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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 65

अथाङ्गदवचः श्रुत्वा ते सर्वे वानरर्षभाः । स्वं स्वं गतौ समुत्साहमूचुस्तत्र यथाक्रमम् ॥ १ ॥

भावार्थ

अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर लंबी छलाँग मारनेके सम्बन्धमें अपने-अपने उत्साहका—शक्तिका क्रमशः परिचय देने लगे ॥ १ ॥

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः । मैन्दश्च द्विविदश्चैव सुषेणो जाम्बवांस्तथा ॥ २ ॥

भावार्थ

गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान्—इन सबने अपनी-अपनी शक्तिका वर्णन किया ॥ २ ॥

आबभाषे गजस्तत्र प्लवेयं दशयोजनम् । गवाक्षो योजनान्याह गमिष्यामीति विंशतिम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

इनमेंसे गजने कहा—‘मैं दस योजनकी छलाँग मार सकता हूँ ।’ गवाक्ष बोले—‘मैं बीस योजनतक चला जाऊँगा’ ॥ ३ ॥

शरभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह । त्रिंशतं तु गमिष्यामि योजनानां प्लवङ्गमाः ॥ ४ ॥

भावार्थ

इसके बाद वहाँ शरभ नामक वानरने उन कपिवरोंसे कहा—‘वानरो ! मैं तीस योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा’ ॥ ४ ॥

ऋषभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह । चत्वारिंशद् गमिष्यामि योजनानां न संशयः ॥ ५ ॥

भावार्थ

तदनन्तर कपिवर ऋषभने उन वानरोंसे कहा—‘मैं चालीस योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’ ॥५॥

वानरांस्तु महातेजा अब्रवीद् गन्धमादनः । योजनानां गमिष्यामि पञ्चाशत्तु न संशयः ॥ ६ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् महातेजस्वी गन्धमादनने उन वानरोंसे कहा—‘इसमें संदेह नहीं कि मैं पचास योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा’ ॥ ६ ॥

मैन्दस्तु वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह । योजनानां परं षष्टिमहं प्लवितुमुत्सहे ॥ ७ ॥

भावार्थ

इसके बाद वहाँ वानर-वीर मैन्द उन वानरोंसे बोले— ‘मैं साठ योजनतक एक छलाँगमें कूद जानेका उत्साह रखता हूँ’ ॥ ७ ॥

ततस्तत्र महातेजा द्विविदः प्रत्यभाषत । गमिष्यामि न संदेहः सप्तिं योजनान्यहम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

तदनन्तर महातेजस्वी द्विविद बोले—‘मैं सत्तर योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है’ ॥ ८ ॥

सुषेणस्तु महातेजाः सत्त्ववान् कपिसत्तमः । अशीतिं प्रतिजानेऽहं योजनानां पराक्रमे ॥ ९ ॥

भावार्थ

इसके बाद धैर्यशाली कपिश्रेष्ठ महातेजस्वी सुषेण बोले— ‘मैं एक छलाँगमें अस्सी योजनतक जानेकी प्रतिज्ञा करता हूँ’ ॥ ९ ॥

तेषां कथयतां तत्र सर्वांस्ताननुमान्य च । ततो वृद्धतमस्तेषां जाम्बवान् प्रत्यभाषत ॥ १० ॥

भावार्थ

इस प्रकार कहनेवाले सब वानरोंका सम्मान करके ऋक्षराज जाम्बवान्, जो सबसे बूढ़े थे, बोले—॥ १० ॥

पूर्वमस्माकमप्यासीत् कश्चिद् गतिपराक्रमः । ते वयं वयसः पारमनुप्राप्ताः स्म साम्प्रतम् ॥ ११ ॥ किं तु नैवं गते शक्यमिदं कार्यमुपेक्षितुम् । यदर्थं कपिराजश्च रामश्च कृतनिश्चयौ ॥ १२ ॥ साम्प्रतं कालमस्माकं या गतिस्तां निबोधत । नवतिं योजनानां तु गमिष्यामि न संशयः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘पहले युवावस्थामें मेरे अंदर भी दूरतक छलाँग मारनेकी कुछ शक्ति थी । यद्यपि अब मैं उस अवस्थाको पार कर चुका हूँ तो भी जिस कार्यके लिये वानरराज सुग्रीव तथा भगवान् श्रीराम दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, उसकी मेरे द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती । इस समय मेरी जो गति है, उसे आपलोग सुनें । मैं एक छलाँगमें नब्बे योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ११—१३ ॥

तांश्च सर्वान् हरिश्रेष्ठाञ्जाम्बवानिदमब्रवीत् । न खल्वेतावदेवासीद् गमने मे पराक्रमः ॥ १४ ॥ मया वैरोचने यज्ञे प्रभविष्णुः सनातनः । प्रदक्षिणीकृतः पूर्वं क्रममाणस्त्रिविक्रमम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर जाम्बवान् उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंसे पुनः इस प्रकार बोले—‘पूर्वकालमें मेरे अंदर इतनी ही दूरतक चलनेकी शक्ति नहीं थी । पहले राजा बलिके यज्ञमें सर्वव्यापी एवं सबके कारणभूत सनातन भगवान् विष्णु जब तीन पग भूमि नापनेके लिये अपने पैर बढ़ा रहे थे, उस समय मैंने उनके उस विराट् स्वरूपकी थोड़े ही समयमें परिक्रमा कर ली थी ॥ १४-१५ ॥

स इदानीमहं वृद्धः प्लवने मन्दविक्रमः । यौवने च तदासीन्मे बलमप्रतिमं परम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘इस समय तो मैं बूढ़ा हो गया, अतः छलाँग मारनेकी मेरी शक्ति बहुत कम हो गयी है; किंतु युवावस्थामें मेरे भीतर वह महान् बल था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥१६॥

सम्प्रत्येतावदेवाद्य शक्यं मे गमने स्वतः । नैतावता च संसिद्धिः कार्यस्यास्य भविष्यति ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘आजकल तो मुझमें स्वतः चलनेकी इतनी ही शक्ति है, परंतु इतनी ही गतिसे समुद्रलङ्घनरूप इस वर्तमान कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती’ ॥ १७ ॥

अथोत्तरमुदारार्थमब्रवीदङ्गदस्तदा । अनुमान्य तदा प्राज्ञो जाम्बवन्तं महाकपिः ॥ १८ ॥

भावार्थ

तदनन्तर बुद्धिमान् महाकपि अङ्गदने उस समय जाम्बवान्का विशेष आदर करके यह उदारतापूर्ण बात कही—॥ १८ ॥

अहमेतद् गमिष्यामि योजनानां शतं महत् । निवर्तने तु मे शक्तिः स्यान्न वेति न निश्चितम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘मैं इस महासागरके सौ योजनकी विशाल दूरीको लाँघ जाऊँगा, किंतु उधरसे लौटनेमें मेरी ऐसी ही शक्ति रहेगी या नहीं, यह निश्चितरूपसे नहीं कहा जा सकता’ ॥ १९ ॥

तमुवाच हरिश्रेष्ठं जाम्बवान् वाक्यकोविदः । ज्ञायते गमने शक्तिस्तव हर्यृक्षसत्तम ॥ २० ॥

भावार्थ

तब बातचीतकी कलामें चतुर जाम्बवान्ने कपिश्रेष्ठ अङ्गदसे कहा—‘रीछों और वानरोंमें श्रेष्ठ युवराज ! तुम्हारी गमनशक्तिसे हमलोग भलीभाँति परिचित हैं ॥ २० ॥

कामं शतसहस्रं वा नह्येष विधिरुच्यते । योजनानां भवाञ्शक्तो गन्तुं प्रतिनिवर्तितुम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘भले ही, तुम एक लाख योजनतक चले जाओ, तथापि तुम सबके स्वामी हो, अतः तुम्हें भेजना हमारे लिये उचित नहीं है । तुम लाखों योजन जाने और वहाँसे लौटनेमें समर्थ हो ॥ २१ ॥

नहि प्रेषयिता तात स्वामी प्रेष्यः कथंचन । भवतायं जनः सर्वः प्रेष्यः प्लवगसत्तम ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘किंतु तात ! वानरशिरोमणे ! जो सबको भेजनेवाला स्वामी है, वह किसी तरह प्रेष्य ( आज्ञापालक ) नहीं हो सकता । ये सब लोग तुम्हारे सेवक हैं, तुम इन्हींमेंसे किसीको भेजो ॥ २२ ॥

भवान् कलत्रमस्माकं स्वामिभावे व्यवस्थितः । स्वामी कलत्रं सैन्यस्य गतिरेषा परंतप ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘तुम कलत्र ( स्त्रीकी भाँति रक्षणीय ) हो, ( जैसे नारी पतिके हृदयकी स्वामिनी होती है, उसी प्रकार ) तुम हमारे स्वामीके पदपर प्रतिष्ठित हो । परंतप ! स्वामी सेनाके लिये कलत्र ( स्त्री ) के समान संरक्षणीय होता है । यही लोककी मान्यता है ॥ २३ ॥

अपि वै तस्य कार्यस्य भवान् मूलमरिंदम । तस्मात् कलत्रवत् तात प्रतिपाल्यः सदा भवान् ॥२४॥

भावार्थ

‘शत्रुदमन ! तात ! तुम्हीं उस कार्यके मूल हो, अतः सदा कलत्रकी भाँति तुम्हारा पालन करना उचित है ॥ २४ ॥

मूलमर्थस्य संरक्ष्यमेष कार्यविदां नयः । मूले हि सति सिध्यन्ति गुणाः सर्वे फलोदयाः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘कार्यके मूलकी रक्षा करनी चाहिये । यही कार्यके तत्त्वको जाननेवाले विद्वानोंकी नीति है; क्योंकि मूलके रहनेपर ही सभी गुण सफल सिद्ध होते हैं ॥ २५ ॥

तद् भवानस्य कार्यस्य साधनं सत्यविक्रम । बुद्धिविक्रमसम्पन्नो हेतुरत्र परंतप ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘अतः सत्यपराक्रमी शत्रुदमन वीर ! तुम्हीं इस कार्यके साधन तथा बुद्धि और पराक्रमसे सम्पन्न हेतु हो ॥ २६ ॥

गुरुश्च गुरुपुत्रश्च त्वं हि नः कपिसत्तम । भवन्तमाश्रित्य वयं समर्था ह्यर्थसाधने ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘कपिश्रेष्ठ ! तुम्हीं हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो । तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधनमें समर्थ हो सकते हैं’ ॥ २७ ॥

उक्तवाक्यं महाप्राज्ञं जाम्बवन्तं महाकपिः । प्रत्युवाचोत्तरं वाक्यं वालिसूनुरथाङ्गदः ॥ २८ ॥

भावार्थ

जब परम बुद्धिमान् जाम्बवान् पूर्वोक्त बात कह चुके, तब महाकपि वालिकुमार अङ्गदने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २८ ॥

यदि नाहं गमिष्यामि नान्यो वानरपुङ्गवः । पुनः खल्विदमस्माभिः कार्यं प्रायोपवेशनम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘यदि मैं नहीं जाऊँगा और दूसरा कोई भी श्रेष्ठ वानर जानेको तैयार न होगा, तब फिर हमलोगोंको निश्चितरूपसे मरणान्त उपवास ही करना चाहिये ॥ २९ ॥

नह्यकृत्वा हरिपतेः संदेशं तस्य धीमतः । तत्रापि गत्वा प्राणानां न पश्ये परिरक्षणम् ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीवके आदेशका पालन किये बिना यदि हमलोग किष्किन्धाको लौट चलें तो वहाँ जाकर भी हमें अपने प्राणोंकी रक्षाका कोई उपाय नहीं दिखायी देता ॥ ३० ॥

स हि प्रसादे चात्यर्थकोपे च हरिरीश्वरः । अतीत्य तस्य संदेशं विनाशो गमने भवेत् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘वे हमपर कृपा करने और अत्यन्त कुपित होकर हमें दण्ड देनेमें भी समर्थ हैं । उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जानेपर हमारा विनाश अवश्यम्भावी है ॥ ३१ ॥

तत्तथा ह्यस्य कार्यस्य न भवत्यन्यथा गतिः । तद् भवानेव दृष्टार्थः संचिन्तयितुमर्हति ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘अतः जिस उपायसे इस सीता-दर्शनरूपी कार्यकी सिद्धिमें कोई रुकावट न पड़े, उसका आप ही विचार करें; क्योंकि आपको सब बातोंका अनुभव है’ ॥ ३२ ॥

सोऽङ्गदेन तदा वीरः प्रत्युक्तः प्लवगर्षभः । जाम्बवानुत्तमं वाक्यं प्रोवाचेदं ततोऽङ्गदम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उस समय अङ्गदके ऐसा कहनेपर वीर वानरशिरोमणि जाम्बवान्ने उनसे यह उत्तम बात कही—॥ ३३ ॥

तस्य ते वीर कार्यस्य न किंचित् परिहास्यते । एष संचोदयाम्येनं यः कार्यं साधयिष्यति ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘वीर ! तुम्हारे इस कार्यमें कोई किंचित् भी त्रुटि नहीं आने पायेगी । अब मैं ऐसे वीरको प्रेरित कर रहा हूँ, जो इस कार्यको सिद्ध कर सकेगा’ ॥ ३४ ॥

ततः प्रतीतं प्लवतां वरिष्ठ- मेकान्तमाश्रित्य सुखोपविष्टम् । संचोदयामास हरिप्रवीरो हरिप्रवीरं हनुमन्तमेव ॥ ३५ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर वानरों और भालुओंके वीर यूथपति जाम्बवान्ने वानरसेनाके श्रेष्ठ वीर हनुमान्जीको ही प्रेरित किया, जो एकान्तमें जाकर मौजसे बैठे हुए थे । उन्हें किसी बातकी चिन्ता नहीं थी और वे दूरतककी छलाँग मारनेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ थे ॥ ३५ ॥

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