किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 64
आख्याता गृध्रराजेन समुत्प्लुत्य प्लवङ्गमाः । संगताः प्रीतिसंयुक्ता विनेदुः सिंहविक्रमाः ॥ १ ॥
भावार्थ
गृध्रराज सम्पातिके इस प्रकार कहनेपर सिंहके समान पराक्रमी सभी वानर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर मिलकर उछल-उछलकर गर्जने लगे ॥ १ ॥
सम्पातेर्वचनं श्रुत्वा हरयो रावणक्षयम् । हृष्टाः सागरमाजग्मुः सीतादर्शनकाङ्क्षिणः ॥ २ ॥
भावार्थ
सम्पातिकी बातोंसे रावणके निवासस्थान तथा उसके भावी विनाशकी सूचना मिली थी । उन्हें सुनकर हर्षसे भरे हुए वे सभी वानर सीताजीके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये समुद्रके तटपर आये ॥ २ ॥
अभिगम्य तु तं देशं ददृशुर्भीमविक्रमाः । कृत्स्नं लोकस्य महतः प्रतिबिम्बमवस्थितम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
उन भयंकर पराक्रमी वानरोंने उस देशमें पहुँचकर समुद्रको देखा, जो इस विराट् विश्वके सम्पूर्ण प्रतिबिम्बकी भाँति स्थित था ॥ ३ ॥
दक्षिणस्य समुद्रस्य समासाद्योत्तरां दिशम् । संनिवेशं ततश्चक्रुर्हरिवीरा महाबलाः ॥ ४ ॥
भावार्थ
दक्षिण समुद्रके उत्तर तटपर जाकर उन महाबली वानर वीरोंने डेरा डाला ॥ ४ ॥
प्रसुप्तमिव चान्यत्र क्रीडन्तमिव चान्यतः । क्वचित् पर्वतमात्रैश्च जलराशिभिरावृतम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
वह समुद्र कहीं तो तरङ्गहीन एवं शान्त होनेके कारण सोया हुआ-सा जान पड़ता था । अन्यत्र जहाँ थोड़ी-थोड़ी लहरें उठ रही थीं, वहाँ वह क्रीड़ा करता-सा प्रतीत होता था और दूसरे स्थलोंमें जहाँ उत्ताल तरङ्गें उठती थीं, वहाँ पर्वतके बराबर जलराशियोंसे आवृत दिखायी देता था ॥ ५ ॥
संकुलं दानवेन्द्रैश्च पातालतलवासिभिः । रोमहर्षकरं दृष्ट्वा विषेदुः कपिकुञ्जराः ॥ ६ ॥
भावार्थ
वह सारा समुद्र पातालनिवासी दानवराजोंसे व्याप्त था । उस रोमाञ्चकारी महासागरको देखकर वे समस्त श्रेष्ठ वानर बड़े विषादमें पड़ गये ॥ ६ ॥
आकाशमिव दुष्पारं सागरं प्रेक्ष्य वानराः । विषेदुः सहिताः सर्वे कथं कार्यमिति ब्रुवन् ॥ ७ ॥
भावार्थ
आकाशके समान दुर्लङ्घ्य समुद्रपर दृष्टिपात करके वे सब वानर ‘अब कैसे करना चाहिये’ ऐसा कहते हुए एक साथ बैठकर चिन्ता करने लगे ॥ ७ ॥
विषण्णां वाहिनीं दृष्ट्वा सागरस्य निरीक्षणात् । आश्वासयामास हरीन् भयार्तान् हरिसत्तमः ॥ ८ ॥
भावार्थ
उस महासागरका दर्शन करके सारी वानर-सेनाको विषादमें डूबी हुई देख कपिश्रेष्ठ अङ्गद उन भयातुर वानरोंको आश्वासन देते हुए बोले—॥ ८ ॥
न विषादे मनः कार्यं विषादो दोषवत्तरः । विषादो हन्ति पुरुषं बालं क्रुद्ध इवोरगः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘वीरो ! तुम्हें अपने मनको विषादमें नहीं डालना चाहिये; क्योंकि विषादमें बहुत बड़ा दोष है । जैसे क्रोधमें भरा हुआ साँप अपने पास आये हुए बालकको काट खाता है, उसी प्रकार विषाद पुरुषका नाश कर डालता है ॥ ९ ॥
यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते । तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्ध्यति ॥ १० ॥
भावार्थ
‘जो पराक्रमका अवसर आनेपर विषादग्रस्त हो जाता है, उसके तेजका नाश होता है । उस तेजोहीन पुरुषका पुरुषार्थ नहीं सिद्ध होता है’ ॥ १० ॥
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामङ्गदो वानरैः सह । हरिवृद्धैः समागम्य पुनर्मन्त्रममन्त्रयत् ॥ ११ ॥
भावार्थ
उस रात्रिके बीत जानेपर बड़े-बड़े वानरोंके साथ मिलकर अङ्गदने पुनः विचार आरम्भ किया ॥ ११ ॥
सा वानराणां ध्वजिनी परिवार्याङ्गदं बभौ । वासवं परिवार्येव मरुतां वाहिनी स्थिता ॥ १२ ॥
भावार्थ
उस समय अङ्गदको घेरकर बैठी हुई वानरोंकी वह सेना इन्द्रको घेरकर स्थित हुई देवताओंकी विशाल वाहिनीके समान शोभा पाती थी ॥ १२ ॥
कोऽन्यस्तां वानरीं सेनां शक्तः स्तम्भयितुं भवेत् । अन्यत्र वालितनयाद्न्यत्र च हनूमतः ॥ १३ ॥
भावार्थ
वालिपुत्र अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान्जीको छोड़कर दूसरा कौन वीर उस वानरसेनाको सुस्थिर रख सकता था ॥ १३ ॥
ततस्तान् हरिवृद्धांश्च तच्च सैन्यमरिंदमः । अनुमान्याङ्गदः श्रीमान् वाक्यमर्थवदब्रवीत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
शत्रुवीरोंका दमन करनेवाले श्रीमान् अङ्गदने उन बड़े-बूढ़े वानरोंका सम्मान करके उनसे यह अर्थयुक्त बात कही—॥ १४ ॥
क इदानीं महातेजा लङ्घयिष्यति सागरम् । कः करिष्यति सुग्रीवं सत्यसंधमरिंदमम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सज्जनो ! तुमलोगोंमें कौन ऐसा महातेजस्वी वीर है जो इस समय समुद्रको लाँघ जायगा और शत्रुदमन सुग्रीवको सत्यप्रतिज्ञ बनायेगा ॥ १५ ॥
को वीरो योजनशतं लङ्घयेत प्लवङ्गमः । इमांश्च यूथपान् सर्वान् मोचयेत् को महाभयात् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘कौन वीर वानर सौ योजन समुद्रको लाँघ सकेगा ? और कौन इन समस्त यूथपतियोंको महान् भयसे मुक्त कर देगा ? ॥ १६ ॥
कस्य प्रसादाद् दारांश्च पुत्रांश्चैव गृहाणि च । इतो निवृत्ताः पश्येम सिद्धार्थाः सुखिनो वयम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘किसके प्रसादसे हमलोग सफलमनोरथ एवं सुखी होकर यहाँसे लौटेंगे और घर-द्वार तथा स्त्री-पुत्रोंका मुँह देख सकेंगे ॥ १७ ॥
कस्य प्रसादाद् रामं च लक्ष्मणं च महाबलम् । अभिगच्छेम संहृष्टाः सुग्रीवं च वनौकसम् ॥ १८ ॥ यदि कश्चित् समर्थो वः सागरप्लवने हरिः । स ददात्विह नः शीघ्रं पुण्यामभयदक्षिणाम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘किसके प्रसादसे हमलोग हर्षोत्फुल्ल होकर श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा वानरवीर सुग्रीवके पास चल सकेंगे ॥ ‘यदि तुमलोगोंमेंसे कोई वानरवीर समुद्रको लाँघ जानेमें समर्थ हो तो वह शीघ्र ही हमें यहाँ परम पवित्र अभय-दान दे’ ॥ १९ ॥
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा न कश्चित् किंचिदब्रवीत् । स्तिमितेवाभवत् सर्वा सा तत्र हरिवाहिनी ॥ २० ॥
भावार्थ
अङ्गदकी यह बात सुनकर कोई कुछ नहीं बोला । वह सारी वानर-सेना वहाँ जडवत् स्थिर रही ॥ २० ॥
पुनरेवाङ्गदः प्राह तान् हरीन् हरिसत्तमः । सर्वे बलवतां श्रेष्ठा भवन्तो दृढविक्रमाः । व्यपदेशकुले जाताः पूजिताश्चाप्यभीक्ष्णशः ॥ २१ ॥
भावार्थ
तब वानरश्रेष्ठ अङ्गदने पुनः उन सबसे कहा— ‘बलवानोंमें श्रेष्ठ वानरो ! तुम सब लोग दृढ़तापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले हो । तुम्हारा जन्म कलङ्करहित उत्तम कुलमें हुआ है । इसके लिये तुम्हारी बारंबार प्रशंसा हो चुकी है ॥ २१ ॥
नहि वो गमने सङ्गः कदाचित् कस्यचिद् भवेत् । ब्रुवध्वं यस्य या शक्तिः प्लवने प्लवगर्षभाः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘श्रेष्ठ वानरो ! तुमलोगोंमें कभी किसीकी भी गति कहीं नहीं रुकती । इसलिये समुद्रको लाँघनेमें जिसकी जितनी शक्ति हो, वह उसे बतावे’ ॥ २२ ॥
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