाभ, चक्र, शठ, कपट, ह्रस्वकर्ण, दंष्ट्र, लोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, ध्वजग्रीव, विद्युज्जिह्व, द्विजिह्व, हस्तिमुख, कराल, पिशाच और शोणिताक्ष आदिके महलोंमें गये । इस प्रकार क्रमशः कूदते-फाँदते हुए महायशस्वी पवनपुत्र हनुमान् उन-उन बहुमूल्य भवनोंमें पधारे । वहाँ उन महाकपिने उन समृद्धिशाली राक्षसोंकी समृद्धि देखी ॥ २३—२७ ॥

सर्वेषां समतिक्रम्य भवनानि समन्ततः । आससादाथ लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् बल-वैभवसे सम्पन्न हनुमान् उन सब भवनों-को लाँघकर पुनः राक्षसराज रावणके महलपर आ गये ॥२८॥

रावणस्योपशायिन्यो ददर्श हरिसत्तमः । विचरन् हरिशार्दूलो राक्षसीर्विकृतेक्षणाः ॥ २९ ॥

भावार्थ

वहाँ विचरते हुए उन वानरशिरोमणि कपिश्रेष्ठने रावणके निकट सोनेवाली ( उसके पलंगकी रक्षा करनेवाली ) राक्षसियोंको देखा, जिनकी आँखें बड़ी विकराल थीं ॥२९॥

शूलमुद्गरहस्तांश्च शक्तितोमरधारिणः । ददर्श विविधान्गुल्मांस्तस्य रक्षःपतेर्गृहे ॥ ३० ॥

भावार्थ

साथ ही, उन्होंने उस राक्षसराजके भवनमें राक्षसियोंके बहुत-से समुदाय देखे, जिनके हाथोंमें शूल, मुद्गर, शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे ॥ ३० ॥

राक्षसांश्च महाकायान् नानाप्रहरणोद्यतान् । रक्ताश्वेतान् सितांश्चापि हरींश्चापि महाजवान् ।३१।

भावार्थ

उनके सिवा, वहाँ बहुत-से विशालकाय राक्षस भी दिखायी दिये, जो नाना प्रकारके हथियारोंसे लैस थे । इतना ही नहीं, वहाँ लाल और सफेद रंगके बहुत-से अत्यन्त वेगशाली घोड़े भी बँधे हुए थे ॥ ३१ ॥

कुलीनान् रूपसम्पन्नान् गजान् परगजारुजान् । शिक्षितान् गजशिक्षायामैरावतसमान् युधि ॥ ३२ ॥ निहन्तॄन् परसैन्यानां गृहे तस्मिन् ददर्श सः । क्षरतश्च यथा मेघान् स्रवतश्च यथा गिरीन् ॥ ३३ ॥ मेघस्तनितनिर्घोषान् दुर्धर्षान् समरे परैः ।

भावार्थ

साथ ही अच्छी जातिके रूपवान् हाथी भी थे, जो शत्रुसेनाके हाथियोंको मार भगानेवाले थे । वे सब-के-सब गज-शिक्षामें सुशिक्षित, युद्धमें ऐरावतके समान पराक्रमी तथा शत्रुसेनाओंका संहार करनेमें समर्थ थे । वे बरसते हुए मेघों और झरने बहाते हुए पर्वतोंके समान मदकी धारा बहा रहे थे । उनकी गर्जना मेघ-गर्जनाके समान जान पड़ती थी । वे समराङ्गणमें शत्रुओंके लिये दुर्जय थे । हनुमान्जीने रावणके भवनमें उन सबको देखा ॥ ३२-३३½ ॥

सहस्रं वाहिनीस्तत्र जाम्बूनदपरिष्कृताः ॥ ३४ ॥ हेमजालैरविच्छिन्नास्तरुणादित्यसंनिभाः । ददर्श राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य निवेशने ॥ ३५ ॥

भावार्थ

राक्षसराज रावणके उस महलमें उन्होंने सहस्रों ऐसी सेनाएँ देखीं, जो जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित थीं । उनके सारे अङ्ग सोनेके गहनोंसे ढके हुए थे तथा वे प्रातःकालके सूर्यकी भाँति उद्दीप्त हो रही थीं ॥ ३४-३५ ॥

शिबिका विविधाकाराः स कपिर्मारुतात्मजः । लतागृहाणि चित्राणि चित्रशालागृहाणि च ॥ ३६ ॥ क्रीडागृहाणि चान्यानि दारुपर्वतकानि च । कामस्य गृहकं रम्यं दिवागृहकमेव च ॥ ३७ ॥ ददर्श राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य निवेशने ।

भावार्थ

पवनपुत्र हनुमान्जीने राक्षसराज रावणके उस भवनमें अनेक प्रकारकी पालकियाँ, विचित्र लता-गृह, चित्रशालाएँ, क्रीडाभवन, काष्ठमय क्रीडापर्वत, रमणीय विलासगृह और दिनमें उपयोगमें आनेवाले विलासभवन भी देखे ॥३६-३७½॥

स मन्दरसमप्रख्यं मयूरस्थानसंकुलम् ॥ ३८ ॥ ध्वजयष्टिभिराकीर्णं ददर्श भवनोत्तमम् । अनन्तरत्ननिचयं निधिजालं समन्ततः । धीरनिष्ठितकर्माङ्गं गृहं भूतपतेरिव ॥ ३९ ॥

भावार्थ

उन्होंने वह महल मन्दराचलके समान ऊँचा, क्रीडा-मयूरोंके रहनेके स्थानोंसे युक्त, ध्वजाओंसे व्याप्त, अनन्त रत्नोंका भण्डार और सब ओरसे निधियोंसे भरा हुआ देखा । उसमें धीर पुरुषोंने निधिरक्षाके उपयुक्त कर्माङ्गोंका अनुष्ठान किया था तथा वह साक्षात् भूतनाथ ( महेश्वर या कुबेर ) के भवनके समान जान पड़ता था ॥ ३८-३९ ॥

अर्चिर्भिश्चापि रत्नानां तेजसा रावणस्य च । विरराज च तद् वेश्म रश्मिवानिव रश्मिभिः ॥ ४० ॥

भावार्थ

रत्नोंकी किरणों तथा रावणके तेजके कारण वह घर किरणोंसे युक्त सूर्यके समान जगमगा रहा था ॥ ४० ॥

जाम्बूनदमयान्येव शयनान्यासनानि च । भाजनानि च शुभ्राणि ददर्श हरियूथपः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

वानरयूथपति हनुमान्ने वहाँके पलंग, चौकी और पात्र सभी अत्यन्त उज्ज्वल तथा जाम्बूनद सुवर्णके बने हुए ही देखे ॥ ४१ ॥

मध्वासवकृतक्लेदं मणिभाजनसंकुलम् । मनोरममसम्बाधं कुबेरभवनं यथा ॥ ४२ ॥ नूपुराणां च घोषेण काञ्चीनां निःस्वनेन च । मृदङ्गतलनिर्घोषैर्घोषवद्भिर्विनादितम् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

उसमें मधु और आसवके गिरनेसे वहाँकी भूमि गीली हो रही थी । मणिमय पात्रोंसे भरा हुआ वह सुविस्तृत महल कुबेर-भवनके समान मनोरम जान पड़ता था । नूपुरोंकी झनकार, करधनियोंकी खनखनाहट, मृदङ्गों और तालियोंकी मधुर ध्वनि तथा अन्य गम्भीर घोष करनेवाले वाद्योंसे वह भवन मुखरित हो रहा था ॥ ४२-४३ ॥

प्रासादसंघातयुतं स्त्रीरत्नशतसंकुलम् । सुव्यूढकक्ष्यं हनुमान् प्रविवेश महागृहम् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

उसमें सैकड़ों अट्टालिकाएँ थीं, सैकड़ों रमणी-रत्नोंसे वह व्याप्त था । उसकी ड्योढ़ियाँ बहुत बड़ी-बड़ी थीं । ऐसे विशाल भवनमें हनुमान्जीने प्रवेश किया ॥ ४४ ॥

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