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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 67

तं दृष्ट्वा जृम्भमाणं ते क्रमितुं शतयोजनम् । वेगेनापूर्यमाणं च सहसा वानरोत्तमम् ॥ १ ॥ सहसा शोकमुत्सृज्य प्रहर्षेण समन्विताः । विनेदुस्तुष्टुवुश्चापि हनूमन्तं महाबलम् ॥ २ ॥

भावार्थ

सौ योजनके समुद्रको लाँघनेके लिये वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको सहसा बढ़ते और वेगसे परिपूर्ण होते देख सब वानर तुरंत शोक छोड़कर अत्यन्त हर्षसे भर गये और महाबली हनुमान्जीकी स्तुति करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १-२ ॥

प्रहृष्टा विस्मिताश्चापि ते वीक्षन्ते समन्ततः । त्रिविक्रमं कृतोत्साहं नारायणमिव प्रजाः ॥ ३ ॥

भावार्थ

वे उनके चारों ओर खड़े हो प्रसन्न एवं चकित होकर उन्हें इस प्रकार देखने लगे, जैसे उत्साहयुक्त नारायणावतार वामनजीको समस्त प्रजाने देखा था ॥ ३ ॥

संस्तूयमानो हनुमान् व्यवर्धत महाबलः । समाविद्ध्य च लाङ्गूलं हर्षाद् बलमुपेयिवान् ॥ ४ ॥

भावार्थ

अपनी प्रशंसा सुनकर महाबली हनुमान्ने शरीरको और भी बढ़ाना आरम्भ किया । साथ ही हर्षके साथ अपनी पूँछको बारंबार घुमाकर अपने महान् बलका स्मरण किया ॥ ४ ॥

तस्य संस्तूयमानस्य वृद्धैर्वानरपुङ्गवैः । तेजसाऽऽपूर्यमाणस्य रूपमासीदनुत्तमम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

बड़े-बूढ़े वानरशिरोमणियोंके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते और तेजसे परिपूर्ण होते हुए हनुमान्जीका रूप उस समय बड़ा ही उत्तम प्रतीत होता था ॥ ५ ॥

यथा विजृम्भते सिंहो विवृते गिरिगह्वरे । मारुतस्यौरसः पुत्रस्तथा सम्प्रति जृम्भते ॥ ६ ॥

भावार्थ

जैसे पर्वतकी विस्तृत कन्दरामें सिंह अँगड़ाई लेता है, उसी प्रकार वायुदेवताके औरस पुत्रने उस समय अपने शरीरको अँगड़ाई ले-लेकर बढ़ाया ॥ ६ ॥

अशोभत मुखं तस्य जृम्भमाणस्य धीमतः । अम्बरीषोपमं दीप्तं विधूम इव पावकः ॥ ७ ॥

भावार्थ

जँभाई लेते समय बुद्धिमान् हनुमान्जीका दीप्तिमान् मुख जलते हुए भाड़ तथा धूमरहित अग्निके समान शोभा पा रहा था ॥ ७ ॥

हरीणामुत्थितो मध्यात् सम्प्रहृष्टतनूरुहः । अभिवाद्य हरीन् वृद्धान् हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ८ ॥

भावार्थ

वे वानरोंके बीचसे उठकर खड़े हो गये । उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया । उस अवस्थामें हनुमान्जीने बड़े-बूढ़े वानरोंको प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥८॥

आरुजन् पर्वताग्राणि हुताशनसखोऽनिलः । बलवानप्रमेयश्च वायुराकाशगोचरः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘आकाशमें विचरनेवाले वायुदेवता बड़े बलवान् हैं । उनकी शक्तिकी कोई सीमा नहीं है । वे अग्निदेवके सखा हैं और अपने वेगसे बड़े-बड़े पर्वत-शिखरोंको भी तोड़ डालते हैं ॥ ९ ॥

तस्याहं शीघ्रवेगस्य शीघ्रगस्य महात्मनः । मारुतस्यौरसः पुत्रः प्लवनेनास्मि तत्समः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘अत्यन्त शीघ्र वेगसे चलनेवाले उन शीघ्रगामी महात्मा वायुका मैं औरस पुत्र हूँ और छलाँग मारनेमें उन्हींके समान हूँ ॥ १० ॥

उत्सहेयं हि विस्तीर्णमालिखन्तमिवाम्बरम् । मेरुं गिरिमसङ्गेन परिगन्तुं सहस्रशः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘कई सहस्र योजनोंतक फैले हुए मेरुगिरिकी, जो आकाशके बहुत बड़े भागको ढके हुए है और उसमें रेखा खींचता-सा जान पड़ता है, मैं बिना विश्राम लिये सहस्रों बार परिक्रमा कर सकता हूँ ॥ ११ ॥

बाहुवेगप्रणुन्नेन सागरेणाहमुत्सहे । समाप्लावयितुं लोकं सपर्वतनदीह्रदम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘अपनी भुजाओंके वेगसे समुद्रको विक्षुब्ध करके उसके जलसे मैं पर्वत, नदी और जलाशयोंसहित सम्पूर्ण जगत्को आप्लावित कर सकता हूँ ॥ १२ ॥

ममोरुजङ्घावेगेन भविष्यति समुत्थितः । समुत्थितमहाग्राहः समुद्रो वरुणालयः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘वरुणका निवासस्थान यह महासागर मेरी जाघों और पिंडलियोंके वेगसे विक्षुब्ध हो उठेगा और इसके भीतर रहनेवाले बड़े-बड़े ग्राह ऊपर आ जायँगे ॥ १३ ॥

पन्नगाशनमाकाशे पतन्तं पक्षिसेवितम् । वैनतेयमहं शक्तः परिगन्तुं सहस्रशः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘समस्त पक्षी जिनकी सेवा करते हैं, वे सर्पभोजी विनतानन्दन गरुड़ आकाशमें उड़ते हों तो भी मैं हजारों बार उनके चारों ओर घूम सकता हूँ ॥ १४ ॥

उदयात् प्रस्थितं वापि ज्वलन्तं रश्मिमालिनम् । अनस्तमितमादित्यमहं गन्तुं समुत्सहे ॥ १५ ॥ ततो भूमिमसंस्पृष्ट्वा पुनरागन्तुमुत्सहे । प्रवेगेनैव महता भीमेन प्लवगर्षभाः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘श्रेष्ठ वानरो ! उदयाचलसे चलकर अपने तेजसे प्रज्वलित होते हुए सूर्यदेवको मैं अस्त होनेसे पहले ही छू सकता हूँ और वहाँसे पृथ्वीतक आकर यहाँ पैर रक्खे बिना ही पुनः उनके पासतक बड़े भयंकर वेगसे जा सकता हूँ ॥ १५-१६॥

उत्सहेयमतिक्रान्तुं सर्वानाकाशगोचरान् । सागराञ् शोषयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम् ॥ १७॥ पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि प्लवमानः प्लवङ्गमाः । हरिष्याम्युरुवेगेन प्लवमानो महार्णवम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘आकाशचारी समस्त ग्रह-नक्षत्र आदिको लाँघकर आगे बढ़ जानेका उत्साह रखता हूँ । मैं चाहूँ तो समुद्रोंको सोख लूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूँगा और कूद-कूदकर पर्वतोंको चूर-चूर कर डालूँगा; क्योंकि मैं दूरतकी छलाँगें मारने-वाला वानर हूँ । महान् वेगसे महासागरको फाँदता हुआ मैं अवश्य उसके पार पहुँच जाऊँगा ॥ १७-१८ ॥

लतानां विविधं पुष्पं पादपानां च सर्वशः । अनुयास्यति मामद्य प्लवमानं विहायसा ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘आज आकाशमें वेगपूर्वक जाते समय लताओं और वृक्षोंके नाना प्रकारके फूल मेरे साथ-साथ उड़ते जायँगे॥१९॥

भविष्यति हि मे पन्थाः स्वातेः पन्था इवाम्बरे । चरन्तं घोरमाकाशमुत्पतिष्यन्तमेव च ॥ २० ॥ द्रक्ष्यन्ति निपतन्तं च सर्वभूतानि वानराः ।

भावार्थ

‘बहुत-से फूल बिखरे होनेके कारण मेरा मार्ग आकाशमें अनेक नक्षत्रपुञ्जोंसे सुशोभित स्वातिमार्ग ( छायापथ ) के समान प्रतीत होगा । वानरो ! आज समस्त प्राणी मुझे भयंकर आकाशमें सीधे जाते हुए, ऊपर उछलते हुए और नीचे उतरते हुए देखेंगे ॥ २०½ ॥

महामेरुप्रतीकाशं मां द्रक्ष्यध्वं प्लवङ्गमाः ॥ २१ ॥ दिवमावृत्य गच्छन्तं ग्रसमानमिवाम्बरम् । विधमिष्यामि जीमूतान् कम्पयिष्यामि पर्वतान् । सागरं शोषयिष्यामि प्लवमानः समाहितः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘कपिवरो ! तुम देखोगे, मैं महागिरि मेरुके समान विशाल शरीर धारण करके स्वर्गको ढकता और आकाशको निगलता हुआ-सा आगे बढ़ूँगा, बादलोंको छिन्न-भिन्न कर डालूँगा, पर्वतोंको हिला दूँगा और एकचित्त हो छलाँग मारकर आगे बढ़नेपर समुद्रको भी सुखा दूँगा ॥ २१-२२ ॥

वैनतेयस्य वा शक्तिर्मम वा मारुतस्य वा । ऋते सुपर्णराजानं मारुतं वा महाबलम् । न तद् भूतं प्रपश्यामि यन्मां प्लुतमनुव्रजेत् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘विनतानन्दन गरुडमें, मुझमें अथवा वायु देवतामें ही समुद्रको लाँघ जानेकी शक्ति है । पक्षिराज गरुड अथवा महाबली वायु देवताके सिवा और किसी प्राणीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो यहाँसे छलाँग मारनेपर मेरे साथ जा सके ॥ २३ ॥

निमेषान्तरमात्रेण निरालम्बनमम्बरम् । सहसा निपतिष्यामि घनाद् विद्युदिवोत्थिता ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘मेघसे उत्पन्न हुई विद्युत्की भाँति मैं पलक मारते-मारते सहसा निराधार आकाशमें उड़ जाऊँगा ॥ २४ ॥

भविष्यति हि मे रूपं प्लवमानस्य सागरम् । विष्णोः प्रक्रममाणस्य तदा त्रीन् विक्रमानिव ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘समुद्रको लाँघते समय मेरा वही रूप प्रकट होगा, जो तीनों पगोंको बढ़ाते समय वामनरूपधारी भगवान् विष्णुका हुआ था ॥ २५ ॥

बुद्ध्या चाहं प्रपश्यामि मनश्चेष्टा च मे तथा । अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीं प्रमोदध्वं प्लवङ्गमाः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘वानरो ! मैं बुद्धिसे जैसा देखता या सोचता हूँ, मेरे मनकी चेष्टा भी उसके अनुरूप ही होती है । मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं विदेहकुमारीका दर्शन करूँगा, अतः अब तुमलोग खुशियाँ मनाओ ॥ २६ ॥

मारुतस्य समो वेगे गरुडस्य समो जवे । अयुतं योजनानां तु गमिष्यामीति मे मतिः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘मैं वेगमें वायुदेवता तथा गरुडके समान हूँ । मेरा तो ऐसा विश्वास है कि इस समय मैं दस हजार योजनतक जा सकता हूँ ॥ २७ ॥

वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुवः । विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तद्दिहानये ॥ २८ ॥ लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मतिः ।

भावार्थ

‘वज्रधारी इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्माजीके हाथसे भी मैं बलपूर्वक अमृत छीनकर सहसा यहाँ ला सकता हूँ । समूची लङ्काको भी भूमिसे उखाड़कर हाथपर उठाये चल सकता हूँ । ऐसा मेरा विश्वास है’ ॥ २८½ ॥

तमेवं वानरश्रेष्ठं गर्जन्तममितप्रभम् ॥ २९ ॥ प्रहृष्टा हरयस्तत्र समुदैक्षन्त विस्मिताः ।

भावार्थ

अमिततेजस्वी वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी जब इस प्रकार गर्जना कर रहे थे, उस समय सम्पूर्ण वानर अत्यन्त हर्षमें भरकर चकितभावसे उनकी ओर देख रहे थे ॥ २९½ ॥

तच्चास्य वचनं श्रुत्वा ज्ञातीनां शोकनाशनम् ॥ ३० ॥ उवाच परिसंहृष्टो जाम्बवान् प्लवगेश्वरः ।

भावार्थ

हनुमान्जीकी बातें भाई-बन्धुओंके शोकको नष्ट करनेवाली थीं । उन्हें सुनकर वानर-सेनापति जाम्बवान्को बड़ी प्रसन्नता हुई । वे बोले—॥ ३०½ ॥

वीर केसरिणः पुत्र वेगवन् मारुतात्मज ॥ ३१ ॥ ज्ञातीनां विपुलः शोकस्त्वया तात प्रणाशितः ।

भावार्थ

‘वीर ! केसरीके सुपुत्र ! वेगशाली पवनकुमार ! तात ! तुमने अपने बन्धुओंका महान् शोक नष्ट कर दिया ॥ ३१½ ॥

तव कल्याणरुचयः कपिमुख्याः समागताः ॥ ३२ ॥ मङ्गलान्यर्थसिद्ध्यर्थे करिष्यन्ति समाहिताः ।

भावार्थ

‘यहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याणकी कामना करते हैं । अब ये कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे एकाग्रचित्त हो तुम्हारे लिये मङ्गलकृत्य—स्वस्तिवाचन आदिका अनुष्ठान करेंगे ॥ ३२½ ॥

ऋषीणां च प्रसादेन कपिवृद्धमतेन च ॥ ३३ ॥ गुरूणां च प्रसादेन सम्प्लव त्वं महार्णवम् ।

भावार्थ

‘ऋषियोंके प्रसाद, वृद्ध वानरोंकी अनुमति तथा गुरुजनोंकी कृपासे तुम इस महासागरके पार हो जाओ ॥ ३३½ ॥

स्थास्यामश्चैकपादेन यावदागमनं तव ॥ ३४ ॥ त्वद्गतानि च सर्वेषां जीवनानि वनौकसाम् ।

भावार्थ

‘जबतक तुम लौटकर यहाँ आओगे, तबतक हम तुम्हारी प्रतीक्षामें एक पैरसे खड़े रहेंगे; क्योंकि हम सब वानरोंका जीवन तुम्हारे ही अधीन है’ ॥ ३४½ ॥

ततश्च हरिशार्दूलस्तानुवाच वनौकसः ॥ ३५ ॥ कोऽपि लोके न मे वेगं प्लवने धारयिष्यति ।

भावार्थ

तदनन्तर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने उन बनवासी वानरोंसे कहा—‘जब मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा, उस समय संसारमें कोई भी मेरे वेगको धारण नहीं कर सकेगा ॥ ३५½ ॥

पतानीह नगस्यास्य शिलासंकटशालिनः ॥ ३६ ॥ शिखराणि महेन्द्रस्य स्थिराणि च महान्ति च । येषु वेगं गमिष्यामि महेन्द्रशिखरेष्वहम् ॥ ३७ ॥ नानाद्रुमविकीर्णेषु धातुनिष्पन्दशोभिषु ।

भावार्थ

‘शिलाओंके समूहसे शोभा पानेवाले केवल इस महेन्द्रपर्वतके ये शिखर ही ऊँचे-ऊँचे और स्थिर हैं, जिनपर नाना प्रकारके वृक्ष फैले हुए हैं तथा गैरिक आदि धातुओंके समुदाय शोभा दे रहे हैं । इन महेन्द्र-शिखरोंपर ही वेगपूर्वक पैर रखकर मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा ॥ ३६-३७½ ॥

एतानि मम वेगं हि शिखराणि महान्ति च ॥ ३८ ॥ प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामितः शतम् ।

भावार्थ

‘यहाँसे सौ योजनके लिये छलाँग मारते समय महेन्द्रपर्वतके ये महान् शिखर ही मेरे वेगको धारण कर सकेंगे’ ॥ ३८½ ॥

ततस्तु मारुतप्रख्यः स हरिर्मारुतात्मजः । आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दनः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

यों कहकर वायुके समान महापराक्रमी शत्रुमर्दन पवनकुमार हनुमान्जी पर्वतोंमें श्रेष्ठ महेन्द्रपर चढ़ गये ॥ ३९ ॥

वृतं नानाविधैः पुष्पैर्मृगसेवितशाद्वलम् । लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम् ॥ ४० ॥

भावार्थ

वह पर्वत नाना प्रकारके पुष्पयुक्त वृक्षोंसे भरा हुआ था, वन्य पशु वहाँकी हरी-हरी घास चर रहे थे, लताओं और फूलोंसे वह सघन जान पड़ता था और वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल-फूल लगे रहते थे ॥ ४० ॥

सिंहशार्दूलसहितं मत्तमातङ्गसेवितम् । मत्तद्विजगणोद्घुष्टं सलिलोत्पीडसंकुलम् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

महेन्द्र पर्वतके वनोंमें सिंह और बाघ भी निवास करते थे, मतवाले गजराज विचरते थे, मदमत्त पक्षियोंके समूह सदा कलरव किया करते थे तथा जलके स्रोतों और झरनोंसे वह पर्वत व्याप्त दिखायी देता था ॥ ४१ ॥

महद्भिरुच्छ्रितं शृङ्गैर्महेन्द्रं स महाबलः । विचचार हरिश्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

बड़े-बड़े शिखरोंसे ऊँचे प्रतीत होनेवाले महेन्द्र पर्वतपर आरूढ़ हो इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली कपिश्रेष्ठ हनुमान् वहाँ इधर-उधर टहलने लगे ॥ ४२ ॥

पादाभ्यां पीडितस्तेन महाशैलो महात्मना । ररास सिंहाभिहतो महान् मत्त इव द्विपः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

महाकाय हनुमान्जीके दोनों पैरोंसे दबा हुआ वह महान् पर्वत सिंहसे आक्रान्त हुए महान् मदमत्त गजराजकी भाँति चीत्कार-सा करने लगा ( वहाँ रहनेवाले प्राणियोंका शब्द ही मानो उसका आर्त्त चीत्कार था ) ॥ ४३ ॥

मुमोच सलिलोत्पीडान् विप्रकीर्णशिलोच्चयः । वित्रस्तमृगमातङ्गः प्रकम्पितमहाद्रुमः ॥ ४४ ॥

भावार्थ

उसके शिलासमूह इधर-उधर बिखर गये । उससे नये-नये झरने फूट निकले । वहाँ रहनेवाले मृग और हाथी भयसे थर्रा उठे और बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाकर झूमने लगे ॥४४॥

नानागन्धर्वमिथुनैः पानसंसर्गकर्कशैः । उत्पतद्भिर्विहंगैश्च विद्याधरगणैरपि ॥ ४५ ॥ त्यज्यमानमहासानुः संनिलीनमहोरगः । शैलशृङ्गशिलोत्पातस्तदाभूत् स महागिरिः ॥ ४६ ॥

भावार्थ

मधुपानके संसर्गसे उद्धत चित्तवाले अनेकानेक गन्धर्वोके जोड़े, विद्याधरोंके समुदाय और उड़ते हुए पक्षी भी उस पर्वतके विशाल शिखरोंको छोड़कर जाने लगे । बड़े-बड़े सर्प बिलोंमें छिप गये तथा उस पर्वतके शिखरोंसे बड़ी-बड़ी शिलाएँ टूट-टूटकर गिरने लगीं । इस प्रकार वह महान् पर्वत बड़ी दुरवस्थामें पड़ गया ॥ ४५-४६ ॥

निःश्वसद्भिस्तदा तैस्तु भुजगैरर्धनिःसृतैः । सप्ताक इवाभाति स तदा धरणीधरः ॥ ४७ ॥

भावार्थ

बिलोंसे अपने आधे शरीरको बाहर निकालकर लंबी साँस खींचते हुए सर्पोंसे उपलक्षित होनेवाला वह महान् पर्वत उस समय अनेकानेक पताकाओंसे अलंकृत-सा प्रतीत होता था ॥ ४७ ॥

ऋषिभिस्त्राससम्भ्रान्तैस्त्यज्यमानः शिलोच्चयः । सीदन् महति कान्तारे सार्थहीन इवाध्वगः ॥ ४८ ॥

भावार्थ

भयसे घबराये हुए ऋषि-मुनि भी उस पर्वतको छोड़ने लगे । जैसे विशाल दुर्गम वनमें अपने साथियोंसे बिछुड़ा हुआ एक राही भारी विपत्तिमें फँस जाता है, यही दशा उस महान् पर्वत महेन्द्रकी हो रही थी ॥ ४८ ॥

स वेगवान् वेगसमाहितात्मा हरिप्रवीरः परवीरहन्ता । मनः समाधाय महानुभावो जगाम लङ्कां मनसा मनस्वी ॥ ४९ ॥

भावार्थ

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वानरसेनाके श्रेष्ठ वीर वेगशाली महामनस्वी महानुभाव हनुमान्जीका मन वेगपूर्वक छलाँग मारनेकी योजनामें लगा हुआ था । उन्होंने चित्तको एकाग्र करके मन-ही-मन लङ्काका स्मरण किया ॥ ४९ ॥

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