किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 55
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम् । स्वामिसत्कारसंयुक्तमङ्गदो वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीका वचन विनययुक्त, धर्मानुकूल और स्वामीके प्रति सम्मानसे युक्त था । उसे सुनकर अङ्गदने कहा—॥ १ ॥
स्थैर्यमात्ममनःशौचमानृशंस्यमथार्जवम् । विक्रमश्चैव धैर्यं च सुग्रीवे नोपपद्यते ॥ २ ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! राजा सुग्रीवमें स्थिरता, शरीर और मनकी पवित्रता, क्रूरताका अभाव, सरलता, पराक्रम और धैर्य है—यह मान्यता ठीक नहीं जान पड़ती ॥ २ ॥
भ्रातुर्ज्येष्ठस्य यो भार्यां जीवतो महिषीं प्रियाम् । धर्मेण मातरं यस्तु स्वीकरोति जुगुप्सितः ॥ ३ ॥ कथं स धर्मं जानीते येन भ्रात्रा दुरात्मना । युद्धायाभिनियुक्तेन बिलस्य पिहितं मुखम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जिसने अपने बड़े भाईके जीते-जी उनकी प्यारी महारानीको, जो धर्मतः उसकी माताके समान थी, कुत्सित भावनासे ग्रहण कर लिया था, वह धर्मको जानता है, यह कैसे कहा जा सकता है ? जिस दुरात्माने युद्धके लिये जाते हुए भाईके द्वारा बिलकी रक्षाके कार्यमें नियुक्त होनेपर भी पत्थरसे उसका मुँह बंद कर दिया, वह कैसे धर्मज्ञ माना जा सकता है ! ॥३-४ ॥
सत्यात् पाणिगृहीतश्च कृतकर्मा महायशाः । विस्मृतो राघवो येन स कस्य सुकृतं स्मरेत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘जिन्होंने सत्यको साक्षी देकर उसका हाथ पकड़ा और पहले ही उसका कार्य सिद्ध कर दिया, उन महायशस्वी भगवान् श्रीरामको ही जब उसने भुला दिया, तब दूसरे किसके उपकारको वह याद रख सकता है ! ॥ ५ ॥
लक्ष्मणस्य भयेनेह नाधर्मभयभीरुणा । आदिष्टा मार्गितुं सीता धर्मस्तस्मिन् कथं भवेत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘जिसने अधर्मके भयसे डरकर नहीं, लक्ष्मणके ही भयसे भीत हो हमलोगोंको सीताकी खोजके लिये भेजा है, उसमें धर्मकी सम्भावना कैसे हो सकती है ? ॥ ६ ॥
तस्मिन् पापे कृतघ्ने तु स्मृतिभिन्ने चलात्मनि । आर्यः को विश्वसेज्जातु तत्कुलीनो विशेषतः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘उस पापी, कृतघ्न, स्मरण-शक्तिसे हीन और चञ्चल-चित्त सुग्रीवपर कोई श्रेष्ठ पुरुष, विशेषतः जो उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ हो, कभी भी किस तरह विश्वास कर सकता है ! ॥ ७ ॥
राज्ये पुत्रः प्रतिष्ठाप्यः सगुणो निर्गुणोऽपि वा । कथं शत्रुकुलीनं मां सुग्रीवो जीवयिष्यति ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘अपना पुत्र गुणवान् हो या गुणहीन, उसीको राज्यपर बिठाना चाहिये, ऐसी धारणा रखनेवाला सुग्रीव मुझ शत्रुकुलमें उत्पन्न हुए बालकको कैसे जीवित रहने देगा ? ॥ ८ ॥
भिन्नमन्त्रोऽपराद्धश्च भिन्नशक्तिः कथं ह्यहम् । किष्किन्धां प्राप्य जीवेयमनाथ इव दुर्बलः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीवसे अलग रहनेका जो मेरा गूढ़ विचार था, वह आज प्रकट हो गया । साथ ही, उसकी आज्ञाका पालन न करनेके कारण मैं अपराधी भी हूँ । इतना ही नहीं, मेरी शक्ति क्षीण हो गयी है । मैं अनाथके समान दुर्बल हूँ । ऐसी दशामें किष्किन्धामें जाकर कैसे जीवित रह सकूँगा ? ॥९॥
उपांशुदण्डेन हि मां बन्धनेनोपपादयेत् । शठः क्रूरो नृशंसश्च सुग्रीवो राज्यकारणात् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव शठ, क्रूर और निर्दयी है । वह राज्यके लिये मुझे गुप्तरूपसे दण्ड देगा अथवा सदाके लिये मुझे बन्धनमें डाल देगा ॥ १० ॥
बन्धनाच्चावसादान्मे श्रेयः प्रायोपवेशनम् । अनुजानन्तु मां सर्वे गृहं गच्छन्तु वानराः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार बन्धनजनित कष्ट भोगनेकी अपेक्षा उपवास करके प्राण दे देना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है । अतः सब वानर मुझे यहीं रहनेकी आज्ञा दें और अपने-अपने घरको चले जायँ ॥ ११ ॥
अहं वः प्रतिजानामि न गमिष्याम्यहं पुरीम् । इहैव प्रायमासिष्ये श्रेयो मरणमेव मे ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘मैं आपलोगोंसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं किष्किन्धापुरीको नहीं जाऊँगा । यहीं मरणान्त उपवास करूँगा । मेरा मर जाना ही अच्छा है ॥ १२ ॥
अभिवादनपूर्वं तु राजा कुशलमेव च । अभिवादनपूर्वं तु राघवौ बलशालिनौ ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘आपलोग राजा सुग्रीवको प्रणाम करके उनसे मेरा कुशल-समाचार कहियेगा । अपने बलके कारण शोभा पानेवाले दोनों रघुवंशी बन्धुओंसे भी मेरा सादर प्रणाम निवेदन करते हुए कुशल-समाचार कह दीजियेगा ॥ १३ ॥
वाच्यस्तातो यवीयान् मे सुग्रीवो वानरेश्वरः । आरोग्यपूर्वं कुशलं वाच्या माता रुमा च मे ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘मेरे छोटे पिता वानरराज सुग्रीव और माता रुमासे भी मेरा आरोग्यपूर्वक कुशल-समाचार बताइयेगा ॥ १४ ॥
मातरं चैव मे तारामाश्वासयितुमर्हथ । प्रकृत्या प्रियपुत्रा सा सानुक्रोशा तपस्विनी ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘मेरी माता ताराको भी धैर्य बँधाइयेगा । वह बेचारी स्वभावसे ही दयालु और पुत्रपर प्रेम रखनेवाली है ॥ १५ ॥
विनष्टमिह मां श्रुत्वा व्यक्तं हास्यति जीवितम् । एतावदुक्त्वा वचनं वृद्धांस्तानभिवाद्य च ॥ १६ ॥ विवेश चाङ्गदो भूमौ रुदन् दर्भेषु दुर्मनाः ।
भावार्थ
‘यहाँ मेरे नष्ट होनेका समाचार सुनकर वह निश्चय ही अपने प्राण त्याग देगी ।‘ इतना कहकर अङ्गदने उन सभी बड़े-बूढ़े वानरोंको प्रणाम किया और धरतीपर कुश बिछाकर उदास मुँहसे रोते-रोते वे मरणान्त उपवासके लिये बैठ गये ॥ १६½ ॥
तस्य संविशतस्तत्र रुदन्तो वानरर्षभाः ॥ १७ ॥ नयनेभ्यः प्रमुमुचुरुष्णं वै वारि दुःखिताः । सुग्रीवं चैव निन्दन्तः प्रशंसन्तश्च वालिनम् ॥ १८ ॥ परिवार्याङ्गदं सर्वे व्यवसन् प्रायमासितुम् ।
भावार्थ
उनके इस प्रकार बैठनेपर सभी श्रेष्ठ वानर रोने लगे और दुखी हो नेत्रोंसे गरम-गरम आँसू बहाने लगे । सुग्रीवकी निन्दा और वालीकी प्रशंसा करते हुए उन सबने अङ्गदको सब ओरसे घेरकर आमरण उपवास करनेका निश्चय किया ॥ १७-१८½ ॥
तद् वाक्यं वालिपुत्रस्य विज्ञाय प्लवगर्षभाः ॥ १९ ॥ उपस्पृश्योदकं सर्वे प्राङ्मुखाः समुपाविशन् । दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु उदक्तीरं समाश्रिताः ॥ २० ॥ मुमूर्षवो हरिश्रेष्ठा एतत् क्षममिति स्म ह ।
भावार्थ
वालिकुमारके वचनोंपर विचार करके उन वानरशिरोमणियोंने मरना ही उचित समझा और मृत्युकी इच्छासे आचमन करके समुद्रके उत्तर तटपर दक्षिणाग्र कुश बिछाकर वे सब-के-सब पूर्वाभिमुख हो बैठ गये ॥ १९-२०½ ॥
रामस्य वनवासं च क्षयं दशरथस्य च ॥ २१ ॥ जनस्थानवधं चैव वधं चैव जटायुषः । हरणं चैव वैदेह्या वालिनश्च वधं तथा । रामकोपं च वदतां हरीणां भयमागतम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
श्रीरामके वनवास, राजा दशरथकी मृत्यु, जनस्थानवासी राक्षसोंके संहार, विदेहकुमारी सीताके अपहरण, जटायुके मरण, वालीके वध और श्रीरामके क्रोधकी चर्चा करते हुए उन वानरोंपर एक दूसरा ही भय आ पहुँचा ॥२१-२२ ॥
स संविशद्भिर्बहुभिर्महीधरो महाद्रिकूटप्रतिमैः प्लवंगमैः । बभूव संनादितनिर्दरान्तरो भृशं नदद्भिर्जलदैरिवाम्बरम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
महान् पर्वत-शिखरोंके समान शरीरवाले वहाँ बैठे हुए बहुसंख्यक वानर भयके मारे जोर-जोरसे शब्द करने लगे, जिससे उस पर्वतकी कन्दराओंका भीतरी भाग प्रतिध्वनित हो उठा और गर्जते हुए मेघोंसे युक्त आकाशके समान प्रतीत होने लगा ॥ २३ ॥
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