किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 63
एतैरन्यैश्च बहुभिर्वाक्यैर्वाक्यविशारदः । मां प्रशस्याभ्यनुज्ञाप्य प्रविष्टः स खमालयम् ॥ १ ॥
भावार्थ
‘बातचीतकी कलामें चतुर महर्षि निशाकरने ये तथा और भी बहुत-सी बातें कहकर मुझे समझाया और श्रीराम-कार्यमें सहायक बननेके कारण मेरे सौभाग्यकी सराहना की । तत्पश्चात् मेरी अनुमति लेकर वे अपने आश्रमके भीतर चले गये ॥ १ ॥
कन्दरात् तु विसर्पित्वा पर्वतस्य शनैः शनैः । अहं विन्ध्यं समारुह्य भवतः प्रतिपालये ॥ २ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर कन्दरासे धीरे-धीरे निकलकर मैं विन्ध्य पर्वतके शिखरपर चढ़ आया और तबसे तुम लोगोंके आनेकी बाट देख रहा हूँ ॥ २ ॥
अद्य त्वेतस्य कालस्य वर्षं साग्रशतं गतम् । देशकालप्रतीक्षोऽस्मि हृदि कृत्वा मुनेर्वचः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘मुनिसे बातचीतके बाद आजतक जो समय बीता है, इसमें आठ हजारसे अधिक वर्ष निकल गये । मुनिके कथनको हृदयमें धारण करके मैं देश-कालकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ ॥ ३ ॥
महाप्रस्थानमासाद्य स्वर्गते तु निशाकरे। मां निर्दहति संतापो वितर्कैर्बहुभिर्वृतम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘निशाकर मुनि महाप्रस्थान करके जब स्वर्गलोकको चले गये, तभीसे मैं अनेक प्रकारके तर्क-वितर्कोंसे घिर गया । संतापकी आग मुझे रात-दिन जलाती रहती है ॥ ४ ॥
उदितां मरणे बुद्धिं मुनिवाक्यैर्निवर्तये । बुद्धिर्या तेन मे दत्ता प्राणानां रक्षणे मम ॥ ५ ॥ सा मेऽपनयते दुःखं दीप्तेवाग्निशिखा तमः ।
भावार्थ
‘मेरे मनमें कई बार प्राण त्यागनेकी इच्छा हुई, किंतु मुनिके वचनोंको याद करके मैं उस संकल्पको टालता आया हूँ । उन्होंने मुझे प्राणोंको रखनेके लिये जो बुद्धि ( सम्मति ) दी थी, वह मेरे दुःखको उसी प्रकार दूर कर देती है, जैसे जलती हुई अग्निशिखा अन्धकारको ॥ ५½ ॥
बुध्यता च मया वीर्यं रावणस्य दुरात्मनः ॥ ६ ॥ पुत्रः संतर्जितो वाग्भिर्न त्राता मैथिली कथम् ।
भावार्थ
‘दुरात्मा रावणमें कितना बल है, इसे मैं जानता हूँ । इसलिये मैंने कठोर वचनोंद्वारा अपने पुत्रको डाँटा था कि तूने मिथिलेशकुमारी सीताकी रक्षा क्यों नहीं की ॥ ६½ ॥
तस्या विलपितं श्रुत्वा तौ च सीतावियोजितौ ॥ ७ ॥ न मे दशरथस्नेहात् पुत्रेणोत्पादितं प्रियम् ।
भावार्थ
‘सीताका विलाप सुनकर और उनसे बिछुड़े हुए श्रीराम तथा लक्ष्मणका परिचय पाकर तथा राजा दशरथके प्रति मेरे स्नेहका स्मरण करके भी मेरे पुत्रने जो सीताकी रक्षा नहीं की, अपने इस बर्तावसे उसने मुझे प्रसन्न नहीं किया—मेरा प्रिय कार्य नहीं होने दिया’ ॥ ७½ ॥
तस्य त्वेवं ब्रुवाणस्य संहतैर्वानरैः सह ॥ ८ ॥ उत्पेततुस्तदा पक्षौ समक्षं वनचारिणाम् ।
भावार्थ
वहाँ एकत्र होकर बैठे हुए वानरोंके साथ सम्पाति इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि उन वनचारी वानरोंके समक्ष उसी समय उनके दो नये पंख निकल आये ॥ ८½ ॥
स दृष्ट्वा स्वां तनुं पक्षैरुद्गतैररुणच्छदैः ॥ ९ ॥ प्रहर्षमतुलं लेभे वानरांश्चेदमब्रवीत् ।
भावार्थ
अपने शरीरको नये निकले हुए लाल रंगके पंखोंसे संयुक्त हुआ देख सम्पातिको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ । वे वानरोंसे इस प्रकार बोले—॥ ९½ ॥
निशाकरस्य राजर्षेः प्रसादादमितौजसः ॥ १० ॥ आदित्यरश्मिनिर्दग्धौ पक्षौ पुनरुपस्थितौ ।
भावार्थ
‘कपिवरो ! अमिततेजस्वी राजर्षि निशाकरके प्रसादसे सूर्यकिरणोंद्वारा दग्ध हुए मेरे दोनों पंख फिर उत्पन्न हो गये ॥ १०½ ॥
यौवने वर्तमानस्य ममासीद् यः पराक्रमः ॥ ११ ॥ तमेवाद्यावगच्छामि बलं पौरुषमेव च । सर्वथा क्रियतां यत्नः सीतामधिगमिष्यथ ॥ १२ ॥ पक्षलाभो ममायं वः सिद्धिप्रत्ययकारकः ।
भावार्थ
‘युवावस्थामें मेरा जैसा पराक्रम और बल था, वैसे ही बल और पुरुषार्थका इस समय मैं अनुभव कर रहा हूँ ॥ ‘वानरो ! तुम सब प्रकारसे यत्न करो । निश्चय ही तुम्हें सीताका दर्शन प्राप्त होगा । मुझे पंखोंका प्राप्त होना तुमलोगोंकी कार्य-सिद्धिका विश्वास दिलानेवाला है’ ॥१२½॥
इत्युक्त्वा तान् हरीन् सर्वान् सम्पातिः पतगोत्तमः १३ उत्पपात गिरेः शृङ्गाज्जिज्ञासुः खगमो गतिम् ।
भावार्थ
उन समस्त वानरोंसे ऐसा कहकर पक्षियोंमें श्रेष्ठ सम्पाति अपने आकाश-गमनकी शक्तिका परिचय पानेके लिये उस पर्वतशिखरसे उड़ गये ॥ १३½ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा प्रतिसंहृष्टमानसाः । बभूवुर्हरिशार्दूला विक्रमाभ्युदयोन्मुखाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
उनकी वह बात सुनकर उन श्रेष्ठ वानरोंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा । वे पराक्रमसाध्य अभ्युदयके लिये उद्यत हो गये ॥ १४ ॥
अथ पवनसमानविक्रमाः प्लवगवराः प्रतिलब्धपौरुषाः । अभिजिदभिमुखां दिशं ययु- र्जनकसुतापरिमार्गणोन्मुखाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वायुके समान पराक्रमी वे श्रेष्ठ वानर अपने भूले हुए पुरुषार्थको फिरसे पा गये और जनकनन्दिनी सीताकी खोजके लिये उत्सुक हो अभिजित् नक्षत्रसे युक्त दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ॥ १५ ॥
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