सुन्दरकाण्ड, सर्ग 11
अवधूय च तां बुद्धिं बभूवावस्थितस्तदा । जगाम चापरां चिन्तां सीतां प्रति महाकपिः ॥ १ ॥
भावार्थ
फिर उस समय इस विचारको छोड़कर महाकपि हनुमान्जी अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हुए और वे सीताजीके विषयमें दूसरे प्रकारकी चिन्ता करने लगे ॥ १ ॥
न रामेण वियुक्ता सा स्वप्तुमर्हति भामिनी । न भोक्तुं नाप्यलंकर्तुं न पानमुपसेवितुम् ॥ २ ॥
भावार्थ
( उन्होंने सोचा—) ‘भामिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीसे बिछुड़ गयी हैं । इस दशामें वे न तो सो सकती हैं, न भोजन कर सकती हैं, न शृङ्गार एवं अलंकार धारण कर सकती हैं, फिर मदिरापानका सेवन तो किसी प्रकार भी नहीं कर सकतीं ॥ २ ॥
नान्यं नरमुपस्थातुं सुराणामपि चेश्वरम् । न हि रामसमः कश्चिद् विद्यते त्रिदशेष्वपि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वे किसी दूसरे पुरुषके पास, वह देवताओंका भी ईश्वर क्यों न हो, नहीं जा सकतीं । देवताओंमें भी कोई ऐसा नहीं है जो श्रीरामचन्द्रजीकी समानता कर सके ॥ ३ ॥
अन्येयमिति निश्चित्य भूयस्तत्र चचार सः । पानभूमौ हरिश्रेष्ठः सीतासंदर्शनोत्सुकः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘अतः अवश्य ही यह सीता नहीं, कोई दूसरी स्त्री है ।’ ऐसा निश्चय करके वे कपिश्रेष्ठ सीताजीके दर्शनके लिये उत्सुक हो पुनः वहाँकी मधुशालामें विचरने लगे ॥ ४ ॥
क्रीडितेनापराः क्लान्ता गीतेन च तथापराः । नृत्येन चापराः क्लान्ताः पानविप्रहतास्तथा ॥ ५ ॥
भावार्थ
वहाँ कोई स्त्रियाँ क्रीड़ा करनेसे थकी हुई थीं तो कोई गीत गानेसे । दूसरी नृत्य करके थक गयी थीं और कितनी ही स्त्रियाँ अधिक मद्यपान करके अचेत हो रही थीं ॥ ५ ॥
मुरजेषु मृदङ्गेषु चेलिकासु च संस्थिताः । तथाऽऽस्तरणमुख्येषु संविष्टाश्चापराः स्त्रियः ॥ ६ ॥
भावार्थ
बहुत-सी स्त्रियाँ ढोल, मृदङ्ग और चेलिका नामक वाद्योंपर अपने अङ्गोंको टेककर सो गयी थीं तथा दूसरी महिलाएँ अच्छे-अच्छे बिछौनोंपर सोयी हुई थीं ॥ ६ ॥
अङ्गनानां सहस्रेण भूषितेन विभूषणैः । रूपसंलापशीलेन युक्तगीतार्थभाषिणा ॥ ७ ॥ देशकालाभियुक्तेन युक्तवाक्याभिधायिना । रताधिकेन संयुक्तां ददर्श हरियूथपः ॥ ८ ॥
भावार्थ
वानरयूथपति हनुमान्जीने उस पानभूमिको ऐसी सहस्रों रमणियोंसे संयुक्त देखा, जो भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित, रूप-लावण्यकी चर्चा करनेवाली, गीतके समुचित अभिप्रायको अपनी वाणीद्वारा प्रकट करनेवाली, देश और कालको समझनेवाली, उचित बात बोलनेवाली और रति-क्रीड़ामें अधिक भाग लेनेवाली थीं ॥ ७-८ ॥
अन्यत्रापि वरस्त्रीणां रूपसंलापशायिनाम् । सहस्रं युवतीनां तु प्रसुप्तं स ददर्श ह ॥ ९ ॥
भावार्थ
दूसरे स्थानपर भी उन्होंने ऐसी सहस्रों सुन्दरी युवतियोंको सोते देखा, जो आपसमें रूप-सौन्दर्यकी चर्चा करती हुई लेट रही थीं ॥ ९ ॥
देशकालाभियुक्तं तु युक्तवाक्याभिधायि तत् । रताविरतसंसुप्तं ददर्श हरियूथपः ॥ १० ॥
भावार्थ
वानरयूथपति पवनकुमारने ऐसी बहुत-सी स्त्रियोंको देखा, जो देश-कालको जाननेवाली, उचित बात कहनेवाली तथा रतिक्रीड़ाके पश्चात् गाढ़ निद्रामें सोयी हुई थीं ॥१०॥
तासां मध्ये महाबाहुः शुशुभे राक्षसेश्वरः । गोष्ठे महति मुख्यानां गवां मध्ये यथा वृषः ॥ ११ ॥
भावार्थ
उन सबके बीचमें महाबाहु राक्षसराज रावण विशाल गोशालामें श्रेष्ठ गौओंके बीच सोये हुए साँड़की भाँति शोभा पा रहा था ॥ ११ ॥
स राक्षसेन्द्रः शुशुभे ताभिः परिवृतः स्वयम् । करेणुभिर्यथारण्ये परिकीर्णो महाद्विपः ॥ १२ ॥
भावार्थ
जैसे वनमें हाथियोंसे घिरा हुआ कोई महान् गजराज सो रहा हो; उसी प्रकार उस भवनमें उन सुन्दरियोंसे घिरा हुआ स्वयं राक्षसराज रावण सुशोभित हो रहा था ॥ १२ ॥
सर्वकामैरुपेतां च पानभूमिं महात्मनः । ददर्श कपिशार्दूलस्तस्य रक्षःपतेर्गृहे ॥ १३ ॥ मृगाणां महिषाणां च वराहाणां च भागशः । तत्र न्यस्तानि मांसानि पानभूमौ ददर्श सः ॥ १४ ॥ रौक्मेषु च विशालेषु भाजनेष्वप्यभक्षितान् । ददर्श कपिशार्दूलो मयूरान् कुक्कुटांस्तथा ॥ १५ ॥ वराहवाग्रीणसकान् दधिसौवर्चलायुतान् । शल्यान् मृगमयूरांश्च हनुमानन्ववैक्षत ॥१६॥
भावार्थ
उस महाकाय राक्षसराजके भवनमें कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने वह पानभूमि देखी, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न थी । उस मधुशालामें अलग-अलग मृगों, भैंसों और सूअरोंके मांस रखे गये थे, जिन्हें हनुमान्जीने देखा ॥ वानरिंह हनुमान्ने वहाँ सोनेके बड़े-बड़े पात्रोंमें मोर, मुर्गे, सूअर, गेंडा, साही, हरिण तथा मयूरोंके मांस देखे, जो दही और नमक मिलाकर रखे गये थे । वे अभी खाये नहीं गये थे ॥ १५-१६ ॥
कृकलान् विविधांश्छागाञ्छशकानर्धभक्षितान् । महिषानेकशल्यांश्च मेषांश्च कृतनिष्ठितान् ॥ १७ ॥ लेह्यानुच्चावचान् पेयान् भोज्यान्युच्चावचानि च । तथाम्ललवणोत्तंसैर्विविधै रागखाण्डवैः ॥ १८ ॥
भावार्थ
कृकल नामक पक्षी, भाँति-भाँतिके बकरे, खरगोश, आधे खाये हुए भैंसे, एकशल्य नामक मत्स्य और भेड़े— ये सब-के-सब राँध-पकाकर रक्खे हुए थें । इनके साथ अनेक प्रकारकी चटनियाँ भी थीं । भाँति-भाँतिके पेय तथा भक्ष्य पदार्थ भी विद्यमान थे । जीभकी शिथिलता दूर करनेके लिये खटाई और नमकके साथ भाँति-भाँतिके राग और खाण्डव भी रक्खे गये थे ॥ १७-१८ ॥
महानूपुरकेयूरैरपविद्धैर्महाधनैः । पानभाजनविक्षिप्तैः फलैश्च विविधैरपि ॥ १९ ॥ कृतपुष्पोपहारा भूरधिकां पुष्यति श्रियम् ।
भावार्थ
बहुमूल्य बड़े-बड़े नूपुर और बाजूबंद जहाँ-तहाँ पड़े हुए थे । मद्यपानके पात्र इधर-उधर लुढ़काये हुए थे । भाँति-भाँतिके फल भी बिखरे पड़े थे । इन सबसे उपलक्षित होनेवाली वह पानभूमि, जिसे फूलोंसे सजाया गया था, अधिक शोभाका पोषण एवं संवर्धन कर रही थी ॥ १९½ ॥
तत्र तत्र च विन्यस्तैः सुश्लिष्टशयनासनैः ॥ २० ॥ पानभूमिर्विना वह्निं प्रदीप्तेवोपलक्ष्यते ।
भावार्थ
यत्र-तत्र रक्खी हुई सुदृढ़ शय्याओं और सुन्दर स्वर्णमय सिंहासनोंसे सुशोभित होनेवाली वह मधुशाला ऐसी जगमगा रही थी कि बिना आगके ही जलती हुई-सी दिखायी देती थी ॥ २०½ ॥
बहुप्रकारैर्विविधैर्वरसंस्कारसंस्कृतैः ॥ २१ ॥ मांसैः कुशलसंयुक्तैः पानभूमिगतैः पृथक् । दिव्याः प्रसन्ना विविधाः सुराः कृतसुरा अपि ॥ २२ ॥ शर्करासवमाध्वीकाः पुष्पासवफलासवाः । वासचूर्णैश्च विविधैर्मृष्टास्तैस्तैः पृथक् पृथक् ॥ २३ ॥
भावार्थ
अच्छी छौंक-बघारसे तैयार किये गये नाना प्रकारके विविध मांस चतुर रसोइयोंद्वारा बनाये गये थे और उस पानभूमिमें पृथक्-पृथक् सजाकर रखे गये थे । उनके साथ ही स्वच्छ दिव्य सुराएँ ( जो कदम्ब आदि वृक्षोंसे स्वतः उत्पन्न हुई थीं ) और कृत्रिम सुराएँ ( जिन्हें शराब बनानेवाले लोग तैयार करते हैं ) भी वहाँ रक्खी गयी थीं । उनमें शर्करासव, माध्वीक, पुष्पासव और फलासव भी थे । इन सबको नाना प्रकारके सुगन्धित चूर्णोंसे पृथक्-पृथक् वासित किया गया था ॥ २१–२३ ॥
संतता शुशुभे भूमिर्माल्यैश्च बहुसंस्थितैः । हिरण्मयैश्च कलशैर्भाजनैः स्फाटिकैरपि ॥ २४ ॥ जाम्बूनदमयैश्चान्यैः करकैरभिसंवृता ।
भावार्थ
वहाँ अनेक स्थानोंपर रखे हुए नाना प्रकारके फूलों, सुवर्णमय कलशों, स्फटिकमणिके पात्रों तथा जाम्बूनदके बने हुए अन्यान्य कमण्डलुओंसे व्याप्त हुई वह पानभूमि बड़ी शोभा पा रही थी ॥ २४½ ॥
राजतेषु च कुम्भेषु जाम्बूनदमयेषु च ॥ २५ ॥ पानश्रेष्ठां तथा भूमिं कपिस्तत्र ददर्श सः ।
भावार्थ
चाँदी और सोनेके घड़ोंमें, जहाँ श्रेष्ठ पेय पदार्थ रखे थे, उस पानभूमिको कपिवर हनुमान्जीने वहाँ अच्छी तरह घूम-घूमकर देखा ॥ २५½ ॥
सोऽपश्यच्छातकुम्भानि सीधोर्मणिमयानि च ॥ २६ ॥ तानि तानि च पूर्णानि भाजनानि महाकपिः ।
भावार्थ
महाकपि पवनकुमारने देखा, वहाँ मदिरासे भरे हुए सोने और मणियोंके भिन्न-भिन्न पात्र रखे गये हैं ॥२६½॥
कचिदर्धावशेषाणि कचित् पीतान्यशेषतः ॥ २७ ॥ कचिन्नैव प्रपीतानि पानानि स ददर्श ह ।
भावार्थ
किसी घड़ेमें आधी मदिरा शेष थी तो किसी घड़ेकी सारी-की-सारी पी ली गयी थी तथा किन्हीं-किन्हीं घड़ोंमें रक्खे हुए मद्य सर्वथा पीये नहीं गये थे । हनुमान्जीने उन सबको देखा ॥ २७½ ॥
कचिद् भक्ष्यांश्च विविधान् कचित् पानानि भागशः ॥२८॥ कचिदर्धावशेषाणि पश्यन् वै विचचार ह ।
भावार्थ
कहीं नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ और कहीं पीनेकी वस्तुएँ अलग-अलग रक्खी गयी थीं और कहीं उनमेंसे आधी-आधी सामग्री ही बची थी । उन सबको देखते हुए वे वहाँ सर्वत्र विचरने लगे ॥ २८½ ॥
शयनान्यत्र नारीणां शून्यानि बहुधा पुनः । परस्परं समाश्लिष्य काश्चित् सुप्तावराङ्गनाः ॥ २९ ॥
भावार्थ
उस अन्तःपुरमें स्त्रियोंकी बहुत-सी शय्याएँ सूनी पड़ी थीं और कितनी ही सुन्दरियाँ एक ही जगह एक-दूसरीका आलिङ्गन किये सो रही थीं ॥ २९ ॥
काचिच्च वस्त्रमन्यस्या अपहृत्योपगुह्य च । उपगम्याबला सुप्ता निद्राबलपराजिता ॥ ३० ॥
भावार्थ
निद्राके बलसे पराजित हुई कोई अबला दूसरी स्त्रीका वस्त्र उतारकर उसे धारण किये उसके पास जा उसीका आलिङ्गन करके सो गयी थी ॥ ३० ॥
तासामुच्छ्वासवातेन वस्त्रं माल्यं च गात्रजम् । नात्यर्थं स्पन्दते चित्रं प्राप्य मन्दमिवानिलम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
उनकी साँसकी हवासे उनके शरीरके विविध प्रकारके वस्त्र और पुष्पमाला आदि वस्तुएँ उसी तरह धीरे-धीरे हिल रही थीं, जैसे धीमी-धीमी वायुके चलनेसे हिला करती हैं ॥ ३१ ॥
चन्दनस्य च शीतस्य सीधोर्मधुरसस्य च । विविधस्य च माल्यस्य पुष्पस्य विविधस्य च ॥ ३२ ॥ बहुधा मारुतस्तस्य गन्धं विविधमुद्वहन् । स्नानानां चन्दनानां च धूपानां चैव मूर्च्छितः ॥ ३३ ॥ प्रववौ सुरभिर्गन्धो विमाने पुष्पके तदा । श्यामावदातास्तत्रान्याः काश्चित् कृष्णा वराङ्गनाः ।३४। काश्चित् काञ्चनवर्णाङ्ग्यः प्रमदा राक्षसालये ।
भावार्थ
उस समय पुष्पकविमानमें शीतल चन्दन, मद्य, मधुरस, विविध प्रकारकी माला, भाँति-भाँतिके पुष्प, स्नान-सामग्री, चन्दन और धूपकी अनेक प्रकारकी गन्धका भार वहन करती हुई सुगन्धित वायु सब ओर प्रवाहित हो रही थी ॥ उस राक्षसराजके भवनमें कोई साँवली, कोई गोरी, कोई काली और कोई सुवर्णके समान कान्तिवाली सुन्दरी युवतियाँ सो रही थीं ॥ ३४½ ॥
तासां निद्रावशत्वाच्च मदनेन विमूर्च्छितम् ॥ ३५ ॥ पद्मिनीनां प्रसुप्तानां रूपमासीद् यथैव हि । एवं सर्वमशेषेण रावणान्तःपुरं कपिः । ददर्श स महातेजा न ददर्श च जानकीम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
निद्राके वशमें होनेके कारण उनका काममोहित रूप मुँदे हुए मुखवाले कमलपुष्पोंके समान जान पड़ता था ॥ इस प्रकार महातेजस्वी कपिवर हनुमान्ने रावणका सारा अन्तःपुर छान डाला तो भी वहाँ उन्हें जनकनन्दिनी सीताका दर्शन नहीं हुआ ॥ ३६ ॥
निरीक्षमाणश्च ततस्ताः स्त्रियः स महाकपिः । जगाम महतीं शङ्कां धर्मसाध्वसशङ्कितः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उन सोती हुई स्त्रियोंको देखते-देखते महाकपि हनुमान् धर्मके भयसे शङ्कित हो उठे । उनके हृदयमें बड़ा भारी संदेह उपस्थित हो गया ॥ ३७ ॥
परदारावरोधस्य प्रसुप्तस्य निरीक्षणम् । इदं खलु ममात्यर्थं धर्मलोपं करिष्यति ॥ ३८ ॥
भावार्थ
वे सोचने लगे कि ‘इस तरह गाढ़ निद्रामें सोयी हुई परायी स्त्रियोंको देखना अच्छा नहीं है । यह तो मेरे धर्मका अत्यन्त विनाश कर डालेगा ॥ ३८ ॥
न हि मे परदाराणां दृष्टिर्विषयवर्तिनी । अयं चात्र मया दृष्टः परदारपरिग्रहः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘मेरी दृष्टि अबतक कभी परायी स्त्रियोंपर नहीं पड़ी थी । यहीं आनेपर मुझे परायी स्त्रियोंका अपहरण करनेवाले इस पापी रावणका भी दर्शन हुआ है ( ऐसे पापीको देखना भी धर्मका लोप करनेवाला होता है )’ ॥ ३९ ॥
तस्य प्रादुरभूच्चिन्ता पुनरन्या मनस्विनः । निश्चितैकान्तचित्तस्य कार्यनिश्चयदर्शिनी ॥ ४० ॥
भावार्थ
तदनन्तर मनस्वी हनुमान्जीके मनमें एक-दूसरी विचार-धारा उत्पन्न हुई । उनका चित्त अपने लक्ष्यमें सुस्थिर था; अतः यह नयी विचारधारा उन्हें अपने कर्तव्यका ही निश्चय करानेवाली थी ॥ ४० ॥
कामं दृष्टा मया सर्वा विश्वस्ता रावणस्त्रियः । न तु मे मनसा किंचिद् वैकृत्यमुपपद्यते ॥ ४१ ॥
भावार्थ
( वे सोचने लगे— ) ‘इसमें संदेह नहीं कि रावणकी स्त्रियाँ निःशङ्क सो रही थीं और उसी अवस्थामें मैंने उन सबको अच्छी तरह देखा है, तथापि मेरे मनमें कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ है ॥ ४१ ॥
मनो हि हेतुः सर्वेषामिन्द्रियाणां प्रवर्तने । शुभाशुभास्ववस्थासु तच्च मे सुव्यवस्थितम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘सम्पूर्ण इन्द्रियोंको शुभ और अशुभ अवस्थाओंमें लगनेकी प्रेरणा देनेमें मन ही कारण है; किंतु मेरा वह मन पूर्णतः स्थिर है ( उसका कहीं राग या द्वेष नहीं है; इसलिये मेरा यह परस्त्री-दर्शन धर्मका लोप करनेवाला नहीं हो सकता ) ॥ ४२ ॥
नान्यत्र हि मया शक्या वैदेही परिमार्गितुम् । स्त्रियो हि स्त्रीषु दृश्यन्ते सदा सम्परिमार्गणे ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनी सीताको दूसरी जगह मैं ढूँढ़ भी तो नहीं सकता था; क्योंकि स्त्रियोंको ढूँढ़ते समय उन्हें स्त्रियोंके ही बीचमें देखा जाता है ॥ ४३ ॥
यस्य सत्त्वस्य या योनिस्तस्यां तत् परिमार्गते । न शक्यं प्रमदा नष्टा मृगीषु परिमार्गितुम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘जिस जीवकी जो जाति होती है, उसीमें उसे खोजा जाता है। खोयी हुई युवती स्त्रीको हरिनियोंके बीचमें नहीं ढूँढ़ा जा सकता है ॥ ४४ ॥
तदिदं मार्गितं तावच्छुद्धेन मनसा मया। रावणान्तःपुरं सर्वं दृश्यते न च जानकी ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘अतः मैंने रावणके इस सारे अन्तःपुरमें शुद्ध हृदयसे ही अन्वेषण किया है; किंतु यहाँ जानकीजी नहीं दिखायी देती हैं’ ॥ ४५ ॥
देवगन्धर्वकन्याश्च नागकन्याश्च वीर्यवान् । अवेक्षमाणो हनुमान् नैवापश्यत जानकीम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
अन्तःपुरका निरीक्षण करते हुए पराक्रमी हनुमान्ने देवताओं, गन्धर्वों और नागोंकी कन्याओंको वहाँ देखा, किंतु जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखा ॥ ४६ ॥
तामपश्यन् कपिस्तत्र पश्यंश्चान्या वरस्त्रियः। अपक्रम्य तदा वीरः प्रस्थातुमुपचक्रमे ॥ ४७ ॥
भावार्थ
दूसरी सुन्दरियोंको देखते हुए वीर वानर हनुमान्ने जब वहाँ सीताको नहीं देखा, तब वे वहाँसे हटकर अन्यत्र जानेको उद्यत हुए ॥ ४७ ॥
स भूयः सर्वतः श्रीमान् मारुतिर्यत्नमाश्रितः । आपानभूमिमुत्सृज्य तां विचेतुं प्रचक्रमे ॥ ४८ ॥
भावार्थ
फिर तो श्रीमान् पवनकुमारने उस पानभूमिको छोड़कर अन्य सब स्थानोंमें उन्हें बड़े यत्नका आश्रय लेकर खोजना आरम्भ किया ॥ ४८ ॥
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