सुन्दरकाण्ड, सर्ग 10
तत्र दिव्योपमं मुख्यं स्फाटिकं रत्नभूषितम् । अवेक्षमाणो हनुमान् ददर्श शयनासनम् ॥ १ ॥
भावार्थ
वहाँ इधर-उधर दृष्टिपात करते हुए हनुमान्जीने एक दिव्य एवं श्रेष्ठ वेदी देखी, जिसपर पलंग बिछाया जाता था । वह वेदी स्फटिक मणिकी बनी हुई थी और उसमें अनेक प्रकारके रत्न जड़े गये थे ॥ १ ॥
दान्तकाञ्चनचित्राङ्गैर्वैदूर्यैश्च वरासनैः । महार्हास्तरणोपेतैरुपपन्नं महाधनैः ॥ २ ॥
भावार्थ
वहाँ वैदूर्यमणि ( नीलम ) के बने हुए श्रेष्ठ आसन ( पलंग ) बिछे हुए थे, जिनकी पाटी-पाये आदि अङ्ग हाथी-दाँत और सुवर्णसे जटित होनेके कारण चितकबरे दिखायी देते थे । उन महामूल्यवान् पलंगोंपर बहुमूल्य बिछौने बिछाये गये थे । उन सबके कारण उस वेदीकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २ ॥
तस्य चैकतमे देशे दिव्यमालोपशोभितम् । ददर्श पाण्डुरं छत्रं ताराधिपतिसंनिभम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
उस पलंगके एक भागमें उन्होंने चन्द्रमाके समान एक श्वेत छत्र देखा, जो दिव्य मालाओंसे सुशोभित था ॥ ३ ॥
जातरूपपरिक्षिप्तं चित्रभानोः समप्रभम् । अशोकमालावितत�� ददर्श परमासनम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
वह उत्तम पलंग सुवर्णसे जटित होनेके कारण अग्निके समान देदीप्यमान हो रहा था । हनुमान्जीने उसे अशोक-पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत देखा ॥ ४ ॥
वालव्यजनहस्ताभिर्वीज्यमानं समन्ततः । गन्धैश्च विविधैर्जुष्टं वरधूपेन धूपितम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उसके चारों ओर खड़ी हुई बहुत-सी स्त्रियाँ हाथोंमें चँवर लिये उसपर हवा कर रही थीं । वह पलंग अनेक प्रकारकी गन्धोंसे सेवित तथा उत्तम धूपसे सुवासित था ॥५॥
परमास्तरणास्तीर्णमाविकाजिनसंवृतम् । दामभिर्वरमाल्यानां समन्तादुपशोभितम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
उसपर उत्तमोत्तम बिछौने बिछे हुए थे । उसमें भेड़की खाल मढ़ी हुई थी तथा वह सब ओरसे उत्तम फूलोंकी मालाओंसे सुशोभित था ॥ ६ ॥
तस्मिञ्जीमूतसंकाशं प्रदीप्तोज्ज्वलकुण्डलम् । लोहिताक्षं महाबाहुं महारजतवाससम् ॥ ७ ॥ लोहितेनानुलिप्ताङ्गं चन्दनेन सुगन्धिना । संध्यारक्तमिवाकाशे तोयदं सतडिद्गुणम् ॥ ८ ॥ वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम् । सवृक्षवनगुल्माढ्यं प्रसुप्तमिव मन्दरम् ॥ ९ ॥ क्रीडित्वोपरतं रात्रौ वराभरणभूषितम् । प्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम् ॥ १० ॥ पीत्वाप्युपरतं चापि ददर्श स महाकपिः । भास्वरे शयने वीरं प्रसुप्तं राक्षसाधिपम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
उस प्रकाशमान पलंगपर महाकपि हनुमान्जीने वीर राक्षसराज रावणको सोते देखा, जो सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला, दिव्य आभरणोंसे अलंकृत और सुरूपवान् था । वह राक्षस-कन्याओंका प्रियतम तथा राक्षसोंको सुख पहुँचानेवाला था । उसके अङ्गोंमें सुगन्धित लाल चन्दनका अनुलेप लगा हुआ था, जिससे वह आकाशमें संध्याकालकी लाली तथा विद्युल्लेखासे युक्त मेघके समान शोभा पाता था । उसकी अङ्गकान्ति मेघके समान श्याम थी । उसके कानोंमें उज्ज्वल कुण्डल झिलमिला रहे थे । आँखें लाल थीं और भुजाएँ बड़ी-बड़ी । उसके वस्त्र सुनहरे रंगके थे । वह रातको स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करके मदिरा पीकर आराम कर रहा था । उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो वृक्ष, वन और लता-गुल्मोंसे सम्पन्न मन्दराचल सो रहा हो ॥ ७—११ ॥
निःश्वसन्तं यथा नागं रावणं वानरोत्तमः । आसाद्य परमोद्विग्नः सोपासर्पत् सुभीतवत् ॥ १२ ॥ अथारोहणमासाद्य वेदिकान्तरमाश्रितः । क्षीबं राक्षसशार्दूलं प्रेक्षते स महाकपिः ॥ १३ ॥
भावार्थ
उस समय साँस लेता हुआ रावण फुफकारते हुए सर्पके समान जान पड़ता था । उसके पास पहुँचकर वानरशिरोमणि हनुमान् अत्यन्त उद्विग्न हो भलीभाँति डरे हुएकी भाँति सहसा दूर हट गये और सीढ़ियोंपर चढ़कर एक दूसरी वेदीपर जाकर खड़े हो गये । वहाँसे उन महाकपिने उस मतवाले राक्षससिंहको देखना आरम्भ किया ॥ १२-१३ ॥
शुशुभे राक्षसेन्द्रस्य स्वपतः शयनं शुभम् । गन्धहस्तिनि संविष्टे यथा प्रस्रवणं महत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
राक्षसराज रावणके सोते समय वह सुन्दर पलंग उसी प्रकार शोभा पा रहा था, जैसे गन्धहस्तीके शयन करनेपर विशाल प्रस्रवणगिरि सुशोभित हो रहा हो ॥ १४ ॥
काञ्चनाङ्गदसंनद्धौ ददर्श स महात्मनः । विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ ॥ १५ ॥
भावार्थ
उन्होंने महाकाय राक्षसराज रावणकी फैलायी हुई दो भुजाएँ देखीं, जो सोनेके बाजूबंदसे विभूषित हो इन्द्रध्वजके समान जान पड़ती थीं ॥ १५ ॥
ऐरावतविषाणाग्रैरापीडनकृतव्रणौ । वज्रोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ ॥ १६ ॥
भावार्थ
युद्धकालमें उन भुजाओंपर ऐरावत हाथीके दाँतोंके अग्रभागसे जो प्रहार किये गये थे, उनके आघातका चिह्न बन गया था । उन भुजाओंके मूलभाग या कंधे बहुत मोटे थे और उनपर वज्रद्वारा किये गये आघातके भी चिह्न दिखायी देते थे । भगवान् विष्णुके चक्रसे भी किसी समय वे भुजाएँ क्षत-विक्षत हो चुकी थीं ॥ १६ ॥
पीनौ समसुजातांसौ सङ्गतौ बलसंयुतौ । सुलक्षणनखाङ्गुष्ठौ स्वङ्गुलीयकलक्षितौ ॥ १७ ॥
भावार्थ
वे भुजाएँ सब ओरसे समान और सुन्दर कंधोंवाली तथा मोटी थीं । उनकी संधियाँ सुदृढ़ थीं । वे बलिष्ठ और उत्तम लक्षणवाले नखों एवं अङ्गुष्ठोंसे सुशोभित थीं । उनकी अङ्गुलियाँ और हथेलियाँ बड़ी सुन्दर दिखायी देती थीं ॥१७॥
संहतौ परिघाकारौ वृत्तौ करिकरोपमौ । विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पञ्चशीर्षाविवोरगौ ॥ १८ ॥
भावार्थ
वे सुगठित एवं पुष्ट थीं । परिघके समान गोलाकार तथा हाथीके शुण्डदण्डकी भाँति चढ़ाव-उतारवाली एवं लंबी थीं । उस उज्ज्वल पलंगपर फैली वे बाँहें पाँच-पाँच फनवाले दो सर्पोंके समान दृष्टिगोचर होती थीं ॥ १८ ॥
शशाक्षतजकल्पेन सुशीतेन सुगन्धिना । चन्दनेन परार्ध्येन स्वनुलिप्तौ स्वलंकृतौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
खरगोशके खूनकी भाँति लाल रंगके उत्तम, सुशीतल एवं सुगन्धित चन्दनसे चर्चित हुई वे भुजाएँ अलंकारोंसे अलंकृत थीं ॥ १९ ॥
उत्तमस्त्रीविमृदितौ गन्धोत्तमनिषेवितौ । यक्षपन्नगगन्धर्वदेवदानवराविणौ ॥ २० ॥
भावार्थ
सुन्दरी युवतियाँ धीरे-धीरे उन बाँहोंको दबाती थीं । उनपर उत्तम गन्ध-द्रव्यका लेप हुआ था । वे यक्ष, नाग, गन्धर्व, देवता और दानव सभीको युद्धमें रुलाने-वाली थीं ॥ २० ॥
ददर्श स कपिस्तस्य बाहू शयनसंस्थितौ । मन्दरस्यान्तरे सुप्तौ महाही रुषिताविव ॥ २१ ॥
भावार्थ
कपिवर हनुमान्ने पलंगपर पड़ी हुई उन दोनों भुजाओंको देखा । वे मन्दराचलकी गुफामें सोये हुए दो रोषभरे अजगरों-के समान जान पड़ती थीं ॥ २१ ॥
ताभ्यां स परिपूर्णाभ्यामुभाभ्यां राक्षसेश्वरः । शुशुभेऽचलसंकाशः शृङ्गाभ्यामिव मन्दरः ॥ २२ ॥
भावार्थ
उन बड़ी-बड़ी और गोलाकार दो भुजाओंसे युक्त पर्वताकार राक्षसराज रावण दो शिखरोंसे संयुक्त मन्दराचलके समान शोभा पा रहा था* ॥ २२ ॥
चूतपुंनागसुरभिर्बकुलोत्तमसंयुतः । मृष्टान्नरससंयुक्तः पानगन्धपुरःसरः ॥ २३ ॥ तस्य राक्षसराजस्य निश्चक्राम महामुखात् । शयानस्य विनिःश्वासः पूरयन्निव तद् गृहम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
वहाँ सोये हुए राक्षसराज रावणके विशाल मुखसे आम और नागकेसरकी सुगन्धसे मिश्रित, मौलसिरीके सुवाससे सुवासित और उत्तम अन्नरससे संयुक्त तथा मधुपानकी गन्धसे मिली हुई जो सौरभयुक्त साँस निकल रही थी, वह उस सारे घरको सुगन्धसे परिपूर्ण-सा कर देती थी ॥ २३-२४ ॥
मुक्तामणिविचित्रेण काञ्चनेन विराजिता । मुकुटेनापवृत्तेन कुण्डलोज्ज्वलिताननम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
उसका कुण्डलसे प्रकाशमान मुखारविन्द अपने स्थानसे हटे हुए तथा मुक्तामणिसे जटित होनेके कारण विचित्र आभावाले सुवर्णमय मुकुटसे और भी उद्भासित हो रहा था ॥ २५ ॥
रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण शोभिना । पीनायतविशालेन वक्षसाभिविराजिता ॥ २६ ॥
भावार्थ
उसकी छाती लाल चन्दनसे चर्चित, हारसे सुशोभित, उभरी हुई तथा लंबी-चौड़ी थी। उसके द्वारा उस राक्षसराजके सम्पूर्ण शरीरकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २६ ॥
पाण्डुरेणापविद्धेन क्षौमेण क्षतजेक्षणम् । महार्हेण सुसंवीतं पीतेनोत्तरवाससा ॥ २७ ॥
भावार्थ
उसकी आँखें लाल थीं। उसकी कटिके नीचेका भाग ढीलेढाले श्वेत रेशमी वस्त्रसे ढका हुआ था तथा वह पीले रंगकी बहुमूल्य रेशमी चादर ओढ़े हुए था ॥ २७ ॥
माषराशिप्रतीकाशं निःश्वसन्तं भुजङ्गवत् । गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
वह स्वच्छ स्थानमें रक्खे हुए उड़दके ढेरके समान जान पड़ता था और सर्पके समान साँसें ले रहा था। उस उज्ज्वल पलंगपर सोया हुआ रावण गङ्गाकी अगाध जलराशिमें सोये हुए गजराजके समान दिखायी देता था ॥ २८ ॥
चतुर्भिः काञ्चनैर्दीपैर्दीप्यमानं चतुर्दिशम् । प्रकाशीकृतसर्वाङ्गं मेघं विद्युद्गणैरिव ॥ २९ ॥
भावार्थ
उसकी चारों दिशाओंमें चार सुवर्णमय दीपक जल रहे थे, जिनकी प्रभासे वह देदीप्यमान हो रहा था और उसके सारे अङ्ग प्रकाशित होकर स्पष्ट दिखायी दे रहे थे। ठीक उसी तरह, जैसे विद्युद्गणोंसे मेघ प्रकाशित एवं परिलक्षित होता है ॥ २९ ॥
पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मनः । पत्नीः स प्रियभार्यस्य तस्य रक्षःपतेर्गृहे ॥ ३० ॥
भावार्थ
पत्नियोंके प्रेमी उस महाकाय राक्षसराजके घरमें हनुमान्जीने उसकी पत्नियोंको भी देखा, जो उसके चरणोंके आस-पास ही सो रही थीं ॥ ३० ॥
शशिप्रकाशवदना वरकुण्डलभूषणाः । अम्लानमाल्याभरणा ददर्श हरियूथपः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
वानरयूथपति हनुमान्जीने देखा, उन रावणपत्नियोंके मुख चन्द्रमाके समान प्रकाशमान थे। वे सुन्दर कुण्डलोंसे विभूषित थीं तथा ऐसे फूलोंके हार पहने हुए थीं, जो कभी मुरझाते नहीं थे ॥ ३१ ॥
नृत्यवादित्रकुशला राक्षसेन्द्रभुजाङ्कगाः । वराभरणधारिण्यो निषण्णा ददृशे कपिः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वे नाचने और बाजे बजानेमें निपुण थीं, राक्षसराज रावणकी बाँहों और अङ्कमें स्थान पानेवाली थीं तथा सुन्दर आभूषण धारण किये हुए थीं। कपिवर हनुमान्ने उन सबको वहाँ सोती देखा ॥ ३२ ॥
वज्रवैदूर्यगर्भाणि श्रवणान्तेषु योषिताम् । ददर्श तापनीयानि कुण्डलान्यङ्गदानि च ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उन्होंने उन सुन्दरियोंके कानोंके समीप हीरे तथा नीलम जड़े हुए सोनेके कुण्डल और बाजूबंद देखे ॥ ३३ ॥
तासां चन्द्रोपमैर्वक्त्रैः शुभैर्ललितकुण्डलैः । विरराज विमानं तन्नभस्तारागणैरिव ॥ ३४ ॥
भावार्थ
ललित कुण्डलोंसे अलंकृत तथा चन्द्रमाके समान मनोहर उनके सुन्दर मुखोंसे वह विमानाकार पर्यङ्क तारिकाओंसे मण्डित आकाशकी भाँति सुशोभित हो रहा था ॥ ३४ ॥
मद्व्यायामखिन्नास्ता राक्षसेन्द्रस्य योषितः । तेषु तेष्ववकाशेषु प्रसुप्तास्तनुमध्यमाः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
क्षीण कटिप्रदेशवाली वे राक्षसराजकी स्त्रियाँ मद तथा रतिक्रीड़ाके परिश्रमसे थककर जहाँ-तहाँ जो जिस अवस्थामें थीं वैसे ही सो गयी थीं ॥ ३५ ॥
अङ्गहारैस्तथैवान्या कोमलैर्नृत्यशालिनी । विन्यस्तशुभसर्वाङ्गी प्रसुप्ता वरवर्णिनी ॥ ३६ ॥
भावार्थ
विधाताने जिसके सारे अङ्गोंको सुन्दर एवं विशेष शोभासे सम्पन्न बनाया था, वह कोमलभावसे अङ्गोंके संचालन ( चटकाने-मटकाने आदि ) द्वारा नाचनेवाली कोई अन्य नृत्यनिपुणा सुन्दरी स्त्री गाढ़ निद्रामें सोकर भी वासनावश जाग्रत्-अवस्थाकी ही भाँति नृत्यके अभिनयसे सुशोभित हो रही थी ॥ ३६ ॥
काचिद् वीणां परिष्वज्य प्रसुप्ता सम्प्रकाशते । महानदीप्रकीर्णेव नलिनी पोतमाश्रिता ॥ ३७ ॥
भावार्थ
कोई वीणाको छातीसे लगाकर सोयी हुई सुन्दरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो महानदीमें पड़ी हुई कोई कमलिनी किसी नौकासे सट गयी हो ॥ ३७ ॥
अन्या कक्षगतेनैव मड्डुकेनासितेक्षणा । प्रसुप्ता भामिनी भाति बालपुत्रेव वत्सला ॥ ३८ ॥
भावार्थ
दूसरी कजरारे नेत्रोंवाली भामिनी काँखमें दबे हुए मड्डुक ( लघुवाद्य विशेष ) के साथ ही सो गयी थी। वह ऐसी प्रतीत होती थी, जैसे कोई पुत्रवत्सला जननी अपने छोटे-से शिशुको गोदमें लिये सो रही हो ॥ ३८ ॥
पटहं चारुसर्वाङ्गी न्यस्य शेते शुभस्तनी । चिरस्य रमणं लब्ध्वा परिष्वज्येव कामिनी ॥ ३९ ॥
भावार्थ
कोई सर्वाङ्गसुन्दरी एवं रुचिर कुचोंवाली कामिनी पटहको अपने नीचे रखकर सो रही थी, मानो चिरकालके पश्चात् प्रियतमको अपने निकट पाकर कोई प्रेयसी उसे हृदयसे लगाये सो रही हो ॥ ३९ ॥
काचिद् वीणां परिष्वज्य सुप्ता कमललोचना । वरं प्रियतमं गृह्य सकामेव हि कामिनी ॥ ४० ॥
भावार्थ
कोई कमललोचना युवती वीणाका आलिङ्गन करके सोयी हुई ऐसी जान पड़ती थी, मानो कामभावसे युक्त कामिनी अपने श्रेष्ठ प्रियतमको भुजाओंमें भरकर सो गयी हो ॥ ४० ॥
विपञ्चीं परिगृह्यान्या नियता नृत्यशालिनी । निद्रावशमनुप्राप्ता सहकान्तेव भामिनी ॥ ४१ ॥
भावार्थ
नियमपूर्वक नृत्यकलासे सुशोभित होनेवाली एक अन्य युवती विपञ्ची ( विशेष प्रकारकी वीणा ) को अङ्कमें भरकर प्रियतमके साथ सोयी हुई प्रेयसीकी भाँति निद्राके अधीन हो गयी थी ॥ ४१ ॥
अन्या कनकसंकाशैर्मृदुपीनैर्मनोरमैः । मृदङ्गं परिविद्ध्याङ्गैः प्रसुप्ता मत्तलोचना ॥ ४२ ॥
भावार्थ
कोई मतवाले नयनोंवाली दूसरी सुन्दरी अपने सुवर्णसदृश गौर, कोमल, पुष्ट और मनोरम अङ्गोंसे मृदङ्गको दबाकर गाढ़ निद्रामें सो गयी थी ॥ ४२ ॥
भुजपाशान्तरस्थेन कक्षगेन कृशोदरी । पणवेन सहानिन्द्या सुप्ता मदकृतश्रमा ॥ ४३ ॥
भावार्थ
नशेसे थकी हुई कोई कृशोदरी अनिन्द्य सुन्दरी रमणी अपने भुजपाशोंके बीचमें स्थित और काँखमें दबे हुए पणवके साथ ही सो गयी थी ॥ ४३ ॥
डिण्डिमं परिगृह्यान्या तथैवासक्तडिण्डिमा । प्रसुप्ता तरुणं वत्समुपगुह्येव भामिनी ॥ ४४ ॥
भावार्थ
दूसरी स्त्री डिंडिमको लेकर उसी तरह उससे सटी हुई सो गयी थी, मानो कोई भामिनी अपने बालक पुत्रको हृदयसे लगाये हुए नींद ले रही हो ॥ ४४ ॥
काचिदाडम्बरं नारी भुजसम्भोगपीडितम् । कृत्वा कमलपत्राक्षी प्रसुप्ता मदमोहिता ॥ ४५ ॥
भावार्थ
मदिराके मदसे मोहित हुई कोई कमलनयनी नारी आडम्बर नामक वाद्यको अपनी भुजाओंके आलिङ्गनसे दबाकर प्रगाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयी ॥ ४५ ॥
कलशीमपविद्ध्यान्या प्रसुप्ता भाति भामिनी । वसन्ते पुष्पशबला मालेव परिमार्जिता ॥ ४६ ॥
भावार्थ
कोई दूसरी युवती निद्रावश जलसे भरी हुई सुराहीको लुढ़काकर भीगी अवस्थामें ही बेसुध सो रही थी । उस अवस्थामें वह वसन्त-ऋतुमें विभिन्न वर्णके पुष्पोंकी बनी और जलके छींटेसे सींची हुई मालाके समान प्रतीत होती थी ॥ ४६ ॥
पाणिभ्यां च कुचौ काचित् सुवर्णकलशोपमौ । उपगुह्यावला सुप्ता निद्राबलपराजिता ॥ ४७ ॥
भावार्थ
निद्राके बलसे पराजित हुई कोई अबला सुवर्णमय कलशके समान प्रतीत होनेवाले अपने कुचोंको दोनों हाथोंसे दबाकर सो रही थी ॥ ४७ ॥
अन्या कमलपत्राक्षी पूर्णेन्दुसदृशानना । अन्यामालिङ्ग्य सुश्रोणीं प्रसुप्ता मदविह्वला ॥ ४८ ॥
भावार्थ
पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली दूसरी कमललोचना कामिनी सुन्दर नितम्बवाली किसी अन्य सुन्दरीका आलिङ्गन करके मदसे विह्वल होकर सो गयी थी ॥ ४८ ॥
आतोद्यानि विचित्राणि परिष्वज्य वरस्त्रियः । निपीड्य च कुचैः सुप्ताः कामिन्यः कामुकानिव ॥ ४९ ॥
भावार्थ
जैसे कामिनियाँ अपने चाहनेवाले कामुकोंको छातीसे लगाकर सोती हैं, उसी प्रकार कितनी ही सुन्दरियाँ विचित्र-विचित्र वाद्योंका आलिङ्गन करके उन्हें कुचोंसे दबाये सो गयी थीं ॥ ४९ ॥
तासामेकान्तविन्यस्ते शयानां शयने शुभे । ददर्श रूपसम्पन्नामथ तां स कपिः स्त्रियम् ॥ ५० ॥
भावार्थ
उन सबकी शय्याओंसे पृथक् एकान्तमें बिछी हुई सुन्दर शय्यापर सोयी हुई एक रूपवती युवतीको वहाँ हनुमान्जीने देखा ॥ ५० ॥
मुक्तामणिसमायुक्तैर्भूषणैः सुविभूषिताम् । विभूषयन्तीमिव च स्वश्रिया भवनोत्तमम् ॥ ५१ ॥
भावार्थ
वह मोती और मणियोंसे जड़े हुए आभूषणोंसे भलीभाँति विभूषित थी और अपनी शोभासे उस उत्तम भवनको विभूषित-सा कर रही थी ॥ ५१ ॥
गौरीं कनकवर्णाभामिष्टामन्तःपुरेश्वरीम् । कपिर्मन्दोदरीं तत्र शयानां चारुरूपिणीम् ॥ ५२ ॥ स तां दृष्ट्वा महाबाहुर्भूषितां मारुतात्मजः । तर्कयामास सीतेति रूपयौवनसम्पदा । हर्षेण महता युक्तो ननन्द हरियूथपः ॥ ५३ ॥
भावार्थ
वह गोरे रंगकी थी । उसकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान दमक रही थी । वह रावणकी प्रियतमा और उसके अन्तःपुरकी स्वामिनी थी । उसका नाम मन्दोदरी था । वह अपने मनोहर रूपसे सुशोभित हो रही थी । वही वहाँ सो रही थी । हनुमान्जीने उसीको देखा । रूप और यौवनकी सम्पत्तिसे युक्त और वस्त्राभूषणोंसे विभूषित मन्दोदरीको देखकर महाबाहु पवनकुमारने अनुमान किया कि ये ही सीताजी हैं । फिर तो ये वानरयूथपति हनुमान् महान् हर्षसे युक्त हो आनन्दमग्न हो गये ॥ ५२-५३ ॥
आस्फोटयामास चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम । स्तम्भानरोहन्निपपात भूमौ निदर्शयन् स्वां प्रकृतिं कपीनाम् ॥ ५४ ॥
भावार्थ
वे अपनी पूँछको पटकने और चूमने लगे । अपनी वानरों-जैसी प्रकृतिका प्रदर्शन करते हुए आनन्दित होने, खेलने और गाने लगे, इधर-उधर आने-जाने लगे । वे कभी खंभोंपर चढ़ जाते और कभी पृथ्वीपर कूद पड़ते थे ॥ ५४ ॥
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