सुन्दरकाण्ड, सर्ग 9
तस्यालयवरिष्ठस्य मध्ये विमलमायतम् । ददर्श भवनश्रेष्ठं हनुमान् मारुतात्मजः ॥ १ ॥ अर्धयोजनविस्तीर्णमायतं योजनं महत् । भवनं राक्षसेन्द्रस्य बहुप्रासादसंकुलम् ॥ २ ॥
भावार्थ
लङ्कावर्ती सर्वश्रेष्ठ महान् गृहके मध्यभागमें पवनपुत्र हनुमान्जीने देखा एक उत्तम भवन शोभा पा रहा है। वह बहुत ही निर्मल एवं विस्तृत था। उसकी लंबाई एक योजनकी और चौड़ाई आधे योजनकी थी। राक्षसराज रावणका वह विशाल भवन बहुत-सी अट्टालिकाओंसे व्याप्त था ॥ १-२ ॥
मार्गमाणस्तु वैदेहीं सीतामायतलोचनाम् । सर्वतः परिचक्राम हनूमानरिसूदनः ॥ ३ ॥
भावार्थ
विशाललोचना विदेह-नन्दिनी सीताकी खोज करते हुए शत्रुसूदन हनुमान्जी उस भवनमें सब ओर चक्कर लगाते फिरे ॥ ३ ॥
उत्तमं राक्षसावासं हनुमानवलोकयन् । आससादाथ लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
बलवैभवसे सम्पन्न हनुमान् राक्षसोंके उस उत्तम आवासका अवलोकन करते हुए एक ऐसे सुन्दर गृहमें जा पहुँचे, जो राक्षसराज रावणका निजी निवास-स्थान था ॥ ४ ॥
चतुर्विषाणैर्द्विरदैस्त्रिविषाणैस्तथैव च । परिक्षिप्तमसम्बाधं रक्ष्यमाणमुदायुधैः ॥ ५ ॥
भावार्थ
चार दाँत तथा तीन दाँतोंवाले हाथी इस विस्तृत भवनको चारों ओरसे घेरकर खड़े थे और हाथोंमें हथियार लिये बहुत-से राक्षस उसकी रक्षा करते थे ॥ ५ ॥
राक्षसीभिश्च पत्नीभी रावणस्य निवेशनम् । आहृताभिश्च विक्रम्य राजकन्याभिरावृतम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
रावणका वह महल उसकी राक्षसजातीय पत्नियों तथा पराक्रमपूर्वक हरकर लायी हुई राजकन्याओंसे भरा हुआ था ॥ ६ ॥
तन्नक्रमकराकीर्णं तिमिंगिलझषाकुलम् । वायुवेगसमाधूतं पन्नगैरिव सागरम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
इस प्रकार नर-नारियोंसे भरा हुआ वह कोलाहलपूर्ण भवन नाके और मगरोंसे व्याप्त, तिमिङ्गलों और मत्स्योंसे पूर्ण, वायुवेगसे विक्षुब्ध तथा सर्पोंसे आवृत महासागरके समान प्रतीत होता था ॥ ७ ॥
या हि वैश्रवणे लक्ष्मीर्या चन्द्रे हरिवाहने । सा रावणगृहे रम्या नित्यमेवानपायिनी ॥ ८ ॥
भावार्थ
जो लक्ष्मी कुबेर, चन्द्रमा और इन्द्रके यहाँ निवास करती हैं, वे ही और भी सुरम्य रूपसे रावणके घरमें नित्य ही निश्चल होकर रहती थीं ॥ ८ ॥
या च राज्ञः कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य च । तादृशी तद्विशिष्टा वा ऋद्धी रक्षोगृहेष्विह ॥ ९ ॥
भावार्थ
जो समृद्धि महाराज कुबेर, यम और वरुणके यहाँ दृष्टिगोचर होती है, वही अथवा उससे भी बढ़कर राक्षसोंके घरोंमें देखी जाती थी ॥ ९ ॥
तस्य हर्म्यस्य मध्यस्थवेश्म चान्यत् सुनिर्मितम् । बहुनिर्यूहसंयुक्तं ददर्श पवनात्मजः ॥ १० ॥
भावार्थ
उस ( एक योजन लंबे और आधे योजन चौड़े ) महलके मध्यभागमें एक दूसरा भवन ( पुष्पक विमान ) था, जिसका निर्माण बड़े सुन्दर ढंगसे किया गया था । वह भवन बहुसंख्यक मतवाले हाथियोंसे युक्त था । पवनकुमार हनुमान्जीने फिर उसे देखा ॥ १० ॥
ब्रह्मणोऽर्थे कृतं दिव्यं दिवि यद् विश्वकर्मणा । विमानं पुष्पकं नाम सर्वरत्नविभूषितम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
वह सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित पुष्पक नामक दिव्य विमान स्वर्गलोकमें विश्वकर्माने ब्रह्माजीके लिये बनाया था ॥ ११ ॥
परेण तपसा लेभे यद् कुबेरः पितामहात् । कुबेरमोजसा जित्वा लेभे तद् राक्षसेश्वरः ॥ १२ ॥
भावार्थ
कुबेरने बड़ी भारी तपस्या करके उसे ब्रह्माजीसे प्राप्त किया और फिर कुबेरको बलपूर्वक परास्त करके राक्षसराज रावणने उसे अपने हाथमें कर लिया ॥ १२ ॥
ईहामृगसमायुक्तैः कार्तस्वरहिरण्मयैः । सुकृतैराचितं स्तम्भैः प्रदीप्तमिव च श्रिया ॥ १३ ॥
भावार्थ
उसमें भेड़ियोंकी मूर्तियोंसे युक्त सोने-चाँदीके सुन्दर खम्भे बनाये गये थे, जिनके कारण वह भवन अद्भुत कान्तिसे उद्दीप्त-सा हो रहा था ॥ १३ ॥
मेरुमन्दरसंकाशैरुल्लिखद्भिरिवाम्बरम् । कूटागारैः शुभागारैः सर्वतः समलंकृतम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
उसमें सुमेरु और मन्दराचलके समान ऊँचे अनेकानेक गुप्त गृह और मङ्गल भवन बने थे, जो अपनी ऊँचाईसे आकाशमें रेखा-सी खींचते हुए जान पड़ते थे । उनके द्वारा वह विमान सब ओरसे सुशोभित होता था ॥१४॥
ज्वलनार्कप्रतीकाशैः सुकृतं विश्वकर्मणा । हेमसोपानयुक्तं च चारुप्रवरवेदिकम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
उनका प्रकाश अग्नि और सूर्यके समान था । विश्वकर्माने बड़ी कारीगरीसे उसका निर्माण किया था । उसमें सोनेकी सीढ़ियाँ और अत्यन्त मनोहर उत्तम वेदियाँ बनायी गयी थीं ॥ १५ ॥
जालवातायनैर्युक्तं काञ्चनैः स्फाटिकैरपि । इन्द्रनीलमहानीलमणिप्रवरवेदिकम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
सोने और स्फटिकके झरोखे और खिड़कियाँ लगायी गयी थीं । इन्द्रनील और महानील मणियोंकी श्रेष्ठतम वेदियाँ रची गयी थीं ॥ १६ ॥
विद्रुमेण विचित्रेण मणिभिश्च महाधनैः । निस्तुलाभिश्च मुक्ताभिस्तलेनाभिविराजितम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
उसकी फर्श विचित्र मूँगे, बहुमूल्य मणियों तथा अनुपम गोल-गोल मोतियोंसे जड़ी गयी थी, जिससे वह विमानकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १७ ॥
चन्दनेन च रक्तेन तपनीयनिभेन च । सुपुण्यगन्धिना युक्तमादित्यतरुणोपमम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
सुवर्णके समान लाल रंगके सुगन्धयुक्त चन्दनसे संयुक्त होनेके कारण वह बालसूर्यके समान जान पड़ता था ॥ १८ ॥
कूटागारैर्वराकारैर्विविधैः समलंकृतम् । विमानं पुष्पकं दिव्यमारुरोह महाकपिः । तत्रस्थः सर्वतो गन्धं पानभक्ष्यान्नसम्भवम् ॥ १९ ॥ दिव्यं सम्मूर्च्छितं जिघ्रन् रूपवन्तमिवानिलम् ।
भावार्थ
महाकपि हनुमान्जी उस दिव्य पुष्पक विमानपर चढ़ गये, जो नाना प्रकारके सुन्दर कूटागारों ( अट्टालिकाओं ) से अलंकृत था । वहाँ बैठकर वे सब ओर फैली हुई नाना प्रकारके पेय, भक्ष्य और अन्नकी दिव्य गन्ध सूँघने लगे। वह गन्ध मूर्तिमान् पवन-सी प्रतीत होती थी ॥ १९½ ॥
स गन्धस्तं महासत्त्वं बन्धुर्बन्धुमिवोत्तमम् ॥ २० ॥ इत पहीत्युवाचेव तत्र यत्र स रावणः ।
भावार्थ
जैसे कोई बन्धु-बान्धव अपने उत्तम बन्धुको अपने पास बुलाता है, उसी प्रकार वह सुगन्ध उन महाबली हनुमान्जीको मानो यह कहकर कि ‘इधर चले आओ’ जहाँ रावण था, वहाँ बुला रही थी ॥ २०½ ॥
ततस्तां प्रस्थितः शालां ददर्श महतीं शिवाम् ॥ २१ ॥ रावणस्य महाकान्तां कान्तामिव वरस्त्रियम् ।
भावार्थ
तदनन्तर हनुमान्जी उस ओर प्रस्थित हुए। आगे बढ़नेपर उन्होंने एक बहुत बड़ी हवेली देखी, जो बहुत ही सुन्दर और सुखद थी। वह हवेली रावणको बहुत ही प्रिय थी; ठीक वैसे ही जैसे पतिको कान्तिमयी सुन्दरी पत्नी अधिक प्रिय होती है ॥ २१½ ॥
मणिसोपानविकृतां हेमजालविराजिताम् ॥ २२ ॥ स्फाटिकैरावृततलां दन्तान्तरितरूपिकाम् । मुक्तावज्रप्रवालैश्च रूप्यचामीकरैरपि ॥ २३ ॥
भावार्थ
उसमें मणियोंकी सीढ़ियाँ बनी थीं और सोनेकी खिड़कियाँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं। उसकी फर्श स्फटिक मणिसे बनायी गयी थी, जहाँ बीच-बीचमें हाथीके दाँतके द्वारा विभिन्न प्रकारकी आकृतियाँ बनी हुई थीं। मोती, हीरे, मूँगे, चाँदी और सोनेके द्वारा भी उसमें अनेक प्रकारके आकार अङ्कित किये गये थे ॥ २२-२३ ॥
विभूषितां मणिस्तम्भैः सुबहुस्तम्भभूषिताम् । समैर्ऋजुभिरत्युच्चैः समन्तात् सुविभूषितैः ॥ २४ ॥
भावार्थ
मणियोंके बने हुए बहुत-से खंभे, जो समान, सीधे, बहुत ही ऊँचे और सब ओरसे विभूषित थे, आभूषणकी भाँति उस हवेलीकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २४ ॥
स्तम्भैः पक्षैरिवात्युच्चैर्दिवं सम्प्रस्थितामिव । महत्या कुथयाऽऽस्तीर्णां पृथिवीलक्षणाङ्कया ॥ २५ ॥
भावार्थ
अपने अत्यन्त ऊँचे स्तम्भरूपी पंखोंसे मानो वह आकाशको उड़ती हुई-सी जान पड़ती थी। उसके भीतर पृथ्वीके वन-पर्वत आदि चिह्नोंसे अङ्कित एक बहुत बड़ा कालीन बिछा हुआ था ॥ २५ ॥
पृथिवीमिव विस्तीर्णां सराष्ट्रगृहशालिनीम् । नादितां मत्तविहगैर्दिव्यगन्धाधिवासिताम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
राष्ट्र और गृह आदिके चित्रोंसे सुशोभित वह शाला पृथ्वीके समान विस्तीर्ण जान पड़ती थी। वहाँ मतवाले विहंगमोंके कलरव गूँजते रहते थे तथा वह दिव्य सुगन्धसे सुवासित थी ॥ २६ ॥
परार्ध्यास्तरणोपेतां रक्षोऽधिपनिषेविताम् । धूम्रामगुरुधूपेन विमलां हंसपाण्डुराम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
उस हवेलीमें बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे तथा स्वयं राक्षसराज रावण उसमें निवास करता था। वह अगुरु नामक धूपके धूएँसे धूमिल दिखायी देती थी, किंतु वास्तवमें हंसके समान श्वेत एवं निर्मल थी ॥ २७ ॥
पत्रपुष्पोपहारेण कल्माषीमिव सुप्रभाम् । मनसो मोदजननीं वर्णस्यापि प्रसाधिनीम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
पत्र-पुष्पके उपहारसे वह शाला चितकबरी-सी जान पड़ती थी। अथवा वसिष्ठमुनिकी शबला गौकी भाँति सम्पूर्ण कामनाओंकी देनेवाली थी। उसकी कान्ति बड़ी ही सुन्दर थी। वह मनको आनन्द देनेवाली तथा शोभाको भी सुशोभित करनेवाली थी ॥ २८ ॥
तां शोकनाशिनीं दिव्यां श्रियः संजननीमिव । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थैस्तु पञ्च पञ्चभिरुत्तमैः ॥ २९ ॥ तर्पयामास मातेव तदा रावणपालिता ।
भावार्थ
वह दिव्य शाला शोकका नाश करनेवाली तथा सम्पत्तिकी जननी-सी जान पड़ती थी। हनुमान्जीने उसे देखा । उस रावणपालित शालाने उस समय माताकी भाँति शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषयोंसे हनुमान्जीकी श्रोत्र आदि पाँचों इन्द्रियोंको तृप्त कर दिया ॥ २९½ ॥
स्वर्गोऽयं देवलोकोऽयमिन्द्रस्यापि पुरी भवेत् । सिद्धिर्वेयं परा हि स्यादित्यमन्यत मारुतिः ॥ ३० ॥
भावार्थ
उसे देखकर हनुमान्जी यह तर्क-वितर्क करने लगे कि सम्भव है, यही स्वर्गलोक या देवलोक हो। यह इन्द्रकी पुरी भी हो सकती है अथवा यह परमसिद्धि ( ब्रह्मलोककी प्राप्ति ) है ॥ ३० ॥
प्रध्यायत इवापश्यत् प्रदीपांस्तत्र काञ्चनान् । धूर्तानिव महाधूर्तैर्देवनेन पराजितान् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीने उस शालामें सुवर्णमय दीपकोंको एकतार जलते देखा, मानो वे ध्यानमग्न हो रहे हों; ठीक उसी तरह जैसे किसी बड़े जुआरीसे जुएमें हारे हुए छोटे जुआरी धननाशकी चिन्ताके कारण ध्यानमें डूबे हुए-से दिखायी देते हैं ॥ ३१ ॥
दीपानां च प्रकाशेन तेजसा रावणस्य च । अर्चिर्भिर्भूषणानां च प्रदीप्तेत्यभ्यमन्यत ॥ ३२ ॥
भावार्थ
दीपकोंके प्रकाश, रावणके तेज और आभूषणोंकी कान्तिसे वह सारी हवेली जलती हुई-सी जान पड़ती थी ॥ ३२ ॥
ततोऽपश्यत् कुथासीनं नानावर्णाम्बरस्रजम् । सहस्रं वरनारीणां नानावेषविभूषितम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर हनुमान्जीने कालीनपर बैठी हुई सहस्रों सुन्दरी स्त्रियाँ देखीं, जो रंग-बिरंगे वस्त्र और पुष्पमाला धारण किये अनेक प्रकारकी वेषभूषाओंसे विभूषित थीं ॥ ३३ ॥
परिवृत्तेऽर्धरात्रे तु पाननिद्रावशंगतम् । क्रीडित्वोपरतं रात्रौ प्रसुप्तं बलवत् तदा ॥ ३४ ॥
भावार्थ
आधी रात बीत जानेपर वे क्रीड़ासे उपरत हो मधुपानके मद और निद्राके वशीभूत हो उस समय गाढ़ी नींदमें सो गयी थीं ॥ ३४ ॥
तत् प्रसुप्तं विरुरुचे निःशब्दान्तरभूषितम् । निःशब्दहंसभ्रमरं यथा पद्मवनं महत् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
उन सोयी हुई सहस्रों नारियोंके कटिभागमें अब करधनीकी खनखनाहटका शब्द नहीं हो रहा था । हंसोंके कलरव तथा भ्रमरोंके गुञ्जारवसे रहित विशाल कमल-वनके समान उन सुप्त सुन्दरियोंका समुदाय बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ३५ ॥
तासां संवृतदान्तानि मीलिताक्षीणि मारुतिः । अपश्यत् पद्मगन्धीनि वदनानि सुयोषिताम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
पवनकुमार हनुमान्जीने उन सुन्दरी युवतियोंके मुख देखे, जिनसे कमलोंकी-सी सुगन्ध फैल रही थी । उनके दाँत ढँके हुए थे और आँखें मुँद गयी थीं ॥ ३६ ॥
प्रबुद्धानीव पद्मानि तासां भूत्वा क्षपाक्षये । पुनः संवृतपत्राणि रात्राविव बभुस्तदा ॥ ३७ ॥
भावार्थ
रात्रिके अन्तमें खिले हुए कमलोंके समान उन सुन्दरियोंके जो मुखारविन्द हर्षसे उत्फुल्ल दिखायी देते थे, वे ही फिर रात आनेपर सो जानेके कारण मुँदे हुए दलवाले कमलोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३७ ॥
इमानि मुखपद्मानि नियतं मत्तषट्पदाः । अम्बुजानीव फुल्लानि प्रार्थयन्ति पुनः पुनः ॥ ३८ ॥ इति वामन्यत श्रीमानुपपत्त्या महाकपिः । मेने हि गुणतस्तानि समानि सलिलोद्भवैः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
उन्हें देखकर श्रीमान् महाकपि हनुमान् यह सम्भावना करने लगे कि ‘मतवाले भ्रमर प्रफुल्ल कमलोंके समान इन मुखारविन्दोंकी प्राप्तिके लिये नित्य ही बारंबार प्रार्थना करते होंगे—उनपर सदा स्थान पानेके लिये तरसते होंगे’; क्योंकि वे गुणकी दृष्टिसे उन मुखारविन्दोंको पानीसे उत्पन्न होनेवाले कमलोंके समान ही समझते थे ॥ ३८-३९ ॥
सा तस्य शुशुभे शाला ताभिः स्त्रीभिर्विराजिता । शरदीव प्रसन्ना द्यौस्ताराभिरभिशोभिता ॥ ४० ॥
भावार्थ
रावणकी वह हवेली उन स्त्रियोंसे प्रकाशित होकर वैसी ही शोभा पा रही थी, जैसे शरत्कालमें निर्मल आकाश ताराओंसे प्रकाशित एवं सुशोभित होता है ॥ ४० ॥
स च ताभिः परिवृतः शुशुभे राक्षसाधिपः । यथा ह्युडुपतिः श्रीमांस्ताराभिरिव संवृतः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उन स्त्रियोंसे घिरा हुआ राक्षसराज रावण ताराओंसे घिरे हुए कान्तिमान् नक्षत्रपति चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ ४१ ॥
याश्च्यवन्तेऽम्बरात् ताराः पुण्यशेषसमावृताः । इमास्ताः संगताः कृत्स्ना इति मेने हरिस्तदा ॥ ४२ ॥
भावार्थ
उस समय हनुमान्जीको ऐसा मालूम हुआ कि आकाश ( स्वर्ग ) से भोगावशिष्ट पुण्यके साथ जो ताराएँ नीचे गिरती हैं, वे सब-की-सब मानो यहाँ इन सुन्दरियोंके रूपमें एकत्र हो गयी हैं* ॥ ४२ ॥
ताराणामिव सुव्यक्तं महतीनां शुभार्चिषाम् । प्रभावर्णप्रसादाश्च विरेजुस्तत्र योषिताम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
क्योंकि वहाँ उन युवतियोंके तेज, वर्ण और प्रसाद स्पष्टतः सुन्दर प्रभावाले महान् तारोंके समान ही सुशोभित होते थे ॥ ४३ ॥
व्यावृत्तकचपीनस्रक्प्रकीर्णवरभूषणाः । पानव्यायामकालेषु निद्रोपहतचेतसः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
मधुपानके अनन्तर व्यायाम ( नृत्य, गान, क्रीडा आदि ) के समय जिनके केश खुलकर बिखर गये थे, पुष्पमालाएँ मर्दित होकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं और सुन्दर आभूषण भी शिथिल होकर इधर-उधर खिसक गये थे, वे सभी सुन्दरियाँ वहाँ निद्रासे अचेत-सी होकर सो रही थीं ॥ ४४ ॥
व्यावृत्ततिलकाः काश्चित् काश्चिदुद्भ्रान्तनूपुराः । पार्श्वे गलितहाराश्च काश्चित् परमयोषितः ॥ ४५ ॥ मुक्ताहारवृताश्चान्याः काश्चित् प्रस्रस्तवाससः । व्याविद्धरशनादामाः किशोर्य इव वाहिताः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
किन्हींके मस्तककी ( सिंदूर-कस्तूरी आदिकी ) बेंदियाँ पुछ गयी थीं, किन्हींके नूपुर पैरोंसे निकलकर दूर जा पड़े थे तथा किन्हीं सुन्दरी युवतियोंके हार टूटकर उनके बगलमें ही पड़े थे ॥ कोई मोतियोंके हार टूट जानेसे उनके बिखरे दानोंसे आवृत थीं, किन्हींके वस्त्र खिसक गये थे और किन्हींकी करधनीकी लड़ टूट गयी थीं । वे युवतियाँ बोझ ढोकर थकी हुई अश्वजातिकी नयी बछेड़ियोंके समान जान पड़ती थीं ॥ ४६ ॥
अकुण्डलधराश्चान्या विच्छिन्नमृदितस्रजः । गजेन्द्रमृदिताः फुल्ला लता इव महावने ॥ ४७ ॥
भावार्थ
किन्हींके कानोंके कुण्डल गिर गये थे, किन्हींकी पुष्पमालाएँ मसली जाकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं । इससे वे महान् वनमें गजराजद्वारा दली-मली गयी फूली लताओंके समान प्रतीत होती थीं ॥ ४७ ॥
चन्द्रांशुकिरणाभाश्च हाराः कासांचिदुद्गताः । हंसा इव बभुः सुप्ताः स्तनमध्येषु योषिताम् ॥ ४८ ॥
भावार्थ
किन्हींके चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशमान हार उनके वक्षःस्थलपर पड़कर उभरे हुए प्रतीत होते थे। वे उन युवतियोंके स्तनमण्डलपर ऐसे जान पड़ते थे मानो वहाँ हंस सो रहे हों ॥ ४८ ॥
अपरासां च वैदूर्याः कादम्बा इव पक्षिणः । हेमसूत्राणि चान्यासां चक्रवाका इवाभवन् ॥ ४९ ॥
भावार्थ
दूसरी स्त्रियोंके स्तनोंपर नीलमके हार पड़े थे, जो कादम्ब ( जलकाक ) नामक पक्षीके समान शोभा पाते थे तथा अन्य स्त्रियोंके उरोजोंपर जो सोनेके हार थे, वे चक्रवाक ( पुरखाब ) नामक पक्षियोंके समान जान पड़ते थे ॥ ४९ ॥
हंसकारण्डवोपेताश्चक्रवाकोपशोभिताः । आपगा इव ता रेजुर्जघनैः पुलिनैरिव ॥ ५० ॥
भावार्थ
इस प्रकार वे हंस, कारण्डव ( जलकाक ) तथा चक्रवाकोंसे सुशोभित नदियोंके समान शोभा पाती थीं। उनके जघनप्रदेश उन नदियोंके तटोंके समान जान पड़ते थे ॥ ५० ॥
किङ्किणीजालसंकाशास्ता हेमविपुलाम्बुजाः । भावग्राहा यशस्तीराः सुप्ता नद्य इवाबभुः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
वे सोयी हुई सुन्दरियाँ वहाँ सरिताओंके समान सुशोभित होती थीं। किङ्किणियों ( घुँघुरुओं ) के समूह उनमें मुकुलके समान प्रतीत होते थे। सोनेके विभिन्न आभूषण ही वहाँ बहुसंख्यक स्वर्णकमलोंकी शोभा धारण करते थे। भाव ( सुप्तावस्थामें भी वासनावश होनेवाली शृङ्गार-चेष्टाएँ ) ही मानो ग्राह थे तथा यश ( कान्ति ) ही तटके समान जान पड़ते थे ॥ ५१ ॥
मृदुष्वङ्गेषु कासांचित् कुचाग्रेषु च संस्थिताः । बभूवुर्भूषणानीव शुभा भूषणराजयः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
किन्हीं सुन्दरियोंके कोमल अङ्गोंमें तथा कुचोंके अग्रभागपर उभरी हुई आभूषणोंकी सुन्दर रेखाएँ नये गहनोंके समान ही शोभा पाती थीं ॥ ५२ ॥
अंशुकान्ताश्च कासांचिन्मुखमारुतकम्पिताः । उपर्युपरि वक्त्राणां व्याधूयन्ते पुनः पुनः ॥ ५३ ॥
भावार्थ
किन्हींके मुखपर पड़े हुए उनकी झीनी साड़ीके अञ्चल उनकी नासिकासे निकली हुई साँससे कम्पित हो बारंबार हिल रहे थे ॥ ५३ ॥
ताः पताका इवोद्धूताः पत्नीनां रुचिरप्रभाः । नानावर्णसुवर्णानां वक्त्रमूलेषु रेजिरे ॥ ५४ ॥
भावार्थ
नाना प्रकारके सुन्दर रूप-रंगवाली उन रावणपत्नियोंके मुखोंपर हिलते हुए वे अञ्चल सुन्दर कान्तिवाली फहराती हुई पताकाओंके समान शोभा पा रहे थे ॥ ५४ ॥
ववल्गुश्चात्र कासांचित् कुण्डलानि शुभार्चिषाम् । मुखमारुतसंकम्पैर्मन्दं मन्दं च योषिताम् ॥ ५५ ॥
भावार्थ
वहाँ किन्हीं-किन्हीं सुन्दर कान्तिमती कामिनियोंके कानोंके कुण्डल उनके निःश्वासजनित कम्पनसे धीरे-धीरे हिल रहे थे ॥ ५५ ॥
शर्करासवगन्धः स प्रकृत्या सुरभिः सुखः । तासां वदननिःश्वासः सिषेवे रावणं तदा ॥ ५६ ॥
भावार्थ
उन सुन्दरियोंके मुखसे निकली हुई स्वभावसे ही सुगन्धित श्वासवायु शर्करानिर्मित आसवकी मनोहर गन्धसे युक्त हो और भी सुखद बनकर उस समय रावणकी सेवा करती थी ॥ ५६ ॥
रावणाननशङ्काश्च काश्चिद् रावणयोषितः । मुखानि च सपत्नीनामुपाजिघ्रन् पुनः पुनः ॥ ५७ ॥
भावार्थ
रावणकी कितनी ही तरुणी पत्नियाँ रावणका ही मुख समझकर बारंबार अपनी सौतोंके ही मुखोंको सूँघ रही थीं ॥५७॥
अत्यर्थं सक्तमनसो रावणे ता वरस्त्रियः । अस्वतन्त्राः सपत्नीनां प्रियमेवाचरंस्तदा ॥ ५८ ॥
भावार्थ
उन सुन्दरियोंका मन रावणमें अत्यन्त आसक्त था, इसलिये वे आसक्ति तथा मदिराके मदसे परवश हो उस समय रावणके मुखके भ्रमसे अपनी सौतोंका मुख सूँघकर उनका प्रिय ही करती थीं ( अर्थात् वे भी उस समय अपने मुख-संलग्न हुए उन सौतोंके मुखोंको रावणका ही मुख समझकर उसे सूँघनेका सुख उठाती थीं ) ॥ ५८ ॥
बाहूनुपनिधायान्याः पारिहार्यविभूषितान् । अंशुकानि च रम्याणि प्रमदास्तत्र शिश्यिरे ॥ ५९ ॥
भावार्थ
अन्य मदमत्त युवतियाँ अपनी वलयविभूषित भुजाओंका ही तकिया लगाकर तथा कोई-कोई सिरके नीचे अपने सुरम्य वस्त्रोंको ही रखकर वहाँ सो रही थीं ॥ ५९ ॥
अन्या वक्षसि चान्यस्यास्तस्याः काचित् पुनर्भुजम् । अपरा त्वङ्कमन्यस्यास्तस्याश्चाप्यपरा कुचौ ॥ ६० ॥
भावार्थ
एक स्त्री दूसरीकी छातीपर सिर रखकर सोयी थी तो कोई दूसरी स्त्री उसकी भी एक बाँहको ही तकिया बनाकर सो गयी थी। इसी तरह एक अन्य स्त्री दूसरीकी गोदमें सिर रखकर सोयी थी तो कोई दूसरी उसके भी कुचोंका ही तकिया लगाकर सो गयी थी ॥ ६० ॥
ऊरुपार्श्वकटीपृष्ठमन्योन्यस्य समाश्रिताः । परस्परनिविष्टाङ्ग्यो मदस्नेहवशानुगाः ॥ ६१ ॥
भावार्थ
इस तरह रावणविषयक स्नेह और मदिराजनित मदके वशीभूत हुई वे सुन्दरियाँ एक दूसरीके ऊरु, पार्श्वभाग, कटिप्रदेश तथा पृष्ठभागका सहारा ले आपसमें अङ्गोंसे अङ्ग मिलाये वहाँ बेसुध पड़ी थीं ॥ ६१ ॥
अन्योन्यस्याङ्गसंस्पर्शात् प्रीयमाणाः सुमध्यमाः। एकीकृतभुजाः सर्वाः सुषुपुस्तत्र योषितः ॥ ६२ ॥
भावार्थ
वे सुन्दर कटिप्रदेशवाली समस्त युवतियाँ एक-दूसरीके अङ्गस्पर्शको प्रियतमका स्पर्श मानकर उससे मन-ही-मन आनन्दका अनुभव करती हुई परस्पर बाँह-से-बाँह मिलाये सो रही थीं ॥ ६२ ॥
अन्योन्यभुजसूत्रेण स्त्रीमाला ग्रथिता हि सा। मालेव ग्रथिता सूत्रे शुशुभे मत्तषट्पदा ॥ ६३ ॥
भावार्थ
एक-दूसरीके बाहुरूपी सूत्रमें गुँथी हुई काले-काले केशोंवाली स्त्रियोंकी वह माला सूतमें पिरोयी हुई मतवाले भ्रमरोंसे युक्त पुष्पमालाकी भाँति शोभा पा रही थी ॥६३॥
लतानां माधवे मासि फुल्लानां वायुसेवनात्। अन्योन्यमालाग्रथितं संसक्तकुसुमोच्चयम् ॥ ६४ ॥ प्रतिवेष्टितसुस्कन्धमन्योन्यभ्रमराकुलम् । आसीद् वनमिवोद्धूतं स्त्रीवनं रावणस्य तत् ॥ ६५ ॥
भावार्थ
माधवमास ( वसन्त ) में मलयानिलके सेवनसे जैसे खिली हुई लताओंका वन कम्पित होता रहता है, उसी प्रकार रावणकी स्त्रियोंका वह समुदाय निःश्वासवायुके चलनेसे अञ्चलोंके हिलनेके कारण कम्पित होता-सा जान पड़ता था। जैसे लताएँ परस्पर मिलकर मालाकी भाँति आबद्ध हो जाती हैं, उनकी सुन्दर शाखाएँ परस्पर लिपट जाती हैं और इसीलिये उनके पुष्पसमूह भी आपसमें मिले हुए-से प्रतीत होते हैं तथा उनपर बैठे हुए भ्रमर भी परस्पर मिल जाते हैं, उसी प्रकार वे सुन्दरियाँ एक-दूसरीसे मिलकर मालाकी भाँति गुँथ गयी थीं। उनकी भुजाएँ और कंधे परस्पर सटे हुए थे। उनकी वेणीमें गुँथे हुए फूल भी आपसमें मिल गये थे तथा उन सबके केशकलाप भी एक-दूसरेसे जुड़ गये थे ॥ ६४-६५ ॥
उचितेष्वपि सुव्यक्तं न तासां योषितां तदा। विवेकः शक्य आधातुं भूषणाङ्गाम्बरस्रजाम् ॥ ६६ ॥
भावार्थ
यद्यपि उन युवतियोंके वस्त्र, अङ्ग, आभूषण और हार उचित स्थानोंपर ही प्रतिष्ठित थे, यह बात स्पष्ट दिखायी दे रही थी, तथापि उन सबके परस्पर गुँथ जानेके कारण यह विवेक होना असम्भव हो गया था कि कौन वस्त्र, आभूषण, अङ्ग अथवा हार किसके हैं*॥ ६६ ॥
रावणे सुखसंविष्टे ताः स्त्रियो विविधप्रभाः। ज्वलन्तः काञ्चना दीपाः प्रेक्षन्तो निमिषा इव ॥ ६७ ॥
भावार्थ
रावणके सुखपूर्वक सो जानेपर वहाँ जलते हुए सुवर्णमय प्रदीप उन अनेक प्रकारकी कान्तिवाली कामिनियोंको मानो एकटक दृष्टिसे देख रहे थे ॥ ६७ ॥
राजर्षिविप्रदैत्यानां गन्धर्वाणां च योषितः। रक्षसां चाभवन् कन्यास्तस्य कामवशंगताः ॥ ६८ ॥
भावार्थ
राजर्षियों, ब्रह्मर्षियों, दैत्यों, गन्धर्वों तथा राक्षसोंकी कन्याएँ कामके वशीभूत होकर रावणकी पत्नियाँ बन गयी थीं ॥ ६८ ॥
युद्धकामेन ताः सर्वा रावणेन हृताः स्त्रियः। समदा मदनेनैव मोहिताः काश्चिदागताः ॥ ६९ ॥
भावार्थ
उन सब स्त्रियोंका रावणने युद्धकी इच्छासे अपहरण किया था और कुछ मदमत्त रमणियाँ कामदेवसे मोहित होकर स्वयं ही उसकी सेवामें उपस्थित हो गयी थीं ॥ ६९ ॥
न तत्र काश्चित् प्रमदाः प्रसह्य वीर्योपपन्नेन गुणेन लब्धाः। न चान्यकामापि न चान्यपूर्वा विना वराहीं जनकात्मजां तु ॥ ७० ॥
भावार्थ
वहाँ ऐसी कोई स्त्रियाँ नहीं थीं, जिन्हें बल-पराक्रमसे सम्पन्न होनेपर भी रावण उनकी इच्छाके विरुद्ध बलात्कारसे हर लाया हो। वे सब-की-सब उसे अपने अलौकिक गुणसे ही उपलब्ध हुई थीं। जो श्रेष्ठतम पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजीके ही योग्य थीं, उन जनककिशोरी सीताको छोड़कर दूसरी कोई ऐसी स्त्री वहाँ नहीं थी, जो रावणके सिवा किसी दूसरेकी इच्छा रखनेवाली हो, अथवा जिसका पहले कोई दूसरा पति रहा हो ॥ ७० ॥
न चाकुलीना न च हीनरूपा नादक्षिणा नानुपचारयुक्ता। भार्याभवत् तस्य न हीनसत्त्वा न चापिकान्तस्य न कामनीया ॥ ७१ ॥
भावार्थ
रावणकी कोई भार्या ऐसी नहीं थी, जो उत्तम कुलमें उत्पन्न न हुई हो अथवा जो कुरूप, अनुदार या कौशल-रहित, उत्तम वस्त्राभूषण एवं माला आदिसे वञ्चित, शक्तिहीन तथा प्रियतमको अप्रिय हो ॥ ७१ ॥
बभूव बुद्धिस्तु हरीश्वरस्य यदीदृशी राघवधर्मपत्नी। इमा महाराक्षसराजभार्याः सुजातमस्येति हि साधुबुद्धेः ॥ ७२ ॥
भावार्थ
उस समय श्रेष्ठ बुद्धिवाले वानरराज हनुमान्जीके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ये महान् राक्षसराज रावणकी भार्याएँ जिस तरह अपने पतिके साथ रहकर सुखी हैं, उसी प्रकार यदि रघुनाथजीकी धर्मपत्नी सीताजी भी इन्हींकी भाँति अपने पतिके साथ रहकर सुखका अनुभव करतीं अर्थात् यदि रावण शीघ्र ही उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें समर्पित कर देता तो यह इसके लिये परम मङ्गलकारी होता ॥ ७२ ॥
पुनश्च सोऽचिन्तयदात्तरूपो ध्रुवं विशिष्टा गुणतो हि सीता । अथायमस्यां कृतवान् महात्मा लङ्केश्वरः कष्टमनार्यकर्म ॥ ७३ ॥
भावार्थ
फिर उन्होंने सोचा निश्चय ही सीता गुणोंकी दृष्टिसे इन सबकी अपेक्षा बहुत ही बढ़-चढ़कर हैं । इस महाबली लङ्कापतिने मायामय रूप धारण करके सीताको धोखा देकर इनके प्रति यह अपहरणरूप महान् कष्टप्रद नीच कर्म किया है॥७३॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें