किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 66
अनेकशतसाहस्रीं विषण्णां हरिवाहिनीम् । जाम्बवान् समुदीक्ष्यैवं हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
लाखों वानरोंकी सेनाको इस तरह विषादमें पड़ी देख जाम्बवान्ने हनुमान्जीसे कहा—॥ १ ॥
वीर वानरलोकस्य सर्वशास्त्रविदां वर । तूष्णीमेकान्तमाश्रित्य हनूमन् किं न जल्पसि ॥२॥
भावार्थ
‘वानरजगत्के वीर ! तथा सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हनुमान् ! तुम एकान्तमें आकर चुपचाप क्यों बैठे हो ? कुछ बोलते क्यों नहीं ? ॥ २ ॥
हनूमन्हरिराजस्य सुग्रीवस्य समो ह्यसि । रामलक्ष्मणयोश्चापि तेजसा च बलेन च ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘हनूमन् ! तुम तो वानरराज सुग्रीवके समान पराक्रमी हो तथा तेज और बलमें श्रीराम और लक्ष्मणके तुल्य हो ॥ ३ ॥
अरिष्टनेमिनः पुत्रो वैनतेयो महाबलः । गरुत्मानिव विख्यात उत्तमः सर्वपक्षिणाम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘कश्यपजीके महाबली पुत्र और समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ जो विनतानन्दन गरुड़ हैं, उन्हींके समान तुम भी विख्यात शक्तिशाली एवं तीव्रगामी हो ॥ ४ ॥
बहुशो हि मया दृष्टः सागरे स महाबलः । भुजङ्गानुद्धरन् पक्षी महाबाहुर्महाबलः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘महाबली महाबाहु पक्षिराज गरुड़को मैंने समुद्रमें कई बार देखा है, जो बड़े-बड़े सर्पोंको वहाँसे निकाल लाते हैं ॥५॥
पक्षयोर्यद् बलं तस्य भुजवीर्यबलं तव । विक्रमश्चापि वेगश्च न ते तेनापहीयते ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘उनके दोनों पंखोंमें जो बल है, वही बल, वही पराक्रम तुम्हारी इन दोनों भुजाओंमें भी है । इसीलिये तुम्हारा वेग और विक्रम भी उनसे कम नहीं है ॥ ६ ॥
बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्त्वं च हरिपुङ्गव । विशिष्टं सर्वभूतेषु किमात्मानं न सज्जसे ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणे ! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियोंमें सबसे बढ़कर है । फिर तुम अपने-आपको ही समुद्र लाँघनेके लिये क्यों नहीं तैयार करते ? ॥७॥
अप्सराऽप्सरसां श्रेष्ठा विख्याता पुञ्जिकस्थला । अञ्जनेति परिख्याता पत्नी केसरिणो हरेः ॥ ८ ॥ विख्याता त्रिषु लोकेषु रूपेणाप्रतिमा भुवि । अभिशापादभूत् तात कपित्वे कामरूपिणी ॥ ९ ॥ दुहिता वानरेन्द्रस्य कुञ्जरस्य महात्मनः ।
भावार्थ
‘( वीरवर ! तुम्हारे प्रादुर्भावकी कथा इस प्रकार है—) पुञ्जिकस्थला नामसे विख्यात जो अप्सरा है, वह समस्त अप्सराओंमें अग्रगण्य है । तात ! एक समय शापवश वह कपियोनिमें अवतीर्ण हुई । उस समय वह वानरराज महामनस्वी कुञ्जरकी पुत्री इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली थी । इस भूतलपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी । वह तीनों लोकोंमें विख्यात थी । उसका नाम अञ्जना था । वह वानरराज केसरीकी पत्नी हुई ॥ ८-९½ ॥
मानुषं विग्रहं कृत्वा रूपयौवनशालिनी ॥ १० ॥ विचित्रमाल्याभरणा कदाचित् क्षौमधारिणी । अचरत् पर्वतस्याग्रे प्रावृडम्बुदसंनिभे ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘एक दिनकी बात है, रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली अञ्जना मानवी स्त्रीका शरीर धारण करके वर्षाकालके मेघकी भाँति श्याम कान्तिवाले एक पर्वत-शिखरपर विचर रही थी । उसके अङ्गोंपर रेशमी साड़ी शोभा पाती थी । वह फूलोंके विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थी ॥ १०-११ ॥
तस्या वस्त्रं विशालाक्ष्याः पीतं रक्तदशं शुभम् । स्थिताया: पर्वतस्याग्रे मारुतोऽपाहरच्छनैः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘उस विशाललोचना बालाका सुन्दर वस्त्र तो पीले रंगका था, किंतु उसके किनारेका रंग लाल था । वह पर्वतके शिखरपर खड़ी थी । उसी समय वायु देवताने उसके उस वस्त्रको धीरेसे हर लिया ॥ १२ ॥
स ददर्श ततस्तस्या वृत्तावूरू सुसंहतौ । स्तनौ च पीनौ सहितौ सुजातं चारु चाननम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् उन्होंने उसकी परस्पर सटी हुई गोल-गोल जाँघों, एक दूसरेसे लगे हुए पीन उरोजों तथा मनोहर मुखको भी देखा ॥ १३ ॥
तां बलादायतश्रोणीं तनुमध्यां यशस्विनीम् । दृष्ट्वैव शुभसर्वाङ्गीं पवनः काममोहितः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘उसके नितम्ब ऊँचे और विस्तृत थे । कटिभाग बहुत ही पतला था । उसके सारे अङ्ग परम सुन्दर थे । इस प्रकार बलपूर्वक यशस्विनी अञ्जनाके अङ्गोंका अवलोकन करके पवन देवता कामसे मोहित हो गये ॥ १४ ॥
स तां भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां पर्यष्वजत मारुतः । मन्मथाविष्टसर्वाङ्गो गतात्मा तामनिन्दिताम् ॥ १५ ॥ सा तु तत्रैव सम्भ्रान्ता सुव्रता वाक्यमब्रवीत् । एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें कामभावका आवेश हो गया। मन अञ्जनामें ही लग गया । उन्होंने उस अनिन्द्य सुन्दरीको अपनी दोनों विशाल भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगा लिया ॥ ‘अञ्जना उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सती नारी थी। अतः उस अवस्थामें पड़कर वह वहीं घबरा उठी और बोली—‘कौन मेरे इस पातिव्रत्यका नाश करना चाहता है’ ? ॥ १६ ॥
अञ्जनाया वचः श्रुत्वा मारुतः प्रत्यभाषत । न त्वां हिंसामि सुश्रोणि मा भूत् ते मनसो भयम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
अञ्जनाकी बात सुनकर पवनदेवने उत्तर दिया— ‘सुश्रोणि ! मैं तुम्हारे एकपत्नी-व्रतका नाश नहीं कर रहा हूँ । अतः तुम्हारे मनसे यह भय दूर हो जाना चाहिये ॥१७॥
मनसास्मि गतो यत् त्वां परिष्वज्य यशस्विनि । वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘यशस्विनि ! मैंने अव्यक्तरूपसे तुम्हारा आलिङ्गन करके मानसिक संकल्पके द्वारा तुम्हारे साथ समागम किया है। इससे तुम्हें बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं बुद्धिमान् पुत्र प्राप्त होगा ॥ १८ ॥
महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रमः । लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति मया समः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘वह महान् धैर्यवान्, महातेजस्वी, महाबली, महापराक्रमी तथा लाँघने और छलाँग मारनेमें मेरे समान होगा’ ॥ १९ ॥
एवमुक्ता ततस्तुष्टा जननी ते महाकपे । गुहायां त्वां महाबाहो प्रजज्ञे प्लवगर्षभ ॥ २० ॥
भावार्थ
‘महाकपे ! वायुदेवके ऐसा कहनेपर तुम्हारी माता प्रसन्न हो गयीं । महाबाहो ! वानरश्रेष्ठ ! फिर उन्होंने तुम्हें एक गुफामें जन्म दिया ॥ २० ॥
अभ्युत्थितं ततः सूर्यं बालो दृष्ट्वा महावने । फलं चेति जिघृक्षुस्त्वमुत्प्लुत्याभ्युत्पतो दिवम् ॥२१॥
भावार्थ
‘बाल्यावस्थामें एक विशाल वनके भीतर एक दिन उदित हुए सूर्यको देखकर तुमने समझा कि यह भी कोई फल है; अतः उसे लेनेके लिये तुम सहसा आकाशमें उछल पड़े ॥ २१ ॥
शतानि त्रीणि गत्वाथ योजनानां महाकपे । तेजसा तस्य निर्धूतो न विषादं गतस्ततः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘महाकपे ! तीन सौ योजन ऊँचे जानेके बाद सूर्यके तेजसे आक्रान्त होनेपर भी तुम्हारे मनमें खेद या चिन्ता नहीं हुई ॥ २२ ॥
त्वामप्युपगतं तूर्णमन्तरिक्षं महाकपे । क्षिप्तमिन्द्रेण ते वज्रं कोपाविष्टेन तेजसा ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘कपिप्रवर ! अन्तरिक्षमें जाकर जब तुरंत ही तुम सूर्यके पास पहुँच गये, तब इन्द्रने कुपित होकर तुम्हारे ऊपर तेजसे प्रकाशित वज्रका प्रहार किया ॥ २३ ॥
तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत । ततो हि नामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘उस समय उदयगिरिके शिखरपर तुम्हारे हनु (ठोड़ी) का बायाँ भाग वज्रकी चोटसे खण्डित हो गया। तभीसे तुम्हारा नाम हनुमान् पड़ गया ॥ २४ ॥
ततस्त्वां निहतं दृष्ट्वा वायुर्गन्धवहः स्वयम् । त्रैलोक्यं भृशसंक्रुद्धो न ववौ वै प्रभञ्जनः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘तुमपर प्रहार किया गया है, यह देखकर गन्धवाहक वायुदेवताको बड़ा क्रोध हुआ। उन प्रभञ्जनदेवने तीनों लोकोंमें प्रवाहित होना छोड़ दिया ॥ २५ ॥
सम्भ्रान्ताश्च सुराः सर्वे त्रैलोक्ये क्षुभिते सति । प्रसादयन्ति संक्रुद्धं मारुतं भुवनेश्वराः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘इससे सम्पूर्ण देवता घबरा गये; क्योंकि वायुके अवरुद्ध हो जानेसे तीनों लोकोंमें खलबली मच गयी थी। उस समय समस्त लोकपाल कुपित हुए वायुदेवको मनाने लगे ॥२६॥
प्रसादिते च पवने ब्रह्मा तुभ्यं वरं ददौ । अशस्त्रवध्यतां तात समरे सत्यविक्रम ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘सत्यपराक्रमी तात ! पवनदेवके प्रसन्न होनेपर ब्रह्माजीने तुम्हारे लिये यह वर दिया कि तुम समराङ्गणमें किसी भी अस्त्र-शस्त्रके द्वारा मारे नहीं जा सकोगे ॥ २७ ॥
वज्रस्य च निपातेन विरुजं त्वां समीक्ष्य च । सहस्रनेत्रः प्रीतात्मा ददौ ते वरमुत्तमम् ॥ २८ ॥ स्वच्छन्दतश्च मरणं तव स्यादिति वै प्रभो ।
भावार्थ
‘प्रभो ! वज्रके प्रहारसे भी तुम्हें पीड़ित न देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने तुम्हारे लिये यह उत्तम वर दिया—‘मृत्यु तुम्हारी इच्छाके अधीन होगी—तुम जब चाहोगे, तभी मर सकोगे, अन्यथा नहीं’ ॥ २८½ ॥
स त्वं केसरिणः पुत्रः क्षेत्रजो भीमविक्रमः ॥ २९ ॥ मारुतस्यौरसः पुत्रस्तेजसा चापि तत्समः ।
भावार्थ
‘इस प्रकार तुम केसरीके क्षेत्रज पुत्र हो। तुम्हारा पराक्रम शत्रुओंके लिये भयंकर है । तुम वायुदेवके औरस पुत्र हो, इसलिये तेजकी दृष्टिसे भी उन्हींके समान हो ॥२९½॥
त्वं हि वायुसुतो वत्स प्लवने चापि तत्समः ॥ ३० ॥ वयमद्य गतप्राणा भवानस्मासु साम्प्रतम् । दाक्ष्यविक्रमसम्पन्नः कपिराज इवापरः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘वत्स ! तुम पवनके पुत्र हो, अतः छलाँग मारनेमें भी उन्हींके तुल्य हो । हमारी प्राणशक्ति अब चली गयी । इस समय तुम्हीं हमलोगोंमें दूसरे वानरराजकी भाँति चातुर्य एवं पौरुषसे सम्पन्न हो ॥ ३०-३१ ॥
त्रिविक्रमे मया तात सशैलवनकानना । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी परिक्रान्ता प्रदक्षिणम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘तात ! भगवान् वामनने त्रिलोकीको नापनेके लिये जब पैर बढ़ाया था, उस समय मैंने पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीकी इक्कीस बार प्रदक्षिणा की थी ॥ ३२॥
तथा चौषधयोऽस्माभिः संचिता देवशासनात् । निर्मथ्यममृतं याभिस्तदानीं नो महद्बलम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘समुद्र-मन्थनके समय देवताओंकी आज्ञासे हमने उन ओषधियोंका संचय किया था, जिनके द्वारा अमृतको मथकर निकालना था । उन दिनों हममें महान् बल था ॥ ३३ ॥
स इदानीमहं वृद्धः परिहीनपराक्रमः । साम्प्रतं कालमस्माकं भवान् सर्वगुणान्वितः ॥ ३४॥
भावार्थ
‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूँ । मेरा पराक्रम घट गया है । इस समय हमलोगोंमें तुम्हीं सब प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ ३४ ॥
तद् विजृम्भस्व विक्रान्त प्लवतामुत्तमो ह्यसि । त्वद्वीर्यं द्रष्टुकामा हि सर्वा वानरवाहिनी ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘अतः पराक्रमी वीर ! तुम अपने असीम बलका विस्तार करो । छलाँग मारनेवालोंमें तुम सबसे श्रेष्ठ हो । यह सारी वानरसेना तुम्हारे बल-पराक्रमको देखना चाहती है॥ ३५॥
उत्तिष्ठ हरिशार्दूल लङ्घयस्व महार्णवम् । परा हि सर्वभूतानां हनुमन् या गतिस्तव ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘वानरश्रेष्ठ हनुमान् ! उठो और इस महासागरको लाँघ जाओ; क्योंकि तुम्हारी गति सभी प्राणियोंसे बढ़कर है ॥ ३६ ॥
विषण्णा हरयः सर्वे हनुमन् किमुपेक्षसे । विक्रमस्व महावेग विष्णुस्त्रीन् विक्रमानिव ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘हनुमन् ! समस्त वानर चिन्तामें पड़े हैं । तुम क्यों इनकी उपेक्षा करते हो ? महान् वेगशाली वीर ! जैसे भगवान् विष्णुने त्रिलोकीको नापनेके लिये तीन पग बढ़ाये थे, उसी प्रकार तुम भी अपने पैर बढ़ाओ’ ॥ ३७ ॥
ततः कपीनामृषभेण चोदितः प्रतीतवेगः पवनात्मजः कपिः । प्रहर्षयंस्तां हरिवीरवाहिनीं चकार रूपं महदात्मनस्तदा ॥ ३८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वानरों और भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान्की प्रेरणा पाकर कपिवर पवनकुमार हनुमान्को अपने महान् वेगपर विश्वास हो आया । उन्होंने वानर वीरोंकी उस सेनाका हर्ष बढ़ाते हुए उस समय अपना विराट्रूप प्रकट किया ॥ ३८ ॥
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